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  • ”तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 12

    ”तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    एपिसोड – 12 : अपनों के बीच छिपा गद्दार

     

    नंदिनी के पत्र में लिखा नाम देखकर आरव और आरोही दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं।

     

    कुछ पल तक किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि उन्होंने जो पढ़ा था, वो सच हो सकता है।

     

    आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “नहीं… ये नहीं हो सकता।”

     

    आरव ने पत्र दोबारा पढ़ा।

     

    उसमें साफ लिखा था “जिस इंसान पर तुम्हारे पिता और राजवीर ने सबसे ज्यादा भरोसा किया, वही इस पूरे खेल का असली हिस्सा है।”

     

    और नीचे एक नाम था “समीर मल्होत्रा।”

     

    आरव ने तुरंत सिर उठाया।

     

    “समीर अंकल?”

     

    आरोही ने उसे देखा।

     

    “वो तो पापा के सबसे करीबी दोस्त थे।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “और राजवीर सर के बिजनेस पार्टनर भी।”

     

    आरव ने पत्र को मुट्ठी में कस लिया।

     

    “इसका मतलब ये हो ही नहीं सकता।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे।

     

    “मेरे पापा उन्हें अपने भाई जैसा मानते थे।”

     

    कबीर ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “हो सकता है नंदिनी जी ने भी यही समझा हो कि वो भरोसे के लायक हैं। लेकिन हमें बिना जांचे किसी को दोषी नहीं मानना चाहिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “सही कह रहे हो।”

     

    आरोही ने पत्र वापस बॉक्स में रख दिया।

     

    तभी उसकी नजर बॉक्स में पड़े छोटे से लॉकेट पर गई।

     

    उसने उसे उठाया।

     

    “ये मां का है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “बचपन से मैंने मां के पुराने सामान में ऐसा ही लॉकेट देखा था।”

     

    उसने लॉकेट खोला।

     

    अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर देखकर आरोही की सांस अटक गई।

     

    उसमें नंदिनी और समीर साथ खड़े थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक तारीख लिखी थी “उस रात से एक दिन पहले।”

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    “उस रात से एक दिन पहले… यानी पापा की मौत से ठीक एक दिन पहले।”

     

    कबीर ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “इस तस्वीर के पीछे कुछ और लिखा है।”

     

    बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था “अगर समीर ने धोखा दिया, तो M-17 के नीचे जाना।”

     

    तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “हमें वापस वहीं जाना होगा।”

     

    शाम होते-होते तीनों फिर उसी पुराने रिकॉर्ड रूम में पहुंच गए।

     

    हरिशंकर भी उनके साथ थे।

     

    आरव ने उनसे पूछा,

     

    “आपको M-17 के नीचे किसी रास्ते के बारे में पता है?”

     

    हरिशंकर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “हां।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि वहां जाना खतरे से खाली नहीं है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब पीछे हटने का वक्त नहीं है।”

     

    हरिशंकर उन्हें कमरे के पीछे बने एक पुराने गलियारे में ले गए।

     

    कुछ दूर चलने के बाद फर्श पर लोहे की एक प्लेट दिखाई दी।

     

    हरिशंकर ने उसे हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियां थीं।

     

    आरोही ने डरते हुए आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हमें नीचे जाना चाहिए?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “अगर तुम नहीं जाना चाहती तो हम वापस जा सकते हैं।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां। मैं अपने पापा के लिए सच जानना चाहती हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।

     

    “तो चलो।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    कबीर पीछे था।

     

    हरिशंकर सबसे अंत में।

     

    नीचे एक पुराना कमरा था।

     

    दीवारों पर धूल जमी थी।

     

    बीच में लोहे की अलमारी थी।

     

    आरव ने उस पर हाथ रखा।

     

    “ये वही जगह है?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “यहां क्या रखा था?”

     

    “तुम्हारे पिता और विनय साहब ने कई दस्तावेज यहां छुपाए थे।”

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर कई फाइलें थीं।

     

    एक फाइल पर लिखा था “समीर मल्होत्रा।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर बैंक लेन-देन की जानकारी थी।

     

    दूसरे पन्ने पर कंपनी के कागजात।

     

    तीसरे पन्ने पर कुछ हस्ताक्षर।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “ये देखो।”

     

    एक दस्तावेज में समीर ने करोड़ों रुपये की रकम एक विदेशी खाते में ट्रांसफर की थी।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो ये सच है।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    कबीर ने अगला पन्ना निकाला।

     

    उसमें लिखा था “समीर ने विक्रम के साथ मिलकर कंपनी के पैसे बाहर भेजे।”

     

    आरोही ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

     

    “पापा को ये सब पता चल गया था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “और शायद इसी वजह से उन्हें मार दिया गया।”

     

    तभी हरिशंकर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सबने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “विनय साहब की मौत के समय समीर वहां नहीं था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आपने देखा था?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर?”

     

    हरिशंकर ने एक और फाइल निकाली।

     

    उस पर लिखा था “असली हत्यारा।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    हरिशंकर ने फाइल खोलने से पहले कहा,

     

    “इसे पढ़ने के बाद तुम्हें अपनी मां पर भी शक हो सकता है।”

     

    आरोही ने दृढ़ आवाज में कहा,

     

    “अब मुझे किसी से डर नहीं लगता।”

     

    फाइल खुली।

     

    अंदर एक तस्वीर थी।

     

    एक अस्पताल की।

     

    तस्वीर में नंदिनी किसी आदमी से बात कर रही थीं।

     

    आरव ने तस्वीर गौर से देखी।

     

    “ये आदमी कौन है?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “वही जो उस रात अस्पताल में आया था।”

     

    कबीर ने तस्वीर को बड़ा किया।

     

    अचानक उसके चेहरे पर हैरानी छा गई।

     

    “मैं इसे जानता हूं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “ये आदमी… समीर का भाई है।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “लेकिन नंदिनी मां की मौत तो विराज के आदमियों ने करवाई थी!”

     

    हरिशंकर ने सिर हिलाया।

     

    “यही बात झूठ थी।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “किसने झूठ बोला?”

     

    हरिशंकर ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “विनय ने?”

     

    “हां।”

     

    आरोही को जैसे झटका लगा।

     

    “पापा ने मां की मौत का सच क्यों छुपाया?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “क्योंकि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्हें जहर दिया गया था।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “किसने?”

     

    हरिशंकर चुप रहे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “बोलिए।”

     

    उन्होंने धीरे से कहा “समीर मल्होत्रा ने।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो पापा ने उसे पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया?”

     

    हरिशंकर ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि समीर के पास तुम्हारी जान से जुड़ा राज था।”

     

    “कैसा राज?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “वो जानता था कि तुम नंदिनी की बेटी हो।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “इसमें क्या बड़ी बात थी?”

     

    “बड़ी बात ये थी कि नंदिनी ने मरने से पहले समीर के खिलाफ सबूत तैयार कर लिए थे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वो सबूत कहां हैं?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता के पास।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन वो सबूत तो…”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता की मौत के बाद गायब हो गए।”

     

    उधर उसी समय…

     

    आरोही की मां अपने कमरे में अकेली बैठी थीं।

     

    उनके हाथ में एक पुराना फोन था।

     

    उन्होंने किसी नंबर पर कॉल किया।

     

    “हमें सब पता चल चुका है।”

     

    दूसरी तरफ से आवाज आई “उन्हें कितना पता है?”

     

    मां ने कहा,

     

    “समीर का नाम।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आवाज आई “तो अब समय आ गया है।”

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “नहीं। आरोही को कुछ नहीं होना चाहिए।”

     

    दूसरी तरफ से हंसी सुनाई दी।

     

    “अगर तुमने हमारा साथ नहीं दिया तो सबसे पहले उसी को नुकसान होगा।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैं तुम्हारा काम करूंगी।”

     

    “याद रखना… एक गलती और तुम्हारी बेटी खत्म।”

     

    फोन कट गया।

     

    मां ने फोन नीचे रखा।

     

    उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे माफ करना बेटी।”

     

     

    आरव, आरोही और कबीर बाहर निकले।

     

    आरोही बहुत शांत थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जो कुछ भी जान रही हूं… उससे मुझे लगता है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”

     

    आरव ने कार रोक दी।

     

    “मेरी तरफ देखो।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी जिंदगी झूठ नहीं थी।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम्हारी मां ने तुम्हें पाला। उन्होंने तुम्हें प्यार किया। तुम्हारे पापा ने तुम्हें बचाया। और तुमने मुझे बचपन से लेकर आज तक जो प्यार दिया… वो सच है।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “और तुम?”

     

    “मैं?”

     

    “तुम्हारा मेरे लिए क्या है?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके करीब आकर बोला,

     

    “तुम मेरी वो कहानी हो जिसे मैं खत्म नहीं होने दूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें जितने भी जवाब चाहिए, हम मिलकर ढूंढेंगे।”

     

    आरोही ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    कुछ पल के लिए दोनों दुनिया की सारी परेशानियां भूल गए।

     

    लेकिन तभी…

     

    कबीर ने पीछे से आवाज लगाई “आरव!”

     

    दोनों ने पीछे देखा।

     

    कबीर सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुराना लिफाफा था।

     

    “ये मुझे कार के नीचे मिला।”

     

    आरव ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक छोटी पर्ची थी।

     

    उस पर लिखा था “समीर असली गद्दार नहीं है।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    नीचे लिखा था “समीर सिर्फ आदेश मान रहा था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो आदेश कौन दे रहा था?”

     

    आरव ने पर्ची पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक शब्द लिखा था “N.”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “N… यानी?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “नंदिनी?”

     

    आरोही ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन तभी उसकी मां का फोन आया।

     

    आरोही ने फोन उठाया।

     

    “हैलो मां?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई “आरोही… घर मत आना।”

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “मां? क्या हुआ?”

     

    “वो लोग घर पर हैं।”

     

    “कौन?”

     

    मां की आवाज कांप रही थी।

     

    “समीर… और उसके साथ कोई और भी है।”

     

    फोन अचानक कट गया।

     

    आरव ने तुरंत कार स्टार्ट की।

     

    “हम घर जा रहे हैं।”

     

    आरोही ने घबराकर कहा,

     

    “मां ने मना किया है।”

     

    “इसीलिए जाना जरूरी है।”

     

     

    जब आरव, आरोही और कबीर घर पहुंचे, दरवाजा खुला था।

     

    अंदर सामान बिखरा हुआ था।

     

    आरोही ने चीखकर कहा,

     

    “मां!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह पूरे घर में दौड़ने लगी।

     

    “मां!”

     

    आरव ने हर कमरे में देखा।

     

    मां कहीं नहीं थीं।

     

    टेबल पर सिर्फ एक फोन पड़ा था।

     

    आरोही ने फोन उठाया।

     

    उसमें एक वीडियो था।

     

    वीडियो चलाया गया।

     

    स्क्रीन पर उसकी मां बैठी थीं।

     

    उनके पीछे दो लोग खड़े थे।

     

    एक था समीर।

     

    और दूसरा…

     

    चेहरा देखते ही आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    आरोही के हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा।

     

    “ये…”

     

    आरव ने स्क्रीन को देखते हुए कहा,

     

    “ये तो…”

     

    वीडियो में मां रोते हुए बोल रही थीं “आरोही, अगर तुम ये वीडियो देख रही हो, तो समझ लेना कि मैं तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारे सामने सबसे बड़ा झूठ बोलती रही।”

     

    फिर उन्होंने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “समीर गद्दार नहीं है।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    मां ने आगे कहा—

     

    “असल गद्दार वो है, जिस पर तुम दोनों सबसे ज्यादा भरोसा करते हो।”

     

    वीडियो अचानक बंद हो गया।

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव भी उसे देख रहा था।

     

    दोनों के मन में एक ही सवाल था आखिर वो कौन है?

     

    तभी पीछे से किसी ने ताली बजाई।

     

    “बहुत जल्दी सच तक पहुंच गए तुम दोनों।”

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने उसे पहचानते ही कहा “तुम!”

     

    वो आदमी मुस्कुराया।

     

    “हां… मैं।”

     

    और उसके हाथ में वही पुराना लॉकेट था, जो नंदिनी के लॉकर से मिला था।

     

    “अब तुम्हें पता चलेगा कि नंदिनी की मौत के पीछे असली वजह क्या थी।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 11

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 11

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    एपिसोड – 11 : जिसे मां समझती रही

     

    हरिशंकर के मुंह से निकले शब्दों ने आरोही की पूरी दुनिया हिला दी थी।

     

    “जिस औरत को तुम अपनी मां समझती हो… उसके बारे में तुम्हें बहुत बड़ा सच नहीं बताया गया।”

     

    आरोही कुछ पल तक उन्हें देखती रही।

     

    उसके कानों में जैसे बाकी सारी आवाजें बंद हो गई थीं।

     

    “आप… क्या कह रहे हैं?”

