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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 39 :

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 39 : विहान को बचाने की जंग

 

 

हवेली के बाहर लगातार गोलियों की आवाज गूंज रही थी।

 

धांय! धांय! धांय!

 

खिड़कियों के शीशे टूटकर जमीन पर बिखरने लगे।

 

आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।

 

“नीचे झुको!”

 

अमन ने भी बंदूक संभाल ली।

 

रुद्र खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगा।

 

“हम चारों तरफ से घिरे हुए हैं।”

 

डॉक्टर ने घबराकर पूछा—

 

“कितने आदमी हैं?”

 

रुद्र ने बाहर देखते हुए कहा—

 

“कम से कम बीस।”

 

शेखर वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था।

 

आरव ने उसे घूरकर देखा।

 

“तुम्हें पहले से पता था।”

 

शेखर ने कहा—

 

“बिल्कुल।”

 

“तुमने हमें यहां बुलाया ही इसलिए था?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

शेखर ने लाल फाइल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा—

 

“क्योंकि मुझे पता था कि तुम अपने भाई को बचाने के लिए कुछ भी करोगे।”

 

आरव ने फाइल नहीं ली।

 

“विहान कहां है?”

 

“मेरे साथ चलो।”

 

“पहले उसे दिखाओ।”

 

शेखर ने सिर हिलाया।

 

“तुम अभी भी मुझ पर भरोसा नहीं करते।”

 

आरव ने कड़वी हंसी हंसी।

 

“जिस आदमी ने मेरी पूरी जिंदगी झूठ में रखी, उस पर भरोसा कैसे करूं?”

 

शेखर की आंखों में दर्द की एक झलक आई।

 

लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा फिर कठोर हो गया।

 

“तो फिर तुम्हारे पास सिर्फ एक रास्ता है।”

 

“क्या?”

 

“मुझे रोककर अपने भाई को ढूंढो।”

 

 

 

अचानक हमला

 

दरवाजा जोर से टूट गया।

 

शेखर के आदमी अंदर घुस आए।

 

रुद्र ने तुरंत गोली चलाई।

 

एक आदमी जमीन पर गिर गया।

 

“सब पीछे हटो!”

 

आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

 

“मेरे साथ रहना।”

 

आरोही ने कहा—

 

“मैं कहीं नहीं जा रही।”

 

अमन ने दो आदमियों को रोकते हुए कहा—

 

“भाई, तुम आगे बढ़ो!”

 

आरव ने पूछा—

 

“और तुम?”

 

“मैं संभाल लूंगा।”

 

“अमन!”

 

“जाओ!”

 

आरव, आरोही और डॉक्टर पीछे की तरफ भागे।

 

लेकिन शेखर वहीं खड़ा रहा।

 

विराज भी उसके पास था।

 

विराज ने पूछा—

 

“आपने इन्हें जाने क्यों दिया?”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“क्योंकि उन्हें लगता है कि वे भाग रहे हैं।”

 

“लेकिन?”

 

“असल में वे वहीं जा रहे हैं जहां मैं उन्हें भेजना चाहता हूं।”

 

विराज का चेहरा गंभीर हो गया।

 

“पुरानी हवेली?”

 

शेखर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

 

 

गुप्त रास्ता

 

आरव एक पुराने गलियारे से गुजर रहा था।

 

उसे अचानक बचपन की याद आई।

 

एक छोटा बच्चा उसके साथ दौड़ रहा था।

 

“भैया! जल्दी करो!”

 

आरव रुक गया।

 

आरोही ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

आरव ने आंखें बंद कीं।

 

“ये रास्ता… मुझे याद है।”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“तुम पहले भी यहां आए हो।”

 

आरव ने कहा—

 

“मैं और विहान यहां खेलते थे।”

 

“विहान का कमरा कहां था?”

 

आरव ने कुछ सेकंड सोचा।

 

फिर दाईं तरफ मुड़ गया।

 

“इधर।”

 

आरोही उसके पीछे चली।

 

डॉक्टर ने पूछा—

 

“तुम्हें पक्का याद है?”

 

आरव ने कहा—

 

“हां।”

 

कुछ दूर जाकर एक लकड़ी का दरवाजा दिखाई दिया।

 

आरव ने दरवाजा खोला।

 

कमरे में धूल जमा थी।

 

दीवार पर बच्चों के बनाए हुए चित्र थे।

 

एक चित्र में तीन बच्चे हाथ पकड़े हुए थे।

 

आरव ने चित्र को छुआ।

 

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

 

“हम तीनों…”

 

आरोही ने धीरे से कहा—

 

“तुम्हें विहान से बहुत प्यार था।”

 

आरव ने कहा—

 

“हां।”

 

“फिर उसे तुमसे अलग क्यों किया गया?”

