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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 42 :

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 42 : तीनों की असली मां कौन है?

 

“अब आखिरी सच सामने आने का समय आ गया है।”

 

डॉक्टर की बात सुनते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे वक्त कुछ पल के लिए रुक गया हो।

 

आरव की नजर अपनी मां माधवी पर थी।

 

अमन और विहान भी उन्हें ही देख रहे थे।

 

आरव ने कांपती आवाज में पूछा—

 

“मां… आपने अभी क्या कहा?”

 

माधवी की आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

“मैंने कहा… आरव मेरा बेटा है।”

 

आरव का दिल टूटने लगा।

 

“तो अमन और विहान?”

 

माधवी ने दोनों की तरफ देखा।

 

“तुम दोनों भी मेरे बच्चे हो… लेकिन मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया।”

 

अमन पीछे हट गया।

 

“तो इतने साल आपने हमें अपना बेटा क्यों कहा?”

 

माधवी ने रोते हुए कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारी मां ने मरते वक्त मुझे तुम दोनों की जिम्मेदारी सौंपी थी।”

 

विहान की आंखें भर आईं।

 

“मेरी मां कौन थी?”

 

माधवी ने जवाब देने के लिए होंठ खोले, लेकिन आवाज नहीं निकली।

 

आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

 

“मां, अब सच बता दीजिए।”

 

माधवी ने आंखें बंद कर लीं।

 

“तुम्हारी मां का नाम…”

 

वह रुक गईं।

 

तभी शेखर ने कहा—

 

“नैना।”

 

विहान जैसे पत्थर का हो गया।

 

“नैना… मेरी मां?”

 

शेखर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

विहान की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“तो आपने मेरी मां को क्यों मारा?”

 

शेखर ने नजरें झुका लीं।

 

“मैंने नहीं मारा।”

 

विहान चौंक गया।

 

“फिर कौन?”

 

शेखर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

 

“इस सवाल का जवाब वही देगा।”

 

सबकी नजर डॉक्टर पर टिक गई।

 

 

 

डॉक्टर का सबसे बड़ा सच

 

डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

 

“नैना की मौत उस रात हुई थी जब उसने शेखर का सच जान लिया था।”

 

विहान ने पूछा—

 

“क्या सच?”

 

“शेखर अकेला सम्राट नहीं था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो उसके साथ कौन था?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“एक ऐसा व्यक्ति, जिस पर शेखर आंख बंद करके भरोसा करता था।”

 

अमन ने पूछा—

 

“कौन?”

 

डॉक्टर ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

 

“अभय।”

 

आरव चौंक गया।

 

“लेकिन अभय तो शेखर के खिलाफ था।”

 

“बाद में।”

 

“मतलब?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“शुरुआत में अभय और शेखर साथ काम करते थे।”

 

आरव को जैसे झटका लगा।

 

“तो मेरे पिता भी…?”

 

“हां।”

 

“उन्होंने भी गलत काम किया था?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“कुछ समय तक।”

 

अमन ने पूछा—

 

“फिर उन्होंने सब छोड़ क्यों दिया?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“क्योंकि उन्हें प्यार हो गया था।”

 

“किससे?”

 

डॉक्टर ने माधवी की तरफ देखा।

 

माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

 

“मां?”

 

माधवी ने सिर झुका लिया।

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“अभय को माधवी से प्यार हो गया था।”

 

शेखर ने पहली बार बीच में कहा—

 

“और यही हमारी दुश्मनी की शुरुआत थी।”

 

 

 

दो भाइयों के बीच का प्यार

 

अमन ने पूछा—

 

“लेकिन इसका हमारी मां से क्या संबंध है?”

 

माधवी ने धीरे से कहा—

 

“सिया और नैना मेरी बहनें थीं।”

 

तीनों की आंखें फैल गईं।

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या?”

 

माधवी ने सिर हिलाया।

 

“हम तीन बहनें थीं।”

 

“माधवी… सिया… और नैना।”

 

विहान ने कांपते हुए पूछा—

 

“तो मेरी मां आपकी बहन थीं?”

 

“हां।”

 

अमन की आवाज भी कांप गई।

 

“और मेरी मां?”

