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भूतिया मम्मी का सच (भाग 1)

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। आसमान में बार-बार बिजली चमकती और कुछ सेकंड के लिए पूरा घर सफेद रोशनी से भर जाता। उसके बाद फिर वही घना अंधेरा और बारिश की आवाज।

बारह साल का आरव अपनी किताब लेकर बिस्तर पर बैठा था। अगले दिन उसका स्कूल में टेस्ट था, लेकिन उसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

उसका नया घर बहुत बड़ा था। शहर से दूर एक पुराने मोहल्ले में बना यह मकान उसके पिता ने कुछ ही महीने पहले खरीदा था। घर की सबसे अजीब बात थी—ऊपरी मंजिल का एक कमरा।

उस कमरे पर हमेशा ताला लगा रहता था।

आरव ने कई बार पापा से पूछा था, “पापा, ऊपर वाला कमरा बंद क्यों रहता है?”

पापा हर बार एक ही जवाब देते, “वह पुराना स्टोर रूम है। उसमें बहुत बेकार सामान पड़ा है। तुम वहाँ मत जाना।”

लेकिन आरव को लगता था कि पापा उससे कुछ छिपा रहे हैं।

उसकी माँ की मृत्यु तीन साल पहले हो चुकी थी। आरव को अपनी माँ की बहुत कम यादें थीं। उसे बस इतना याद था कि माँ उसे रात में कहानी सुनाकर सुलाती थीं और उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहती थीं—

“आरव, चाहे दुनिया में कुछ भी हो जाए, मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँगी।”

माँ की मृत्यु के बाद पापा ने दूसरी शादी नहीं की थी। आरव अक्सर सोचता था कि शायद पापा भी माँ को बहुत याद करते हैं।

उस रात अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

ठक… ठक… ठक…

आरव ने किताब बंद कर दी।

आवाज फिर आई।

ठक… ठक… ठक…

ऐसा लग रहा था जैसे कोई धीरे-धीरे ऊपर वाले बंद कमरे के बाहर चल रहा हो।

आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

उसने सोचा, शायद बिल्ली होगी।

तभी ऊपर से एक और आवाज आई।

“आरव…”

वह जम गया।

आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन वह पहचान गया था।

वह उसकी माँ की आवाज थी।

“आरव…”

उसके हाथ से किताब नीचे गिर गई।

कुछ देर तक वह हिल भी नहीं पाया।

फिर उसने खुद को समझाया, “नहीं… यह मेरा भ्रम है। माँ तो…”

उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

फिर आवाज आई—

“आरव… दरवाजा खोल दो…”

अब आरव बिस्तर से उतर चुका था।

वह धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकला। गलियारे में अंधेरा था। बिजली कुछ देर पहले ही चली गई थी। उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

हर सीढ़ी पर उसके पैर कांप रहे थे।

ऊपर पहुंचकर उसने देखा कि बंद कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था।

आरव की सांस रुक गई।

जिस कमरे पर हमेशा भारी ताला लगा रहता था, वह आज खुला था।

दरवाजे के अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

“आरव…”

इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास सुनाई दी।

वह डरकर पीछे मुड़ा।

वहाँ कोई नहीं था।

तभी कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी अपने आप हिलने लगी।

चर्र… चर्र…

आरव ने मोबाइल की रोशनी कमरे में डाली।

दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। एक कोने में लोहे का संदूक रखा था। सामने एक बड़ी अलमारी थी।

और दीवार पर एक तस्वीर लगी थी।

आरव की आँखें फैल गईं।

वह उसकी माँ की तस्वीर थी।

लेकिन तस्वीर में माँ मुस्कुरा नहीं रही थीं।

उनका चेहरा उदास था और उनकी आँखें सीधी आरव को देख रही थीं।

आरव तस्वीर के पास गया।

तस्वीर के नीचे धूल से ढका एक छोटा-सा कागज रखा था।

उसने उसे उठाया।

उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“जिसे तुम अपनी माँ समझ रहे हो, उससे दूर रहना।”

आरव के हाथ कांपने लगे।

तभी पीछे से दरवाजा जोर से बंद हो गया।

धड़ाम!

आरव चीख पड़ा।

उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन कुंडी बाहर से बंद थी।

अचानक कमरे में किसी के रोने की आवाज आने लगी।

“आरव… मुझे यहाँ से निकालो…”

आरव ने पीछे देखा।

कमरे के अंधेरे कोने में एक औरत खड़ी थी।

उसके लंबे काले बाल चेहरे पर फैले हुए थे। सफेद साड़ी जमीन को छू रही थी। उसके पैर दिखाई नहीं दे रहे थे।

आरव का शरीर सुन्न पड़ गया।

औरत ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

वह चेहरा उसकी माँ का था।

“माँ…”

आरव के मुंह से अनायास निकला।

औरत मुस्कुराई।

लेकिन वह मुस्कान इंसानी नहीं थी।

उसने अपना हाथ आरव की ओर बढ़ाया।

“बेटा… इतने साल बाद आए हो…”

आरव पीछे हटने लगा।

तभी उसकी नजर औरत के पैरों पर पड़ी।

उसके पैर उल्टे थे।

आरव जोर से चीखा।

और उसी क्षण कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

तेज हवा अंदर आई और मेज पर रखे कागज हवा में उड़ने लगे।

उनमें से एक कागज आरव के पैरों के पास गिरा।

उस पर लिखा था—

“अगर वह तुम्हारी माँ जैसी दिखती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह तुम्हारी माँ है।”

अचानक कमरे की सारी लाइटें जल उठीं।

औरत गायब थी।

दरवाजा खुला हुआ था।

आरव दौड़ता हुआ नीचे आया।

पापा अभी घर नहीं लौटे थे।

वह पूरी रात अपने कमरे में दुबका रहा।

सुबह पापा आए तो आरव ने पूरी घटना उन्हें बताई।

पापा का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।

उन्होंने तुरंत ऊपर जाकर कमरे का दरवाजा देखा।

लेकिन अब वहाँ फिर से ताला लगा हुआ था।

पापा कुछ देर तक चुप रहे।

फिर उन्होंने आरव से कहा—

“आज से तुम कभी ऊपर नहीं जाओगे।”

आरव ने पूछा, “पापा, वह कौन थी?”

पापा ने उसकी तरफ देखा।

उनकी आँखों में डर था।

“मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें यह सच कभी पता चले।”

आरव ने पूछा, “कौन-सा सच?”

पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

उन्होंने बस जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

तस्वीर में आरव की माँ थी।

और उसके पीछे एक दूसरी औरत खड़ी थी।

वह बिल्कुल उसी भूत जैसी दिख रही थी।

तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

15 अगस्त 1998।

आरव ने तारीख देखते ही पूछा—

“पापा… यह औरत कौन है?”

पापा ने धीमी आवाज में कहा—

“यही वह राज है जिसकी वजह से तुम्हारी माँ मरी थी।”

और तभी ऊपर से फिर वही आवाज आई—

“आरव…”

दोनों ने एक साथ ऊपर देखा।

घर की छत से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज आ रही थी।

ठक… ठक… ठक…

 

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