     

    हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं जानता हूं ये सुनना तुम्हारे लिए आसान नहीं है।”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “वो मेरी मां हैं। उन्होंने मुझे पाला है। बचपन से मेरे साथ रही हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि वो मेरी मां नहीं हैं?”

     

    हरिशंकर ने गहरी सांस ली।

     

    “मैंने ये नहीं कहा कि उन्होंने तुम्हें प्यार नहीं किया। मैंने सिर्फ इतना कहा है कि वो तुम्हारी जन्म देने वाली मां नहीं हैं।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “नहीं…”

     

    आरव तुरंत उसके पास आया।

     

    “आरोही, शांत हो जाओ।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मेरी जिंदगी में और कितना झूठ है?”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “जब तक पूरा सच सामने नहीं आता, किसी बात पर भरोसा मत करो।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर ये सच हुआ तो?”

     

    आरव ने बिना झिझक कहा,

     

    “तो भी मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू और तेज बहने लगे।

     

    “तुम हर बार मेरे साथ रहने की बात क्यों करते हो?”

     

    आरव ने धीमे से कहा,

     

    “क्योंकि जब तुम टूटती हो… तो मुझे भी दर्द होता है।”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    उसने बस अपना सिर आरव के कंधे पर रख दिया।

     

    कुछ पल दोनों वैसे ही खड़े रहे।

     

    लेकिन हरिशंकर उन्हें देखकर बेचैन थे।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विराज के लोग हमें ढूंढ रहे होंगे।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “पहले सुरक्षित जगह चलते हैं।”

     

    तीनों एक पुराने मंदिर के पीछे बने छोटे से कमरे में पहुंचे।

     

    हरिशंकर ने दरवाजा बंद किया।

     

    आरोही अब भी खामोश थी।

     

    कुछ देर बाद उसने पूछा,

     

    “हरिशंकर जी… आपको कैसे पता कि मेरी मां मेरी असली मां नहीं हैं?”

     

    हरिशंकर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय मैं अस्पताल में था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “आप वहां क्यों थे?”

     

    “तुम्हारे पिता के साथ।”

     

    “पापा के साथ?”

     

    “हां।”

     

    उन्होंने आगे कहा,

     

    “उस रात तुम्हारे पिता बहुत परेशान थे। तुम्हारा जन्म हुआ था। लेकिन कुछ ही घंटों बाद अस्पताल में एक ऐसी घटना हुई, जिसके बाद तुम्हारी जिंदगी बदल गई।”

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ था?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “तुम्हारी जन्म देने वाली मां…”

     

    वह रुक गए।

     

    “क्या हुआ था उन्हें?”

     

    “उनकी मौत हो गई थी।”

     

    आरोही जैसे पत्थर की हो गई।

     

    “मेरी… मां मर गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो फिर जिन्हें मैं मां कहती हूं…”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “वो तुम्हारी मां की सबसे करीबी दोस्त थीं।”

     

    आरोही ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

     

    “पापा ने मुझे उनसे क्यों रखा?”

     

    “क्योंकि उस समय तुम्हारी जान खतरे में थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किससे?”

     

    हरिशंकर ने जवाब दिया,

     

    “विराज से।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    हरिशंकर आगे बोले,

     

    “विराज को पता था कि तुम्हारे पिता के पास उसके खिलाफ सबूत हैं। उसे डर था कि अगर विनय की बेटी बड़ी होकर सच जान गई, तो वो सब कुछ उजागर कर देगी।”

     

    आरोही ने आंसू पोंछे।

     

    “लेकिन मेरी मां…”

     

    “तुम्हारे पिता ने उन्हें कहा था कि वो तुम्हें अपनी बेटी बनाकर रखें।”

     

    “और उन्होंने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उन्हें डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

     

    आरोही ने धीमे से पूछा,

     

    “क्या मेरे पिता ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था?”

     

    “हां।”

     

    हरिशंकर ने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारे पिता का लिखा हुआ बयान है।”

     

    आरोही ने कांपते हाथों से कागज लिया।

     

    उस पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही को बचाने के लिए उसे सच्चाई से दूर रखना। जिस औरत को वो मां कहेगी, वो मेरी बेटी को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करेगी। लेकिन उसे सच तब तक मत बताना जब तक विराज का खतरा खत्म न हो जाए।”

     

    आरोही ने कागज सीने से लगा लिया।

     

    उसकी आंखों से आंसू बहते रहे।

     

    “तो मां ने मुझसे झूठ बोला… लेकिन मुझे बचाने के लिए।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब मुझे उनसे सच सुनना है।”

     

     

    रात होते-होते आरोही और आरव उसके घर पहुंचे।

     

    मां दरवाजे के पास बैठी थीं।

     

    आरोही को देखते ही उनके चेहरे पर डर और राहत दोनों दिखाई दिए।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    वह सीधे उनके सामने जाकर खड़ी हो गई।

     

    “मां।”

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “हां बेटी।”

     

    “मुझसे एक बात सच-सच कहिए।”

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “क्या?”

     

    “क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूं?”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    मां की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरोही की आवाज टूट गई।

     

    “बस एक बार कह दीजिए कि ये झूठ है।”

     

    मां ने सिर उठाया।

     

    “नहीं बेटी… ये झूठ नहीं है।”

     

    आरोही जैसे अंदर से टूट गई।

     

    “तो आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    मां उसके पास आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे वचन दिया था।”

     

    “किस बात का?”

     

    “तुम्हें जिंदा रखने का।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “क्या मेरी असली मां…”

     

    मां ने रोते हुए कहा,

     

    “तुम्हारी जन्म देने वाली मां का नाम नंदिनी था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “नंदिनी?”

     

    “हां।”

     

    “वो कैसी थीं?”

     

    मां मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं,

     

    “बहुत खूबसूरत थीं। लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “उनकी मौत कैसे हुई?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, मुझे सच चाहिए।”

     

    मां ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “नंदिनी की मौत… अस्पताल में नहीं हुई थी।”

     

    आरोही ठिठक गई।

     

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे जन्म के बाद उन्हें अस्पताल से बाहर ले जाया गया था।”

     

    “किसने?”

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “विराज के आदमियों ने।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    “और फिर?”

     

    “वो कभी वापस नहीं आईं।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तो पापा ने क्या किया?”

     

    “उन्होंने विराज के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए।”

     

    “और उसी वजह से पापा की मौत हुई?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव अब तक खामोश खड़ा था।

     

    उसने पूछा,

     

    “मेरे पिता को ये सब पता था?”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “फिर उन्होंने हमें क्यों अलग किया?”

     

    “क्योंकि विराज को पता चल चुका था कि तुम दोनों के परिवारों के बीच पुराना रिश्ता है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन-सा रिश्ता?”

     

    मां ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और राजवीर ने तय किया था कि जब तुम दोनों बड़े हो जाओगे…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों की शादी करेंगे।”

     

    आरोही और आरव दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “क्या?”

     

    मां की आंखों में आंसू थे।

     

    “तुम दोनों बचपन से एक-दूसरे के लिए तय थे।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव भी उसे देख रहा था।

     

    उसके चेहरे पर हैरानी के साथ एक हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “तो बचपन में तुमने सच में कहा था कि मैं तुम्हें भूलूं नहीं।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू के बीच मुस्कान आ गई।

     

    “मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है।”

     

    “तुमने लाल पतंग उड़ाई थी।”

     

    आरोही हंसते हुए रो पड़ी।

     

    “और तुमने मेरी पतंग काट दी थी।”

     

    आरव भी हंस पड़ा।

     

    “मुझे क्या पता था कि वही लड़की एक दिन मेरी जिंदगी बन जाएगी।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    मां उन्हें देख रही थीं।

     

    उनकी आंखों में खुशी थी।

     

    लेकिन उसी खुशी के पीछे डर भी था।

     

    मां ने कहा,

     

    “लेकिन एक बात और है।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “अब क्या?”

     

    मां ने कहा,

     

    “विराज सिर्फ तुम्हारे परिवार के पीछे नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    “वो राजवीर के परिवार को भी खत्म करना चाहता था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि राजवीर के पास भी उसके खिलाफ सबूत थे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वो सबूत कहां हैं?”

     

    मां ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने उन्हें कहीं छुपाया था।”

     

    “कहां?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    तभी आरव का फोन बजा।

     

    कबीर का कॉल था।

     

    “आरव, मुझे एक जरूरी जानकारी मिली है।”

     

    “क्या?”

     

    “मैंने विराज के पुराने रिकॉर्ड खंगाले हैं।”

     

    “और?”

     

    “उसके नाम से एक बैंक लॉकर था।”

     

    आरव की आंखें चमक उठीं।

     

    “कहां?”

     

    “शहर के पुराने बैंक में।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पता नहीं। लेकिन लॉकर दस साल से बंद है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसके नाम पर?”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला “नंदिनी मेहरा।”

     

    आरोही के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    “नंदिनी… मेरी असली मां?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हमें उस लॉकर तक पहुंचना होगा।”

     

     

    रात करीब बारह बजे।

     

    सभी सोने की तैयारी कर रहे थे।

     

    तभी घर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

     

    आरव तुरंत खिड़की के पास गया।

     

    बाहर एक काली कार खड़ी थी।

     

    उसकी खिड़की के पीछे कोई बैठा था।

     

    आरव ने कहा,

     

    “सब लोग पीछे हटो।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।

     

    आरव बाहर जाने ही वाला था कि उसके फोन पर मैसेज आया।

     

    “नंदिनी का लॉकर मत खोलना।”

     

    आरव ने स्क्रीन आरोही को दिखाई।

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “उसे कैसे पता कि हम लॉकर के बारे में जानते हैं?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि कोई हमें लगातार देख रहा है।”

     

    तभी दूसरा मैसेज आया—

     

    “अगर लॉकर खोला, तो तुम्हारी मां अगली होंगी।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने मां की तरफ देखा।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डरो मत।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मैं नहीं डर रही।”

     

    “झूठ।”

     

    “हां… डर रही हूं।”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “लेकिन अब तुम अकेली नहीं हो।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “अगर मुझे कुछ हो गया तो?”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “ऐसा मत कहना।”

     

    “लेकिन—”

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    आरव ने धीरे से उसके आंसू पोंछे।

     

    “हम सच तक जाएंगे।”

     

    “साथ?”

     

    “साथ।”

     

    अगली सुबह आरव, आरोही और कबीर पुराने बैंक पहुंचे।

     

    कबीर ने सारे दस्तावेज तैयार कर लिए थे।

     

    बैंक मैनेजर ने रिकॉर्ड देखकर कहा,

     

    “लॉकर नंबर 317।”

     

    आरोही ने कांपते हाथों से दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

     

    तीनों लॉकर रूम में पहुंचे।

     

    लोहे का छोटा दरवाजा खोला गया।

     

    अंदर एक पुराना लकड़ी का बॉक्स रखा था।

     

    आरोही ने उसे उठाया।

     

    बॉक्स पर सिर्फ एक शब्द लिखा था “आरोही।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी मां ने मेरे लिए रखा था।”

     

    उसने बॉक्स खोला।

     

    अंदर कुछ तस्वीरें थीं।

     

    एक लाल रंग की छोटी चूड़ी।

     

    एक पुराना लॉकेट।

     

    और एक पत्र।

     

    आरोही ने पत्र खोला।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें भर आईं “मेरी प्यारी बेटी आरोही, अगर तुम ये पत्र पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

     

    उसने कांपते हुए आगे पढ़ा “लेकिन तुम्हें एक बात जाननी होगी। तुम्हारे पिता की मौत का बदला लेने वाला इंसान विराज नहीं है।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसकी सांस रुक गई।

     

    पत्र में लिखा था “विराज सिर्फ एक मोहरा था। असली खेल किसी और ने शुरू किया था।”

     

    आरोही ने आखिरी लाइन पढ़ी “और वो इंसान… हमारे परिवार का ही है।”

     

    आरोही ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    आरव उसे देख रहा था।

     

    कबीर स्तब्ध खड़ा था।

     

    तीनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    लेकिन पत्र के नीचे एक नाम लिखा था।

     

    नाम देखते ही आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने धीरे से कहा “मां…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने पत्र उसकी तरफ बढ़ा दिया।

     

    आरव ने नाम पढ़ा।

     

    उसका चेहरा भी बदल गया।

     

    क्योंकि पत्र में जिस इंसान का नाम था…

     

    वो वही व्यक्ति था, जिस पर दोनों परिवार पिछले दस सालों से सबसे ज्यादा भरोसा करते आए थे।

     

    और अब…

     

    उनकी पूरी कहानी एक ऐसे विश्वासघात की तरफ बढ़ रही थी, जहां दुश्मन बाहर नहीं… उनके अपने बीच छिपा था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 10

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 10

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    एपिसोड – 10 : मौत के बाद भी जिंदा था वो

     

    “असली विक्रम सूद की मौत दस साल पहले ही हो चुकी थी।”

     

    आरोही की मां के मुंह से निकले ये शब्द सुनकर कमरे में जैसे समय थम गया।

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    कुछ सेकंड तक किसी के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली।

     

    आखिर आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन… अगर विक्रम सूद मर चुका है, तो इतने सालों से हमें धमकाने वाला कौन है?”

