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टैग: #बच्चों कि कहानियां

  • जादुई पक्षियों की नगरी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई पक्षियों की नगरी

     

    बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसी नगरी थी, जिसके बारे में इंसानों की दुनिया में बहुत कम लोग जानते थे। उस नगरी का नाम था पंखलोक। वहाँ घर पत्थरों से नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे पंखों, चमकती बेलों और पेड़ों की मजबूत शाखाओं से बने थे। वहाँ इंसान नहीं, बल्कि तरह-तरह के जादुई पक्षी रहते थे।

     

    किसी के पंख नीले थे, किसी के लाल, किसी के चाँदी जैसे सफेद और किसी के सुनहरे। हर पक्षी के पास कोई न कोई खास शक्ति थी। कोई बारिश बुला सकता था, कोई अंधेरे में रास्ता दिखा सकता था और कोई घायल पक्षियों को अपनी मीठी आवाज से शांत कर सकता था।

     

    उस नगरी की रानी थी पंखरानी सुरम्या। उसके पंख मोर के पंखों जैसे रंग-बिरंगे थे और उसके माथे पर एक छोटा-सा चमकता मुकुट था।

     

    पंखलोक में एक पुरानी परंपरा थी। नगरी के बीचों-बीच एक विशाल पेड़ था, जिसे जीवन-वृक्ष कहा जाता था। उसके पत्ते कभी नहीं सूखते थे। कहा जाता था कि जब तक जीवन-वृक्ष हरा रहेगा, तब तक पंखलोक सुरक्षित रहेगा।

     

    लेकिन एक दिन अचानक जीवन-वृक्ष के पत्ते मुरझाने लगे।

     

    पक्षियों में डर फैल गया।

     

    “रानी माँ, ये क्या हो रहा है?” एक छोटी चिड़िया ने घबराकर पूछा।

     

    सुरम्या ने पेड़ को ध्यान से देखा। उसके चेहरे की चिंता बढ़ गई।

     

    “मुझे लगता है किसी ने जीवन-वृक्ष की जादुई रोशनी चुरा ली है।”

     

    सभा में सन्नाटा छा गया।

     

    उसी समय एक बूढ़ा उल्लू आगे आया। उसका नाम था उलूक बाबा।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “रानी, कई साल पहले एक काला पक्षी इस नगरी से निकाला गया था। उसका नाम था कालपंख। वह जादुई शक्ति चाहता था। हो सकता है वह वापस आ गया हो।”

     

    सुरम्या ने पूछा, “लेकिन वह कहाँ है?”

     

    उलूक बाबा ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “काले पहाड़ के उस पार उसकी गुफा है। वहाँ जाना आसान नहीं है।”

     

    सभा में कोई पक्षी आगे नहीं आया।

     

    तभी एक छोटी-सी नीली चिड़िया आगे बढ़ी।

     

    उसका नाम था नीरा।

     

    नीरा आकार में छोटी थी, लेकिन उसके अंदर बहुत साहस था।

     

    “मैं जाऊँगी,” उसने कहा।

     

    कुछ पक्षी हँसने लगे।

     

    “तुम? इतनी छोटी होकर?”

     

    नीरा ने शांत होकर कहा, “बड़ा शरीर हमेशा बड़ी हिम्मत नहीं देता।”

     

    रानी सुरम्या मुस्कुराई।

     

    “नीरा, रास्ता बहुत कठिन है।”

     

    “मुझे पता है,” नीरा बोली, “लेकिन अगर मैं कोशिश ही न करूँ तो जीवन-वृक्ष को कौन बचाएगा?”

     

    रानी ने उसे एक चमकता हुआ पंख दिया।

     

    “जब भी तुम्हें रास्ता न मिले, यह पंख तुम्हें सही दिशा दिखाएगा।”

     

    नीरा उड़ चली।

     

    पहले उसने घने बादलों का जंगल पार किया। वहाँ पेड़ों के बीच इतनी धुंध थी कि कुछ दिखाई नहीं देता था। तभी उसे दूर से रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    नीरा नीचे उतरी तो एक नन्हा सफेद पक्षी काँटों में फँसा हुआ था।

     

    “मुझे बचा लो,” वह बोला।

     

    नीरा ने बिना देर किए काँटों को हटाया और उसे बाहर निकाल दिया।

     

    सफेद पक्षी ने कहा, “तुमने मेरी मदद की है। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

     

    उसका नाम था चांदू।

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    कुछ दूर जाकर उन्हें एक चौड़ी नदी मिली। पानी बहुत तेज था।

     

    चांदू बोला, “हम इसे पार कैसे करेंगे?”

     

    नीरा ने अपना चमकता पंख पानी के ऊपर रखा। अचानक पानी शांत हो गया और नदी के बीच एक रास्ता बन गया।

     

    दोनों नदी पार कर गए।

     

    आखिर वे काले पहाड़ तक पहुँचे।

     

    पहाड़ के अंदर एक विशाल गुफा थी। वहाँ चारों तरफ काली धुंध फैली हुई थी।

     

    अचानक गुफा के अंदर से भारी आवाज आई।

     

    “कौन आया है?”

     

    नीरा ने हिम्मत करके कहा, “मैं नीरा हूँ। जीवन-वृक्ष की रोशनी वापस लेने आई हूँ।”

     

    अंधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं।

     

    कालपंख सामने आ गया।

     

    वह बहुत बड़ा काला पक्षी था। उसके पंखों से जैसे धुआँ निकल रहा था।

     

    “तुम मुझे रोकने आई हो?” उसने हँसते हुए पूछा।

     

    “मैं तुम्हें रोकने नहीं,” नीरा बोली, “तुम्हें समझाने आई हूँ।”

     

    कालपंख कुछ पल चुप रहा।

     

    “समझाने? मुझे?”

     

    “हाँ। तुमने जीवन-वृक्ष की रोशनी क्यों चुराई?”

     

    कालपंख ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि इस नगरी में किसी ने मुझे स्वीकार नहीं किया। मैं भी शक्तिशाली बनना चाहता था। जब सबने मुझे कमजोर समझा, तो मैंने सोचा कि अगर मेरे पास सबसे बड़ी शक्ति होगी, तो सब मुझसे डरेंगे।”

     

    नीरा ने कहा, “डर से सम्मान नहीं मिलता।”

     

    कालपंख ने गुस्से में पंख फड़फड़ाए।

     

    “तुम मुझे क्या समझाओगी?”

     

    तभी गुफा की छत से पत्थर गिरने लगा। कालपंख ने नीरा और चांदू को धक्का देकर सुरक्षित जगह कर दिया।

     

    नीरा ने देखा कि कालपंख बुरा बनना नहीं चाहता था। वह बस अपने अकेलेपन से परेशान था।

     

    नीरा बोली, “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो मेरे साथ पंखलोक चलो।”

     

    कालपंख ने हैरानी से पूछा, “क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे?”

     

    “शायद तुरंत नहीं,” नीरा बोली, “लेकिन तुम्हें एक मौका जरूर मिलना चाहिए।”

     

    कालपंख ने कुछ देर सोचा। फिर उसने जीवन-वृक्ष की रोशनी से भरा चमकता पत्थर बाहर निकाला।

     

    “ले जाओ इसे।”

     

    तीनों पंखलोक लौट आए।

     

    जैसे ही रोशनी जीवन-वृक्ष में वापस रखी गई, सूखे पत्ते फिर से हरे हो गए। पूरे पंखलोक में रंग-बिरंगी रोशनी फैल गई।

     

    पक्षी खुशी से उड़ने लगे।

     

    रानी सुरम्या ने कालपंख की ओर देखा।

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    कालपंख ने सिर झुकाकर कहा, “क्योंकि एक छोटी-सी चिड़िया ने मुझे बताया कि शक्ति पाने से ज्यादा जरूरी है किसी का विश्वास पाना।”

     

    रानी कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने कहा, “गलती बड़ी थी, लेकिन उसे सुधारने की इच्छा भी बड़ी है।”

     

    उस दिन से कालपंख को पंखलोक में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    नीरा को नगरी की सबसे बहादुर चिड़िया का सम्मान दिया गया।

     

    लेकिन नीरा ने पुरस्कार लेते हुए कहा, “मैं अकेली बहादुर नहीं थी। चांदू ने मेरा साथ दिया और कालपंख ने अपनी गलती स्वीकार की। असली जादू यही है कि जब कोई गिर जाए, तो उसे उठने का मौका दिया जाए।”

     

    उस दिन से पंखलोक में एक नया नियम बना।

     

    किसी को उसकी कमजोरी के कारण छोटा नहीं समझा जाएगा।

     

    और कहते हैं, आज भी उन ऊँचे पहाड़ों के बीच अगर किसी को रात में रंग-बिरंगे पक्षियों की आवाज सुनाई दे, तो समझ लेना कि कहीं पास ही पंखलोक की नगरी है।

     

    वहाँ आज भी जीवन-वृक्ष हरा है, आसमान में जादुई पक्षी उड़ते हैं और हर सुबह सूरज की पहली किरण उनके पंखों पर पड़कर पूरी नगरी को सोने जैसा चमका देती है।

     

    पंखलोक का सबसे बड़ा रहस्य कोई जादुई पेड़ या चमकता पत्थर नहीं था।

     

    उस नगरी का असली जादू था—दया, दोस्ती और किसी को बदलने का एक मौका देना।

  • कान्हा और रास्ता भूली गाय

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और रास्ता भूली गाय

     

    अगली सुबह वृंदावन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रात की बारिश के बाद मिट्टी से मीठी खुशबू उठ रही थी। नंद बाबा रोज की तरह गायों को चराने के लिए तैयार कर रहे थे।

     

    कान्हा भी जल्दी उठकर आँगन में पहुँच गए।

     

    छोटू और चंदू उन्हें देखते ही उनके पास आ गए।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम दोनों तो मुझसे पहले ही तैयार हो!”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आज गायों को गाँव के पश्चिम वाले मैदान में ले जाना है। वहाँ घास बहुत हरी है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं भी चलूँ?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना कि कोई गाय बहुत दूर न चली जाए।”

     

    कान्हा ने गंभीर होकर कहा—

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    सभी गायें धीरे-धीरे मैदान की तरफ चल पड़ीं।

     

    कान्हा कभी किसी बछड़े के पास जाते, कभी किसी गाय को रास्ते से भटकने से रोकते।

     

    उनके दोस्त भी मदद कर रहे थे।

     

    दोपहर के करीब नंद बाबा ने गायों को एक जगह इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    उन्होंने एक-एक करके गिनती की।

     

    “एक… दो… तीन…”

     

    फिर अचानक वे रुक गए।

     

    “एक गाय कम है।”

     

    कान्हा तुरंत चौकन्ने हो गए।

     

    “कौन सी?”