 

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसे याद करने की कोशिश करते ही उसके सिर में तेज दर्द होने लगा।

 

अचानक एक आवाज उसके दिमाग में गूंजी—

 

“आरव, अगर कभी विहान को ढूंढना हो तो नीली दीवार के पीछे देखना।”

 

आरव ने आंखें खोल दीं।

 

“नीली दीवार!”

 

डॉक्टर ने पूछा—

 

“क्या?”

 

आरव ने कमरे की दीवारों को देखा।

 

एक दीवार बाकी दीवारों से थोड़ी अलग थी।

 

उस पर नीले रंग की पुरानी पपड़ी जमी थी।

 

आरव ने दीवार पर हाथ फेरा।

 

टक!

 

अंदर से खोखली आवाज आई।

 

“यही है।”

 

 

 

छुपा हुआ कमरा

 

आरव ने दीवार पर जोर से हाथ मारा।

 

लकड़ी का एक हिस्सा टूट गया।

 

पीछे छोटा-सा रास्ता दिखाई दिया।

 

तीनों अंदर चले गए।

 

कुछ कदम बाद उन्हें एक कमरा मिला।

 

कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी थी।

 

और उस कुर्सी पर कोई बैठा था।

 

उसके हाथ बंधे थे।

 

चेहरा नीचे झुका हुआ था।

 

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“विहान?”

 

वह आदमी धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाने लगा।

 

आरव की सांस रुक गई।

 

सामने एक जवान लड़का था।

 

चेहरा थका हुआ।

 

आंखों में दर्द।

 

लेकिन चेहरे की बनावट…

 

आरव जैसी।

 

अमन जैसी।

 

वह लड़का उन्हें देखता रहा।

 

फिर उसकी नजर आरव पर टिक गई।

 

उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

 

“भैया…”

 

आरव जैसे पत्थर का हो गया।

 

उसके होंठ कांपने लगे।

 

“विहान?”

 

विहान मुस्कुराया।

 

“आप सच में आ गए।”

 

आरव दौड़कर उसके पास गया।

 

उसके हाथ खोले।

 

फिर दोनों भाई एक-दूसरे से लिपट गए।

 

“मुझे पता था तुम मुझे लेने आओगे।”

 

आरव की आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

“मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

 

विहान ने कहा—

 

“आपने बहुत देर कर दी।”

 

“माफ कर दो।”

 

“आपकी गलती नहीं थी।”

 

आरोही की आंखें भी भर आईं।

 

डॉक्टर चुपचाप दोनों भाइयों को देख रहा था।

 

 

 

विहान की कहानी

 

अमन भी वहां पहुंच गया।

 

विहान ने उसे देखा।

 

कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

 

फिर विहान धीरे से बोला—

 

“भैया?”

 

अमन ने उसे गले लगा लिया।

 

“हां।”

 

तीनों भाई एक-दूसरे को पकड़कर खड़े रहे।

 

विहान ने कहा—

 

“मुझे हमेशा बताया गया कि मेरे दोनों भाई मुझे छोड़कर चले गए।”

 

आरव ने कहा—

 

“हमने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

 

“मुझे पता है।”

 

“तुम्हें यहां किसने रखा?”

 

विहान की आंखों में डर आ गया।

 

“शेखर।”

 

अमन ने कहा—

 

“उसने तुम्हें क्यों कैद किया?”

 

विहान बोला—

 

“क्योंकि उसे लगता है कि मेरे पास उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।”

 

आरव चौंका।

 

“क्या?”

 

विहान ने धीरे से कहा—

 

“उसकी पत्नी की डायरी।”

 

डॉक्टर ने तुरंत पूछा—

 

“कौन-सी डायरी?”

 

विहान ने कहा—

 

“सिया की।”

 

अमन की सांस रुक गई।

 

“मेरी मां की डायरी?”

 

विहान ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“वो तुम्हारे पास है?”

 

“नहीं।”

 

“फिर?”

 

विहान ने कहा—

 

“मैंने उसे छुपा दिया था।”

 

 

 

डायरी कहां है?

 

आरव ने पूछा—

 

“कहां?”

 

विहान ने कमरे की छत की तरफ देखा।

 

“इस हवेली के नीचे।”

 

रुद्र अचानक कमरे में आ गया।

 

“आरव!”

 

आरव ने मुड़कर देखा।

 

“क्या हुआ?”

 

रुद्र ने कहा—

 

“हमें जल्दी निकलना होगा।”

 

“क्यों?”

