नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
— कान्हा और बारिश में खोया छोटू
अगली सुबह वृंदावन में आसमान पर बादल छाए हुए थे। हवा ठंडी थी और दूर-दूर तक काले बादल दिखाई दे रहे थे।
कान्हा सुबह उठते ही आँगन में आए। उनकी नजर सबसे पहले गायों के पास गई।
वहाँ छोटू भी खड़ा था।
उसके गले में नंद बाबा की दी हुई नई छोटी घंटी थी।
टन… टन…
कान्हा उसके पास दौड़कर गए।
“छोटू!”
बछड़े ने कान्हा की तरफ देखा और धीरे से आवाज की।
कान्हा हँस पड़े।
“देखो मैया! ये मुझे पहचान गया।”
यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं।
“अब तो तुम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई है।”
कान्हा ने छोटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“हाँ।”
तभी नंद बाबा ने आसमान की तरफ देखा।
“आज बारिश हो सकती है। गायों को बहुत दूर मत ले जाना।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“ठीक है बाबा।”
कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ गायों के पीछे-पीछे चल पड़े।
छोटू भी उनके आसपास ही घूम रहा था।
आसमान में बादल और घने होते जा रहे थे।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, आज बारिश होगी।”
कान्हा ने कहा—
“तो क्या हुआ? थोड़ी बारिश में खेलेंगे।”
दूसरा दोस्त बोला—
“अगर बाबा ने सुन लिया तो?”
कान्हा हँसे।
“हम दूर नहीं जाएँगे।”
वे एक खुले मैदान में पहुँचे।
गायें घास खाने लगीं और बच्चे पेड़ के नीचे बैठ गए।
कान्हा ने बांसुरी निकाली।
धीरे-धीरे बांसुरी की धुन हवा में फैलने लगी।
छोटू कान्हा के पास आकर बैठ गया।
कान्हा ने उसके गले की घंटी बजाई।
टन…
“अच्छी है ना?”
छोटू ने पूँछ हिलाई।
कान्हा हँस पड़े।
तभी पहली बूंद उनके हाथ पर गिरी।
फिर दूसरी।
एक दोस्त ने ऊपर देखा।
“बारिश!”
कुछ ही पल में बारिश तेज हो गई।
सभी बच्चे पेड़ के नीचे भागकर खड़े हो गए।
गायें भी एक जगह इकट्ठी होने लगीं।
नंद बाबा ने दूर से आवाज लगाई—
“सब बच्चे पास रहो!”
कान्हा ने जवाब दिया—
“जी बाबा!”
तेज बारिश में कुछ दिखाई देना मुश्किल हो गया।
कान्हा ने अपने दोस्तों को गिनना शुरू किया।
“एक… दो… तीन… चार…”
सभी बच्चे थे।
फिर उन्होंने गायों की तरफ देखा।
कई गायें पास थीं।
लेकिन छोटू दिखाई नहीं दे रहा था।
कान्हा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“छोटू कहाँ है?”
एक दोस्त ने कहा—
“शायद गायों के बीच होगा।”
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
“नहीं है।”
उन्होंने ध्यान से सुना।
बारिश की आवाज के बीच कोई घंटी सुनाई नहीं दे रही थी।
कान्हा घबरा गए।
“छोटू!”
कोई जवाब नहीं।
उन्होंने फिर आवाज लगाई—
“छोटू!”
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, बारिश बहुत तेज है। अभी बाहर मत जाओ।”
कान्हा बोले—
“लेकिन छोटू अकेला है।”
नंद बाबा भी गायों को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे।
कान्हा उनके पास दौड़कर पहुँचे।
“बाबा, छोटू नहीं मिल रहा।”
नंद बाबा ने तुरंत आसपास देखा।
“कहाँ था आखिरी बार?”
“मेरे पास। फिर बारिश शुरू हुई और वो गायों के बीच चला गया।”
नंद बाबा ने कहा—
“तुम यहाँ रहो। मैं देखता हूँ।”
लेकिन कान्हा बोले—
“मैं भी चलूँगा।”
नंद बाबा ने कहा—
“बारिश बहुत तेज है।”
कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—
“बाबा, वो डर गया होगा।”
नंद बाबा ने कान्हा को अपने पास रखा।
“ठीक है। लेकिन अकेले नहीं जाना।”
कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।
“तुम सब भी चलोगे?”
सबने सिर हिलाया।
नंद बाबा आगे और बच्चे पीछे चलने लगे।
उन्होंने रास्ते में घंटी की आवाज सुनने की कोशिश की।
लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि कुछ साफ नहीं सुनाई दे रहा था।
कान्हा बार-बार आवाज लगाते—
“छोटू!”
कोई जवाब नहीं आता।
तभी कान्हा ने हाथ उठाया।
“रुको!”
सब रुक गए।
कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल तक वह चुप रहे।
फिर बहुत हल्की आवाज आई—
टन…
कान्हा की आँखें खुल गईं।
“सुना?”
एक दोस्त बोला—
“क्या?”
“घंटी!”
उन्होंने आवाज की दिशा में दौड़ना शुरू किया।
नंद बाबा भी उनके पीछे गए।
थोड़ी दूर एक झाड़ी के पीछे छोटू खड़ा था।
उसका एक पैर कीचड़ में फँस गया था।
कान्हा उसे देखकर तुरंत उसके पास बैठ गए।
“छोटू!”