     

    नंद बाबा ने चारों तरफ देखा।

     

    “सुरभि नहीं दिखाई दे रही।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “वही सफेद गाय?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    दूर कहीं से बहुत हल्की घंटी की आवाज आ रही थी।

     

    टन…

     

    कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “बाबा! उधर से आवाज आ रही है।”

     

    नंद बाबा ने ध्यान लगाया।

     

    कुछ पल बाद उन्हें भी घंटी सुनाई दी।

     

    “हाँ, आवाज उसी तरफ से है।”

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस दिशा में चल पड़े।

     

    रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ था।

     

    कुछ दूर जाने पर घंटी की आवाज फिर सुनाई दी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा बोले—

     

    “वह ज्यादा दूर नहीं है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी की आवाज तेज हो रही है।”

     

    वे आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन अचानक रास्ता दो दिशाओं में बँट गया।

     

    एक रास्ता नदी की तरफ जाता था और दूसरा घने पेड़ों की तरफ।

     

    घंटी की आवाज दोनों तरफ से आती हुई लग रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब किस तरफ जाएँ?”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    उन्होंने जमीन पर देखा।

     

    मिट्टी पर गाय के खुरों के निशान थे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इधर।”

     

    सब उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें घास कुचली हुई दिखाई दी।

     

    “गाय यहाँ से गई है।”

     

    तभी फिर आवाज आई।

     

    टन…

     

    कान्हा दौड़ पड़े।

     

    पेड़ों के बीच एक खुला स्थान था।

     

    वहाँ सुरभि खड़ी थी।

     

    लेकिन वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके पास एक छोटा सा बछड़ा भी था।

     

    कान्हा ने हैरानी से पूछा—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा और मुस्कुराए।

     

    “शायद सुरभि ने इसे यहाँ पाया है।”

     

    बछड़ा बहुत छोटा था और अपनी माँ से अलग लग रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे आए?”

     

    बछड़े ने धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसकी माँ कहाँ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “शायद हमें इसकी माँ भी ढूँढ़नी होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो आज दो खोज करनी होंगी।”

     

    सब बच्चे हँस पड़े।

     

    लेकिन इस बार कान्हा बहुत ध्यान से बछड़े को देखते रहे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “पहले इसे सुरभि के साथ सुरक्षित गाँव ले चलते हैं। फिर इसकी माँ ढूँढ़ेंगे।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया।

     

    सुरभि आगे चलने लगी और बछड़ा उसके साथ।

     

    कान्हा दोनों के पीछे चलते रहे।

     

    वापस मैदान में पहुँचकर उन्होंने बाकी गायों को देखा।

     

    एक गाय बार-बार बछड़े की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने गौर किया।

     

    “बाबा, ये गाय इसे देख रही है।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद इसे पहचानती है।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उस गाय की ओर बढ़ा।

     

    गाय ने उसे सूँघा और उसके पास खड़ी हो गई।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “बाबा! शायद यही इसकी माँ है!”

     

    बछड़ा अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया।

     

    गाय ने उसे प्यार से चाटा।

     

    कान्हा खुशी से ताली बजाने लगे।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त भी खुशी से चिल्लाए।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा कान्हा? कभी-कभी किसी को सही जगह पहुँचाने के लिए बस ध्यान से देखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ। अगर हमने ध्यान नहीं दिया होता तो ये दोनों अलग रह जाते।”

     

    शाम को गायों को वापस गाँव लाया गया।

     

    सुरभि भी अपने झुंड के साथ लौट आई।

     

    कान्हा ने उसकी घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अब तुम रास्ता नहीं भूलना।”

     

    सुरभि ने जैसे जवाब में सिर हिलाया।

     

    घर पहुँचकर यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने सारी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तो आज तुमने दो दोस्तों को उनके परिवार से मिलाया।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ मैया।”

     

    फिर छोटू और चंदू आ गए।

     

    कान्हा ने दोनों को देखकर कहा—

     

    “तुम दोनों भी कभी रास्ता मत भूलना।”

     

    चंदू ने कान्हा की धोती को हल्का सा खींचा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अच्छा, तुम मुझे ही रास्ता दिखाओगे?”

     

    यशोदा भी हँसने लगीं।

     

    उस रात कान्हा आँगन में बैठे थे। आसमान साफ था और तारों की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    उन्होंने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, क्या हर किसी का कोई अपना होता है?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। परिवार हो, दोस्त हों या कोई ऐसा जो हमारी चिंता करे—हर किसी को अपनापन चाहिए।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो हमें किसी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “यही तो सबसे बड़ी बात है।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, कल मैं सब गायों के लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। लेकिन फूल तोड़ते समय पौधे को नुकसान मत पहुँचाना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “गिरे हुए फूल इकट्ठे करेंगे।”

     

    “बहुत अच्छे।”

     

    अगली सुबह कान्हा और उनके दोस्त पेड़ों के नीचे गिरे हुए फूल इकट्ठे करने लगे।

     

    गौरी भी उनके साथ थी।

     

    सब मिलकर फूलों की छोटी-छोटी मालाएँ बनाने लगे।

     

    कान्हा ने एक माला सुरभि के गले में डाली।

     

    फिर दूसरी छोटू के गले में।

     

    चंदू अपनी माला पहनने से पहले ही उसे सूँघने लगा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे खाना मत!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दूसरी तरफ से तेज आवाज आई।

     

    “बचाओ! मेरी मटकी गिर गई!”

     

    सभी बच्चे उस तरफ दौड़े।

     

    वहाँ एक गोपी की बड़ी मटकी जमीन पर गिर गई थी और उसके अंदर का दूध बहने लगा था।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “जल्दी से कपड़ा लाओ!”

     

    सभी बच्चे मदद करने लगे।

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उस मटकी के गिरने के पीछे एक छोटी सी गलती थी, जो अगले अध्याय में पूरे गाँव को एक नई सीख देने वाली थी।

  • रहस्मयी फूलों के निशान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    रहस्मयी फूलों का निशान

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में धूप की हल्की किरणें फैल रही थीं। यशोदा मैया रसोई का काम कर रही थीं। तभी उनकी नजर एक मटकी पर पड़ी।

     

    मटकी के ऊपर फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना हुआ था।

     

    यशोदा कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    पास खेल रहे कान्हा ने तुरंत सिर उठाया।

     

    “क्या हुआ मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें बुलाया।

     

    “इधर आओ और देखो।”

     

    कान्हा मटकी के पास पहुँचे। उन्होंने निशान को बहुत ध्यान से देखा।

     

    वह गोल आकार का था और उसके चारों ओर छोटी-छोटी पंखुड़ियाँ लगी थीं।

     

    कान्हा ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखा।

     

    “हम्म…”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये किसी ने जानबूझकर बनाया है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

     

    “क्योंकि पंखुड़ियाँ एक जैसी दूरी पर लगी हैं।”

     

    दोस्त हैरान होकर बोला—

     

    “तुमने ये कैसे देख लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि मैं ध्यान से देख रहा हूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “बस ध्यान रखना कि किसी की चीज खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “हम सिर्फ पता लगाएंगे कि इसे किसने बनाया।”

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर निकले।

     

    उन्होंने आँगन में चारों तरफ देखा।

     

    जमीन पर कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ पड़ी थीं।

     

    कान्हा ने एक पंखुड़ी उठाई।

     

    “ये वही फूल है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “ये फूल कहाँ मिलता है?”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “यमुना के पास।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तो निशान बनाने वाला शायद वहीं से आया होगा।”

     

    सभी बच्चे यमुना की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में छोटू और चंदू भी उनके पीछे आ गए।

     

    कान्हा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम दोनों फिर आ गए?”

     

    छोटू की घंटी बजी।

     

    टन…

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ठीक है, तुम भी चलो।”

     

    यमुना किनारे पहुँचकर उन्होंने वही फूल देखा।

     

    वहाँ कई पंखुड़ियाँ जमीन पर बिखरी हुई थीं।

     

    कान्हा नीचे बैठ गए।

     

    “यहाँ से कोई फूल लेकर गया है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन कौन?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    उन्हें मिट्टी पर छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    वे निशान नदी से दूर एक कच्चे रास्ते की ओर जा रहे थे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो।”

     

    सभी उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें एक छोटा सा पेड़ दिखाई दिया। पेड़ के नीचे फूलों की पंखुड़ियों का ढेर था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “यहाँ कोई फूल जमा करता है।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    सभी बच्चे चौंक गए।

     

    एक छोटी लड़की पेड़ के पीछे से बाहर आई।

     

    उसके हाथ में फूलों की टोकरी थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं फूल इकट्ठे करती हूँ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या तुम नंद भवन गई थीं?”

     

    लड़की चुप हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “मटकी पर फूलों का निशान तुमने बनाया था?”

     

    लड़की ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं आपको बुलाना चाहती थी।”

     

    कान्हा हैरान हुए।

     

    “हमें?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन सीधे बुला सकती थीं।”

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “मैं आपको जानती नहीं थी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब जानती हो।”

     

    लड़की भी मुस्कुरा दी।

     

    उसने टोकरी से एक सुंदर फूल निकाला।

     

    “मैं आपको ये देना चाहती थी।”

     

    कान्हा ने फूल लिया।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    फिर लड़की ने बताया कि वह अपनी माँ के साथ गाँव के बाहर रहती है। उसकी माँ बीमार होने के कारण घर से बाहर कम निकल पाती थीं। वह रोज फूल इकट्ठे करके गाँव की गोपियों को देती थी।

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो तुमने मटकी पर निशान क्यों बनाया?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं चाहती थी कि आप मुझे पहचान लें।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो पहचान लिया।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हें डर नहीं लगा कि मैया नाराज होंगी?”

