एपिसोड – 24 : क्या विराज ही आरोही का असली पिता है?
विराज की बात सुनकर समुद्र किनारे खड़े सभी लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”
आरोही की आंखें विराज के चेहरे पर जम गईं।
उसके होंठ कांपने लगे।
“नहीं…”
विराज मुस्कुराया।
“हां, आरोही।”
“आप झूठ बोल रहे हैं।”
“मैं झूठ क्यों बोलूंगा?”
आरोही पीछे हट गई।
“मेरे पिता अर्जुन थे।”
विराज ने कहा,
“अर्जुन ने तुम्हें पाला था। लेकिन तुम्हें जन्म मैंने दिया।”
अर्जुन अचानक आगे बढ़े।
“विराज!”
विराज ने उनकी तरफ देखा।
“क्यों अर्जुन? अब सच सुनकर डर लग रहा है?”
अर्जुन की आंखों में गुस्सा था।
“तुम्हें पिता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।”
विराज हंस पड़ा।
“खून का रिश्ता अधिकार नहीं मांगता।”
आरव तुरंत आरोही के सामने आकर खड़ा हो गया।
“बस।”
विराज ने उसे देखा।
“तुम बीच में क्यों आ रहे हो?”
आरव ने कहा,
“क्योंकि वो अकेली नहीं है।”
आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।
“आरव… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जो भी सच होगा, हम साथ जानेंगे।”
आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।
“मां, आप बताइए।”
नंदिनी चुप रहीं।
“क्या विराज सच बोल रहा है?”
नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।
उन्होंने धीरे से सिर हिला दिया।
आरोही का दिल टूट गया।
“मतलब…?”
नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,
“हां… विराज तुम्हारा जैविक पिता है।”
आरोही पीछे हट गई।
“नहीं!”
आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन आरोही ने अपना हाथ छुड़ा लिया।
“मेरे पिता अर्जुन थे।”
अर्जुन की आंखों में दर्द था।
“और हमेशा रहेंगे।”
विराज ने कड़वाहट से कहा,
“तुम्हें क्या पता पिता होने का मतलब?”
अर्जुन ने जवाब दिया,
“उतना पता है जितना तुम्हें कभी नहीं होगा।”
“तुमने मेरी बेटी को मुझसे दूर किया।”
“क्योंकि तुम उसके लायक नहीं थे।”
विराज की आंखों में गुस्सा आ गया।
“तुम्हारी वजह से मैंने उसे पच्चीस साल दूर से देखा।”
अर्जुन ने कहा,
“और मैंने पच्चीस साल उसे तुम्हारी सच्चाई से बचाया।”
आरोही ने दोनों की तरफ देखा।
उसका सिर चकराने लगा।
“मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”
वह पीछे हटने लगी।
आरव उसके पास गया।
“आरोही।”
“नहीं आरव।”
“मैं तुम्हारे साथ हूं।”
“मुझे थोड़ी देर अकेले रहना है।”
आरव रुक गया।
लेकिन उसकी नजर आरोही से नहीं हटी।
विराज ने समुद्र की तरफ देखते हुए कहा,
“तुम्हें लगता है मैं सिर्फ एक खलनायक हूं?”
किसी ने जवाब नहीं दिया।
“नंदिनी और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”
नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।
“फिर?”
“फिर अर्जुन हमारे बीच आ गया।”
अर्जुन ने कहा,
“झूठ।”
विराज ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हमेशा यही कहते रहे।”
फिर वह आरोही की तरफ मुड़ा।
“जब तुम्हारी मां को पता चला कि वो तुम्हारे साथ गर्भवती है, मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता था।”
नंदिनी बोलीं,
“तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे। तुम मुझे अपने कारोबार और ताकत का हिस्सा बनाना चाहते थे।”
विराज चुप हो गया।
नंदिनी आगे बोलीं,
“तुम्हें सिर्फ अपना नाम चाहिए था।”
विराज ने कहा,
“लेकिन वो मेरी बेटी थी।”
“तुम्हारी बेटी होने से ज्यादा उसे एक इंसान बनने का अधिकार था।”
विराज की आंखों में कुछ पल के लिए दर्द दिखाई दिया।
फिर उसने कहा,
“और मैंने वो अधिकार उसे कभी नहीं दिया?”
