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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

पढ़ने का समय : 10 मिनट

एपिसोड – 23 : “जिसे पिता समझा, वही मेरा दुश्मन निकला?”

 

नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में चारों तरफ धुआं फैल चुका था।

 

दरवाजा टूटकर जमीन पर पड़ा था।

 

सामने खड़ा आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

 

उसकी नजर सबसे पहले आरोही पर पड़ी।

 

वह मुस्कुराया।

 

“आखिरकार… इतने सालों बाद मेरी बेटी मेरे सामने खड़ी है।”

 

आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“आप… मेरे पिता हैं?”

 

उस आदमी ने कहा,

 

“हां।”

 

शेखर तुरंत आरोही के सामने आकर खड़े हो गए।

 

“इसके पास मत जाना।”

 

वह आदमी हंस पड़ा।

 

“तुम अब भी मुझे इससे दूर रखोगे?”

 

शेखर ने गुस्से में कहा,

 

“तुमने इसे पैदा किया होगा, लेकिन पिता कहलाने का अधिकार तुम्हें नहीं है।”

 

आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“मुझे सच चाहिए।”

 

उस आदमी ने कहा,

 

“सच यही है कि मैं तुम्हारा पिता हूं।”

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“और इतने सालों तक कहां थे?”

 

उस आदमी ने आरव की तरफ देखा।

 

“तुम बीच में मत बोलो।”

 

आरव एक कदम आगे बढ़ा।

 

“ये मेरी जिंदगी है। मैं बीच में बोलूंगा।”

 

आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“आरव…”

 

वह आदमी मुस्कुराया।

 

“तुम दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ चुके हो।”

 

आरव ने कहा,

 

“इससे तुम्हें क्या?”

 

“बहुत कुछ।”

 

शेखर ने कहा,

 

“आरोही, मेरी बात सुनो। ये आदमी तुम्हें सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।”

 

आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

 

“लेकिन अगर ये सच में मेरे पिता हैं तो?”

 

शेखर ने कहा,

 

“खून का रिश्ता हमेशा पिता का रिश्ता नहीं बनाता।”

 

उस आदमी ने गुस्से में शेखर की तरफ देखा।

 

“तुमने ये अधिकार कब से हासिल कर लिया?”

 

शेखर ने जवाब दिया,

 

“जिस दिन मैंने इसकी जान बचाई थी।”

 

आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

 

“आपका नाम क्या है?”

 

कुछ पल तक वह आदमी चुप रहा।

 

फिर बोला “अभय राजवंशी।”

 

कमरे में मौजूद राघव और अर्जुन दोनों चौंक गए।

 

राघव के मुंह से निकला,

 

“अभय…!”

 

अभय ने उनकी तरफ देखा।

 

“हां राघव। इतने साल बाद भी मेरा नाम याद है?”

 

राघव ने कहा,

 

“तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

 

अभय हंस पड़ा।

 

“ये बात तुम्हारे भाई शेखर ने भी कही थी।”

 

आरव ने तुरंत पूछा,

 

“तुम शेखर के भाई हो?”

 

अभय ने कहा,

 

“नहीं।”

 

सब चौंक गए।

 

अभय ने आगे कहा “मैं शेखर का सौतेला भाई हूं।”

 

अभय ने धीरे-धीरे अपनी कहानी बतानी शुरू की।

 

“मेरे पिता और शेखर के पिता अलग थे। लेकिन एक ही परिवार में पले-बढ़े।”

 

शेखर ने कहा,

 

“अभय, पुरानी बातें मत दोहराओ।”

 

“क्यों नहीं?”

 

अभय ने उसकी तरफ देखा।

 

“आज आरव और आरोही को सब पता चलना चाहिए।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या?”

 

अभय ने कहा,

 

“तुम दोनों की जिंदगी सिर्फ तुम्हारे माता-पिता की वजह से नहीं बदली।”

 

“फिर किस वजह से?”