     

    लड़की ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे लगा था शायद कोई मुझे समझेगा नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर किसी से बात करनी हो तो छिपकर निशान बनाने की जरूरत नहीं। सीधे आ जाना।”

     

    लड़की ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “हम इसे भी दोस्त बना लेते हैं।”

     

    सभी बच्चों ने हामी भरी।

     

    तभी चंदू लड़की की फूलों वाली टोकरी के पास गया और उसे सूँघने लगा।

     

    लड़की हँस पड़ी।

     

    “ये भी फूल पसंद करता है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे हर चीज पसंद है।”

     

    चंदू ने टोकरी को नाक से हल्का सा धक्का दिया।

     

    फूल थोड़े बिखर गए।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    कान्हा और उनके दोस्तों ने मिलकर फूल फिर से टोकरी में रख दिए।

     

    लड़की ने कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “दोस्त धन्यवाद नहीं कहते।”

     

    फिर वे सब गाँव की ओर लौटने लगे।

     

    रास्ते में कान्हा ने लड़की से पूछा—

     

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    “मेरा नाम गौरी है।”

     

    “गौरी, तुम्हें फूल बहुत पसंद हैं?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो कल हमारे साथ फूलों की माला बनाना।”

     

    गौरी ने खुशी से सिर हिलाया।

     

    घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “मिल गया रहस्य?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    उन्होंने गौरी की कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तो तुमने एक नई दोस्त बना ली।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उन्होंने मटकी पर बने फूलों के निशान को साफ कर दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “इसे मिटा क्यों रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब इसकी जरूरत नहीं। गौरी सीधे हमारे घर आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    अगले दिन गौरी सच में नंद भवन आई।

     

    उसने फूलों की बड़ी टोकरी लाई थी।

     

    कान्हा और उसके दोस्तों ने फूलों की माला बनानी शुरू की।

     

    किसी की माला छोटी बनी, किसी की टेढ़ी।

     

    कान्हा की माला में एक फूल बार-बार निकल जाता।

     

    गौरी हँसकर बोली—

     

    “कान्हा, तुमसे माला नहीं बन रही।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं तो जानबूझकर इसे ऐसा बना रहा हूँ।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “झूठ!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    आखिर में उन्होंने मिलकर एक सुंदर माला बनाई।

     

    कान्हा ने उसे छोटू के गले में डाल दिया।

     

    छोटू की घंटी के साथ फूल भी झूलने लगे।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “देखो, आज छोटू सबसे सुंदर लग रहा है।”

     

    चंदू ने भी आगे आकर माला सूँघी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम्हारे लिए भी बनाएँगे।”

     

    शाम तक पूरा आँगन फूलों की खुशबू से भर गया।

     

    उस दिन कान्हा ने एक छोटी सी बात सीखी—

     

    कभी-कभी कोई अजीब हरकत परेशानी पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि किसी तक पहुँचने की कोशिश में की जाती है। इसलिए किसी बात को समझने से पहले उसके पीछे की वजह जानना जरूरी है।

     

    रात को यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जिसे मदद चाहिए, उसे डरना नहीं चाहिए। और हमें भी किसी को बिना समझे गलत नहीं समझना चाहिए।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार से हाथ रखा।

     

    “बहुत अच्छी बात सीखी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    लेकिन अगली सुबह वृंदावन में एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    नंद बाबा की कुछ गायें चरते-चरते बहुत दूर निकल गई थीं। उनमें से एक छोटी गाय रास्ता भूल गई थी।

     

    कान्हा ने उसकी घंटी की आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत कहा—

     

    “ये आवाज गाँव की तरफ से नहीं आ रही।”

     

    और फिर कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस घंटी की आवाज का पीछा करने निकल पड़े।

     

  • कान्हा और यमुना की बहती नाव

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और यमुना की बहती नाव

     

    शाम का समय था। यमुना के किनारे ठंडी हवा चल रही थी। कान्हा अपनी पतंग समेटकर घर लौटने ही वाले थे कि उनका दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! जल्दी चलो!”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “हमारी गेंद नाव में रह गई है और नाव किनारे से छूटकर पानी में चली गई!”

     

    कान्हा ने यमुना की ओर देखा। सचमुच एक छोटी सी नाव धीरे-धीरे पानी के साथ दूर जा रही थी। उसमें बच्चों की लाल गेंद पड़ी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब गेंद वापस नहीं मिलेगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गेंद तो मिल सकती है, लेकिन पहले ये देखना होगा कि नाव कहाँ जा रही है।”

     

    सब बच्चे किनारे पर खड़े होकर नाव को देखने लगे।

     

    नाव बहुत दूर नहीं गई थी, लेकिन पानी का बहाव तेज था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हम पानी में नहीं उतरेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तो फिर गेंद कैसे आएगी?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    उन्हें किनारे पर पड़ी एक लंबी बाँस की लकड़ी दिखाई दी।

     

    “इससे कोशिश कर सकते हैं।”

     

    उन्होंने बाँस उठाया, लेकिन नाव अभी भी काफी दूर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये वहाँ तक नहीं पहुँचेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कोई और तरीका सोचते हैं।”

     

    तभी नंद बाबा वहाँ पहुँच गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने सारी बात बताई।

     

    नंद बाबा ने नदी की ओर देखा।

     

    “नाव को पकड़ने की कोशिश मत करना। पानी का बहाव तेज है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, फिर गेंद?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “गेंद से ज्यादा जरूरी तुम सब हो।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ बाबा।”

     

    उन्होंने नाव को ध्यान से देखा।

     

    नाव किनारे से दूर जाकर एक शांत हिस्से की तरफ बढ़ रही थी।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अगर हवा इसी दिशा में रही तो नाव थोड़ी देर में उस दूसरे किनारे के पास जा सकती है।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “तो हम वहीं से उसे पकड़ सकते हैं!”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन मेरे साथ।”

     

    सभी बच्चे नंद बाबा के साथ सुरक्षित रास्ते से आगे बढ़ने लगे।

     

    कान्हा बार-बार नाव को देखते।

     

    “अभी वहाँ है!”

     

    कुछ देर बाद नाव धीरे-धीरे किनारे की तरफ आने लगी।

     

    नंद बाबा ने एक लंबी रस्सी ली और किनारे पर खड़े होकर उसे नाव की तरफ बढ़ाया।

     

    इस बार नाव पास थी।

     

    उन्होंने सावधानी से रस्सी नाव के अगले हिस्से में अटका दी।

     

    धीरे-धीरे नाव किनारे खिंच आई।

     

    कान्हा ने अंदर झाँका।

     

    “गेंद!”

     

    उन्होंने गेंद उठा ली।

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

     

    “मिल गई!”

     

    कान्हा ने गेंद दोस्त को दे दी।

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारी वजह से मिल गई।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “नहीं, बाबा की वजह से।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “और तुम्हारी समझदारी की वजह से भी।”

     

    वापस लौटते समय कान्हा चुप थे।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज समझ आया कि हर चीज को पाने के लिए तुरंत दौड़ना जरूरी नहीं। पहले सोचना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बिल्कुल। यही समझदारी है।”

     

    अगले दिन बच्चों ने तय किया कि वे यमुना किनारे खेलेंगे, लेकिन इस बार पानी से थोड़ी दूरी पर।

     

    कान्हा ने गेंद हाथ में ली और कहा—

     

    “आज हम ऐसा खेल खेलेंगे जिसमें कोई पानी के पास नहीं जाएगा।”

     

    सबने हामी भरी।

     

    खेल शुरू हुआ।

     

    कान्हा गेंद एक दोस्त को देते, दोस्त दूसरे को।

     

    कुछ देर बाद गेंद अचानक एक पेड़ के पीछे जा गिरी।

     

    एक बच्चा उसे लेने दौड़ा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! धीरे जाना।”

     

    बच्चा रुक गया।

     

    कान्हा खुद उसके साथ गए।

     

    वहाँ गेंद के पास एक छोटा पक्षी बैठा था।

     

    उसका पंख शायद किसी सूखी टहनी में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से बैठ गए।

     

    “डरो मत।”

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    नंद बाबा ने सावधानी से टहनी हटाई।

     

    पक्षी आजाद होकर उड़ गया।

     

    कान्हा उसे आसमान में जाते हुए देखते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “आज तो हमारी गेंद से ज्यादा काम पक्षी का हो गया।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “गेंद तो फिर मिल जाती। इसे मदद की जरूरत थी।”

     

    शाम होते-होते सभी बच्चे घर लौटने लगे।

     

    रास्ते में कान्हा ने देखा कि छोटू और चंदू उनके पीछे-पीछे आ रहे हैं।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम दोनों यहाँ कैसे?”

     

    दोनों बछड़ों की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अच्छा! अब तुम भी हमारे साथ खेलना चाहते हो?”

     

    चंदू आगे बढ़ा और कान्हा की गेंद सूँघने लगा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे मत खाना!”

     

    दोस्त जोर से हँसने लगे।

     

    चंदू ने गेंद को नाक से धक्का दिया और गेंद लुढ़कती हुई दूर चली गई।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़े।

     

    “अरे चंदू!”

     

    छोटू भी पीछे दौड़ पड़ा।

     

    कुछ ही क्षणों में पूरा रास्ता बच्चों और दोनों बछड़ों की दौड़ से भर गया।

     

    घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज फिर क्या शरारत हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हमने किसी की गेंद बचाई, एक पक्षी की मदद की और चंदू ने गेंद को फिर भगा दिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो आज का दिन अच्छा रहा।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    उस रात कान्हा आँगन में लेटे हुए आसमान के तारों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, क्या तारे भी कभी रास्ता भूलते हैं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “शायद नहीं। वे अपनी जगह चमकते रहते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “फिर अगर कोई रास्ता भूल जाए तो?”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “उसे रास्ता दिखाने वाला कोई न कोई जरूर मिल जाता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें छोटू, चंदू, अपने दोस्त और आज मिला वह छोटा पक्षी याद आ गया।

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वृंदावन में एक और हलचल मचने वाली थी।

     

    नंद बाबा के आँगन में रखी मटकी पर किसी ने फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना दिया था।

     

    यशोदा मैया ने उसे देखा तो हैरान रह गईं।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    कान्हा ने निशान देखा।

     

    उनके चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गई।

     

    “मैया… मुझे लगता है हमें इसका रहस्य पता लगाना पड़ेगा।”

     

    और इस बार निशान उन्हें वृंदावन की एक ऐसी जगह तक ले जाने वाला था, जहाँ बच्चों ने पहले कभी जाने की हिम्मत नहीं की थी।

  • कान्हा और पेड़ की अटकी पतंग

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और पेड़ पर अटकी पतंग

     

    अगली सुबह कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँचे। आज सबके हाथों में रंग-बिरंगी पतंगें थीं। किसी की पतंग लाल थी, किसी की पीली, तो किसी की नीली।

     

    कान्हा के हाथ में पीले रंग की एक सुंदर पतंग थी।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम्हारी पतंग सबसे ऊपर जाएगी?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सबसे ऊपर!”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “पहले उड़ाकर तो देखो।”

     

    कान्हा ने डोर पकड़ी और दोस्त ने पतंग हवा में छोड़ दी।

     

    हवा तेज थी, इसलिए पतंग तुरंत ऊपर उठने लगी।

     

    “छोड़ो!”