नंदिनी ने कहा,
“नहीं।”
आरोही ने अर्जुन की तरफ देखा।
“अगर आप मेरे पिता नहीं थे… तो आपने मुझे इतना प्यार क्यों किया?”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
“क्योंकि तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें पहली बार अपनी बाहों में लिया था।”
“और?”
“उस दिन मैंने तय कर लिया था कि चाहे दुनिया मुझे तुम्हारा पिता माने या न माने… मैं तुम्हारा पिता बनकर रहूंगा।”
आरोही रोने लगी।
“तो आपने मुझे कभी झूठ नहीं बताया?”
अर्जुन चुप हो गए।
आरोही ने फिर पूछा,
“आपने मेरे पिता की सच्चाई मुझसे छुपाई।”
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
“हां।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”
विराज ने कहा,
“और उसने मुझे ढूंढने नहीं दिया।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि तुम खतरनाक थे।”
विराज ने कहा,
“मैं आज भी हूं।”
अचानक दूर से गोली चलने की आवाज आई।
धांय!
सब चौंक गए।
गोली पास की चट्टान से टकराई।
अभय ने तुरंत सबको नीचे झुकाया।
“सब नीचे!”
विराज के साथ आए लोग चारों तरफ फैल गए।
कबीर ने बंदूक निकाली।
“हमें यहां से निकलना होगा।”
अर्जुन ने कहा,
“पहले आरोही।”
आरव ने तुरंत आरोही का हाथ पकड़ा।
“मेरे साथ चलो।”
आरोही इस बार उसके साथ चल पड़ी।
दोनों एक चट्टान के पीछे छिप गए।
आरव ने पूछा,
“तुम ठीक हो?”
आरोही ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे पता है।”
“मेरे पिता…”
“अर्जुन तुम्हारे पिता हैं।”
“लेकिन खून से?”
आरव ने कहा,
“खून से क्या होता है?”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे लिए?”
“मेरे लिए जिसने मुझे पाला, वो मेरे पिता हैं।”
“और अगर वो भी झूठ निकले?”
आरव ने उसका चेहरा अपनी तरफ किया।
“तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”
आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।
“तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो?”
आरव हल्का सा मुस्कुराया।
“क्योंकि शायद मैं तुम्हें छोड़ना चाहता ही नहीं।”
आरोही ने धीरे से पूछा,
“अगर हमारे परिवारों की वजह से हमारा रिश्ता गलत साबित हुआ तो?”
आरव ने कहा,
“तो दुनिया से लड़ेंगे।”
“और अगर हमारे परिवार हमें अलग करना चाहें?”
“तो उनसे भी लड़ेंगे।”
“अगर तुम्हारे पिता?”
“उनसे भी।”
आरोही ने उसकी आंखों में देखा।
“और अगर मैं खुद कहूं कि मुझसे दूर चले जाओ?”
आरव ने कहा,
“तब भी पहले पूछूंगा कि तुम सच में चाहती हो या डर की वजह से कह रही हो।”
आरोही हल्का सा मुस्कुराई।
“तुम बहुत जिद्दी हो।”
“तुम्हारे मामले में हूं।”
तभी एक गोली उनके पास से निकल गई।
दोनों तुरंत नीचे झुक गए।
आरव ने आरोही को अपनी बाहों में ढक लिया।
“तुम ठीक हो?”
“हां।”
“पक्का?”
“हां।”
“चलो।”
दूसरी तरफ विराज ने शेखर को घेर लिया था।
“अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”
शेखर ने कहा,
“तुम्हें क्या चाहिए?”
“लाल फाइल।”
शेखर चुप रहा।
“मुझे पता है कि फाइल तुम्हारे पास है।”
“नहीं।”
विराज ने कहा,
“तो फिर आरव को मार दूंगा।”
शेखर ने पहली बार घबराकर उसकी तरफ देखा।
“उसे हाथ मत लगाना।”
विराज मुस्कुराया।
“यही तो तुम्हारी कमजोरी है।”
“आरव को इसमें मत घसीटो।”
“वो पहले से इसमें है।”
विराज ने बंदूक शेखर की तरफ कर दी।
“फाइल कहां है?”
शेखर ने कहा,
“मेरे पास नहीं।”
“झूठ।”
“मैं सच बोल रहा हूं।”
विराज ने गोली चलाने के लिए उंगली ट्रिगर पर रखी।
तभी पीछे से आवाज आई—
“बंदूक नीचे रखो।”
विराज पलटा।
आरव सामने खड़ा था।
उसके हाथ में बंदूक थी।
आरोही उसके पीछे थी।
विराज हंस पड़ा।
“तुम?”