 

“एक विरासत की वजह से।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कैसी विरासत?”

 

अभय ने कहा,

 

“राजवंशी परिवार की ऐसी संपत्ति, जिसका राज सिर्फ परिवार के कुछ लोगों को पता था।”

 

राघव ने कहा,

 

“वो संपत्ति नहीं थी।”

 

अभय हंसा।

 

“तुम अब भी इसे छुपा रहे हो?”

 

राघव चुप हो गए।

 

आरोही ने पूछा,

 

“क्या छुपा रहे हैं?”

 

अभय ने कहा,

 

“तुम्हारे जन्म से पहले राजवंशी परिवार के पास एक गुप्त ट्रस्ट था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“और उसका वारिस?”

 

अभय ने कहा,

 

“तुम।”

 

आरव स्तब्ध रह गया।

 

“मैं?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

अभय ने कहा,

 

“क्योंकि शेखर ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी।”

 

शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

 

“मैंने वो संपत्ति इसलिए दी थी ताकि मेरे बाद आरव सुरक्षित रहे।”

 

अभय ने कहा,

 

“लेकिन मुझे वो सब चाहिए था।”

 

 

आरोही ने पूछा,

 

“तो इसमें मेरा क्या संबंध है?”

 

अभय उसकी तरफ देखकर बोला,

 

“तुम्हारी मां नंदिनी उस ट्रस्ट की दूसरी संरक्षक थीं।”

 

आरोही ने मां की तरफ देखा।

 

“मां?”

 

नंदिनी ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

 

“क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता तो अभय तुम्हें ढूंढ लेता।”

 

अभय ने कहा,

 

“मैंने तुम्हें ढूंढ लिया।”

 

नंदिनी ने गुस्से में कहा,

 

“तुम्हें मेरी बेटी नहीं चाहिए। तुम्हें उसका अधिकार चाहिए।”

 

अभय ने कहा,

 

“मुझे दोनों चाहिए।”

 

आरव आगे बढ़ा।

 

“तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।”

 

अभय ने बंदूक उठाई।

 

“आरव, मुझे मजबूर मत करो।”

 

आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

 

“उन्हें गोली मत मारना।”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“यही तो जानता था।”

 

आरव ने आरोही से कहा,

 

“मेरे सामने मत आओ।”

 

“मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी।”

 

“आरोही…”

 

“नहीं।”

 

अभय दोनों को देखता रहा।

 

फिर अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।

 

“तुम दोनों का प्यार मेरे लिए बहुत उपयोगी है।”

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“हमारा प्यार तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा।”

 

अभय ने कहा,

 

“देखते हैं।”

 

अभय ने एक फाइल निकाली।

 

“इसमें तुम्हारे जन्म के सारे दस्तावेज हैं।”

 

आरव ने कहा,

 

“मुझे नहीं चाहिए।”

 

“लेकिन तुम्हें चाहिए।”

 

अभय ने फाइल आरोही की तरफ बढ़ाई।

 

“क्योंकि इसमें तुम्हारे रिश्ते का सच भी है।”

 

आरोही ने फाइल लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

आरव ने उसका हाथ रोक दिया।

 

“अभी नहीं।”

 

अभय ने कहा,

 

“क्यों डर रहे हो?”

 

“मुझे किसी बात का डर नहीं।”

 

“तो फिर सच देखने से क्यों बच रहे हो?”

 

आरव ने फाइल ले ली।

 

उसने पहला पन्ना खोला।

 

आरोही उसके पास खड़ी थी।

 

पन्ने पर उनके जन्म की तारीख लिखी थी।

 

दोनों की तारीख एक ही थी।

 

फिर अगला पन्ना।

 

दोनों के जन्मस्थान का नाम एक ही था।

 

फिर तीसरा पन्ना।

 

उसमें लिखा था “दोनों बच्चों की सुरक्षा एक ही परिवार के जिम्मे रहेगी।”

 

आरोही ने कहा,

 

“इसमें तो कुछ गलत नहीं है।”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“आखिरी पन्ना पढ़ो।”

 

आरव ने आखिरी पन्ना खोला।

 

उस पर सिर्फ एक लाइन थी—

 

“इन दोनों बच्चों को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि वे एक-दूसरे से किस रिश्ते में जुड़े हैं।”

 

आरोही का चेहरा बदल गया।

 

“कौन-सा रिश्ता?”