     

    कान्हा ने डोर खींची।

     

    पतंग आसमान में ऊपर जाने लगी।

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए—

     

    “उड़ गई!”

     

    कान्हा बहुत खुश थे।

     

    वह कभी पतंग को ऊपर करते, कभी नीचे लाते।

     

    तभी एक तेज हवा का झोंका आया।

     

    पतंग अचानक दूसरी दिशा में मुड़ गई।

     

    कान्हा ने डोर संभालने की कोशिश की।

     

    “अरे! इधर आओ!”

     

    लेकिन पतंग तेजी से एक बड़े पेड़ की तरफ जाने लगी।

     

    एक दोस्त चिल्लाया—

     

    “कान्हा! पेड़!”

     

    कान्हा ने डोर खींची।

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फटाक!

     

    पतंग पेड़ की ऊँची शाखाओं में फँस गई।

     

    सभी बच्चे कुछ पल चुप रहे।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    उनकी प्यारी पतंग एक शाखा पर अटकी हुई थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब गई पतंग।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। मैं इसे वापस लाऊँगा।”

     

    दोस्त ने पेड़ को देखा।

     

    “लेकिन ये बहुत ऊँची है।”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को छुआ।

     

    “इतनी भी ऊँची नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम चढ़ोगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने ही वाले थे कि पीछे से आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा रुक गए।

     

    वहाँ नंद बाबा खड़े थे।

     

    “क्या करने वाले हो?”

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “मेरी पतंग फँस गई है।”

     

    नंद बाबा ने पेड़ की तरफ देखा।

     

    “पतंग के लिए पेड़ पर मत चढ़ो। गिर सकते हो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “लेकिन बाबा, मेरी पतंग…”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “पतंग फिर मिल जाएगी। तुम्हारी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।”

     

    कान्हा थोड़ा उदास हो गए।

     

    “लेकिन ये मेरी पसंदीदा पतंग है।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “चलो, पहले सोचते हैं कि इसे बिना चढ़े कैसे निकाला जाए।”

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “हम लंबी लकड़ी से इसे नीचे कर सकते हैं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन लकड़ी इतनी लंबी नहीं है।”

     

    तीसरा बोला—

     

    “हम पत्थर फेंककर डोर गिरा सकते हैं।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं! पत्थर से किसी को चोट लग सकती है।”

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा ने पेड़ को ध्यान से देखा।

     

    एक लंबी सूखी डाल नीचे पड़ी थी।

     

    उन्होंने उसे उठाया।

     

    “अगर इसे बाँस के साथ बाँध दें तो शायद ऊपर तक पहुँच जाए।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अच्छा विचार है। लेकिन सावधानी से।”

     

    कुछ बड़े बच्चों ने बाँस और लकड़ी को जोड़ दिया।

     

    कान्हा नीचे खड़े होकर उसे धीरे-धीरे ऊपर करने लगे।

     

    पहली बार लकड़ी पतंग तक नहीं पहुँची।

     

    दूसरी बार भी नहीं।

     

    तीसरी बार लकड़ी पतंग की डोर से टकराई।

     

    छपाक!

     

    पतंग थोड़ा हिली, लेकिन नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा बोले—

     

    “थोड़ा और ऊपर!”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “धीरे!”

     

    कान्हा ने फिर कोशिश की।

     

    इस बार डोर लकड़ी में उलझ गई।

     

    कान्हा ने धीरे से उसे खींचा।

     

    पतंग शाखा से निकलकर नीचे गिरने लगी।

     

    “मिल गई!”

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

     

    कान्हा ने पतंग पकड़ ली।

     

    लेकिन पतंग का एक कोना फट गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर थोड़ा उदास हुए।

     

    “मेरी पतंग टूट गई।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कोई बात नहीं। इसे ठीक कर लेंगे।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हाँ, हमारे पास कागज है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “चलो, घर जाकर इसे ठीक करते हैं।”

     

    कान्हा ने पतंग को सीने से लगा लिया।

     

    “मैं इसे खुद ठीक करूँगा।”

     

    वापस लौटते समय कान्हा चुपचाप चल रहे थे।

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “सोच रहा हूँ, हवा पतंग को इतनी दूर क्यों ले गई?”

     

    दोस्त हँसा।

     

    “क्योंकि हवा को भी शरारत करनी थी।”

     

    कान्हा भी हँस पड़े।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “पतंग की तरह मन भी होता है। कभी-कभी बहुत दूर जाने लगता है। उसे संभालने के लिए समझदारी की डोर चाहिए।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “और अगर डोर टूट जाए?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो उसे फिर से जोड़ना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “जैसे मेरी पतंग की डोर?”

     

    “बिल्कुल।”

     

    घर पहुँचकर कान्हा सीधे यशोदा मैया के पास गए।

     

    “मैया देखो!”

     

    उन्होंने फटी हुई पतंग दिखाई।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “ये कैसे फटी?”

     

    कान्हा ने पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “अच्छा हुआ तुम पेड़ पर नहीं चढ़े।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “पहले तो मैं चढ़ने वाला था।”

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “लेकिन बाबा ने रोक दिया।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें पता है, छोटी सी लापरवाही से चोट लग सकती थी।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “अब नहीं चढ़ूँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा बच्चा।”

     

    फिर उन्होंने पतंग उठाई।

     

    “इसे हम दोनों मिलकर ठीक करेंगे।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा ने रंगीन कागज निकाला।

     

    कान्हा ने पतंग का फटा हिस्सा पकड़ा और मैया ने धीरे-धीरे उसे ठीक करना शुरू किया।

     

    कान्हा बहुत ध्यान से देखते रहे।

     

    “मैया, अब ये पहले जैसी हो जाएगी?”

     

    “थोड़ी अलग होगी।”

     

    “तो क्या ये खराब हो गई?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “नहीं। कभी-कभी टूटने के बाद चीजें पहले से भी सुंदर लगती हैं।”

     

    कान्हा ने पतंग को देखा।

     

    उस पर अब नीले रंग का छोटा सा कागज लगा था।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब तो ये और अच्छी लग रही है।”

     

    शाम को कान्हा फिर दोस्तों के साथ बाहर गए।

     

    उन्होंने पतंग हाथ में ली।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “आज फिर उड़ाएँगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन आज पेड़ से दूर।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    कान्हा ने पतंग आसमान में छोड़ी।

     

    इस बार हवा शांत थी।

     

    पतंग धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।

     

    कान्हा डोर संभालते हुए बोले—

     

    “धीरे… धीरे…”

     

    पतंग ऊँची जाती गई।

     

    कान्हा के चेहरे पर खुशी थी।

     

    तभी उन्हें कल की बात याद आई।

     

    उन्होंने डोर को थोड़ा ढीला किया।

     

    पतंग हवा के साथ चलने लगी।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम डोर ढीली क्यों कर रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हर चीज को अपनी मर्जी से खींचना जरूरी नहीं। कभी-कभी उसे हवा के साथ चलने देना चाहिए।”

     

    दोस्त उसकी बात सुनकर चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद पतंग आसमान में बहुत ऊँची दिखाई देने लगी।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखो! मेरी पतंग सबसे ऊपर है!”

     

    सभी बच्चे तालियाँ बजाने लगे।

     

    दूर खड़ी यशोदा मैया उन्हें देख रही थीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उन्हें लगा जैसे उनका नन्हा कान्हा हर छोटी शरारत से कोई न कोई नई बात सीख रहा है।

     

    रात को कान्हा अपनी पतंग लेकर सोने की जिद करने लगे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “पतंग लेकर सोओगे तो वो फिर फट जाएगी।”

     

    कान्हा ने तुरंत उसे सुरक्षित जगह रख दिया।

     

    “ठीक है। इसे कल फिर उड़ाएँगे।”

     

    वह सोने लगे।

     

    तभी बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

     

    एक दोस्त घबराया हुआ नंद भवन के आँगन में आया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा उठकर बैठ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    दोस्त ने हाँफते हुए कहा—

     

    “यमुना किनारे एक छोटी नाव बहकर दूर चली गई है… और उसमें हमारी गेंद पड़ी है!”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “गेंद?”

     

    दोस्त ने सिर हिलाया।

     

    कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।

     

    “चलो!”

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि यमुना किनारे इस बार उनका सामना एक बहुत तेज बहाव से होने वाला था।

  • मक्खन की रहस्यमई चोरी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     — मक्खन की रहस्यमयी चोरी

     

    वृंदावन की उस सुबह नंद भवन के आँगन में बच्चों की टोली जमा थी। कल तक सबकी चर्चा छोटू और चंदू के जंगल में चले जाने की थी, लेकिन आज गाँव में एक नई बात फैल गई थी।

     

    गाँव की कई गोपियाँ परेशान थीं।

     

    उनकी मटकी में रखा मक्खन हर दिन थोड़ा-थोड़ा कम हो रहा था।

     

    सबसे ज्यादा परेशान थीं रोहिणी चाची की पड़ोसन गोपी, जो सुबह-सुबह नंद भवन पहुँच गई थीं।

     

    उन्होंने यशोदा मैया से कहा—

     

    “बहन, समझ नहीं आता मेरे घर से मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुमने किसी को देखा?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। लेकिन आज सुबह मटकी का ढक्कन खुला मिला।”

     

    पास खड़े कान्हा ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    उनके दोस्त भी वहीं थे।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कान्हा के कान में कहा—

     

    “मुझे तो पता है मक्खन कौन खाता है।”

     

    कान्हा ने उसे आँख दिखाई।

     

    “चुप!”

     

    गोपी ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्यों कान्हा? तुम्हें कुछ पता है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “मुझे? नहीं।”

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    उन्हें कान्हा का यह चेहरा देखकर समझ आ गया कि उसके मन में जरूर कुछ चल रहा है।

     

    गोपी बोलीं—

     

    “मैं आज पता लगाकर रहूँगी कि मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “हम भी मदद करेंगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तुम?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा के दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उन्हें पता था कि अगर कान्हा जाँच में शामिल हुए तो मक्खन की कहानी और भी मजेदार होने वाली है।

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों को लेकर बाहर आए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “सबसे पहले सुराग ढूँढ़ेंगे।”

     

    दूसरे ने पूछा—

     

    “सुराग क्या होता है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “जिससे हमें पता चले कि मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    वे उस गोपी के घर पहुँचे।

     

    मटकी वहीं रखी थी।

     

    कान्हा ने जमीन देखी।

     

    उन्हें मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    “देखो!”

