सुबह तक काली हवेली पूरी तरह मलबे में बदल चुकी थी।
गाँव वाले दूर खड़े होकर उस जगह को देख रहे थे।
हरिराम बाबा भी वहाँ पहुँचे।
उन्होंने आरव, निखिल, करण और मोहित को देखा।
चारों जिंदा थे।
बाबा ने राहत की साँस ली।
“सब खत्म हो गया।”
आरव ने कुछ नहीं कहा।
वह मलबे की तरफ देखता रहा।
उसके मन में सिर्फ मीरा का चेहरा था।
कुछ देर बाद पुलिस भी आई।
हवेली के अंदर से पुराने कागज, तस्वीरें और कई साल पुरानी चीजें मिलीं।
लेकिन सबसे अजीब चीज थी—
एक पुराना रजिस्टर।
उसमें उन सभी लोगों के नाम लिखे थे जो पिछले पैंतीस सालों में हवेली के आसपास गायब हुए थे।
हर नाम के सामने एक तारीख थी।
सबसे आखिरी नाम था—
मोहित।
आरव का दिल बैठ गया।
“ये कैसे हो सकता है?”
मोहित तो उसके सामने खड़ा था।
हरिराम बाबा ने रजिस्टर देखा।
उन्होंने कहा—
“इसे यहीं छोड़ दो।”
लेकिन आरव को यकीन नहीं हुआ।
उसने आखिरी पन्ना पलटा।
वहाँ एक और नाम लिखा था—
आरव।
उसके सामने तारीख थी—
आज की।
आरव ने घबराकर पन्ना बंद कर दिया।
“बाबा…”
हरिराम बाबा ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे भी यही डर था।”
“क्या?”
बाबा ने कहा—
“हवेली में सिर्फ एक आत्मा नहीं थी।”
आरव चौंक गया।
“तो कितनी?”
बाबा ने मलबे की तरफ देखते हुए कहा—
“जितने लोग वहाँ मरे, उतनी ही।”
मोहित धीरे-धीरे उनके पास आया।
“लेकिन हमने तो उस आत्मा को खत्म कर दिया।”
बाबा ने सिर हिलाया।
“तुमने सिर्फ उस आत्मा को रोका है।”
“खत्म नहीं किया?”
“नहीं।”
तभी हवा का एक ठंडा झोंका आया।
आरव ने पीछे देखा।
मलबे के बीच वही छोटा आईने का टुकड़ा पड़ा था।
वह उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।
हरिराम बाबा ने चिल्लाया—
“उसे मत छूना!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
आरव ने आईना उठा लिया।
आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।
फिर धीरे-धीरे उसके पीछे मीरा दिखाई दी।
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
“मीरा…”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
उसने सिर्फ पीछे की तरफ इशारा किया।
आरव ने पलटकर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर आईने में देखा।
मीरा के पीछे…
एक लंबा आदमी खड़ा था।
वही काली आत्मा।
आरव के हाथ से आईने का टुकड़ा गिर गया।
छन्न!
आईना टूट गया।
उसी पल मोहित ने सिर पकड़ लिया।
“मुझे फिर वही आवाज सुनाई दे रही है।”
आरव ने पूछा—
“क्या?”
मोहित ने काँपते हुए कहा—
“दरवाजा खोलो…”
सभी चुप हो गए।
हरिराम बाबा ने मलबे की तरफ देखा।
“कौन सा दरवाजा?”
मोहित ने उंगली से जमीन के नीचे की तरफ इशारा किया।
“तीसरा कमरा।”
आरव ने कहा—
“लेकिन हवेली तो गिर चुकी है।”
मोहित ने सिर हिलाया।
“कमरा नहीं गिरा।”
सभी ने मलबे की तरफ देखा।
वहाँ पत्थरों के बीच एक लोहे का छोटा दरवाजा दिखाई दे रहा था।
उस पर वही शब्द लिखे थे—
“इसे मत खोलना।”
हरिराम बाबा पीछे हट गए।
“इसे बंद ही रहने दो।”
लेकिन अंदर से आवाज आई।
पहले बहुत धीमी।
फिर साफ।
ठक… ठक… ठक…
आरव का शरीर ठंडा पड़ गया।
फिर एक लड़की की आवाज आई—
“भैया…”
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
उसे मीरा याद आई।
उसने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया।
बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं।”
आरव ने कहा—
“अगर अंदर कोई जिंदा है तो?”
बाबा ने कहा—
“पैंतीस साल तक कोई जिंदा नहीं रह सकता।”
अंदर से फिर आवाज आई—
“भैया… मुझे बाहर निकालो…”
आरव के आँसू निकल आए।
उसने धीरे से कहा—
“मीरा?”
अंदर से जवाब आया—
“हाँ।”
आरव ने दरवाजे पर हाथ रख दिया।
तभी पीछे से मोहित चिल्लाया—
“आरव! मत खोलना!”
आरव ने पलटकर देखा।
मोहित की आँखें फिर काली हो चुकी थीं।
वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।
“क्योंकि…”
उसकी आवाज बदल गई।
“मीरा अंदर नहीं है।”
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
मोहित ने कहा—
“वह तो आज़ाद हो चुकी है।”
दरवाजे के अंदर से अचानक एक भारी पुरुष आवाज आई—
“लेकिन मैं अभी भी अंदर हूँ।”
हरिराम बाबा ने तुरंत आरव को पीछे खींच लिया।
दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
गाँव वाले डरकर पीछे हटने लगे।
और फिर अचानक सब शांत हो गया।
सुबह तक उस जगह को मिट्टी और पत्थरों से पूरी तरह बंद कर दिया गया।
उस दिन के बाद गाँव में किसी ने काली हवेली का नाम तक नहीं लिया।
आरव ने शहर वापस जाकर अपनी जिंदगी शुरू कर दी।
लेकिन एक चीज कभी सामान्य नहीं हुई।
हर रात ठीक 12:00 बजे उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक होती।
ठक… ठक… ठक…
पहली रात उसने ध्यान नहीं दिया।
दूसरी रात भी नहीं।
तीसरी रात उसने दरवाजा खोल दिया।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।
आरव ने तस्वीर उठाई।
उसमें काली हवेली के सामने पाँच बच्चे खड़े थे।
मीरा।
आरव।
उसका छोटा भाई।
और दो बच्चे जिन्हें वह पहचानता नहीं था।
तस्वीर के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“हवेली में पाँच कमरे थे।”
आरव ने काँपते हुए तस्वीर पलटी।
नीचे एक और लाइन लिखी थी—
“तुमने अभी तक सिर्फ तीसरा कमरा खोला है।”
उसी पल उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।
अंधेरे में एक बच्चे की आवाज आई—
“भैया… चौथा कमरा खोलोगे?”
और दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
समाप्त… !!

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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