     

    आरोही की मां ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “यही तो मैं नहीं जानती।”

     

    “आपने उसकी मौत देखी थी?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो आपको कैसे पता कि वो मर चुका है?”

     

    मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा ने मुझे उसकी मौत की खबर दी थी।”

     

    आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    “कब?”

     

    “तुम्हारे पापा की मौत से ठीक दो दिन पहले।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो फिर पापा की मौत से दो दिन पहले ही विक्रम मर चुका था?”

     

    “हां।”

     

    “फिर मेरे पापा को किससे खतरा था?”

     

    मां ने धीरे से कहा,

     

    “उस आदमी से… जो विक्रम के नाम का इस्तेमाल कर रहा था।”

     

    आरव के चेहरे पर गंभीरता आ गई।

     

    “क्या आपके पास कोई सबूत है?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहा,

     

    “हां।”

     

    “कहां?”

     

    “तुम्हारे पापा ने मुझे एक तस्वीर दी थी।”

     

    उन्होंने अलमारी खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    लिफाफे के अंदर एक तस्वीर थी।

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    उसमें तीन लोग खड़े थे।

     

    राजवीर सिंह।

     

    विनय मेहरा।

     

    और विक्रम सूद।

     

    लेकिन पीछे एक चौथा आदमी भी दिखाई दे रहा था।

     

    उसका चेहरा आधा छाया में था।

     

    आरोही ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे सिर्फ एक तारीख लिखी थी “28 मार्च, रात 10:15।”

     

    आरव अचानक ठिठक गया।

     

    “ये वही रात है… जिस रात पापा की मौत हुई थी।”

     

    कबीर ने तुरंत कहा,

     

    “इस तस्वीर को स्कैन करना होगा। शायद बैकग्राउंड से कुछ पता चले।”

     

    लेकिन तभी आरोही की नजर तस्वीर के कोने में लिखे एक छोटे-से नंबर पर पड़ी।

     

    “17-B”

     

    वह बोली,

     

    “ये नंबर… M-17 से जुड़ा हो सकता है।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “हो सकता है।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हमें पुराने रिकॉर्ड रूम में फिर जाना होगा।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां, आप हमारे साथ चलेंगी?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां जाने का मतलब है कि दस साल पुरानी वो रात फिर से सामने आएगी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “शायद अब उसे सामने आना ही होगा।”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आरव, तुम्हारे पिता ने तुम दोनों को बचाने के लिए बहुत कुछ छुपाया था।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “लेकिन कुछ राज ऐसे हैं जिन्हें जानने के बाद जिंदगी पहले जैसी नहीं रहती।”

     

    आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम सच से भागते-भागते थक चुके हैं।”

     

    मां ने उसकी आंखों में देखा।

     

    फिर धीरे से बोलीं,

     

    “जाओ।”

     

    “लेकिन सावधान रहना।”

     

    कुछ घंटों बाद आरव, आरोही और कबीर पुराने रिकॉर्ड रूम में पहुंचे।

     

    इस बार आरव ने तस्वीर अपने साथ रखी थी।

     

    उन्होंने उस जगह को दोबारा खंगालना शुरू किया।

     

    कबीर ने दीवार पर लगे पुराने नंबर देखे।

     

    “17-B…”

     

    वह धीरे-धीरे दीवार के पास गया।

     

    एक जगह पर लकड़ी का पैनल लगा था।

     

    उसने उसे हटाया।

     

    पीछे एक छोटा दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “ये यहां पहले नहीं था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि इसे छुपाया गया था।”

     

    दरवाजे पर छोटा-सा ताला लगा था।

     

    आरव ने M-17 वाली चाबी लगाई।

     

    ताला खुल गया।

     

    अंदर एक बहुत छोटा कमरा था।

     

    कमरे में सिर्फ एक टेबल, एक कुर्सी और पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    टेबल पर एक कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उठाया।

     

    उस पर लिखा था “अगर तुम यहां तक पहुंच चुके हो, तो अब तुम्हें सच जानने से कोई नहीं रोक सकता।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं हूं।”

     

    “तुम हर बार यही कहते हो।”

     

    “और हर बार रहूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कबीर ने टेप रिकॉर्डर उठाया।

     

    “इसमें शायद रिकॉर्डिंग है।”

     

    उसने प्ले बटन दबाया।

     

    कुछ सेकंड शोर हुआ।

     

    फिर विनय मेहरा की आवाज सुनाई दी।

     

    “अगर ये रिकॉर्डिंग मेरे परिवार तक पहुंची है, तो शायद मैं जिंदा नहीं हूं।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “पापा…”

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    “राजवीर मेरा दुश्मन नहीं था। वो मेरा सबसे भरोसेमंद दोस्त था। हमने साथ मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत जमा किए थे।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो विक्रम…”

     

    रिकॉर्डिंग में विनय की आवाज आई “लेकिन विक्रम अकेला नहीं था।”

     

    कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग रोक दी।

     

    “क्या?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “आगे चलाओ।”

     

    रिकॉर्डिंग फिर शुरू हुई।

     

    “विक्रम के पीछे कोई और था। ऐसा आदमी जिसके पास हमारी कंपनी, हमारे परिवार और हमारी निजी जिंदगी की पूरी जानकारी थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    रिकॉर्डिंग में विनय बोले “उसका नाम…”

     

    अचानक आवाज में तेज शोर आया।

     

    फिर रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

     

    कबीर ने कई बार कोशिश की।

     

    लेकिन टेप आगे नहीं चला।

     

    “यही हिस्सा खराब है।”

     

    आरव ने गुस्से में टेबल पर हाथ मारा।

     

    “हर बार नाम आने से पहले रिकॉर्डिंग क्यों रुक जाती है?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि शायद कोई नहीं चाहता कि हमें उसका नाम पता चले।”

     

    कबीर ने कमरे की तलाशी जारी रखी।

     

    कुछ देर बाद उसने टेबल की दराज खोली।

     

    अंदर एक पुराना मोबाइल फोन पड़ा था।

     

    “ये देखो।”

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    फोन बंद था।

     

    कबीर ने उसे चार्जर से जोड़ा।

     

    कुछ मिनट बाद स्क्रीन जल उठी।

     

    पासवर्ड मांगा गया।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “शायद पापा का जन्मदिन?”

     

    आरव ने तारीख डाली।

     

    फोन खुल गया।

     

    अंदर सिर्फ तीन वीडियो थे।

     

    पहला वीडियो विनय मेहरा का था।

     

    दूसरा राजवीर सिंह का।

     

    और तीसरा…

     

    किसी अनजान आदमी का।

     

    आरव ने तीसरा वीडियो खोला।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी बैठा था।

     

    चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    उसने कहा “तुम दोनों के पिता बहुत ज्यादा सच जान चुके हैं।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    वीडियो में आदमी आगे बोला “अगर उन्होंने अपना मुंह बंद नहीं किया, तो दोनों परिवारों का अंत कर दिया जाएगा।”

     

    फिर उसने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उसका चेहरा कुछ सेकंड के लिए रोशनी में आया।

     

    आरोही ने स्क्रीन को गौर से देखा।

     

    उसकी आंखें अचानक फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “मैं इसे जानती हूं।”

     

    आरव और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “कौन है?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “ये आदमी…”

     

    उसने स्क्रीन की तरफ उंगली की।

     

    “मैंने इसे अपनी मां के साथ देखा है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “कहां?”

     

    “लगभग दो महीने पहले।”

     

    “कहां?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमारे पुराने घर के बाहर।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां ने कहा था कि उन्हें उस आदमी के बारे में कुछ नहीं पता।”

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “शायद मां मुझसे कुछ छुपा रही हैं।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हमें अभी उनके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “सही।”

     

    तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    कदम धीरे-धीरे कमरे के करीब आ रहे थे।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव ने इशारे से दोनों को पीछे रहने को कहा।

     

    दरवाजे की कुंडी धीरे-धीरे हिली।

     

    फिर दरवाजा खुला।

     

    सामने…

     

    एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा “तुम राजवीर के बेटे हो?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बुजुर्ग ने दरवाजा बंद किया।

     

    “मेरा नाम हरिशंकर है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “आप यहां क्या कर रहे हैं?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “मैं इस रिकॉर्ड रूम का पुराना चौकीदार हूं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आपको इस कमरे के बारे में पता था?”

     

    “हां।”

     

    “फिर आपने पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    हरिशंकर ने गहरी सांस ली।

     

    “क्योंकि मुझे डर था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किससे?”

     

    हरिशंकर ने सीधे उसकी तरफ देखा।

     

    “उस आदमी से… जिसने तुम्हारे पिता को मरवाया।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “आप उसे जानते हैं?”

     

    “हां।”

     

    “कौन है?”

     

    हरिशंकर कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक बाहर गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    आरव ने तुरंत उसे अपनी तरफ खींच लिया।

     

    कबीर ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    हरिशंकर घबराकर बोले,

     

    “वो आ गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    हरिशंकर की आंखों में डर था।

     

    उन्होंने फुसफुसाकर कहा “विक्रम नहीं…”

     

    “तो कौन?”

     

    हरिशंकर ने धीरे से कहा “विक्रम का मालिक।”

     

     

    बाहर कदमों की आवाज आने लगी।

     

    कबीर ने खिड़की देखी।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    हरिशंकर ने कमरे की पिछली दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “वहां एक रास्ता है।”

     

    आरव ने दीवार का पैनल हटाया।

     

    पीछे एक संकरा रास्ता था।

     

    “पहले आरोही।”

     

    आरोही अंदर जाने लगी।

     

    तभी बाहर से दरवाजे पर जोरदार चोट हुई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने दरवाजा संभाल लिया।

     

    “जाओ!”

     

    कबीर और हरिशंकर अंदर चले गए।

     

    आरव भी अंदर जाने ही वाला था कि दरवाजा टूट गया।

     

    एक आदमी अंदर घुसा।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरव उससे भिड़ गया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने चिल्लाकर कहा,

     

    “भागो!”

     

    आरोही वहीं रुक गई।

     

    लेकिन तभी उस आदमी ने आरव को धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।

     

    बंदूक उसकी तरफ उठी।

     

    आरोही ने बिना सोचे पास पड़ी लोहे की छड़ उठाई और उस आदमी पर हमला कर दिया।

     

    बंदूक नीचे गिर गई।

     

    आरव ने तुरंत उसे पकड़ लिया।

     

    “आरोही, तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    “तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि मैंने कहा था ना… तुम्हें खोने से डरती हूं।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    दोनों सुरंग में भागने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे सुरंग से बाहर निकले।

     

    हरिशंकर भी उनके साथ थे।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “अब बताइए। आप किसे जानते हैं?”

     

    हरिशंकर ने पीछे देखा।

     

    फिर धीमी आवाज में कहा “वो आदमी विक्रम सूद नहीं था।”

     

    “कौन था?”

     

    “विक्रम का छोटा भाई।”

     

    आरव और आरोही चौंक गए।

     

    “विक्रम का भाई?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “हां। उसका नाम था… विराज सूद।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन उसने विक्रम का नाम क्यों इस्तेमाल किया?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “क्योंकि असली विक्रम की मौत के बाद सारी संपत्ति और कंपनी पर विराज का कब्जा हो गया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और हमारे परिवार?”

     

    हरिशंकर की आवाज भारी हो गई।

     

    “विराज ने राजवीर और विनय के बीच गलतफहमियां पैदा कीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन दोनों के पास उसके खिलाफ सबूत था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और पापा?”

     

    हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।

     

    “विनय ने मरने से पहले मुझे एक चीज दी थी।”

     

    “क्या?”

     

    उन्होंने जेब से एक छोटा लिफाफा निकाला।

     

    “ये।”

     

    आरोही ने लिफाफा लिया।

     

    उस पर लिखा था “मेरी बेटी के लिए।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

     

    उस पर लिखा था “बेटी, जिस दिन तुम्हें ये खत मिलेगा, उस दिन तुम आरव से मिल चुकी होगी। उस पर भरोसा करना। लेकिन उसके करीब आने वाले हर इंसान पर भरोसा मत करना।”

     

    आरोही ने आगे पढ़ा।

     

    अगली लाइन ने उसकी सांस रोक दी “क्योंकि तुम्हारे सबसे करीब रहने वाला कोई व्यक्ति ही हमारे खिलाफ है।”

     

    आरोही ने तुरंत आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में भी चिंता थी।

     

    कौन?

     

    कौन था वो इंसान…

     

    जो उनके सबसे करीब रहकर दस साल से उन्हें धोखा दे रहा था?