     

    सभी बच्चे नीचे झुक गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो पैरों के निशान हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “लेकिन ये इंसान के नहीं लग रहे।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो किसके हैं?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अभी पता लगाएँगे।”

     

    निशान रसोई से बाहर निकलकर पिछवाड़े की तरफ जा रहे थे।

     

    बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    वहाँ उन्हें कुछ गिरे हुए मक्खन के छोटे-छोटे निशान मिले।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “मक्खन यहाँ तक आया है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसका मतलब चोर मक्खन लेकर इधर गया।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    निशान एक पुराने पेड़ के पास जाकर खत्म हो गए।

     

    कान्हा ने पेड़ के नीचे देखा।

     

    वहाँ एक टूटी हुई पत्तों की टोकरी पड़ी थी।

     

    उसमें मक्खन के कुछ छोटे टुकड़े चिपके हुए थे।

     

    कान्हा ने टोकरी उठाई।

     

    “हमें सुराग मिल गया!”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पता नहीं।”

     

    सभी हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अभी जाँच बाकी है।”

     

    तभी पेड़ के पीछे से हल्की सी आवाज आई।

     

    म्याऊँ…

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “शांत!”

     

    उन्होंने पेड़ के पीछे देखा।

     

    वहाँ एक छोटी सी बिल्ली बैठी थी।

     

    उसके मुँह के पास मक्खन लगा हुआ था।

     

    एक दोस्त खुशी से चिल्लाया—

     

    “चोर मिल गया!”

     

    बिल्ली डरकर भागने लगी।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़े।

     

    “रुको!”

     

    बिल्ली एक झाड़ी के पीछे जाकर छिप गई।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठे।

     

    “डरो मत।”

     

    बिल्ली ने उन्हें देखा।

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    बिल्ली धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    कान्हा ने देखा कि उसके पास दो छोटे बच्चे भी थे।

     

    वे बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    कान्हा समझ गए।

     

    “तुम अपने बच्चों के लिए मक्खन ले जा रही थी?”

     

    बिल्ली चुपचाप बैठी रही।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे चोर मत कहो।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “लेकिन ये मक्खन तो ले जा रही थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ, लेकिन शायद इसके बच्चे भूखे थे।”

     

    कान्हा ने बिल्ली के बच्चों को देखा।

     

    फिर गोपी को बुलाया।

     

    गोपी भी वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने बिल्ली को देखा और बोलीं—

     

    “अरे, तो ये मक्खन ले जाती थी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ। लेकिन देखो, इसके बच्चे कितने छोटे हैं।”

     

    गोपी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनका गुस्सा धीरे-धीरे कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बेचारी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप रोज थोड़ा सा मक्खन इनके लिए अलग रख सकती हैं?”

     

    गोपी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ। इतना तो कर सकती हूँ।”

     

    बिल्ली जैसे कान्हा की बात समझ रही थी।

     

    उसने धीरे से आवाज की।

     

    म्याऊँ…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो, धन्यवाद भी बोल रही है।”

     

    सभी बच्चे मुस्कुराने लगे।

     

    गोपी ने कान्हा के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुमने आज मुझे भी एक बात सिखाई।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर गलती के पीछे बुरी नीयत हो, यह जरूरी नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर उनके दोस्तों में से एक ने धीरे से कहा—

     

    “लेकिन कान्हा…”

     

    “क्या?”

     

    “अगर ये मक्खन नहीं ले जाती, तो बाकी मक्खन कहाँ गया?”

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    सभी बच्चों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    गोपी भी सोच में पड़ गईं।

     

    “सच!”

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मेरे घर से तो बहुत ज्यादा मक्खन कम हुआ है।”

     

    कान्हा ने जमीन पर फिर निशान देखे।

     

    बिल्ली के पैरों के निशान बहुत छोटे थे।

     

    लेकिन मक्खन की मात्रा ज्यादा थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसने कुछ मक्खन लिया होगा, लेकिन सारा नहीं।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “तो दूसरा कौन है?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें दूसरी जगह देखना होगा।”

     

    वे वापस घर की ओर गए।

     

    रास्ते में कान्हा ने एक दीवार पर सफेद सा निशान देखा।

     

    उन्होंने उंगली लगाई।

     

    “ये मक्खन है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मक्खन दीवार पर कैसे आया?”

     

    कान्हा ने निशान को ऊपर तक देखा।

     

    वह दीवार के किनारे से आगे जा रहा था।

     

    वे उसी रास्ते पर चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाकर उन्हें एक छोटा सा खाली कमरा मिला।

     

    कमरे के दरवाजे के पास मक्खन के निशान थे।

     

    कान्हा ने धीरे से दरवाजा खोला।

     

    अंदर अँधेरा था।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “सब धीरे से चलना।”

     

    अंदर जाकर उन्होंने देखा कि एक कोने में कुछ मिट्टी के छोटे बर्तन रखे थे।

     

    एक बर्तन के अंदर मक्खन था।

     

    दूसरे में दही।

     

    तीसरा खाली था।

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “ये किसका घर है?”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “यह कमरा तो कई दिनों से खाली है।”

     

    तभी अंदर से आवाज आई—

     

    “छीं!”

     

    सब चौंक गए।

     

    एक बच्चा कान्हा के पीछे छिप गया।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “छीं!”

     

    कान्हा ने दरवाजे के पीछे देखा।

     

    वहाँ एक छोटा लड़का बैठा था।

     

    उसके कपड़े पुराने थे और चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    लड़का चुप रहा।

     

    गोपी गुस्से में बोलीं—

     

    “तो मक्खन तुम ले जाते थे?”

     

    लड़के ने सिर झुका लिया।

     

    कान्हा ने उसे डाँटा नहीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “तुम ऐसा क्यों करते थे?”

     

    लड़के की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मेरी छोटी बहन भूखी रहती है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने माँगा क्यों नहीं?”

     

    लड़के ने कहा—

     

    “डर लगता था।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने गोपी की तरफ देखा।

     

    “इसे चोरी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”

     

    गोपी की आँखें भी नम हो गईं।

     

    उन्होंने लड़के से कहा—

     

    “तुम्हें भूख लगे तो मेरे घर आना। लेकिन बिना पूछे चीज मत लेना।”

     

    लड़के ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब हम सब मिलकर तुम्हारी बहन के लिए खाना ले जाएँगे।”

     

    दोस्तों ने भी हामी भर दी।

     

    उस दिन गोपी ने मक्खन, रोटी और दूध दिया।

     

    कान्हा खुद वह खाना लेकर उस लड़के के घर गए।

     

    लड़के की छोटी बहन ने खाना देखा तो उसके चेहरे पर खुशी आ गई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब भूखे नहीं रहना।”

     

    वापस आते समय एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, आज हमने चोर पकड़ा या दोस्त बनाया?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “दोस्त बनाया।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन चोरी तो गलत है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, चोरी गलत है। लेकिन गलती करने वाले को समझाकर सही रास्ता दिखाना भी जरूरी है।”

     

    शाम को यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बता दी।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुमने अच्छा किया। लेकिन याद रखना, किसी की मदद करते समय उसकी गलती को सही नहीं मानना चाहिए।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं समझ गया मैया।”

     

    उस रात कान्हा सोने लगे तो बाहर से बिल्ली की आवाज आई—

     

    म्याऊँ…

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब तुम्हें चोरी नहीं करनी पड़ेगी।”

     

    और पास ही रखी छोटी कटोरी में थोड़ा दूध देखकर उन्हें संतोष हुआ।

     

    लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई शरारत होने वाली थी।

     

    कान्हा के दोस्तों ने तय किया कि इस बार वे यमुना किनारे पतंग उड़ाएँगे।

     

    और कान्हा को क्या पता था कि पतंग उड़ाते-उड़ाते उनकी डोर सीधे एक पेड़ की सबसे ऊँची डाल में फँसने वाली है।

    •  
  • कान्हा और जंगल में खोए दोस्त

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    कान्हा और जंगल में खोए छोटे दोस्त

     

    सुबह का समय था। वृंदावन की गलियों में अभी पूरी तरह चहल-पहल शुरू भी नहीं हुई थी, लेकिन कान्हा के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    वह गायों के बीच बार-बार छोटू और चंदू को ढूँढ़ रहे थे।

     

    “छोटू!”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू!”

     

    लेकिन दोनों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

     

    नंद बाबा भी आसपास देखने लगे।

     

    “अभी थोड़ी देर पहले तो दोनों यहीं थे।”

     

    कान्हा ने जमीन की तरफ देखा। मिट्टी पर छोटे-छोटे खुरों के निशान बने थे।

     

    उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, देखो!”

     

    नंद बाबा उनके पास आए।

     

    “ये निशान जंगल की तरफ जा रहे हैं।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “हमें उन्हें ढूँढ़ना होगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “हम सब साथ चलेंगे।”

     

    नंद बाबा ने कुछ बड़े लड़कों को भी उनके साथ भेज दिया।

     

    कान्हा रास्ते भर छोटे-छोटे निशान देखते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें सच में समझ आ रहा है कि ये किसके निशान हैं?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “छोटू के निशान छोटे हैं और चंदू के थोड़ा गोल।”

     

    दोस्त हैरान होकर बोला—

     

    “तुम्हें ये सब कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्तों को पहचानने के लिए हमेशा नाम की जरूरत नहीं होती।”

     

    सब बच्चे मुस्कुरा दिए।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें झाड़ियों के पास घास टूटी हुई दिखाई दी।

     

    कान्हा नीचे बैठ गए।

     

    उन्होंने घास को देखा।

     

    “यहाँ दोनों रुके थे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “फिर कहाँ गए?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    तभी दूर से बहुत हल्की आवाज आई।

     

    टन…

     

    कान्हा खड़े हो गए।

     

    “घंटी!”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद फिर आवाज आई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उस दिशा में दौड़ पड़े।

     

    “छोटू!”

     

    लेकिन वहाँ पहुँचने पर कोई नहीं मिला।

     

    सिर्फ एक पेड़ की शाखा पर घंटी की आवाज जैसी हल्की टकराहट हो रही थी।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद हवा से आवाज आई थी।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मुझे लगा जैसे कोई हिला था।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    जंगल का रास्ता थोड़ा घना हो गया था।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “सब साथ रहना। कोई अकेला आगे मत जाना।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद उन्हें मिट्टी पर ताजे खुरों के निशान दिखाई दिए।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ये वही हैं!”

     

    वे निशानों के पीछे चलने लगे।

     

    अचानक सामने एक छोटी सी ढलान आई।

     

    नीचे घनी घास थी।

     

    वहीं से आवाज आई—

     

    “माँ…”

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    “ये तो छोटू की आवाज है!”