 

“शेखर खुद यहां आ रहा है।”

 

अमन ने कहा—

 

“तो आने दो।”

 

रुद्र ने कहा—

 

“तुम उसे नहीं जानते।”

 

विहान ने घबराकर कहा—

 

“वो मुझे वापस ले जाएगा।”

 

आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

 

“अब कोई तुम्हें नहीं ले जाएगा।”

 

अचानक बाहर कदमों की आवाज सुनाई दी।

 

धीरे-धीरे…

 

कोई दरवाजे के पास आ रहा था।

 

टक… टक… टक…

 

विहान डरकर पीछे हट गया।

 

डॉक्टर ने फुसफुसाकर कहा—

 

“वो आ गया।”

 

दरवाजा खुला।

 

सामने शेखर खड़ा था।

 

उसके पीछे कई हथियारबंद लोग थे।

 

शेखर ने तीनों भाइयों को एक साथ देखा।

 

उसकी आंखें नम हो गईं।

 

“आखिरकार… मेरे तीनों बच्चे एक साथ।”

 

आरव ने कहा—

 

“हम तुम्हारे बच्चे नहीं हैं।”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“तुम अभी भी यही सोचते हो?”

 

अमन ने पूछा—

 

“क्या मतलब?”

 

शेखर ने कहा—

 

“विहान से पूछो।”

 

सभी की नजर विहान पर गई।

 

विहान का चेहरा पीला पड़ गया।

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“विहान?”

 

विहान कांपते हुए बोला—

 

“मुझे… मुझे सब पता है।”

 

“क्या?”

 

विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“मैं अभय का बेटा नहीं हूं।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

आरव ने हैरानी से पूछा—

 

“क्या?”

 

विहान ने कहा—

 

“मेरे पिता का नाम अभय नहीं… शेखर है।”

 

अमन चौंक गया।

 

“लेकिन डॉक्टर ने कहा था—”

 

शेखर ने बीच में कहा—

 

“डॉक्टर ने बहुत कुछ झूठ बताया है।”

 

डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या ये सच है?”

 

डॉक्टर चुप रहा।

 

आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

 

“डॉक्टर!”

 

डॉक्टर ने आखिरकार कहा—

 

“हां।”

 

आरव पीछे हट गया।

 

“तो हम तीनों…”

 

शेखर ने कहा—

 

“तीनों मेरे बेटे हो।”

 

अमन ने सिर पकड़ लिया।

 

“लेकिन मां?”

 

शेखर ने कहा—

 

“सिया सिर्फ तुम्हारी मां थी।”

 

“और आरव की मां?”

 

“माधवी।”

 

“विहान की?”

 

शेखर चुप हो गया।

 

विहान ने खुद कहा—

 

“मेरी मां… कोई और थी।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन?”

 

विहान ने जवाब देने से पहले शेखर की तरफ देखा।

 

शेखर की आंखों में पहली बार डर था।

 

विहान ने कहा—

 

“जिसका नाम आज तक किसी ने नहीं लिया।”

 

“कौन?”

 

विहान ने धीरे से कहा—

 

“नैना।”

 

डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

रुद्र ने तुरंत पूछा—

 

“नैना?”

 

विहान ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन थी नैना?”

 

डॉक्टर ने कांपती आवाज में कहा—

 

“नैना… शेखर की पहली पत्नी थी।”

 

शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

 

विहान आगे बोला—

 

“और उसकी मौत के पीछे भी…”

 

वह रुक गया।

 

आरव ने पूछा—

 

“किसका हाथ था?”

 

विहान ने शेखर की तरफ देखा।

 

शेखर ने नजरें झुका लीं।

 

विहान ने कहा—

 

“मेरे पिता का।”

 

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

 

आरव की आंखें शेखर पर टिक गईं।

 

शेखर ने कुछ नहीं कहा।

 

और तभी हवेली के नीचे से जोरदार धमाका हुआ।

 

धड़ाम!

 

पूरी जमीन हिल गई।

 

रुद्र चिल्लाया—

 

“नीचे बम लगाया गया है!”

 

शेखर ने तुरंत कहा—

 

“सब बाहर निकलो!”

 

लेकिन आरव ने विहान का हाथ पकड़ लिया।

 

“पहले डायरी।”

 

विहान ने सिर हिलाया।

 

“वो नीचे है।”

 

अमन ने कहा—

 

“तो चलो।”

 

तीनों भाई नीचे जाने लगे।

 

शेखर ने उन्हें रोकने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन उसी पल आरोही उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

 

“अगर आपने उन्हें रोकने की कोशिश की…”

 

शेखर ने पूछा—

 

“तो?”

 

आरोही ने दृढ़ता से कहा—

 

“इस बार आपके सामने सिर्फ आपका बेटा नहीं, उसकी पत्नी भी खड़ी होगी।”

 

शेखर उसे घूरता रहा।

 

और पहली बार…

 

उसे समझ आया कि आरव अकेला नहीं है।

 

जारी रहेगा…

 

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