     

    तभी हरिशंकर ने कांपती आवाज में कहा “मैं जानता हूं वो कौन है।”

     

    आरव और आरोही दोनों उनकी तरफ मुड़े।

     

    हरिशंकर ने धीरे से कहा “वो तुम्हारी मां के बहुत करीब है।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मेरी मां?”

     

    हरिशंकर ने सिर हिलाया।

     

    “हां… लेकिन वो तुम्हारी मां नहीं है।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    हरिशंकर ने कहा “जिस औरत को तुम अपनी मां समझती हो… उसके बारे में तुम्हें बहुत बड़ा सच नहीं बताया गया।”

     

    आरोही के हाथ से खत नीचे गिर गया।

     

    और पहली बार…

     

    उसे अपनी पूरी जिंदगी पर शक होने लगा।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 9

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 9

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    एपिसोड – 9 : एक धोखा, जिसने सब बदल दिया

     

    कमरे में फिर से रोशनी जल चुकी थी, लेकिन आरव और आरोही के चेहरों पर अंधेरा छाया हुआ था।

     

    टेबल पर रखा वह कागज अब भी उनके सामने था “जिसे तुम बचाना चाहते हो, उसी के पिता ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

     

    आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

     

    उसने धीरे से आरव की तरफ देखा।

     

    “आरव… इसमें लिखा है कि मेरे पापा ने तुम्हारे पापा को धोखा दिया था।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    कबीर ने कागज हाथ में लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।

     

    “ये वही लिखावट है?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    “जिसने पहले तुम्हें धमकी दी थी, उस कागज पर भी ऐसी ही स्याही थी।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    “मतलब ये हो सकता है कि जो हमें यहां तक लेकर आया है, वो चाहता है कि हम एक-दूसरे पर शक करें।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “लेकिन अगर इसमें कुछ सच्चाई हुई तो?”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुम पर है।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन अपने पापा पर नहीं।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैं भी अपने पिता के हर फैसले पर आंख बंद करके भरोसा नहीं कर सकता।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो हम क्या करें?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सच ढूंढें।”

     

    “और अगर सच हमारे खिलाफ हुआ?”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “तो भी साथ रहेंगे।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “वादा?”

     

    आरव ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “वादा।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही घंटों में उनका यह भरोसा एक ऐसे सच के सामने आने वाला था, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कबीर ने लैपटॉप दोबारा खोला।

     

    “वीडियो अधूरा है, लेकिन शायद उसमें बाकी डेटा छुपा हुआ हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम कर सकते हो?”

     

    “कोशिश कर सकता हूं।”

     

    कबीर ने कुछ देर तक कंप्यूटर पर काम किया।

     

    स्क्रीन पर कई फाइलें खुलीं।

     

    एक फोल्डर का नाम देखकर उसकी आंखें ठहर गईं।

     

    “R-27”

     

    “ये क्या है?” आरोही ने पूछा।

     

    कबीर ने फोल्डर खोला।

     

    अंदर कई स्कैन किए हुए दस्तावेज थे।

     

    पहले दस्तावेज पर लिखा था “राजवीर सिंह – व्यक्तिगत गारंटी।”

     

    आरव ने दस्तावेज अपने हाथ में लिया।

     

    “ये मेरे पिता के हस्ताक्षर हैं।”

     

    कबीर ने दूसरा दस्तावेज खोला।

     

    उसमें लिखा था कि राजवीर सिंह ने विनय मेहरा की कंपनी को आर्थिक संकट से बचाने के लिए करोड़ों रुपये की निजी गारंटी दी थी।

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “तो मेरे पापा की कंपनी डूब रही थी?”

     

    “हां,” आरव ने कहा।

     

    कबीर ने तीसरा दस्तावेज खोला।

     

    “लेकिन ये देखो।”

     

    उसमें लिखा था कि कुछ दिनों बाद वही रकम किसी तीसरे खाते में ट्रांसफर हुई थी।

     

    कबीर ने खाता नंबर देखा।

     

    “ये खाता किसका है?”

     

    आरव ने पूछा।

     

    कबीर ने कुछ सेकंड में जानकारी निकाली।

     

    उसके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “विक्रम सूद।”

     

    आरोही ने गहरी सांस ली।

     

    “तो उसने पैसे चुराए।”

     

    “और शायद दोनों परिवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया,” आरव ने कहा।

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन अभी एक बात समझ नहीं आ रही।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर राजवीर तुम्हारे पिता की मदद कर रहे थे, तो फिर दोनों परिवारों में दुश्मनी कैसे हुई?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “शायद हमें उसी का जवाब इस पेन ड्राइव में मिलेगा।”

     

    कबीर ने एक और फाइल खोली।

     

    उसमें एक ऑडियो रिकॉर्डिंग थी।

     

    रिकॉर्डिंग का नाम था “28 March – 11:42 PM”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “ये उसी रात की है?”

     

    कबीर ने प्ले दबाया।

     

    पहले कुछ सेकंड सिर्फ हवा की आवाज सुनाई दी।

     

    फिर दो पुरुषों की आवाजें सुनाई दीं।

     

    पहली आवाज विनय मेहरा की थी।

     

    “राजवीर, तुम यहां क्यों आए हो?”

     

    दूसरी आवाज राजवीर की थी।

     

    “तुम्हें बचाने।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    आरव बिल्कुल स्थिर बैठा था।

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    विनय की आवाज आई “बहुत देर हो चुकी है। विक्रम सब कुछ जान चुका है।”

     

    राजवीर ने कहा “हमें पुलिस के पास जाना होगा।”

     

    विनय ने जवाब दिया “नहीं। अगर पुलिस के पास गए तो सिर्फ हम नहीं, हमारे परिवार भी खतरे में आ जाएंगे।”

     

    फिर अचानक किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    रिकॉर्डिंग में शोर होने लगा।

     

    और उसके बाद…

     

    एक तीसरी आवाज सुनाई दी।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर ने रिकॉर्डिंग रोक दी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “चलाओ।”

     

    रिकॉर्डिंग दोबारा शुरू हुई।

     

    तीसरी आवाज साफ सुनाई दी “तुम दोनों को लगता है कि तुम मुझे रोक सकते हो?”

     

    आरोही के चेहरे से खून उतर गया।

     

    “विक्रम…”

     

    लेकिन रिकॉर्डिंग में अगली आवाज ने सबको चौंका दिया।

     

    वो आवाज विक्रम की नहीं थी।

     

    वो किसी और की थी।

     

    “विक्रम, इन्हें जाने दो।”

     

    कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग रोक दी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये कौन था?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पता नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से से कहा,

     

    “आवाज पहचानो।”

     

    कबीर ने फिर से रिकॉर्डिंग चलाई।

     

    तीसरी आवाज दोबारा सुनाई दी।

     

    आरोही अचानक उठ खड़ी हुई।

     

    उसके चेहरे पर डर था।

     

    “मैं इस आवाज को जानती हूं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किसकी है?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “मेरी मां की।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही को जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।

     

    “नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “शांत हो जाओ।”

     

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

     

    “हमें पहले पूरी रिकॉर्डिंग सुननी होगी।”

     

    कबीर ने आवाज तेज की।

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    आरोही की मां की आवाज सुनाई दी “विनय, तुम्हें अभी यहां से जाना होगा।”

     

    विनय ने कहा “लेकिन राजवीर?”

     

    “उसे मैं संभाल लूंगी।”

     

    राजवीर की आवाज आई “तुम पर भरोसा कैसे करूं?”

     

    आरोही की मां ने कहा “क्योंकि मैं आरोही की मां हूं।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर अचानक रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

     

    आरोही ने लैपटॉप बंद कर दिया।

     

    “बस!”

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मां यहां क्यों थीं?”

     

    आरव ने उसे संभालते हुए कहा,

     

    “हमें उनसे पूछना होगा।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    घर में इंतजार करता सच

     

    दोनों तुरंत आरोही के घर पहुंचे।

     

    मां ड्राइंग रूम में बैठी थीं।

     

    आरोही को देखते ही उन्होंने पूछा,

     

    “तुम दोनों इतनी जल्दी कैसे आ गए?”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसने मोबाइल पर रिकॉर्डिंग चला दी।

     

    कमरे में उसकी मां की पुरानी आवाज गूंजने लगी।

     

    रिकॉर्डिंग खत्म हुई।

     

    मां का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “तुम्हें ये कहां मिली?”

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “पापा की डायरी और पेन ड्राइव में।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैं चाहती थी कि ये सच कभी तुम्हारे सामने न आए।”

     

    आरोही की आवाज टूट गई।

     

    “तो आप उस रात वहां थीं?”

     

    मां ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    मां की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा ने मुझे बुलाया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसलिए?”

     

    “उन्होंने कहा था कि उन्हें खतरा है।”

     

    “किससे?”

     

    मां ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा “विक्रम से।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तो आपने उन्हें बचाने की कोशिश की थी?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “फिर पापा की मौत कैसे हुई?”

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “मैं वहां से चली गई थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विक्रम ने मुझे धमकी दी थी।”

     

    आरोही ने रोते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि उसने कहा था कि अगर मैंने मुंह खोला तो तुम्हें भी मार देगा।”

     

    आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

     

    “आपने इतने साल अकेले ये सब सहा?”

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम मेरी आखिरी उम्मीद थीं।”

     

    आरव चुपचाप दोनों को देख रहा था।

     

    तभी मां ने अचानक आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “क्या?”

     

    मां की आंखें नम थीं।

     

    “उन्होंने कहा था…”

     

    वह रुक गईं।

     

    “क्या कहा था?”

     

    “अगर कभी आरव और आरोही एक-दूसरे के करीब आएं… तो उन्हें अलग मत करना।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    मां ने धीरे से कहा “क्योंकि तुम दोनों का मिलना शायद कोई संयोग नहीं था।”

     

    एक पुराना रिश्ता

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “इसका क्या मतलब है?”

     

    मां ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हमारे परिवार के बीच पहले से कोई रिश्ता था?”

     

    मां की आंखें झुक गईं।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कैसा रिश्ता?”

     

    मां ने अलमारी से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में दो छोटे बच्चे थे।

     

    एक लड़का…

     

    और एक छोटी लड़की।

     

    आरोही ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    उसने लड़की को देखा।

     

    फिर लड़के को।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “ये… मैं हूं।”

     

    आरव ने तस्वीर ली।

     

    “और ये… मैं?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “लेकिन हम बचपन में मिले थे?”

     

    मां ने कहा,

     

    “हां। तुम्हारे पिता और आरव के पिता बहुत करीबी दोस्त थे। तुम दोनों बचपन में कई बार साथ खेले हो।”

     

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    उसे अचानक कुछ धुंधली यादें आने लगीं।

     

    एक छोटी लड़की…

     

    दो चोटी…

     

    उसके हाथ में लाल रंग की पतंग…

     

    और उसकी आवाज “तुम बड़े होकर मुझे भूल मत जाना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे याद आ रहा है…”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझे भी।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनके बीच जो रिश्ता आज बना था…

     

    क्या वो वास्तव में आज से शुरू हुआ था?

     

    या उनकी कहानी बहुत पहले लिखी जा चुकी थी?

     

    लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था

     

    मां ने अचानक कहा,

     

    “एक बात और है।”

     

    आरव और आरोही दोनों उनकी तरफ देखने लगे।

     

    “क्या?”

     

    मां ने कहा,

     

    “तुम्हारे पापा की मौत के बाद राजवीर ने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “मुझे?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विक्रम तुम्हें भी खत्म करना चाहता था।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “तो मेरे पिता ने क्या किया?”

     

    मां ने कहा,

     

    “उन्होंने तुम्हें और आरोही को अलग-अलग शहरों में भेज दिया।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “इसलिए मुझे अपने बचपन की बहुत-सी बातें याद नहीं हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे।

     

    “तो इतने सालों से हम एक-दूसरे से दूर क्यों थे?”

     

    मां ने जवाब दिया,

     

    “तुम दोनों को बचाने के लिए।”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने धीरे से आरोही की तरफ देखा।

     

    “तो हमारी कहानी…”

     

    आरोही ने उसकी बात पूरी की “शायद आज से नहीं शुरू हुई थी।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “बहुत पहले शुरू हो गई थी।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन तभी…

     

    मां का फोन बजा।

     

    उन्होंने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।

     

    फिर एक भारी आवाज आई “तुमने उन्हें सच बता दिया?”

     

    मां के हाथ कांपने लगे।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आवाज हंसी।

     

    “जिसे तुम दस साल से मरा हुआ समझ रही हो।”

     

    मां की आंखें फैल गईं।

     

    फोन उनके हाथ से लगभग गिर गया।

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “मां, कौन था?”

     

    मां ने कांपते हुए आरव और आरोही की तरफ देखा।

     

    उनके होंठों से सिर्फ एक नाम निकला “विक्रम…”

     

    आरव के चेहरे पर गुस्सा आ गया।

     

    “लेकिन विक्रम तो जिंदा है!”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    मां की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “जिस विक्रम को तुम जानते हो… वो असली विक्रम नहीं है।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    मां ने कांपती आवाज में कहा “असली विक्रम सूद की मौत दस साल पहले ही हो चुकी थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    अगर ये सच था…

     

    तो पिछले दस सालों से उनके परिवारों को कौन चला रहा था?