     

    उन्होंने नीचे देखा।

     

    छोटू एक झाड़ी के पास खड़ा था।

     

    वह सुरक्षित था, लेकिन उसके आगे एक छोटी लकड़ी रास्ते में पड़ी थी और वह आगे नहीं जा पा रहा था।

     

    कान्हा नीचे उतर गए।

     

    “अरे छोटू! तुम यहाँ क्यों आ गए?”

     

    छोटू कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुमने हमें कितना परेशान किया।”

     

    छोटू ने धीरे से घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अब क्या सफाई दे रहे हो?”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    “लेकिन चंदू कहाँ है?”

     

    छोटू की तरफ देखते ही कान्हा समझ गए कि वह किसी दूसरी दिशा में देख रहा है।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्या चंदू उधर गया है?”

     

    छोटू आगे बढ़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही दूरी पर उन्हें एक अजीब सी आवाज सुनाई दी।

     

    “माँ… माँ…”

     

    इस बार आवाज थोड़ी घबराई हुई थी।

     

    कान्हा तेज कदमों से आगे बढ़े।

     

    एक बड़े पेड़ के पीछे चंदू खड़ा था।

     

    उसके सामने जमीन पर गिरी हुई बेलें थीं। शायद वह खेलते-खेलते वहाँ पहुँच गया था और रास्ता उलझा हुआ देखकर रुक गया था।

     

    कान्हा उसके पास पहुँचे।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू कान्हा को देखकर तुरंत उनकी तरफ आया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम भी यहीं थे!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “दोनों हमें बहुत दूर तक ले आए।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “लेकिन मिल तो गए।”

     

    उन्होंने दोनों बछड़ों को अपने पास खड़ा किया।

     

    “अब कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    दोनों बछड़े जैसे कान्हा की बात समझ गए।

     

    वापस लौटते समय अचानक आसमान में बादल घिरने लगे।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “फिर बारिश आने वाली है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमें जल्दी चलना होगा।”

     

    सब बच्चे और बछड़े तेजी से लौटने लगे।

     

    लेकिन रास्ते में चंदू एक रंग-बिरंगे फूल के पास रुक गया।

     

    उसने फूल सूँघा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चंदू, अभी फूल नहीं। घर चलो।”

     

    चंदू वहीं खड़ा रहा।

     

    कान्हा ने उसका सिर सहलाया।

     

    “अगर हम देर करेंगे तो मैया चिंता करेंगी।”

     

    चंदू ने आखिरकार कदम बढ़ाया।

     

    रास्ते में कान्हा ने छोटू और चंदू को बीच में रखा और दोस्तों को दोनों तरफ चलने को कहा।

     

    कुछ देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं।

     

    लेकिन इस बार सब सुरक्षित थे।

     

    जब वे गाँव पहुँचे तो यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    कान्हा को देखते ही उन्होंने राहत की साँस ली।

     

    “कहाँ चले गए थे तुम लोग?”

     

    कान्हा ने छोटू और चंदू की तरफ इशारा किया।

     

    “ये दोनों जंगल में चले गए थे।”

     

    यशोदा ने दोनों बछड़ों को देखा।

     

    “और तुम इनके पीछे चले गए?”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा ने चिंता से पूछा—

     

    “तुम्हें पता है जंगल कितना बड़ा है?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “पता है मैया।”

     

    यशोदा ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन बिना बड़े को बताए ऐसी जगह नहीं जाना चाहिए। अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस आगे से ध्यान रखना।”

     

    नंद बाबा भी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने छोटू और चंदू को देखकर कहा—

     

    “अब इन्हें कुछ दिन गाँव के पास ही रखना होगा।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, मैं इनकी देखभाल करूँगा।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम करोगे, लेकिन अकेले नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    शाम को बारिश रुक गई।

     

    कान्हा दोनों बछड़ों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    फिर चंदू की।

     

    टन…

     

    दोनों आवाजें अलग थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब मैं दोनों को आँखें बंद करके भी पहचान सकता हूँ।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “अगर दोनों एक साथ भाग गए तो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं दोनों को पकड़ लूँगा।”

     

    दोस्त हँसने लगा।

     

    “तुम्हें अपने ऊपर बहुत भरोसा है।”

     

    कान्हा भी हँसे।

     

    “दोस्तों को छोड़ना नहीं चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने मिट्टी पर दो छोटे-छोटे चित्र बनाए।

     

    एक छोटू का और दूसरा चंदू का।

     

    उन्होंने दोनों चित्रों के ऊपर फूल रख दिए।

     

    यशोदा ने दूर से पूछा—

     

    “ये क्या बना रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अपने दोस्तों का घर।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और इसमें तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    कान्हा ने चित्र के बीच में एक छोटा सा निशान बनाया।

     

    “यहाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं इनके बीच रहूँगा।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    रात को कान्हा सोने गए तो दोनों बछड़ों की घंटियों की आवाज अभी भी बाहर से सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—

     

    “अब तुम दोनों कहीं मत जाना।”

     

    बाहर से जैसे छोटू ने जवाब दिया।

     

    टन…

     

    कान्हा मुस्कुराते हुए सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई परेशानी आने वाली थी।

     

    सुबह-सुबह गाँव की एक गोपी दौड़ती हुई नंद भवन पहुँची।

     

    वह बहुत परेशान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “यशोदा! मेरी मटकी से रोज थोड़ा-थोड़ा मक्खन गायब हो रहा है। आज मैंने किसी को घर के पास देखा है।”

     

    कान्हा यह सुन रहे थे।

     

    उनके दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “मुझे लगता है हमें पता लगाना चाहिए कि मक्खन कौन ले जा रहा है।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “नहीं। इस बार हम जासूस बनेंगे।”

     

    और इस तरह शुरू होने वाली थी वृंदावन की सबसे मजेदार मक्खन वाली पहेली।

     

     समाप्त। 🌸

  • शरारती सफेद बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और शरारती सफेद बछड़ा

     

    अगली सुबह नंद भवन में सूरज की पहली किरण पड़ते ही कान्हा उठ गए। उन्हें रात से ही उस नन्हे सफेद बछड़े की चिंता थी, जो कल पहली बार उनके पास आया था।

     

    कान्हा आँगन में दौड़ते हुए पहुँचे।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने तुरंत घंटी बजाई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    फिर उनकी नजर सफेद बछड़े पर गई।

     

    वह थोड़ी दूर खड़ा था और बड़ी-बड़ी आँखों से कान्हा को देख रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम्हारा नाम क्या रखें?”

     

    बछड़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम बहुत सफेद हो।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसका नाम गोरा रख दो।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “नहीं, चाँद रखो।”

     

    कान्हा ने कुछ देर सोचा।

     

    फिर बोले—

     

    “इसका नाम चंदू होगा।”

     

    सभी दोस्तों को नाम पसंद आ गया।

     

    कान्हा ने चंदू को पुकारा—

     

    “चंदू!”

     

    बछड़ा कान खड़े करके उनकी तरफ देखने लगा।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “इसे अपना नाम पसंद आ गया!”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    सुबह का समय था। नंद भवन में यशोदा मैया रसोई में काम कर रही थीं। उन्होंने बड़े बर्तन में आटा रखा और रोटियाँ बनाने लगीं।

     

    कान्हा कुछ देर तक चंदू और छोटू के साथ खेलते रहे।

     

    लेकिन चंदू बाकी बछड़ों से अलग था।

     

    वह हर चीज को सूँघता, फिर उसे छूने की कोशिश करता।

     

    कभी वह लकड़ी के दरवाजे को नाक से धक्का देता, कभी रस्सी खींचता।

     

    कान्हा उसे देखकर हँसते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो तुमसे भी ज्यादा शरारती है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं, ये तो बहुत सीधा है।”

     

    उसी समय चंदू एक रस्सी के पास गया और उसे खींचने लगा।

     

    रस्सी से बंधी छोटी टोकरी नीचे गिर गई।

     

    धड़ाम!

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    फिर हँस पड़े।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ऐसा नहीं करते।”

     

    चंदू ने कान हिलाए।

     

    कान्हा बोले—

     

    “समझ गए?”

     

    चंदू फिर रस्सी सूँघने लगा।

     

    कान्हा ने सिर पकड़ लिया।

     

    “तुम तो मेरी बात सुनते ही नहीं।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया रसोई में आटा गूँध रही थीं।

     

    उन्होंने बच्चों की हँसी सुनी तो बाहर देखा।

     

    “कान्हा, अंदर मत आना। मैं काम कर रही हूँ।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं अंदर नहीं आऊँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और चंदू को भी अंदर मत आने देना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    लेकिन जैसे ही यशोदा अंदर गईं, चंदू उनकी ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू, उधर नहीं जाना।”

     

    चंदू ने दो कदम पीछे किए।

     

    फिर अचानक मुड़ा और रसोई की तरफ चल पड़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “अरे! रुको!”

     

    चंदू रसोई के दरवाजे तक पहुँच गया।

     

    कान्हा ने उसे रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन चंदू बहुत तेज था।

     

    वह सीधे अंदर चला गया।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “अरे!”

     

    चंदू आटे के पास पहुँच चुका था।

     

    उसने अपना मुँह आटे वाले बर्तन के पास किया।

     

    कान्हा चिल्लाए—

     

    “चंदू! नहीं!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    चंदू ने बर्तन को हल्का सा धक्का दिया।

     

    बर्तन हिल गया और थोड़ा आटा नीचे गिर गया।

     

    यशोदा ने जल्दी से बर्तन पकड़ लिया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “मैया, मैंने इसे रोका था।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन ये अंदर आया कैसे?”

     

    कान्हा चुप।

     

    तभी चंदू ने अपनी पूँछ हिलाई और पीछे हटते हुए आटे पर पैर रख दिया।

     

    उसके पैरों के निशान पूरे फर्श पर बन गए।

     

    कान्हा उन्हें देखकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कान्हा ने हँसी रोकने की कोशिश की।

     

    “थोड़ी।”

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    “अब इसे बाहर ले जाओ।”

     

    कान्हा चंदू को बाहर ले गए।

     

    लेकिन चंदू की शरारत अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    आँगन में रखी एक टोकरी में सूखी घास थी।

     

    चंदू उसमें मुँह डालकर घास खींचने लगा।

     

    कुछ ही पल में पूरी घास बाहर बिखर गई।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो बिल्कुल तुम्हारी तरह है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरी तरह क्यों?”