आरव ने कहा,
“हां।”
“तुम मुझे गोली मारोगे?”
“अगर जरूरत पड़ी तो।”
विराज ने कहा,
“अपने पिता के सामने?”
आरव ने कहा,
“मेरे पिता वो हैं जिन्होंने मुझे बचाया।”
शेखर की आंखों में आंसू आ गए।
शेखर ने आरव की तरफ देखा।
“बंदूक नीचे कर दो।”
आरव ने कहा,
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि आज कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”
शेखर ने कहा,
“तुम्हें अपनी जिंदगी खतरे में नहीं डालनी चाहिए।”
आरव ने जवाब दिया,
“आपने मेरी जिंदगी बचाने के लिए पच्चीस साल अकेले गुजारे। आज मेरी बारी है।”
शेखर की आंखों से आंसू गिर पड़े।
“आरव…”
आरव ने कहा,
“मैंने आपको पिता मान लिया है।”
विराज ने ताना मारा,
“इतनी जल्दी?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“खून से नहीं… कर्म से।”
विराज ने कहा,
“बहुत भावुक हो गए।”
फिर उसने आरोही की तरफ देखा।
“लेकिन तुम्हें एक बात नहीं पता।”
आरोही ने पूछा,
“क्या?”
विराज ने कहा,
“लाल फाइल में सिर्फ तुम्हारे पिता का सच नहीं है।”
“तो?”
“उसमें तुम्हारी मां की मौत का सच भी है।”
आरोही की सांस रुक गई।
“मेरी मां?”
विराज ने नंदिनी की तरफ देखा।
“नंदिनी ने तुम्हें बताया कि वो तुमसे दूर क्यों हुई?”
आरोही ने मां की तरफ देखा।
नंदिनी चुप थीं।
विराज ने कहा,
“क्योंकि उसने तुम्हें बचाने के लिए नहीं…”
वह थोड़ा रुका।
“बल्कि क्योंकि उसने तुम्हारे जन्म की रात एक ऐसा काम किया था, जिसकी सजा उसे आज तक भुगतनी पड़ रही है।”
आरोही ने पूछा,
“क्या काम?”
नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।
“आरोही…”
“मां, सच बताइए।”
नंदिनी रोते हुए बोलीं,
“मैंने उस रात…”
वह आगे बोल नहीं पाईं।
अर्जुन ने कहा,
“नंदिनी, अभी नहीं।”
आरोही ने कहा,
“नहीं! आज सब सच बताइए।”
नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा “तुम्हारे जन्म के कुछ मिनट बाद मैंने अस्पताल से एक और बच्चा उठाया था।”
आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।
“दूसरा बच्चा?”
नंदिनी ने सिर हिलाया।
“हां।”
आरव ने पूछा,
“किसका?”
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आंखों में डर था।
“आरव का।”
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
“मेरा?”
नंदिनी ने कहा “तुम्हें तुम्हारी मां से अलग करके मैंने ही दूसरी जगह पहुंचाया था।”
आरव पीछे हट गया।
माधवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“नंदिनी… तुमने ऐसा क्यों किया?”
नंदिनी रोते हुए बोलीं “क्योंकि उस रात किसी ने मुझे मजबूर किया था।”
आरव ने पूछा,
“किसने?”
नंदिनी ने कांपते हुए विराज की तरफ देखा।
विराज मुस्कुराया।
“अब सच सामने आ गया।”
आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।
“तुमने मेरी मां से मुझे छीन लिया?”
विराज ने कहा,
“नहीं।”
उसने धीरे से कहा “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”
आरव ने बंदूक कसकर पकड़ ली।
और तभी…
पीछे से एक और गोली चली।
इस बार गोली…
शेखर के सीने में जा लगी।
“पापा!”
आरव चीख उठा।
शेखर जमीन पर गिर पड़े।
आरोही ने भी चीख मार दी।
नंदिनी रोने लगीं।
विराज ने तुरंत पीछे देखा।
लेकिन गोली चलाने वाला…
विराज का आदमी नहीं था।
वह आदमी अंधेरे से बाहर आया।
उसके हाथ में बंदूक थी।
और उसने कहा “अब अगला नंबर आरव का है।”
आरव ने शेखर को संभालते हुए ऊपर देखा।
उस आदमी का चेहरा देखकर…
विराज भी स्तब्ध रह गया।
“तुम…?”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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