     

    कौन था वो आदमी जो विक्रम के नाम पर सबको धमका रहा था?

     

    और सबसे बड़ा सवाल विनय मेहरा की मौत की असली साजिश आखिर किसने रची थी?

     

    जारी रहेगा…

  • महादेव का रूद्र अवतार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जब कैलाश पर गूंजा रुद्र का डमरू

     

    हिमालय की ऊंची चोटियों पर उस दिन सब कुछ शांत था। कैलाश पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी। भगवान शिव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती उनके पास बैठी थीं। नंदी कुछ दूर शांत भाव से पहरा दे रहे थे।

     

    लेकिन अचानक…

     

    डम… डम… डम…

     

    महादेव का डमरू अपने आप बज उठा।

     

    माता पार्वती ने चौंककर महादेव की ओर देखा।

     

    “स्वामी… आपने डमरू बजाया?”

     

    महादेव ने धीरे से आंखें खोलीं।

     

    “नहीं देवी।”

     

    पार्वती जी के चेहरे पर चिंता आ गई।

     

    “फिर यह अपने आप कैसे बज रहा है?”

     

    महादेव कुछ पल शांत रहे। उनकी आंखों में अचानक गंभीरता उतर आई।

     

    “कहीं न कहीं धरती पर अधर्म अपनी सीमा पार कर चुका है।”

     

    नंदी ने भी सिर उठाकर कैलाश की ओर देखा।

     

    उसी समय आकाश में काले बादल घिरने लगे। बर्फीली हवा अचानक तेज हो गई। कैलाश के आसपास घूमने वाले पक्षी घबराकर दूर उड़ गए।

     

    महादेव ने अपनी आंखें बंद कीं और ध्यान लगाया।

     

    उन्हें एक छोटा-सा गांव दिखाई दिया।

     

    गांव का नाम था देवगिरि।

     

    वहां लोग बहुत परेशान थे। गांव के पास रहने वाला एक शक्तिशाली राजा, वज्रसेन, आसपास के गांवों पर जबरन कर लगाता था। जो गरीब किसान कर नहीं दे पाते, उनसे उनकी जमीन छीन ली जाती।

     

    लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि वज्रसेन को भगवान शिव के मंदिर से नफरत थी।

     

    गांव के बीचोंबीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। वहां रहने वाले बूढ़े पुजारी हरिदास रोज सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे।

     

    वज्रसेन कई बार उन्हें मंदिर बंद करने की धमकी दे चुका था।

     

    एक दिन वह अपने सैनिकों के साथ मंदिर पहुंचा।

     

    “पुजारी!” उसने गुस्से में कहा, “मैंने कहा था यह मंदिर बंद कर दो।”

     

    हरिदास ने शांत स्वर में कहा, “राजन, मंदिर किसी राजा का नहीं होता। यह भोलेनाथ का घर है।”

     

    वज्रसेन हंस पड़ा।

     

    “भोलेनाथ? अगर तुम्हारा शिव सच में है, तो उसे बुलाओ।”

     

    हरिदास ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “महादेव को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती राजन। सच्ची पुकार उन तक खुद पहुंच जाती है।”

     

    वज्रसेन ने गुस्से में मंदिर का दीपक बुझा दिया।

     

    “आज से यहां पूजा बंद!”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस रात पूरा गांव डरा हुआ था।

     

    लेकिन हरिदास मंदिर में अकेले बैठे रहे। उन्होंने शिवलिंग के सामने दीपक जलाया और आंखों में आंसू लेकर बोले,

     

    “भोलेनाथ… मैं आपसे अपने लिए कुछ नहीं मांगता। बस इस गांव के लोगों की रक्षा कर लेना।”

     

    पास ही एक छोटा बच्चा बैठा था। उसका नाम था गोपाल।

     

    गोपाल ने पूछा, “बाबा, क्या महादेव हमारी मदद करेंगे?”

     

    हरिदास मुस्कुराए।

     

    “बेटा, जब भक्त सच्चे मन से पुकारता है, तो महादेव देर कर सकते हैं… लेकिन अंधेर नहीं करते।”

     

    उधर कैलाश पर अचानक फिर डमरू बजा।

     

    डम… डम… डम…

     

    इस बार उसकी आवाज पहले से ज्यादा तेज थी।

     

    माता पार्वती ने महादेव को देखा।

     

    “स्वामी, क्या समय आ गया है?”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

     

    “अभी नहीं देवी… लेकिन बहुत जल्द।”

     

    अगली सुबह वज्रसेन ने गांव वालों को अपने महल में बुलाया।

     

    उसने घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव की सारी जमीन मेरी होगी। जो मेरा आदेश नहीं मानेगा, उसे गांव छोड़ना पड़ेगा।”

     

    लोग डर गए।

     

    गोपाल आगे बढ़ा।

     

    “राजा जी, ये जमीन हमारे खेत हैं। इन्हें हमसे मत छीनिए।”

     

    वज्रसेन ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तू मुझे सिखाएगा?”

     

    हरिदास तुरंत गोपाल के आगे आ गए।

     

    “राजन, बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए।”

     

    वज्रसेन ने सैनिकों को आदेश दिया,

     

    “कल सुबह मंदिर भी गिरा देना।”

     

    यह सुनते ही गांव में सन्नाटा छा गया।

     

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    रात होते ही पूरा गांव मंदिर में इकट्ठा हुआ।

     

    हरिदास ने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा,

     

    “हे महादेव, आज आपकी परीक्षा नहीं है। आज हमारी भक्ति की परीक्षा है। अगर हमने कभी सच्चे मन से आपका नाम लिया है, तो आज अपने भक्तों की लाज रख लेना।”

     

    सबने एक साथ आवाज लगाई—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    तभी मंदिर के अंदर रखा दीपक अचानक बहुत तेज जलने लगा।

     

    शिवलिंग पर चढ़ा जल अपने आप कांपने लगा।

     

    और उसी क्षण…

     

    दूर कैलाश पर महादेव खड़े हो गए।

     

    उनके चेहरे पर अब वह शांत मुस्कान नहीं थी।

     

    उनकी आंखों में अग्नि जैसी चमक थी।

     

    माता पार्वती ने उन्हें देखा।

     

    “स्वामी…”

     

    महादेव ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपना डमरू उठाया।

     

    डम!

     

    एक ही आवाज से कैलाश की चोटियां गूंज उठीं।

     

    डम! डम! डम!

     

    आकाश में बिजली चमकने लगी।

     

    महादेव के शरीर से एक दिव्य तेज निकलने लगा। उनकी जटाएं खुल गईं। उनके मस्तक पर तीसरा नेत्र चमक उठा।

     

    यह भोलेनाथ का शांत रूप नहीं था।

     

    यह था—

     

    रुद्र।

     

    देवगिरि गांव में अचानक तेज हवा चलने लगी।

     

    वज्रसेन अपने महल में बैठा था। तभी उसके सामने रखा दीपक अपने आप बुझ गया।

     

    उसने सैनिकों को बुलाया।

     

    “कौन है बाहर?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर उसे दूर से डमरू की आवाज सुनाई दी।

     

    डम… डम… डम…

     

    वज्रसेन घबरा गया।

     

    “यह आवाज… यहां कैसे?”

     

    अचानक महल के दरवाजे खुल गए।

     

    सामने एक विशाल तेजस्वी साधु खड़ा था।

     

    शरीर पर भस्म, जटाएं खुली हुईं और आंखों में ऐसा तेज कि वज्रसेन की आवाज तक कांपने लगी।

     

    साधु ने कहा,

     

    “वज्रसेन।”

     

    राजा पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    साधु ने शांत लेकिन भारी आवाज में कहा,

     

    “जिसे तूने बार-बार पुकारा था।”

     

    वज्रसेन को मंदिर की अपनी बात याद आ गई।

     

    “नहीं… यह नहीं हो सकता।”

     

    साधु आगे बढ़े।

     

    “तूने शक्ति को अपना अधिकार समझ लिया। तूने गरीबों से उनकी जमीन छीनी। भक्तों को डराया। मंदिर का दीपक बुझाया।”

     

    वज्रसेन कांपने लगा।

     

    “मुझे क्षमा कर दो!”

     

    साधु की आंखों में अग्नि और तेज हो गया।

     

    “क्षमा मांगने से पहले अपने कर्मों का भार समझ।”

     

    तभी आकाश में जोरदार गर्जना हुई।

     

    साधु का स्वर गूंजा—

     

    “मैं रुद्र हूं!”

     

    पूरा महल कांप उठा।

     

    वज्रसेन घुटनों के बल गिर गया।

     

    रुद्र ने अपनी दृष्टि उठाई।

     

    “शक्ति का अर्थ दूसरों को डराना नहीं होता। शक्ति का अर्थ कमजोर की रक्षा करना होता है।”

     

    वज्रसेन ने सिर झुका दिया।

     

    “मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है।”

     

    “तो उसका प्रायश्चित भी बड़ा होगा।”

     

    रुद्र ने आदेश दिया कि जिन लोगों की जमीन छीनी गई है, वह उन्हें वापस की जाए। मंदिर को पहले से भी बड़ा बनाया जाए और गरीबों से लिया गया धन लौटा दिया जाए।

     

    वज्रसेन ने सब कुछ स्वीकार कर लिया।

     

    सुबह गांव वालों ने देखा कि मंदिर के सामने वही साधु खड़े हैं।

     

    गोपाल दौड़कर उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप कौन हैं?”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “जिसे तुम रातभर बुला रहे थे।”

     

    गोपाल ने उनके पैरों को छूना चाहा।

     

    लेकिन अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

     

    सिर्फ मंदिर के सामने एक छोटा-सा डमरू पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे उठाया और उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा,

     

    “भोलेनाथ… आपने फिर अपने भक्तों की लाज रख ली।”

     

    उसी समय दूर कैलाश पर महादेव फिर अपने शांत स्वरूप में बैठे थे।

     

    माता पार्वती मुस्कुराईं।

     

    “स्वामी, आपका क्रोध भी अंत में किसी की रक्षा ही करता है।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, रुद्र का क्रोध विनाश के लिए नहीं… अधर्म के अंत के लिए होता है।”

     

    नंदी ने प्रसन्न होकर सिर झुका दिया।

     

    और उसी क्षण कैलाश की चोटियों पर एक बार फिर डमरू की मधुर आवाज गूंजी—

     

    डम… डम… डम…

     

    जैसे स्वयं कैलाश कह रहा हो—

     

    जहां सच्ची भक्ति होगी, वहां महादेव की कृपा जरूर होगी।

  • शौर्य की नादानियां

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 1: एक नादान लड़का

     

    शहर के किनारे बने एक बड़े से पुराने बंगले में शौर्य अपनी मां और छोटी बहन के साथ रहता था। उम्र उसकी करीब बाईस साल थी, लेकिन हरकतें ऐसी कि घर में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था।

     

    शौर्य दिल का बहुत अच्छा था, बस उसकी एक आदत खराब थी—वह बिना सोचे कोई भी काम कर देता था।

     

    कभी किसी की मदद करने के चक्कर में खुद मुसीबत में फंस जाता, तो कभी दोस्तों के साथ मजाक करते-करते घर में हंगामा खड़ा कर देता।

     

    उस सुबह भी उसकी मां रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    “शौर्य! उठ गया क्या?” मां ने आवाज लगाई।

     

    अंदर से आवाज आई, “हां मां!”

     

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    “शौर्य!”

     

    मां दौड़कर सीढ़ियों के पास पहुंचीं। शौर्य नीचे खड़ा था और उसके हाथ में टूटा हुआ फूलदान था।

     

    “ये कैसे टूटा?”

     

    शौर्य ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “मां, मैंने नहीं तोड़ा।”

     

    “तो फिर?”

     

    “वो खुद गिर गया।”

     

    तभी उसकी छोटी बहन रिया पीछे से बोली, “मां, भैया ने गेंद से निशाना लगाया था।”

     

    शौर्य ने रिया को घूरकर देखा।

     

    “तुम मेरी बहन हो या पड़ोसियों की गवाह?”

     

    रिया हंसने लगी।

     

    मां ने माथा पकड़ लिया।

     

    “तुम दोनों मुझे एक दिन पागल कर दोगे।”

     

    नाश्ते के बाद शौर्य अपने दोस्त कबीर से मिलने निकल गया। रास्ते में उसे एक बुजुर्ग आदमी सड़क किनारे परेशान खड़ा दिखाई दिया।

     

    “बाबा, क्या हुआ?”