     

    “जहाँ देखो वहाँ शरारत।”

     

    कान्हा ने चंदू को देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “लेकिन इसकी शरारतें बहुत मजेदार हैं।”

     

    तभी चंदू ने फिर दौड़ लगा दी।

     

    इस बार वह सीधे आँगन में रखे पानी के बड़े बर्तन की तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “चंदू! वहाँ मत जाना!”

     

    चंदू ने बर्तन को सूँघा।

     

    फिर पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “चलो, इस बार बच गए।”

     

    लेकिन अचानक चंदू ने अपना सिर बर्तन से टकरा दिया।

     

    बर्तन थोड़ा हिला और पानी बाहर छलक गया।

     

    कान्हा के पैर भीग गए।

     

    दोस्त जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो तुमने हद कर दी!”

     

    चंदू मासूम बनकर उन्हें देखने लगा।

     

    कान्हा उसका चेहरा देखकर खुद भी हँस पड़े।

     

    दोपहर में नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने आँगन में बिखरी घास, पानी और आटे के निशान देखे।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज यहाँ क्या हुआ?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपके नए बछड़े ने पूरा घर उलट-पुलट कर दिया।”

     

    नंद बाबा ने चंदू को देखा।

     

    “इतना शरारती?”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “बाबा, ये बहुत अच्छा है। बस इसे सब चीजों को छूने की आदत है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें तो अच्छा दोस्त मिल गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने चंदू के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “लेकिन इसे धीरे-धीरे समझाना होगा कि क्या करना है और क्या नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिखाऊँगा।”

     

    शाम को कान्हा ने एक खेल बनाया।

     

    उन्होंने चंदू के सामने तीन चीजें रखीं—घास, लकड़ी और एक फूल।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू, घास खानी है।”

     

    चंदू ने घास खा ली।

     

    कान्हा खुश हुए।

     

    “बहुत अच्छे!”

     

    फिर उन्होंने लकड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे नहीं खाना।”

     

    चंदू ने लकड़ी सूँघी और आगे बढ़ गया।

     

    कान्हा ने ताली बजाई।

     

    “शाबाश!”

     

    दोस्तों ने कहा—

     

    “देखो, कान्हा इसे पढ़ा रहे हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। इसे भी तो सीखना है।”

     

    कुछ देर बाद चंदू फूल की तरफ बढ़ा।

     

    कान्हा ने उसे रोक दिया।

     

    “ये नहीं। ये खेलने के लिए है।”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने खुशी से उसकी गर्दन सहलाई।

     

    “तुम सीख रहे हो!”

     

    यशोदा दूर से यह सब देख रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “देखिए, हमारा कान्हा खुद कितना शरारती है, लेकिन चंदू को समझा रहा है।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “शायद दूसरों को समझाते-समझाते खुद भी बहुत कुछ सीख रहा है।”

     

    रात को कान्हा चंदू के पास बैठे।

     

    उन्होंने उसके गले की छोटी सी घंटी को हाथ से छुआ।

     

    टन…

     

    छोटू भी पास खड़ा था।

     

    उसकी घंटी भी बजने लगी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “अब तो मेरे पास दो घंटियों वाले दोस्त हैं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “और दोनों तुमसे कम शरारती हैं।”

     

    कान्हा ने उसे देखा।

     

    “तुम मुझे शरारती कह रहे हो?”

     

    दोस्त भागने लगा।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़ पड़े।

     

    आँगन में फिर बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कुछ देर बाद यशोदा ने सबको घर बुलाया।

     

    कान्हा जाने से पहले चंदू के पास गए।

     

    “कल फिर मिलेंगे।”

     

    चंदू ने अपनी छोटी घंटी बजाई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तुमने हाँ कह दिया!”

     

    उस रात कान्हा जल्दी सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    • सुबह जब वे गायों के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू और चंदू दोनों गायों के झुंड से गायब थे।

     

    कान्हा की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “छोटू?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “चंदू?”

     

    दूर कहीं से एक बहुत हल्की घंटी सुनाई दी—

     

    टन…

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “दोनों शायद जंगल की तरफ चले गए हैं।”

     

    और बिना देर किए कान्हा अपने दोस्तों के साथ उनकी तलाश में निकल पड़े।

     

  • बारिश में खोया छोटू

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और बारिश में खोया छोटू

     

    अगली सुबह वृंदावन में आसमान पर बादल छाए हुए थे। हवा ठंडी थी और दूर-दूर तक काले बादल दिखाई दे रहे थे।

     

    कान्हा सुबह उठते ही आँगन में आए। उनकी नजर सबसे पहले गायों के पास गई।

     

    वहाँ छोटू भी खड़ा था।

     

    उसके गले में नंद बाबा की दी हुई नई छोटी घंटी थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उसके पास दौड़कर गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़े ने कान्हा की तरफ देखा और धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो मैया! ये मुझे पहचान गया।”

     

    यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं।

     

    “अब तो तुम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई है।”

     

    कान्हा ने छोटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “हाँ।”

     

    तभी नंद बाबा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “आज बारिश हो सकती है। गायों को बहुत दूर मत ले जाना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ गायों के पीछे-पीछे चल पड़े।

     

    छोटू भी उनके आसपास ही घूम रहा था।

     

    आसमान में बादल और घने होते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज बारिश होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ी बारिश में खेलेंगे।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “अगर बाबा ने सुन लिया तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “हम दूर नहीं जाएँगे।”

     

    वे एक खुले मैदान में पहुँचे।

     

    गायें घास खाने लगीं और बच्चे पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    कान्हा ने बांसुरी निकाली।

     

    धीरे-धीरे बांसुरी की धुन हवा में फैलने लगी।

     

    छोटू कान्हा के पास आकर बैठ गया।

     

    कान्हा ने उसके गले की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अच्छी है ना?”

     

    छोटू ने पूँछ हिलाई।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी पहली बूंद उनके हाथ पर गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    कुछ ही पल में बारिश तेज हो गई।

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे भागकर खड़े हो गए।

     

    गायें भी एक जगह इकट्ठी होने लगीं।

     

    नंद बाबा ने दूर से आवाज लगाई—

     

    “सब बच्चे पास रहो!”

     

    कान्हा ने जवाब दिया—

     

    “जी बाबा!”

     

    तेज बारिश में कुछ दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों को गिनना शुरू किया।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    सभी बच्चे थे।

     

    फिर उन्होंने गायों की तरफ देखा।

     

    कई गायें पास थीं।

     

    लेकिन छोटू दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कान्हा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “छोटू कहाँ है?”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद गायों के बीच होगा।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं है।”

     

    उन्होंने ध्यान से सुना।

     

    बारिश की आवाज के बीच कोई घंटी सुनाई नहीं दे रही थी।

     

    कान्हा घबरा गए।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    उन्होंने फिर आवाज लगाई—

     

    “छोटू!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बारिश बहुत तेज है। अभी बाहर मत जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन छोटू अकेला है।”

     

    नंद बाबा भी गायों को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे।

     

    कान्हा उनके पास दौड़कर पहुँचे।

     

    “बाबा, छोटू नहीं मिल रहा।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत आसपास देखा।

     

    “कहाँ था आखिरी बार?”

     

    “मेरे पास। फिर बारिश शुरू हुई और वो गायों के बीच चला गया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तुम यहाँ रहो। मैं देखता हूँ।”

     

    लेकिन कान्हा बोले—

     

    “मैं भी चलूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बारिश बहुत तेज है।”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “बाबा, वो डर गया होगा।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा को अपने पास रखा।

     

    “ठीक है। लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “तुम सब भी चलोगे?”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    नंद बाबा आगे और बच्चे पीछे चलने लगे।

     

    उन्होंने रास्ते में घंटी की आवाज सुनने की कोशिश की।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि कुछ साफ नहीं सुनाई दे रहा था।

     

    कान्हा बार-बार आवाज लगाते—

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं आता।

     

    तभी कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “रुको!”

     

    सब रुक गए।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहे।

     

    फिर बहुत हल्की आवाज आई—

     

    टन…

     

    कान्हा की आँखें खुल गईं।

     

    “सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “घंटी!”

     

    उन्होंने आवाज की दिशा में दौड़ना शुरू किया।

     

    नंद बाबा भी उनके पीछे गए।

     

    थोड़ी दूर एक झाड़ी के पीछे छोटू खड़ा था।

     

    उसका एक पैर कीचड़ में फँस गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर तुरंत उसके पास बैठ गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़ा घबराकर आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “डरो मत। मैं आ गया।”

     

    नंद बाबा ने सावधानी से उसका पैर कीचड़ से बाहर निकाला।

     

    छोटू आजाद होते ही कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसे गले से लगा लिया।

     

    “तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गए थे?”

     

    छोटू ने धीरे से आवाज की।

     

    एक दोस्त हँसते हुए बोला—

     

    “लगता है ये भी तुम्हें जवाब दे रहा है।”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी को देखा।

     

    वह कीचड़ से भर गई थी।

     

    कान्हा ने अपने कपड़े के एक साफ हिस्से से घंटी साफ की।

     

    टन…

     

    आवाज फिर सुनाई दी।

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “अब मैं तुम्हें फिर कभी खोने नहीं दूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “कान्हा, किसी की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होता। उसके लिए ध्यान रखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं रखूँगा।”

     

    बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।

     

    सब लोग गायों के साथ वापस चल पड़े।

     

    छोटू इस बार कान्हा के बिल्कुल पास चल रहा था।

     

    हर कुछ कदम बाद उसकी घंटी बजती।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हर बार पीछे मुड़कर उसे देखते।

     

    नंद बाबा यह देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया दौड़कर बाहर आईं।

     

    “कान्हा! तुम इतने भीग क्यों गए?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, छोटू खो गया था।”

     

    यशोदा ने पहले कान्हा को देखा, फिर छोटू को।

     

    “मिल गया?”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ!”