 

माधवी ने उसकी तरफ देखा।

 

“सिया।”

 

अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“तो हम दोनों…”

 

माधवी ने कहा—

 

“तुम दोनों मेरे भांजे हो।”

 

आरव ने दोनों भाइयों को देखा।

 

कुछ पल कोई कुछ नहीं बोला।

 

फिर आरव आगे बढ़ा और दोनों को गले लगा लिया।

 

“रिश्ता चाहे जैसा हो… तुम दोनों मेरे भाई हो।”

 

अमन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

 

“भाई से बढ़कर।”

 

विहान ने भी दोनों को पकड़ लिया।

 

“मैंने जिंदगी भर भाई को ढूंढा था।”

 

आरव ने कहा—

 

“अब कभी अकेले नहीं रहोगे।”

 

 

 

लेकिन असली सवाल अभी बाकी था

 

आरव ने माधवी से पूछा—

 

“मां, अगर सिया और नैना आपकी बहनें थीं, तो आप तीनों अलग कैसे हुईं?”

 

माधवी ने कहा—

 

“शेखर की वजह से।”

 

शेखर चुपचाप सुन रहा था।

 

माधवी ने उसकी तरफ देखा।

 

“शेखर ने हमारे परिवार को बर्बाद कर दिया।”

 

शेखर ने कहा—

 

“तुम सच नहीं जानती।”

 

माधवी ने गुस्से से कहा—

 

“मैंने सब अपनी आंखों से देखा है।”

 

“नहीं।”

 

“तो बताओ।”

 

शेखर चुप हो गया।

 

माधवी ने कहा—

 

“सिया को तुम्हारे कारोबार का पता चला।”

 

“नैना ने तुम्हारा विरोध किया।”

 

“और अभय तुम्हें छोड़कर हमारे साथ खड़ा हो गया।”

 

“तुमने एक-एक करके सबको खत्म करना शुरू कर दिया।”

 

शेखर ने धीमे से कहा—

 

“मैंने किसी को खत्म नहीं किया।”

 

माधवी चौंकी।

 

“क्या?”

 

शेखर ने कहा—

 

“मैंने सिर्फ उन्हें बचाने की कोशिश की थी।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

 

 

शेखर की सफाई

 

शेखर ने कहा—

 

“तुम लोग मुझे जितना बुरा समझते हो, मैं उतना बुरा नहीं हूं।”

 

अमन ने गुस्से में कहा—

 

“मेरी मां मर गई।”

 

विहान बोला—

 

“मेरी मां भी।”

 

आरव ने कहा—

 

“मेरे पिता भी।”

 

शेखर ने कहा—

 

“मैंने किसी को नहीं मारा।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो फिर कौन मारता रहा?”

 

शेखर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

 

डॉक्टर का चेहरा बदल गया।

 

आरव समझ गया।

 

“डॉक्टर?”

 

शेखर ने कहा—

 

“हां।”

 

डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

 

अमन ने कहा—

 

“आपने हमारी मांओं को मारा?”

 

डॉक्टर ने तुरंत कहा—

 

“नहीं!”

 

“तो फिर?”

 

डॉक्टर की आंखों में डर आ गया।

 

“मैंने उन्हें मारने की कोशिश नहीं की।”

 

आरव ने कहा—

 

“साफ-साफ बोलिए।”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“मैंने उन्हें बचाने की कोशिश की थी।”

 

“लेकिन वे मरी कैसे?”

 

डॉक्टर चुप रहा।

 

फिर उसने कहा—

 

“क्योंकि हमारे बीच एक और व्यक्ति था।”

 

 

 

चौथा नाम

 

रुद्र ने पूछा—

 

“कौन?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“वही व्यक्ति जिसने पच्चीस साल से सबको एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन?”

 

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

 

“राजवीर।”

 

शेखर का चेहरा अचानक बदल गया।

 

“राजवीर!”

 

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव ने पूछा—

 

“राजवीर कौन है?”

 

शेखर ने कहा—

 

“मेरा सबसे पुराना दोस्त।”

 

माधवी ने कहा—

 

“दोस्त नहीं।”

 

फिर उनकी आंखों में नफरत भर गई।

 

“वही आदमी जिसने मेरी दोनों बहनों को मारा।”

 

विहान की सांस रुक गई।

 

“मेरी मां को?”

 

“हां।”

 

अमन ने पूछा—

 

“और सिया को?”

 

माधवी ने सिर हिलाया।

 

“उसे भी।”

 

आरव ने पूछा—

 

“लेकिन उसने ऐसा क्यों किया?”