     

    बुजुर्ग बोले, “बेटा, मेरी साइकिल की चेन उतर गई है।”

     

    शौर्य तुरंत नीचे बैठ गया।

     

    “अरे इसमें क्या है? मैं ठीक कर देता हूं।”

     

    कबीर बोला, “तू रहने दे। पिछली बार तूने मेरी साइकिल ठीक की थी और उसके बाद वो उल्टी दिशा में चलने लगी थी।”

     

    “चुप कर।”

     

    शौर्य ने बड़ी मेहनत से चेन ठीक की।

     

    बुजुर्ग ने साइकिल चलाई और मुस्कुराते हुए बोले, “बिल्कुल ठीक हो गई।”

     

    शौर्य गर्व से मुस्कुराया।

     

    कबीर ने धीरे से कहा, “आज तो बच गया।”

     

    शौर्य ने उसे कोहनी मारी।

     

    दोनों आगे बढ़े ही थे कि शौर्य की नजर सड़क के दूसरी तरफ खड़ी एक लड़की पर पड़ी। लड़की अपने हाथ में कुछ कागज लिए परेशान दिखाई दे रही थी।

     

    “वो शायद किसी को ढूंढ रही है।”

     

    कबीर बोला, “तुझे हर जगह किसी की मदद करने की पड़ी रहती है।”

     

    “तो?”

     

    “तो एक दिन किसी मुसीबत में फंस जाएगा।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “मेरी जिंदगी में मुसीबत खुद चलकर आती है।”

     

    वह लड़की के पास पहुंचा।

     

    “आपको किसी मदद की जरूरत है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जी… मेरा नाम अनाया है। मुझे इस इलाके में एक घर ढूंढना है, लेकिन पता समझ नहीं आ रहा।”

     

    शौर्य ने कागज देखा।

     

    “ये तो मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है।”

     

    “सच?”

     

    “हां। चलिए, मैं रास्ता बता देता हूं।”

     

    कबीर पीछे से बोला, “अब तू गाइड भी बनेगा?”

     

    शौर्य ने अनदेखा कर दिया।

     

    रास्ते में अनाया ने बताया कि वह अपने पिता के पुराने दोस्त से मिलने आई थी। उसके पिता कुछ साल पहले गुजर चुके थे और उनके जाने के बाद अनाया को एक पुरानी चिट्ठी मिली थी।

     

    उस चिट्ठी में इसी इलाके के एक पुराने घर का जिक्र था।

     

    शौर्य अचानक गंभीर हो गया।

     

    “कौन सा घर?”

     

    अनाया ने पता दिखाया।

     

    शौर्य का चेहरा बदल गया।

     

    “ये घर…?”

     

    “हां। जानते हो?”

     

    शौर्य कुछ पल चुप रहा।

     

    “वो घर कई सालों से बंद है।”

     

    अनाया ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”

     

    “पता नहीं। बचपन से उसे बंद ही देखा है।”

     

    कबीर बोला, “चल वापस चलते हैं।”

     

    लेकिन अनाया की आंखों में सवाल थे।

     

    शौर्य ने कहा, “मैं तुम्हें वहां तक छोड़ देता हूं।”

     

    पुराने घर के सामने पहुंचकर तीनों रुक गए।

     

    बड़ा लोहे का दरवाजा जंग लगा हुआ था। अंदर पेड़ों की सूखी डालियां दिखाई दे रही थीं।

     

    अनाया ने अपनी जेब से वही पुरानी चिट्ठी निकाली।

     

    “यही जगह है।”

     

    शौर्य ने दरवाजा धकेला।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    कबीर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भाई, नादानी मत कर।”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “डर गया?”

     

    “हां।”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    घर के अंदर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। अचानक अनाया की नजर एक तस्वीर पर पड़ी।

     

    वह वहीं रुक गई।

     

    “ये… मेरे पिता हैं।”

     

    शौर्य और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।

     

    तस्वीर में अनाया के पिता एक आदमी के साथ खड़े थे।

     

    शौर्य ने तस्वीर में दूसरे आदमी को देखा और चौंक गया।

     

    “इन्हें मैं जानता हूं।”

     

    “कौन हैं?”

     

    शौर्य ने धीरे से कहा, “मेरे पापा।”

     

    अनाया के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

     

    “क्या?”

     

    शौर्य भी समझ नहीं पा रहा था कि उसके पिता और अनाया के पिता का इस घर से क्या रिश्ता था।

     

    तभी ऊपर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर बोला, “अब मैं सच में जा रहा हूं।”

     

    शौर्य ने कहा, “रुक।”

     

    तीनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    ऊपर एक कमरा बंद था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो अनाया की चिट्ठी के पीछे बना हुआ था।

     

    अनाया ने कांपते हाथों से चिट्ठी पलटी।

     

    उसके पीछे लिखा था—

     

    “सच जानना हो तो उस कमरे का दरवाजा खोलना।”

     

    शौर्य ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    उसकी नादानियां उसे यहां तक तो ले आई थीं।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि यह नादानी उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज खोलने वाली थी।

     

    और जैसे ही शौर्य ने दरवाजे की कुंडी पकड़ी…

     

    अंदर से किसी ने धीरे से दरवाजा खटखटाया।

     

    तीनों के चेहरे पर डर छा गया।

  • शरारती सफेद बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और शरारती सफेद बछड़ा

     

    अगली सुबह नंद भवन में सूरज की पहली किरण पड़ते ही कान्हा उठ गए। उन्हें रात से ही उस नन्हे सफेद बछड़े की चिंता थी, जो कल पहली बार उनके पास आया था।

     

    कान्हा आँगन में दौड़ते हुए पहुँचे।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने तुरंत घंटी बजाई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    फिर उनकी नजर सफेद बछड़े पर गई।

     

    वह थोड़ी दूर खड़ा था और बड़ी-बड़ी आँखों से कान्हा को देख रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम्हारा नाम क्या रखें?”

     

    बछड़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम बहुत सफेद हो।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसका नाम गोरा रख दो।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “नहीं, चाँद रखो।”

     

    कान्हा ने कुछ देर सोचा।

     

    फिर बोले—

     

    “इसका नाम चंदू होगा।”

     

    सभी दोस्तों को नाम पसंद आ गया।

     

    कान्हा ने चंदू को पुकारा—

     

    “चंदू!”

     

    बछड़ा कान खड़े करके उनकी तरफ देखने लगा।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “इसे अपना नाम पसंद आ गया!”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    सुबह का समय था। नंद भवन में यशोदा मैया रसोई में काम कर रही थीं। उन्होंने बड़े बर्तन में आटा रखा और रोटियाँ बनाने लगीं।

     

    कान्हा कुछ देर तक चंदू और छोटू के साथ खेलते रहे।

     

    लेकिन चंदू बाकी बछड़ों से अलग था।

     

    वह हर चीज को सूँघता, फिर उसे छूने की कोशिश करता।

     

    कभी वह लकड़ी के दरवाजे को नाक से धक्का देता, कभी रस्सी खींचता।

     

    कान्हा उसे देखकर हँसते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो तुमसे भी ज्यादा शरारती है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं, ये तो बहुत सीधा है।”

     

    उसी समय चंदू एक रस्सी के पास गया और उसे खींचने लगा।

     

    रस्सी से बंधी छोटी टोकरी नीचे गिर गई।

     

    धड़ाम!

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    फिर हँस पड़े।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ऐसा नहीं करते।”

     

    चंदू ने कान हिलाए।

     

    कान्हा बोले—

     

    “समझ गए?”

     

    चंदू फिर रस्सी सूँघने लगा।

     

    कान्हा ने सिर पकड़ लिया।

     

    “तुम तो मेरी बात सुनते ही नहीं।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया रसोई में आटा गूँध रही थीं।

     

    उन्होंने बच्चों की हँसी सुनी तो बाहर देखा।

     

    “कान्हा, अंदर मत आना। मैं काम कर रही हूँ।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं अंदर नहीं आऊँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और चंदू को भी अंदर मत आने देना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    लेकिन जैसे ही यशोदा अंदर गईं, चंदू उनकी ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू, उधर नहीं जाना।”

     

    चंदू ने दो कदम पीछे किए।

     

    फिर अचानक मुड़ा और रसोई की तरफ चल पड़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “अरे! रुको!”

     

    चंदू रसोई के दरवाजे तक पहुँच गया।

     

    कान्हा ने उसे रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन चंदू बहुत तेज था।

     

    वह सीधे अंदर चला गया।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “अरे!”

     

    चंदू आटे के पास पहुँच चुका था।

     

    उसने अपना मुँह आटे वाले बर्तन के पास किया।

     

    कान्हा चिल्लाए—

     

    “चंदू! नहीं!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    चंदू ने बर्तन को हल्का सा धक्का दिया।

     

    बर्तन हिल गया और थोड़ा आटा नीचे गिर गया।

     

    यशोदा ने जल्दी से बर्तन पकड़ लिया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “मैया, मैंने इसे रोका था।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन ये अंदर आया कैसे?”

     

    कान्हा चुप।

     

    तभी चंदू ने अपनी पूँछ हिलाई और पीछे हटते हुए आटे पर पैर रख दिया।

     

    उसके पैरों के निशान पूरे फर्श पर बन गए।

     

    कान्हा उन्हें देखकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कान्हा ने हँसी रोकने की कोशिश की।

     

    “थोड़ी।”

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    “अब इसे बाहर ले जाओ।”

     

    कान्हा चंदू को बाहर ले गए।

     

    लेकिन चंदू की शरारत अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    आँगन में रखी एक टोकरी में सूखी घास थी।

     

    चंदू उसमें मुँह डालकर घास खींचने लगा।

     

    कुछ ही पल में पूरी घास बाहर बिखर गई।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो बिल्कुल तुम्हारी तरह है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरी तरह क्यों?”

     

    “जहाँ देखो वहाँ शरारत।”

     

    कान्हा ने चंदू को देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “लेकिन इसकी शरारतें बहुत मजेदार हैं।”

     

    तभी चंदू ने फिर दौड़ लगा दी।

     

    इस बार वह सीधे आँगन में रखे पानी के बड़े बर्तन की तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “चंदू! वहाँ मत जाना!”

     

    चंदू ने बर्तन को सूँघा।

     

    फिर पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “चलो, इस बार बच गए।”

     

    लेकिन अचानक चंदू ने अपना सिर बर्तन से टकरा दिया।

     

    बर्तन थोड़ा हिला और पानी बाहर छलक गया।

     

    कान्हा के पैर भीग गए।

     

    दोस्त जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो तुमने हद कर दी!”

     

    चंदू मासूम बनकर उन्हें देखने लगा।

     

    कान्हा उसका चेहरा देखकर खुद भी हँस पड़े।

     

    दोपहर में नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने आँगन में बिखरी घास, पानी और आटे के निशान देखे।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज यहाँ क्या हुआ?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपके नए बछड़े ने पूरा घर उलट-पुलट कर दिया।”

     

    नंद बाबा ने चंदू को देखा।

     

    “इतना शरारती?”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “बाबा, ये बहुत अच्छा है। बस इसे सब चीजों को छूने की आदत है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें तो अच्छा दोस्त मिल गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने चंदू के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “लेकिन इसे धीरे-धीरे समझाना होगा कि क्या करना है और क्या नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिखाऊँगा।”

     

    शाम को कान्हा ने एक खेल बनाया।

     

    उन्होंने चंदू के सामने तीन चीजें रखीं—घास, लकड़ी और एक फूल।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू, घास खानी है।”

     

    चंदू ने घास खा ली।

     

    कान्हा खुश हुए।

     

    “बहुत अच्छे!”

     

    फिर उन्होंने लकड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे नहीं खाना।”

     

    चंदू ने लकड़ी सूँघी और आगे बढ़ गया।

     

    कान्हा ने ताली बजाई।

     

    “शाबाश!”

     

    दोस्तों ने कहा—

     

    “देखो, कान्हा इसे पढ़ा रहे हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। इसे भी तो सीखना है।”

     

    कुछ देर बाद चंदू फूल की तरफ बढ़ा।

     

    कान्हा ने उसे रोक दिया।

     

    “ये नहीं। ये खेलने के लिए है।”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने खुशी से उसकी गर्दन सहलाई।

     

    “तुम सीख रहे हो!”

     

    यशोदा दूर से यह सब देख रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “देखिए, हमारा कान्हा खुद कितना शरारती है, लेकिन चंदू को समझा रहा है।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “शायद दूसरों को समझाते-समझाते खुद भी बहुत कुछ सीख रहा है।”

     

    रात को कान्हा चंदू के पास बैठे।

     

    उन्होंने उसके गले की छोटी सी घंटी को हाथ से छुआ।

     

    टन…

     

    छोटू भी पास खड़ा था।

     

    उसकी घंटी भी बजने लगी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “अब तो मेरे पास दो घंटियों वाले दोस्त हैं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “और दोनों तुमसे कम शरारती हैं।”

     

    कान्हा ने उसे देखा।

     

    “तुम मुझे शरारती कह रहे हो?”