बछड़ा घबराकर आवाज करने लगा।
कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“डरो मत। मैं आ गया।”
नंद बाबा ने सावधानी से उसका पैर कीचड़ से बाहर निकाला।
छोटू आजाद होते ही कान्हा के पास आ गया।
कान्हा ने उसे गले से लगा लिया।
“तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गए थे?”
छोटू ने धीरे से आवाज की।
एक दोस्त हँसते हुए बोला—
“लगता है ये भी तुम्हें जवाब दे रहा है।”
कान्हा मुस्कुरा दिए।
उन्होंने छोटू की घंटी को देखा।
वह कीचड़ से भर गई थी।
कान्हा ने अपने कपड़े के एक साफ हिस्से से घंटी साफ की।
टन…
आवाज फिर सुनाई दी।
कान्हा खुश हो गए।
“अब मैं तुम्हें फिर कभी खोने नहीं दूँगा।”
नंद बाबा ने कहा—
“कान्हा, किसी की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होता। उसके लिए ध्यान रखना पड़ता है।”
कान्हा ने कहा—
“मैं रखूँगा।”
बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।
सब लोग गायों के साथ वापस चल पड़े।
छोटू इस बार कान्हा के बिल्कुल पास चल रहा था।
हर कुछ कदम बाद उसकी घंटी बजती।
टन… टन…
कान्हा हर बार पीछे मुड़कर उसे देखते।
नंद बाबा यह देखकर मुस्कुराते रहे।
घर पहुँचते ही यशोदा मैया दौड़कर बाहर आईं।
“कान्हा! तुम इतने भीग क्यों गए?”
कान्हा ने कहा—
“मैया, छोटू खो गया था।”
यशोदा ने पहले कान्हा को देखा, फिर छोटू को।
“मिल गया?”
कान्हा खुशी से बोले—
“हाँ!”
यशोदा ने राहत की साँस ली।
“मैं तो डर गई थी।”
कान्हा बोले—
“मैया, इसकी घंटी सुनाई दी थी।”
उन्होंने घंटी बजाई।
टन…
यशोदा मुस्कुरा दीं।
“अच्छा हुआ इसे घंटी मिल गई।”
कान्हा बोले—
“हाँ। अब ये खोएगा नहीं।”
यशोदा ने कान्हा के गीले बाल पोंछे।
“लेकिन तुम भी तोगए थे बारिश में।”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“छोटू अकेला था।”
यशोदा कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।
“दूसरों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“अगली बार बाबा के साथ ही जाऊँगा।”
नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—
“यही समझदारी है।”
उस शाम बारिश रुक चुकी थी।
आसमान में हल्की धूप निकल आई थी।
कान्हा छोटू के पास बैठकर उसकी घंटी सुन रहे थे।
एक दोस्त ने पूछा—
“कान्हा, अब तुम्हें बारिश से डर नहीं लगता?”
कान्हा बोले—
“बारिश से नहीं। बस छोटू खो जाए तो डर लगता है।”
दोस्त हँस पड़ा।
“तुम्हें सच में इसकी बहुत चिंता है।”
कान्हा ने कहा—
“दोस्त की चिंता तो करनी ही चाहिए।”
कुछ देर बाद कान्हा ने अपनी बांसुरी उठाई और धीरे-धीरे बजाने लगे।
छोटू उनके पास बैठा रहा।
गायें भी शांत थीं।
वृंदावन की गीली मिट्टी से खुशबू आ रही थी।
यशोदा दूर खड़ी यह सब देख रही थीं।
उनके मन में एक ही बात आई—
उनका नन्हा कान्हा भले ही शरारती हो, लेकिन उसके दिल में अपने हर दोस्त के लिए बहुत गहरा प्यार था।
रात को कान्हा सोने से पहले फिर छोटू की बात करने लगे।
“मैया, कल मैं उसके लिए कुछ अच्छा करूँगा।”
“क्या?”
“उसके लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”
यशोदा मुस्कुराईं।
“ठीक है।”
कान्हा ने आँखें बंद कीं।
फिर अचानक बोले—
“मैया?”
“हाँ?”
“क्या छोटू भी मुझे अपना दोस्त मानता होगा?”
यशोदा ने उनके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा—
“जिसके लिए तुम बारिश में उसे ढूँढ़ने निकल पड़े, वो तुम्हें दोस्त क्यों नहीं मानेगा?”
कान्हा मुस्कुराए और सो गए।
अगली सुबह उन्होंने सच में छोटू के लिए फूलों की एक छोटी माला बनाई।
लेकिन जब वह माला लेकर छोटू के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू अकेला नहीं था।
उसके पास एक नन्हा सफेद बछड़ा खड़ा था।
और वह बछड़ा कान्हा को देखते ही उनके पास दौड़ पड़ा।
कान्हा हैरान होकर बोले—
“ये कौन है?”
नंद बाबा मुस्कुराकर बोले—
“छोटू का नया दोस्त।”
कान्हा ने दोनों बछड़ों को देखा और खुशी से बोले—
“अब हमारे पास दो दोस्त हैं!”
लेकिन कान्हा को क्या पता था कि नया बछड़ा इतना शरारती था कि अगले ही दिन वह नंद भवन की रसोई में घुसकर सारा आटा बिखेरने वाला था।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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