 

माधवी ने कहा—

 

“क्योंकि वह शेखर का साम्राज्य चाहता था।”

 

शेखर ने पहली बार सिर झुका लिया।

 

“और मैंने उसे कभी नहीं पहचाना।”

 

 

 

पुरानी डायरी का दूसरा पन्ना

 

अमन ने सिया की डायरी फिर खोली।

 

अचानक एक मुड़ा हुआ पन्ना नीचे गिरा।

 

उस पर सिर्फ कुछ शब्द लिखे थे—

 

“अगर मैं मर जाऊं तो राजवीर पर भरोसा मत करना।”

 

अमन की आंखें फैल गईं।

 

“मां को पता था!”

 

आरव ने पन्ना लिया।

 

नीचे एक तारीख लिखी थी।

 

14 अगस्त।

 

वही तारीख।

 

आरव ने कहा—

 

“यही रात।”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“हां।”

 

अचानक आरव को फिर अपनी बचपन की याद आने लगी।

 

वह अस्पताल के कमरे में था।

 

माधवी उसके पास थीं।

 

सिया रो रही थीं।

 

नैना किसी बच्चे को गोद में लिए हुए थी।

 

और दरवाजे के बाहर एक आदमी खड़ा था।

 

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

लेकिन उसकी उंगली में एक बड़ी काली अंगूठी थी।

 

आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

 

“अंगूठी!”

 

रुद्र ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

“राजवीर की अंगूठी कैसी है?”

 

शेखर ने कहा—

 

“काली।”

 

आरव ने कहा—

 

“उस पर सांप का निशान है?”

 

शेखर चौंक गया।

 

“हां।”

 

आरव ने धीरे से कहा—

 

“वही आदमी उस रात अस्पताल में था।”

 

 

 

सबसे बड़ा खतरा

 

अचानक शेखर का फोन बजा।

 

उसने फोन उठाया।

 

दूसरी तरफ से किसी ने सिर्फ एक बात कही—

 

“तीनों बच्चे एक साथ हैं।”

 

शेखर का चेहरा बदल गया।

 

“तुम कौन हो?”

 

फोन कट गया।

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन था?”

 

शेखर ने फोन नीचे कर लिया।

 

“राजवीर।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

विहान ने पूछा—

 

“वो हमें क्यों ढूंढ रहा है?”

 

शेखर ने कहा—

 

“क्योंकि उसे पता चल गया है कि तुम तीनों एक साथ हो।”

 

अमन ने कहा—

 

“तो?”

 

शेखर ने गंभीर आवाज में कहा—

 

“तो अब वो तुम्हें मारने आएगा।”

 

आरव ने कहा—

 

“उसे आने दो।”

 

शेखर ने उसे देखा।

 

“तुम नहीं जानते राजवीर कितना खतरनाक है।”

 

आरव ने कहा—

 

“अब मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

 

आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

 

“हम तीनों भाई एक साथ हैं।”

 

अमन ने कहा—

 

“और हम पीछे नहीं हटेंगे।”

 

विहान ने भी सिर हिलाया।

 

“इस बार कोई हमें अलग नहीं कर सकता।”

 

आरव ने तीनों भाइयों की तरफ देखा।

 

फिर माधवी के पास जाकर उनका हाथ पकड़ लिया।

 

“मां, अब हम भागेंगे नहीं।”

 

माधवी ने कहा—

 

“तुम्हें लड़ना पड़ेगा।”

 

आरव ने पूछा—

 

“किससे?”

 

माधवी ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा—

 

“उस आदमी से, जिसने पच्चीस साल पहले तुम्हारे परिवार को तोड़ा था।”

 

उसी वक्त बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

 

रुद्र ने खिड़की से देखा।

 

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“आरव…”

 

“क्या हुआ?”

 

रुद्र ने कांपते हुए कहा—

 

“राजवीर अकेला नहीं आया है।”

 

“कितने लोग हैं?”

 

“पूरी से कहती” 

 

और उसी पल हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

 

“शेखर… अपने बेटों को मेरे हवाले कर दो।”

 

शेखर ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

 

आरव ने आरोही का हाथ थाम लिया।

 

और तीनों भाई एक साथ खड़े हो गए।

 

क्योंकि अब उनकी लड़ाई सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं… अपने प्यार और अपने भविष्य के लिए भी थी।

 

जारी रहेगा…

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