 

अभय ने कहा,

 

“यही तो तुम्हें जानना है।”

 

शेखर अचानक बोले,

 

“अभय, अब बहुत हो गया।”

 

अभय ने उनकी तरफ देखा।

 

“तुम्हें सच बताना पड़ेगा।”

 

शेखर कुछ पल चुप रहे।

 

फिर उन्होंने आरव और आरोही की तरफ देखा।

 

“तुम दोनों के बीच खून का कोई रिश्ता नहीं है।”

 

आरोही ने राहत की सांस ली।

 

लेकिन शेखर ने आगे कहा “लेकिन तुम दोनों के परिवारों के बीच एक बहुत पुराना रिश्ता है।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कैसा?”

 

“तुम्हारे पिता और आरोही के पिता…”

 

शेखर रुक गए।

 

अभय ने बात पूरी की “एक ही मां के बेटे थे।”

 

आरोही चौंक गई।

 

“मतलब?”

 

अभय ने कहा,

 

“तुम्हारे पिता और मेरे पिता…”

 

वह रुक गया।

 

फिर बोला “एक ही परिवार से थे।”

 

आरव ने कहा,

 

“तो इससे हमारे रिश्ते पर क्या असर पड़ता है?”

 

शेखर ने कहा,

 

“कुछ नहीं।”

 

अभय ने हंसकर कहा,

 

“लेकिन आगे की बात सुनो।”

 

उसने दूसरी फाइल खोली।

 

“आरोही के पिता की पहचान अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

अभय ने कहा,

 

“क्योंकि उसके जन्म रिकॉर्ड में पिता का नाम बदला गया था।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“किसने बदला?”

 

अभय ने शेखर की तरफ देखा।

 

“शेखर ने।”

 

आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

 

“आपने?”

 

शेखर ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

आरोही ने मां की तरफ देखा।

 

“मां, सच क्या है?”

 

नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

 

“तो बताइए।”

 

“लेकिन तुम्हारी जान खतरे में थी।”

 

“फिर भी… मुझे जानने का हक था।”

 

नंदिनी ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारे पिता का नाम रिकॉर्ड में कुछ और था।”

 

“कौन?”

 

नंदिनी ने होंठ खोले।

 

लेकिन अचानक बाहर गोली चली।

 

धांय!

 

कमरे की खिड़की का शीशा टूट गया।

 

अभय ने तुरंत नंदिनी को पीछे खींच लिया।

 

शेखर चिल्लाए “सब नीचे!”

 

दूसरी गोली चली।

 

इस बार अभय के कंधे को छूती हुई निकल गई।

 

अभय पीछे हट गया।

 

“वो यहां कैसे पहुंच गए?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“विराज!”

 

शेखर ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

उन्होंने बाहर देखा।

 

“ये विराज नहीं है।”

 

हवेली के बाहर कई गाड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी।

 

कबीर ने खिड़की से देखा।

 

“बहुत सारे लोग हैं।”

 

अर्जुन ने कहा,

 

“हमें यहां से निकलना होगा।”

 

शेखर ने कहा,

 

“पीछे का रास्ता बंद है।”

 

राघव ने पूछा,

 

“तो क्या करें?”

