आरव अपने पिता को सामने देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।
उसका चेहरा वही था जिसे उसने बचपन से तस्वीरों में देखा था।
वही आँखें…
वही चेहरा…
लेकिन उसके शरीर के चारों तरफ धुंध की एक परत थी।
आरव की आवाज़ काँप गई।
“पापा…?”
उस आकृति ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ, बेटा।”
दीनानाथ पीछे हट गया।
“राघव…”
आरव ने अपने पिता से पूछा—
“आपने मुझे इतने सालों तक सच क्यों नहीं बताया?”
राघव ने उसकी ओर देखा।
“क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”
“लेकिन मैं सामान्य जिंदगी जी ही नहीं पाया!”
आरव की आँखों से आँसू निकल आए।
“मुझे हमेशा लगता रहा कि मेरे अंदर कुछ अधूरा है। अब पता चल रहा है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”
राघव ने कहा—
“झूठ नहीं था, बेटा। वह मेरी मजबूरी थी।”
आरव ने चिट्ठी उठाई।
“इसमें लिखा है कि देवेंद्र से मेरा रिश्ता मेरी सोच से ज्यादा गहरा है। इसका क्या मतलब है?”
राघव कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“देवेंद्र तुम्हारा चाचा नहीं था।”
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
“तो कौन था?”
राघव की आवाज़ भारी हो गई।
“वह तुम्हारा पिता था।”
आरव की साँस जैसे रुक गई।
“नहीं…”
“मीरा से तुम्हारा जन्म हुआ था। देवेंद्र तुम्हारा जैविक पिता था।”
आरव पीछे हट गया।
“तो आपने मुझे क्यों पाला?”
राघव ने कहा—
“क्योंकि देवेंद्र तुम्हें अपने लालच के लिए इस्तेमाल करना चाहता था। तुम्हारे दादा ने पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी। देवेंद्र तुम्हें खत्म करना चाहता था।”
“और मीरा?”
“मीरा ने तुम्हें बचाने के लिए अपनी जान दे दी।”
आरव की आँखों के सामने सारी घटनाएँ घूमने लगीं।
वह हवेली…
बंद कमरा…
आईना…
मीरा की आत्मा…
और वह आहट।
तभी राघव ने कहा—
“लेकिन देवेंद्र को पूरी तरह खत्म करना जरूरी था।”
आरव ने पूछा—
“आपने उसे कैसे रोका?”
“मैंने उसे उसी रात तहखाने में बंद कर दिया। लेकिन वह मरने से पहले एक श्राप छोड़ गया।”
दीनानाथ ने काँपते हुए कहा—
“उसने कहा था कि जब तक उसका खून इस हवेली में वापस नहीं आएगा, उसकी आत्मा मुक्त नहीं होगी।”
आरव ने समझते हुए पूछा—
“इसलिए उसने मुझे बुलाया?”
राघव ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
अचानक जमीन काँपने लगी।
कब्रिस्तान की मिट्टी फटने लगी।
हवा में तेज़ ठंड फैल गई।
दीनानाथ चिल्लाया—
“हमें यहाँ से जाना होगा!”
लेकिन तभी सामने की जमीन से एक काला धुआँ उठने लगा।
उस धुएँ के बीच देवेंद्र की आकृति दिखाई दी।
“भागोगे कहाँ?”
उसकी आवाज़ पूरे कब्रिस्तान में गूँज उठी।
आरव ने अपने पिता की ओर देखा।
“अब क्या होगा?”
राघव ने कहा—
“तुम्हें हवेली वापस जाना होगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि इस कहानी का अंत वहीं होगा जहाँ इसकी शुरुआत हुई थी।”
कुछ ही देर बाद आरव और दीनानाथ वापस हवेली पहुँचे।
हवेली पहले से बिल्कुल अलग लग रही थी।
खिड़कियाँ खुली थीं।
दरवाज़े अपने आप हिल रहे थे।
और अंदर से लगातार एक ही आवाज़ आ रही थी—
ठक… ठक… ठक…
आरव धीरे-धीरे अंदर गया।
दीवार पर लगी घड़ी फिर बारह बजे पर रुक गई।
तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।
इस बार उसका चेहरा शांत था।
उसने आरव की ओर हाथ बढ़ाया।
“डरो मत।”
आरव ने पूछा—
“माँ… अब क्या करना है?”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम्हें उस कमरे में जाना होगा जहाँ मेरा अंत हुआ था।”
आरव तीसरी मंज़िल पर पहुँचा।
बंद कमरा अब खुला था।
कमरे के बीच में एक पुरानी कुर्सी रखी थी।
उसके सामने देवेंद्र खड़ा था।
“आ गए मेरे बेटे?”