     

    दोस्त भागने लगा।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़ पड़े।

     

    आँगन में फिर बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कुछ देर बाद यशोदा ने सबको घर बुलाया।

     

    कान्हा जाने से पहले चंदू के पास गए।

     

    “कल फिर मिलेंगे।”

     

    चंदू ने अपनी छोटी घंटी बजाई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तुमने हाँ कह दिया!”

     

    उस रात कान्हा जल्दी सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    • सुबह जब वे गायों के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू और चंदू दोनों गायों के झुंड से गायब थे।

     

    कान्हा की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “छोटू?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “चंदू?”

     

    दूर कहीं से एक बहुत हल्की घंटी सुनाई दी—

     

    टन…

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “दोनों शायद जंगल की तरफ चले गए हैं।”

     

    और बिना देर किए कान्हा अपने दोस्तों के साथ उनकी तलाश में निकल पड़े।

     

  • बारिश में खोया छोटू

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और बारिश में खोया छोटू

     

    अगली सुबह वृंदावन में आसमान पर बादल छाए हुए थे। हवा ठंडी थी और दूर-दूर तक काले बादल दिखाई दे रहे थे।

     

    कान्हा सुबह उठते ही आँगन में आए। उनकी नजर सबसे पहले गायों के पास गई।

     

    वहाँ छोटू भी खड़ा था।

     

    उसके गले में नंद बाबा की दी हुई नई छोटी घंटी थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उसके पास दौड़कर गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़े ने कान्हा की तरफ देखा और धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो मैया! ये मुझे पहचान गया।”

     

    यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं।

     

    “अब तो तुम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई है।”

     

    कान्हा ने छोटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “हाँ।”

     

    तभी नंद बाबा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “आज बारिश हो सकती है। गायों को बहुत दूर मत ले जाना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ गायों के पीछे-पीछे चल पड़े।

     

    छोटू भी उनके आसपास ही घूम रहा था।

     

    आसमान में बादल और घने होते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज बारिश होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ी बारिश में खेलेंगे।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “अगर बाबा ने सुन लिया तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “हम दूर नहीं जाएँगे।”

     

    वे एक खुले मैदान में पहुँचे।

     

    गायें घास खाने लगीं और बच्चे पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    कान्हा ने बांसुरी निकाली।

     

    धीरे-धीरे बांसुरी की धुन हवा में फैलने लगी।

     

    छोटू कान्हा के पास आकर बैठ गया।

     

    कान्हा ने उसके गले की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अच्छी है ना?”

     

    छोटू ने पूँछ हिलाई।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी पहली बूंद उनके हाथ पर गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    कुछ ही पल में बारिश तेज हो गई।

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे भागकर खड़े हो गए।

     

    गायें भी एक जगह इकट्ठी होने लगीं।

     

    नंद बाबा ने दूर से आवाज लगाई—

     

    “सब बच्चे पास रहो!”

     

    कान्हा ने जवाब दिया—

     

    “जी बाबा!”

     

    तेज बारिश में कुछ दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों को गिनना शुरू किया।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    सभी बच्चे थे।

     

    फिर उन्होंने गायों की तरफ देखा।

     

    कई गायें पास थीं।

     

    लेकिन छोटू दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कान्हा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “छोटू कहाँ है?”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद गायों के बीच होगा।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं है।”

     

    उन्होंने ध्यान से सुना।

     

    बारिश की आवाज के बीच कोई घंटी सुनाई नहीं दे रही थी।

     

    कान्हा घबरा गए।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    उन्होंने फिर आवाज लगाई—

     

    “छोटू!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बारिश बहुत तेज है। अभी बाहर मत जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन छोटू अकेला है।”

     

    नंद बाबा भी गायों को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे।

     

    कान्हा उनके पास दौड़कर पहुँचे।

     

    “बाबा, छोटू नहीं मिल रहा।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत आसपास देखा।

     

    “कहाँ था आखिरी बार?”

     

    “मेरे पास। फिर बारिश शुरू हुई और वो गायों के बीच चला गया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तुम यहाँ रहो। मैं देखता हूँ।”

     

    लेकिन कान्हा बोले—

     

    “मैं भी चलूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बारिश बहुत तेज है।”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “बाबा, वो डर गया होगा।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा को अपने पास रखा।

     

    “ठीक है। लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “तुम सब भी चलोगे?”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    नंद बाबा आगे और बच्चे पीछे चलने लगे।

     

    उन्होंने रास्ते में घंटी की आवाज सुनने की कोशिश की।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि कुछ साफ नहीं सुनाई दे रहा था।

     

    कान्हा बार-बार आवाज लगाते—

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं आता।

     

    तभी कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “रुको!”

     

    सब रुक गए।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहे।

     

    फिर बहुत हल्की आवाज आई—

     

    टन…

     

    कान्हा की आँखें खुल गईं।

     

    “सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “घंटी!”

     

    उन्होंने आवाज की दिशा में दौड़ना शुरू किया।

     

    नंद बाबा भी उनके पीछे गए।

     

    थोड़ी दूर एक झाड़ी के पीछे छोटू खड़ा था।

     

    उसका एक पैर कीचड़ में फँस गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर तुरंत उसके पास बैठ गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़ा घबराकर आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “डरो मत। मैं आ गया।”

     

    नंद बाबा ने सावधानी से उसका पैर कीचड़ से बाहर निकाला।

     

    छोटू आजाद होते ही कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसे गले से लगा लिया।

     

    “तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गए थे?”

     

    छोटू ने धीरे से आवाज की।

     

    एक दोस्त हँसते हुए बोला—

     

    “लगता है ये भी तुम्हें जवाब दे रहा है।”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी को देखा।

     

    वह कीचड़ से भर गई थी।

     

    कान्हा ने अपने कपड़े के एक साफ हिस्से से घंटी साफ की।

     

    टन…

     

    आवाज फिर सुनाई दी।

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “अब मैं तुम्हें फिर कभी खोने नहीं दूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “कान्हा, किसी की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होता। उसके लिए ध्यान रखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं रखूँगा।”

     

    बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।

     

    सब लोग गायों के साथ वापस चल पड़े।

     

    छोटू इस बार कान्हा के बिल्कुल पास चल रहा था।

     

    हर कुछ कदम बाद उसकी घंटी बजती।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हर बार पीछे मुड़कर उसे देखते।

     

    नंद बाबा यह देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया दौड़कर बाहर आईं।

     

    “कान्हा! तुम इतने भीग क्यों गए?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, छोटू खो गया था।”

     

    यशोदा ने पहले कान्हा को देखा, फिर छोटू को।

     

    “मिल गया?”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ!”

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “मैं तो डर गई थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी घंटी सुनाई दी थी।”

     

    उन्होंने घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा हुआ इसे घंटी मिल गई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। अब ये खोएगा नहीं।”

     

    यशोदा ने कान्हा के गीले बाल पोंछे।

     

    “लेकिन तुम भी तोगए थे बारिश में।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “छोटू अकेला था।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “दूसरों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अगली बार बाबा के साथ ही जाऊँगा।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “यही समझदारी है।”

     

    उस शाम बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की धूप निकल आई थी।

     

    कान्हा छोटू के पास बैठकर उसकी घंटी सुन रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, अब तुम्हें बारिश से डर नहीं लगता?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बारिश से नहीं। बस छोटू खो जाए तो डर लगता है।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हें सच में इसकी बहुत चिंता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्त की चिंता तो करनी ही चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने अपनी बांसुरी उठाई और धीरे-धीरे बजाने लगे।

     

    छोटू उनके पास बैठा रहा।

     

    गायें भी शांत थीं।

     

    वृंदावन की गीली मिट्टी से खुशबू आ रही थी।

     

    यशोदा दूर खड़ी यह सब देख रही थीं।

     

    उनके मन में एक ही बात आई—

     

    उनका नन्हा कान्हा भले ही शरारती हो, लेकिन उसके दिल में अपने हर दोस्त के लिए बहुत गहरा प्यार था।

     

    रात को कान्हा सोने से पहले फिर छोटू की बात करने लगे।

     

    “मैया, कल मैं उसके लिए कुछ अच्छा करूँगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उसके लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “क्या छोटू भी मुझे अपना दोस्त मानता होगा?”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “जिसके लिए तुम बारिश में उसे ढूँढ़ने निकल पड़े, वो तुम्हें दोस्त क्यों नहीं मानेगा?”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    अगली सुबह उन्होंने सच में छोटू के लिए फूलों की एक छोटी माला बनाई।

     

    लेकिन जब वह माला लेकर छोटू के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू अकेला नहीं था।

     

    उसके पास एक नन्हा सफेद बछड़ा खड़ा था।

     

    और वह बछड़ा कान्हा को देखते ही उनके पास दौड़ पड़ा।

     

    कान्हा हैरान होकर बोले—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराकर बोले—

     

    “छोटू का नया दोस्त।”

     

    कान्हा ने दोनों बछड़ों को देखा और खुशी से बोले—

     

    “अब हमारे पास दो दोस्त हैं!”

     

    लेकिन कान्हा को क्या पता था कि नया बछड़ा इतना शरारती था कि अगले ही दिन वह नंद भवन की रसोई में घुसकर सारा आटा बिखेरने वाला था।

     

    •  
  • कान्हा और बिछड़ा बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और बिछड़ा हुआ बछड़ा

     

    अगली सुबह कान्हा सूरज निकलने से पहले ही उठ गए। आज उनके लिए खास दिन था, क्योंकि नंद बाबा ने उन्हें पहली बार गायों के साथ खुले मैदान तक चलने की अनुमति दी थी।

     

    कान्हा उठते ही यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    “मैया! उठो ना!”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “क्या हुआ कान्हा?”

     

    “आज मैं बाबा के साथ गायों को चराने जाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे याद है। लेकिन इतनी सुबह से इतनी खुशी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं गायों की घंटियाँ सुनूँगा, उनके साथ चलूँगा और उनकी देखभाल भी करूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके बाल सँवारे और कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन बाबा की बात मानना। बहुत दूर मत जाना।”

     

    “पक्का!”

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को लेकर घर से निकले। कान्हा उनके साथ थे। उनके पीछे उनके कई दोस्त भी चल पड़े।

     

    रास्ते भर गायों की घंटियाँ बजती रहीं।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा कभी किसी गाय के पास जाते, कभी किसी बछड़े के सिर पर हाथ फेरते।

     

    नंद बाबा उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, आज तो तुम बिल्कुल बड़े ग्वाले जैसे लग रहे हो।”

     

    कान्हा ने गर्व से कहा—

     

    “मैं बड़ा होकर भी गायों की देखभाल करूँगा।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “और माखन?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “माखन भी खाऊँगा।”

     

    सब बच्चे हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे एक बड़े हरे मैदान में पहुँचे। वहाँ घास बहुत अच्छी थी। गायें अलग-अलग जगह फैलकर घास खाने लगीं।

     

    नंद बाबा ने बच्चों से कहा—

     

    “तुम सब यहीं रहना। गायों को बहुत दूर मत जाने देना।”

     

    सभी ने कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी निकालने लगे।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे धुन बजानी शुरू की।

     

    गायों की घंटियाँ और बांसुरी की आवाज मिलकर बहुत प्यारी लग रही थी।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने बांसुरी रोक दी।

     

    उन्हें लगा जैसे कोई आवाज कर रहा है।

     

    “माँ… माँ…”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    आवाज बहुत हल्की थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से पूछा—

     

    “तुमने कुछ सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा फिर चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    कान्हा तुरंत खड़े हो गए।

     

    “कोई बछड़ा अपनी माँ को बुला रहा है।”

     

    वह आवाज की दिशा में चल पड़े।

     

    दो दोस्त उनके साथ हो लिए।

     

    थोड़ी दूर झाड़ियों के पीछे उन्हें एक छोटा सा बछड़ा दिखाई दिया।

     

    वह अकेला खड़ा था और बार-बार अपनी माँ की तरफ देखने की कोशिश कर रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे रह गए?”

     

    बछड़ा धीरे से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “डरो मत। हम तुम्हारी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ दूसरी तरफ चली गई होगी।”

     

    कान्हा ने मैदान की तरफ देखा।

     

    बहुत सारी गायें थीं।

     

    “हमें पहचानना होगा कि इसकी माँ कौन है।”

     

    उन्होंने बछड़े को ध्यान से देखा।

     

    उसके गले में कोई घंटी नहीं थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चलो, इसे धीरे-धीरे गायों के पास ले चलते हैं।”

     

    वे बछड़े को लेकर मैदान की ओर लौटे।

     

    जैसे ही बछड़ा गायों के पास पहुँचा, वह एक दिशा में तेजी से बढ़ने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! इसे पता है इसकी माँ कहाँ है।”

     

    बछड़ा एक सफेद गाय के पास पहुँचा।

     

    लेकिन गाय ने उसे देखकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

     

    बछड़ा फिर दूसरी तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे चलते रहे।

     

    अचानक वह एक भूरे रंग की गाय के पास जाकर रुक गया।

     

    गाय ने जैसे ही बछड़े को देखा, वह उसकी तरफ बढ़ी।

     

    बछड़ा खुशी से अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त खुशी से बोले—

     

    “सच में इसकी माँ मिल गई!”