 

अभय ने कहा,

 

“मेरे साथ आओ।”

 

आरव ने तुरंत कहा,

 

“मैं तुम्हारे साथ नहीं आऊंगा।”

 

अभय ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि जो लोग बाहर हैं, वो मुझे नहीं…”

 

उसने आरोही की तरफ देखा।

 

“उसे लेने आए हैं।”

 

आरोही का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

 

आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

 

“कोई उसे हाथ भी नहीं लगाएगा।”

 

अभय ने कहा,

 

“तो फिर मेरे साथ चलो।”

 

आरव ने कुछ पल सोचा।

 

फिर उसने आरोही का हाथ पकड़ा।

 

“हम साथ चलेंगे।”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“यही सही फैसला है।”

 

अभय उन्हें कमरे के पीछे एक और दरवाजे तक ले गया।

 

दरवाजा खुला तो नीचे जाने वाली लंबी सुरंग दिखाई दी।

 

नंदिनी ने हैरानी से कहा,

 

“ये सुरंग अभी तक बंद थी।”

 

अभय बोला,

 

“मैंने इसे कभी बंद नहीं किया।”

 

सब लोग सुरंग में उतरने लगे।

 

आरव सबसे पीछे था।

 

आरोही उसके साथ थी।

 

अचानक आरोही का पैर फिसल गया।

 

आरव ने उसे पकड़ लिया।

 

“संभलकर।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“अगर तुम नहीं होते तो मैं गिर जाती।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“मैं हूं ना।”

 

आरोही ने धीरे से कहा,

 

“हमेशा रहना।”

 

आरव ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,

 

“ये वादा है।”

 

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

 

फिर आगे चलने लगे।

 

लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनके पीछे…

 

कोई और भी सुरंग में उतर चुका था।

 

कुछ देर बाद वे सुरंग के आखिरी हिस्से में पहुंचे।

 

वहां एक बड़ा लोहे का दरवाजा था।

 

अभय ने दरवाजा खोला।

 

सामने समुद्र का किनारा था।

 

सब बाहर निकल आए।

 

राघव ने राहत की सांस ली।

 

लेकिन तभी पीछे से आवाज आई “बहुत अच्छा रास्ता है।”

 

सब पलट गए।

 

सुरंग के मुहाने पर विराज खड़ा था।

 

उसके हाथ में बंदूक थी।

 

वह मुस्कुराया।

 

“तुम सब सोच रहे थे कि मुझसे बच जाओगे?”

 

आरव ने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

 

विराज ने कहा,

 

“आज सिर्फ एक चीज चाहिए मुझे।”

 

“क्या?”

 

विराज ने आरोही की तरफ इशारा किया।

 

“ये लड़की।”

 

अभय ने गुस्से में कहा,

 

“विराज, उसे हाथ लगाया तो…”

 

विराज हंस पड़ा।

 

“अभय, तुम अब भी समझते हो कि फैसला तुम्हारा है?”

 

अभय चौंक गया।

 

“क्या मतलब?”

 

विराज ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

 

उसने तस्वीर अभय की तरफ फेंकी।

 

अभय ने तस्वीर उठाई।

 

तस्वीर देखकर उसका चेहरा बदल गया।

 

“नहीं…”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या है?”

 

अभय ने तस्वीर आरव को दी।

 

तस्वीर में एक बच्चा था।

 

और उसके साथ खड़ी थी…

 

आरोही की मां नंदिनी।

 

लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा था “असली पिता – अभय नहीं।”

 

आरव ने हैरानी से नंदिनी की तरफ देखा।

 

नंदिनी रो पड़ीं।

 

विराज मुस्कुराया।

 

“अब बताओ आरोही…”

 

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

“क्या तुम जानना चाहती हो कि तुम्हारा असली पिता कौन है?”

 

आरोही ने कांपती आवाज में पूछा “कौन?”

 

विराज ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “जिसे तुम आज तक अपना दुश्मन समझती रही हो…”

 

आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

 

नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

 

और विराज ने आखिरी शब्द कहे “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

 

आरोही के हाथ से तस्वीर गिर गई।

 

जारी रहेगा…

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