आरव ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ, लेकिन तुम्हारी तरह नहीं बनूँगा।”
देवेंद्र हँसा।
“तुम्हारे खून में मेरा खून है।”
आरव ने कहा—
“खून इंसान को नहीं बनाता। उसके कर्म बनाते हैं।”
देवेंद्र का चेहरा बदल गया।
उसकी आँखें लाल हो गईं।
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे खिलाफ कर दिया।”
“नहीं,” आरव ने कहा, “तुम्हारे कर्मों ने किया।”
देवेंद्र ने हाथ उठाया।
कमरे की सारी चीज़ें हवा में उठने लगीं।
कुर्सी दीवार से जा टकराई।
खिड़कियों के शीशे टूटने लगे।
दीनानाथ बाहर से चिल्लाया—
“आरव! मीरा का लॉकेट!”
आरव ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।
जैसे ही उसने उसे हाथ में पकड़ा, कमरे में तेज़ सफेद रोशनी फैल गई।
मीरा सामने आ गई।
देवेंद्र पीछे हटने लगा।
“नहीं!”
मीरा ने कहा—
“यह लॉकेट उस रात मेरे पास था। इसमें तुम्हारी सारी ताकत नहीं, तुम्हारा सच बंद है।”
आरव ने लॉकेट जमीन पर रख दिया।
अचानक कमरे में मीरा, राघव और देवेंद्र तीनों दिखाई देने लगे।
तीनों की आत्माएँ जैसे एक-दूसरे से जुड़ गईं।
राघव ने आरव से कहा—
“बेटा, हमें जाने दो।”
आरव समझ गया।
उसने आँखें बंद कर लीं और कहा—
“मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”
मीरा मुस्कुराई।
राघव ने भी मुस्कुराकर सिर झुका दिया।
लेकिन देवेंद्र चीख रहा था।
“नहीं! मैं नहीं जाऊँगा!”
उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
मीरा ने उसकी ओर देखा।
“अब इस घर पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।”
अचानक कमरे में जोरदार रोशनी हुई।
देवेंद्र की परछाईं चीखते हुए दीवार में समा गई।
और उसी क्षण…
ठक… ठक… ठक…
आखिरी बार आवाज़ आई।
फिर सब शांत हो गया।
सुबह होने तक हवेली पूरी तरह शांत थी।
आरव बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठ गया।
पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी बोझ उतर गया हो।
दीनानाथ उसके पास आया।
“सब खत्म हो गया।”
आरव ने हवेली की ओर देखा।
“हाँ।”
लेकिन तभी ऊपर तीसरी मंज़िल की खिड़की में उसे एक सफेद आकृति दिखाई दी।
मीरा।
वह मुस्कुरा रही थी।
आरव ने हाथ जोड़ दिए।
अगले ही पल वह आकृति गायब हो गई।
कुछ महीनों बाद आरव ने हवेली को गिराने का फैसला किया।
मजदूरों ने काम शुरू किया।
जब तीसरी मंज़िल की दीवार तोड़ी गई, तो उसके अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।
संदूक के अंदर सिर्फ एक कागज़ था।
उस पर लिखा था—
“हर आहट डर की निशानी नहीं होती। कभी-कभी कोई अपना यह बताने आता है कि वह अब भी तुम्हारे साथ है।”
आरव ने वह कागज़ संभालकर रख लिया।
उसने हवेली को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
ठीक एक साल बाद…
आरव अपने नए घर में रात को अकेला बैठा था।
घड़ी में बारह बज रहे थे।
अचानक उसके कमरे के बाहर से आवाज़ आई—
ठक… ठक… ठक…
आरव की आँखें खुल गईं।
वह धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।
दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
फर्श पर सिर्फ एक छोटा सा लॉकेट पड़ा था।
वही लॉकेट…
जो उसने हवेली में छोड़ दिया था।
आरव ने उसे उठाया।
पीछे एक नया वाक्य खुदा हुआ था—
“आरव, कहानी खत्म नहीं हुई…”
उसी क्षण उसके पीछे से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।
“ही… ही… ही…”
आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
कमरे के कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।
उसके गले में वही लॉकेट था।
और उसकी आँखें बिल्कुल मीरा जैसी थीं।
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—
“माँ मुझे लेने आएगी।”
कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
और अंधेरे में आखिरी बार वही आवाज़ गूँजी—
ठक… ठक… ठक…
समाप्त।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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