     

    कान्हा ने गाय के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम इसे छोड़कर इतनी दूर क्यों चली गई थीं?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए थे।

     

    उन्होंने पूरा दृश्य देखा।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता चला कि ये अपनी माँ से बिछड़ गया है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसकी आवाज सुनाई दी थी। ये अपनी माँ को बुला रहा था।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से कहा—

     

    “तुमने बहुत अच्छा किया।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, अगर कोई छोटा अपने घरवालों से बिछड़ जाए तो उसे ढूँढ़ना चाहिए ना?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “बिल्कुल।”

     

    कान्हा कुछ देर उस बछड़े को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “अब इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “आज से तुम इसकी भी देखभाल करना।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने बछड़े को गले लगाने की कोशिश की।

     

    बछड़ा थोड़ा पीछे हट गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अरे, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”

     

    कुछ देर बाद बछड़ा खुद कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “अब डरना नहीं।”

     

    दोपहर को बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे।

     

    कान्हा ने अपनी पोटली खोली।

     

    उसमें यशोदा मैया ने रोटी और थोड़ा मक्खन रखा था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मुझे भी थोड़ा दो।”

     

    कान्हा ने रोटी का टुकड़ा उसे दे दिया।

     

    फिर दूसरे दोस्त को भी दिया।

     

    थोड़ी देर में कान्हा के पास बहुत कम खाना बचा।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम खुद क्या खाओगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरे पास अभी भी है।”

     

    उन्होंने आखिरी टुकड़ा उठाया।

     

    तभी वही छोटा बछड़ा उनके पास आ गया।

     

    वह कान्हा को देखने लगा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें भी चाहिए?”

     

    उन्होंने रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसे नहीं दिया, बल्कि पास की घास की ओर इशारा किया।

     

    “तुम ये खाओ। ये तुम्हारे लिए है।”

     

    बछड़ा घास खाने लगा।

     

    कान्हा उसे देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    शाम होने लगी।

     

    नंद बाबा ने गायों को वापस इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    सभी बच्चे अपने-अपने दोस्तों के साथ चल पड़े।

     

    लेकिन अचानक कान्हा ने पीछे देखा।

     

    वही छोटा बछड़ा फिर से पीछे रह गया था।

     

    कान्हा दौड़कर उसके पास गए।

     

    “चलो, घर चलते हैं।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उनके पीछे चलने लगा।

     

    रास्ते में उसकी घंटी नहीं बज रही थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा, इसके लिए भी घंटी लगवा दो।”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि अगर ये फिर पीछे रह जाए तो हमें इसकी आवाज सुनाई दे।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। कल इसके लिए एक छोटी घंटी ले आएँगे।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “फिर मैं इसकी घंटी सबसे पहले सुनूँगा।”

     

    शाम को नंद भवन पहुँचते ही यशोदा मैया बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को देखा।

     

    “आज दिन कैसा रहा?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा!”

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने बछड़े की पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को अपने पास बुलाकर कहा—

     

    “तुमने आज बहुत अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, वो बहुत डर गया था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “किसी को डर में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया, कल उसके लिए घंटी आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तो अब तुम्हारा एक नया दोस्त भी बन गया।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ। इसका नाम भी रखेंगे।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या नाम रखोगे?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “छोटू!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “इतना छोटा नाम?”

     

    “हाँ। क्योंकि वो छोटा है।”

     

    रात को कान्हा सोने गए तो उनकी बातें सिर्फ उसी बछड़े के बारे में थीं।

     

    “मैया, कल मैं छोटू को घास खिलाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसकी घंटी बजाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसके साथ दौड़ूँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “और फिर कोई शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने तुरंत मासूम चेहरा बनाया।

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारे इस ‘नहीं’ पर मुझे भरोसा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में उनकी आँखें बंद हो गईं।

     

    लेकिन अगले दिन जब छोटू के गले में नई घंटी बाँधी गई, तो कान्हा ने देखा कि घंटी की आवाज बाकी सभी घंटियों से अलग थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मैं तुम्हें भीड़ में भी पहचान लूँगा।”

     

    छोटू ने अपनी छोटी सी पूँछ हिलाई।

     

    और शायद वह भी समझ गया था कि वृंदावन में उसे एक ऐसा दोस्त मिल गया है जो उसकी छोटी-सी आवाज भी सुन लेता है।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा और छोटू के सामने एक नई मुसीबत आने वाली थी—वृंदावन की तेज बारिश में छोटू अचानक गायों के झुंड से अलग हो जाएगा।

     

    और उसे ढूँढ़ने के लिए कान्हा अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे दोस्तों के साथ निकल पड़ेंगे।

     

     

  • कान्हा और गाय की घंटी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और गाय की नई घंटी

     

    अगली सुबह नंद भवन के आँगन में एक नई आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा ने खेलते-खेलते अपना सिर उठाया।

     

    “ये कैसी आवाज है?”

     

    उनके दोस्त ने कहा—

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    सभी बच्चे दौड़कर आँगन में पहुँचे।

     

    वहाँ नंद बाबा एक सुंदर सी गाय के गले में नया घंटी वाला पट्टा बाँध रहे थे। घंटी चमक रही थी और उसके हिलते ही मधुर आवाज निकल रही थी।

     

    कान्हा उस गाय के पास जाकर खड़े हो गए।

     

    उन्होंने घंटी को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, ये नई है?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। आज इसे नई घंटी पहनाई है।”

     

    कान्हा ने घंटी को हल्के से छुआ।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अब जब ये दूर जाएगी, तो इसकी आवाज से पता चल जाएगा कि ये कहाँ है।”

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “तो अगर मैं भी इसे पहन लूँ तो आपको पता चल जाएगा कि मैं कहाँ हूँ?”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें घंटी की जरूरत नहीं है। तुम्हारी शरारतों की आवाज दूर से ही सुनाई दे जाती है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने मुँह बना लिया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अच्छा, नाराज मत हो।”

     

    कान्हा फिर घंटी को देखने लगे।

     

    उसके साथ लाल रंग का सुंदर पट्टा भी लगा था।

     

    उनके मन में तुरंत एक विचार आया।

     

    उन्होंने अपने दोस्त को आँख से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गया कि कुछ होने वाला है।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर ये घंटी किसी और को पहना दें तो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “किसे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    नंद बाबा गाय को लेकर बाहर चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ पीछे-पीछे चल दिए।

     

    गाय थोड़ी दूर जाकर पेड़ के नीचे घास खाने लगी।

     

    कान्हा उसकी घंटी की आवाज सुनते रहे।

     

    टन… टन…

     

    उन्हें यह आवाज बहुत पसंद आ रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम इसे इतना ध्यान से क्यों सुन रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “हम भी ऐसा खेल खेलेंगे।”

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “कैसा?”

     

    “एक बच्चा आँखें बंद करेगा और बाकी घंटी बजाकर अलग-अलग जगह छिपेंगे। उसे आवाज सुनकर सबको ढूँढ़ना होगा।”

     

    सभी बच्चों को खेल पसंद आ गया।

     

    उन्होंने एक छोटी घंटी ली जो घर के पुराने सामान में पड़ी थी।

     

    पहली बारी कान्हा की थी।

     

    उन्होंने आँखों पर कपड़ा बाँध लिया।

     

    दोस्त घंटी बजाते हुए इधर-उधर भागने लगे।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा आवाज सुनकर एक तरफ दौड़ते।

     

    लेकिन दोस्त दूसरी तरफ चले जाते।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम लोग मुझे परेशान कर रहे हो!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    आखिरकार कान्हा ने आवाज का पीछा किया और एक दोस्त को पकड़ लिया।

     

    “पकड़ लिया!”

     

    दोस्त बोला—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम्हारी हँसी से।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कुछ देर तक खेल चलता रहा।

     

    तभी नंद बाबा की गाय वहाँ से निकलकर दूसरी तरफ चली गई।

     

    उसकी घंटी बज रही थी।

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    “रुको।”

     

    सबने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गाय कहाँ जा रही है?”

     

    उन्होंने देखा कि गाय रास्ते से हटकर झाड़ियों की तरफ चली गई थी।

     

    कान्हा उसके पीछे गए।

     

    वहाँ एक छोटा बछड़ा खड़ा था, जो अपनी माँ के पीछे जाना चाहता था लेकिन रस्सी के कारण रुक गया था।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अरे, तुम यहाँ हो!”

     

    बछड़ा बेचैनी से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा तुरंत आए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा।

     

    “ये अपनी माँ के पास जाना चाहता है।”

     

    उन्होंने उसे खोल दिया।

     

    बछड़ा दौड़कर अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी ने हमें इसका रास्ता बता दिया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा? छोटी सी चीज भी कितने काम आती है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    उस दिन से कान्हा को घंटी की आवाज और भी अच्छी लगने लगी।

     

    शाम को वह गाय के पास बैठे रहे।

     

    वह उसे प्यार से सहलाते और घंटी की आवाज सुनते।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें देखा।

     

    “कान्हा, आज तुम्हें घंटी से इतनी दोस्ती कैसे हो गई?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें गायों की बहुत चिंता रहती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “ये हमारे घर का हिस्सा हैं।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    तभी कान्हा ने अचानक कहा—

     

    “मैया, मुझे भी एक घंटी चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैं बाहर जाऊँ तो आपको पता रहे कि मैं कहाँ हूँ।”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तुम्हें घंटी पहनाने की जरूरत नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारी आवाज से ही पहचान लूँगी।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अगर मैं चुप रहा तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तब तुम्हारे दोस्त तुम्हें ढूँढ़ते हुए जरूर शोर मचाएँगे।”

     

    कान्हा और उनके दोस्त हँसने लगे।

     

    अगले दिन कान्हा ने एक नई शरारत की योजना बनाई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “आज हम सब अपनी-अपनी छोटी घंटियाँ पहनेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “हम देखेंगे कि कौन सबसे ज्यादा देर तक बिना आवाज किए चल सकता है।”

     

    सभी ने घंटियाँ बाँध लीं।

     

    लेकिन जैसे ही वे चलने लगे—

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    सबकी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “कोई भी चुप नहीं चल सकता!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारी वजह से ये खेल भी खराब हो गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “खराब नहीं, मजेदार हो गया।”

     

    सभी बच्चे दौड़ने लगे।

     

    घंटियों की आवाज पूरे रास्ते में गूँजने लगी।

     

    गाँव की गोपियाँ बाहर आ गईं।

     

    एक गोपी ने पूछा—

     

    “ये कैसी बारात निकल रही है?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “लगता है कान्हा ने बच्चों को गाय बना दिया है।”

     

    कान्हा जोर से हँसे।

     

    “हम गाय नहीं हैं!”

     

    गोपियाँ भी हँसने लगीं।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने बच्चों की घंटियाँ देखीं।

     

    “ये सब क्या है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम घंटी वाला खेल खेल रहे हैं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, लेकिन किसी की गाय की घंटी मत खोलना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं खोलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “कान्हा, तुमने तो सोचा था गाय की घंटी खुद पहनोगे।”

     

    यशोदा ने सुन लिया।

     

    “क्या कहा?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    दोस्त भाग गया।

     

    यशोदा ने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तुम गाय की घंटी पहनने वाले थे?”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “बस सोच रहा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मेरे कान्हा को हर चीज खुद करके देखनी होती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मुझे सब जानना है।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “जानना अच्छी बात है, लेकिन हर चीज करने से पहले पूछना भी जरूरी है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    रात को नंद बाबा घर लौटे।

     

    कान्हा उनके पास बैठकर बोले—

     

    “बाबा, आपकी गाय की घंटी बहुत अच्छी है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हें पसंद है?”

     

    “बहुत।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो कल तुम मेरे साथ गायों को चराने चलना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “और मैं उनकी घंटियाँ भी सुनूँगा?”

     

    “जितनी चाहो।”

     

    कान्हा ने नंद बाबा को गले लगा लिया।

     

    उस रात कान्हा बहुत खुश थे।

     

    उन्होंने सोने से पहले यशोदा से कहा—

     

    “मैया, कल मैं बाबा के साथ गायों के पास जाऊँगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “किस बात का?”

     

    “गायों से दूर मत जाना।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”

     

    • यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    अगली सुबह कान्हा पहली बार नंद बाबा के साथ गायों को लेकर वृंदावन के खुले मैदानों की ओर जाने वाले थे।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही कान्हा को एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी जिसने उन्हें चौंका दिया—

     

    एक बहुत छोटा बछड़ा अपनी माँ से अलग होकर अकेला खड़ा था।

     

    कान्हा तुरंत उसकी ओर दौड़ पड़े।

     

    और इस बार उनकी शरारत नहीं, उनकी ममता और समझदारी सबको देखने को मिलने वाली थी।