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “मैं तो डर गई थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी घंटी सुनाई दी थी।”

     

    उन्होंने घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा हुआ इसे घंटी मिल गई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। अब ये खोएगा नहीं।”

     

    यशोदा ने कान्हा के गीले बाल पोंछे।

     

    “लेकिन तुम भी तोगए थे बारिश में।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “छोटू अकेला था।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “दूसरों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अगली बार बाबा के साथ ही जाऊँगा।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “यही समझदारी है।”

     

    उस शाम बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की धूप निकल आई थी।

     

    कान्हा छोटू के पास बैठकर उसकी घंटी सुन रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, अब तुम्हें बारिश से डर नहीं लगता?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बारिश से नहीं। बस छोटू खो जाए तो डर लगता है।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हें सच में इसकी बहुत चिंता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्त की चिंता तो करनी ही चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने अपनी बांसुरी उठाई और धीरे-धीरे बजाने लगे।

     

    छोटू उनके पास बैठा रहा।

     

    गायें भी शांत थीं।

     

    वृंदावन की गीली मिट्टी से खुशबू आ रही थी।

     

    यशोदा दूर खड़ी यह सब देख रही थीं।

     

    उनके मन में एक ही बात आई—

     

    उनका नन्हा कान्हा भले ही शरारती हो, लेकिन उसके दिल में अपने हर दोस्त के लिए बहुत गहरा प्यार था।

     

    रात को कान्हा सोने से पहले फिर छोटू की बात करने लगे।

     

    “मैया, कल मैं उसके लिए कुछ अच्छा करूँगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उसके लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “क्या छोटू भी मुझे अपना दोस्त मानता होगा?”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “जिसके लिए तुम बारिश में उसे ढूँढ़ने निकल पड़े, वो तुम्हें दोस्त क्यों नहीं मानेगा?”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    अगली सुबह उन्होंने सच में छोटू के लिए फूलों की एक छोटी माला बनाई।

     

    लेकिन जब वह माला लेकर छोटू के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू अकेला नहीं था।

     

    उसके पास एक नन्हा सफेद बछड़ा खड़ा था।

     

    और वह बछड़ा कान्हा को देखते ही उनके पास दौड़ पड़ा।

     

    कान्हा हैरान होकर बोले—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराकर बोले—

     

    “छोटू का नया दोस्त।”

     

    कान्हा ने दोनों बछड़ों को देखा और खुशी से बोले—

     

    “अब हमारे पास दो दोस्त हैं!”

     

    लेकिन कान्हा को क्या पता था कि नया बछड़ा इतना शरारती था कि अगले ही दिन वह नंद भवन की रसोई में घुसकर सारा आटा बिखेरने वाला था।

     

    •  
  • कान्हा और बिछड़ा बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और बिछड़ा हुआ बछड़ा

     

    अगली सुबह कान्हा सूरज निकलने से पहले ही उठ गए। आज उनके लिए खास दिन था, क्योंकि नंद बाबा ने उन्हें पहली बार गायों के साथ खुले मैदान तक चलने की अनुमति दी थी।

     

    कान्हा उठते ही यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    “मैया! उठो ना!”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “क्या हुआ कान्हा?”

     

    “आज मैं बाबा के साथ गायों को चराने जाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे याद है। लेकिन इतनी सुबह से इतनी खुशी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं गायों की घंटियाँ सुनूँगा, उनके साथ चलूँगा और उनकी देखभाल भी करूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके बाल सँवारे और कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन बाबा की बात मानना। बहुत दूर मत जाना।”

     

    “पक्का!”

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को लेकर घर से निकले। कान्हा उनके साथ थे। उनके पीछे उनके कई दोस्त भी चल पड़े।

     

    रास्ते भर गायों की घंटियाँ बजती रहीं।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा कभी किसी गाय के पास जाते, कभी किसी बछड़े के सिर पर हाथ फेरते।

     

    नंद बाबा उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, आज तो तुम बिल्कुल बड़े ग्वाले जैसे लग रहे हो।”

     

    कान्हा ने गर्व से कहा—

     

    “मैं बड़ा होकर भी गायों की देखभाल करूँगा।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “और माखन?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “माखन भी खाऊँगा।”

     

    सब बच्चे हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे एक बड़े हरे मैदान में पहुँचे। वहाँ घास बहुत अच्छी थी। गायें अलग-अलग जगह फैलकर घास खाने लगीं।

     

    नंद बाबा ने बच्चों से कहा—

     

    “तुम सब यहीं रहना। गायों को बहुत दूर मत जाने देना।”

     

    सभी ने कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी निकालने लगे।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे धुन बजानी शुरू की।

     

    गायों की घंटियाँ और बांसुरी की आवाज मिलकर बहुत प्यारी लग रही थी।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने बांसुरी रोक दी।

     

    उन्हें लगा जैसे कोई आवाज कर रहा है।

     

    “माँ… माँ…”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    आवाज बहुत हल्की थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से पूछा—

     

    “तुमने कुछ सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा फिर चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    कान्हा तुरंत खड़े हो गए।

     

    “कोई बछड़ा अपनी माँ को बुला रहा है।”

     

    वह आवाज की दिशा में चल पड़े।

     

    दो दोस्त उनके साथ हो लिए।

     

    थोड़ी दूर झाड़ियों के पीछे उन्हें एक छोटा सा बछड़ा दिखाई दिया।

     

    वह अकेला खड़ा था और बार-बार अपनी माँ की तरफ देखने की कोशिश कर रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे रह गए?”

     

    बछड़ा धीरे से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “डरो मत। हम तुम्हारी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ दूसरी तरफ चली गई होगी।”

     

    कान्हा ने मैदान की तरफ देखा।

     

    बहुत सारी गायें थीं।

     

    “हमें पहचानना होगा कि इसकी माँ कौन है।”

     

    उन्होंने बछड़े को ध्यान से देखा।

     

    उसके गले में कोई घंटी नहीं थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चलो, इसे धीरे-धीरे गायों के पास ले चलते हैं।”

     

    वे बछड़े को लेकर मैदान की ओर लौटे।

     

    जैसे ही बछड़ा गायों के पास पहुँचा, वह एक दिशा में तेजी से बढ़ने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! इसे पता है इसकी माँ कहाँ है।”

     

    बछड़ा एक सफेद गाय के पास पहुँचा।

     

    लेकिन गाय ने उसे देखकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

     

    बछड़ा फिर दूसरी तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे चलते रहे।

     

    अचानक वह एक भूरे रंग की गाय के पास जाकर रुक गया।

     

    गाय ने जैसे ही बछड़े को देखा, वह उसकी तरफ बढ़ी।

     

    बछड़ा खुशी से अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त खुशी से बोले—

     

    “सच में इसकी माँ मिल गई!”

     

    कान्हा ने गाय के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम इसे छोड़कर इतनी दूर क्यों चली गई थीं?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए थे।

     

    उन्होंने पूरा दृश्य देखा।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता चला कि ये अपनी माँ से बिछड़ गया है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसकी आवाज सुनाई दी थी। ये अपनी माँ को बुला रहा था।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से कहा—

     

    “तुमने बहुत अच्छा किया।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, अगर कोई छोटा अपने घरवालों से बिछड़ जाए तो उसे ढूँढ़ना चाहिए ना?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “बिल्कुल।”

     

    कान्हा कुछ देर उस बछड़े को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “अब इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “आज से तुम इसकी भी देखभाल करना।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने बछड़े को गले लगाने की कोशिश की।

     

    बछड़ा थोड़ा पीछे हट गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अरे, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”

     

    कुछ देर बाद बछड़ा खुद कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “अब डरना नहीं।”

     

    दोपहर को बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे।

     

    कान्हा ने अपनी पोटली खोली।

     

    उसमें यशोदा मैया ने रोटी और थोड़ा मक्खन रखा था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मुझे भी थोड़ा दो।”

     

    कान्हा ने रोटी का टुकड़ा उसे दे दिया।

     

    फिर दूसरे दोस्त को भी दिया।

     

    थोड़ी देर में कान्हा के पास बहुत कम खाना बचा।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम खुद क्या खाओगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरे पास अभी भी है।”

     

    उन्होंने आखिरी टुकड़ा उठाया।

     

    तभी वही छोटा बछड़ा उनके पास आ गया।

     

    वह कान्हा को देखने लगा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें भी चाहिए?”

     

    उन्होंने रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसे नहीं दिया, बल्कि पास की घास की ओर इशारा किया।

     

    “तुम ये खाओ। ये तुम्हारे लिए है।”

     

    बछड़ा घास खाने लगा।

     

    कान्हा उसे देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    शाम होने लगी।

     

    नंद बाबा ने गायों को वापस इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    सभी बच्चे अपने-अपने दोस्तों के साथ चल पड़े।

     

    लेकिन अचानक कान्हा ने पीछे देखा।

     

    वही छोटा बछड़ा फिर से पीछे रह गया था।

     

    कान्हा दौड़कर उसके पास गए।

     

    “चलो, घर चलते हैं।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उनके पीछे चलने लगा।

     

    रास्ते में उसकी घंटी नहीं बज रही थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा, इसके लिए भी घंटी लगवा दो।”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि अगर ये फिर पीछे रह जाए तो हमें इसकी आवाज सुनाई दे।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। कल इसके लिए एक छोटी घंटी ले आएँगे।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “फिर मैं इसकी घंटी सबसे पहले सुनूँगा।”

     

    शाम को नंद भवन पहुँचते ही यशोदा मैया बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को देखा।

     

    “आज दिन कैसा रहा?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा!”

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने बछड़े की पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को अपने पास बुलाकर कहा—

     

    “तुमने आज बहुत अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, वो बहुत डर गया था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “किसी को डर में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया, कल उसके लिए घंटी आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तो अब तुम्हारा एक नया दोस्त भी बन गया।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ। इसका नाम भी रखेंगे।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या नाम रखोगे?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “छोटू!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “इतना छोटा नाम?”

     

    “हाँ। क्योंकि वो छोटा है।”

     

    रात को कान्हा सोने गए तो उनकी बातें सिर्फ उसी बछड़े के बारे में थीं।

     

    “मैया, कल मैं छोटू को घास खिलाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसकी घंटी बजाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसके साथ दौड़ूँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “और फिर कोई शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने तुरंत मासूम चेहरा बनाया।

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारे इस ‘नहीं’ पर मुझे भरोसा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में उनकी आँखें बंद हो गईं।

     

    लेकिन अगले दिन जब छोटू के गले में नई घंटी बाँधी गई, तो कान्हा ने देखा कि घंटी की आवाज बाकी सभी घंटियों से अलग थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मैं तुम्हें भीड़ में भी पहचान लूँगा।”

     

    छोटू ने अपनी छोटी सी पूँछ हिलाई।

     

    और शायद वह भी समझ गया था कि वृंदावन में उसे एक ऐसा दोस्त मिल गया है जो उसकी छोटी-सी आवाज भी सुन लेता है।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा और छोटू के सामने एक नई मुसीबत आने वाली थी—वृंदावन की तेज बारिश में छोटू अचानक गायों के झुंड से अलग हो जाएगा।

     

    और उसे ढूँढ़ने के लिए कान्हा अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे दोस्तों के साथ निकल पड़ेंगे।