नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और जंगल में खोए छोटे दोस्त
सुबह का समय था। वृंदावन की गलियों में अभी पूरी तरह चहल-पहल शुरू भी नहीं हुई थी, लेकिन कान्हा के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
वह गायों के बीच बार-बार छोटू और चंदू को ढूँढ़ रहे थे।
“छोटू!”
उन्होंने आवाज लगाई।
फिर बोले—
“चंदू!”
लेकिन दोनों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
नंद बाबा भी आसपास देखने लगे।
“अभी थोड़ी देर पहले तो दोनों यहीं थे।”
कान्हा ने जमीन की तरफ देखा। मिट्टी पर छोटे-छोटे खुरों के निशान बने थे।
उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।
“बाबा, देखो!”
नंद बाबा उनके पास आए।
“ये निशान जंगल की तरफ जा रहे हैं।”
कान्हा तुरंत बोले—
“हमें उन्हें ढूँढ़ना होगा।”
नंद बाबा ने कहा—
“हाँ, लेकिन अकेले नहीं जाना।”
कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।
“हम सब साथ चलेंगे।”
नंद बाबा ने कुछ बड़े लड़कों को भी उनके साथ भेज दिया।
कान्हा रास्ते भर छोटे-छोटे निशान देखते जा रहे थे।
एक दोस्त ने पूछा—
“तुम्हें सच में समझ आ रहा है कि ये किसके निशान हैं?”
कान्हा मुस्कुराए।
“छोटू के निशान छोटे हैं और चंदू के थोड़ा गोल।”
दोस्त हैरान होकर बोला—
“तुम्हें ये सब कैसे पता?”
कान्हा ने कहा—
“दोस्तों को पहचानने के लिए हमेशा नाम की जरूरत नहीं होती।”
सब बच्चे मुस्कुरा दिए।
कुछ दूर जाने पर उन्हें झाड़ियों के पास घास टूटी हुई दिखाई दी।
कान्हा नीचे बैठ गए।
उन्होंने घास को देखा।
“यहाँ दोनों रुके थे।”
एक दोस्त ने पूछा—
“फिर कहाँ गए?”
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
तभी दूर से बहुत हल्की आवाज आई।
टन…
कान्हा खड़े हो गए।
“घंटी!”
सभी बच्चे चुप हो गए।
कुछ पल बाद फिर आवाज आई।
टन… टन…
कान्हा उस दिशा में दौड़ पड़े।
“छोटू!”
लेकिन वहाँ पहुँचने पर कोई नहीं मिला।
सिर्फ एक पेड़ की शाखा पर घंटी की आवाज जैसी हल्की टकराहट हो रही थी।
एक दोस्त ने कहा—
“शायद हवा से आवाज आई थी।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“नहीं। मुझे लगा जैसे कोई हिला था।”
वे आगे बढ़े।
जंगल का रास्ता थोड़ा घना हो गया था।
कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—
“सब साथ रहना। कोई अकेला आगे मत जाना।”
कुछ दूर चलने के बाद उन्हें मिट्टी पर ताजे खुरों के निशान दिखाई दिए।
कान्हा खुशी से बोले—
“ये वही हैं!”
वे निशानों के पीछे चलने लगे।
अचानक सामने एक छोटी सी ढलान आई।
नीचे घनी घास थी।
वहीं से आवाज आई—
“माँ…”
कान्हा चौंक गए।
“ये तो छोटू की आवाज है!”
उन्होंने नीचे देखा।
छोटू एक झाड़ी के पास खड़ा था।
वह सुरक्षित था, लेकिन उसके आगे एक छोटी लकड़ी रास्ते में पड़ी थी और वह आगे नहीं जा पा रहा था।
कान्हा नीचे उतर गए।
“अरे छोटू! तुम यहाँ क्यों आ गए?”
छोटू कान्हा के पास आ गया।
कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“तुमने हमें कितना परेशान किया।”
छोटू ने धीरे से घंटी बजाई।
टन…
कान्हा हँस पड़े।
“अब क्या सफाई दे रहे हो?”
उन्होंने आसपास देखा।
“लेकिन चंदू कहाँ है?”
छोटू की तरफ देखते ही कान्हा समझ गए कि वह किसी दूसरी दिशा में देख रहा है।
कान्हा ने कहा—
“क्या चंदू उधर गया है?”
छोटू आगे बढ़ा।
कान्हा उसके पीछे चल पड़े।
कुछ ही दूरी पर उन्हें एक अजीब सी आवाज सुनाई दी।
“माँ… माँ…”
इस बार आवाज थोड़ी घबराई हुई थी।
कान्हा तेज कदमों से आगे बढ़े।
एक बड़े पेड़ के पीछे चंदू खड़ा था।
उसके सामने जमीन पर गिरी हुई बेलें थीं। शायद वह खेलते-खेलते वहाँ पहुँच गया था और रास्ता उलझा हुआ देखकर रुक गया था।
कान्हा उसके पास पहुँचे।
“चंदू!”
चंदू कान्हा को देखकर तुरंत उनकी तरफ आया।
कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तुम भी यहीं थे!”
एक दोस्त बोला—
“दोनों हमें बहुत दूर तक ले आए।”
कान्हा हँसे।
“लेकिन मिल तो गए।”
उन्होंने दोनों बछड़ों को अपने पास खड़ा किया।
“अब कोई कहीं नहीं जाएगा।”
दोनों बछड़े जैसे कान्हा की बात समझ गए।
वापस लौटते समय अचानक आसमान में बादल घिरने लगे।
एक दोस्त ने ऊपर देखा।
“फिर बारिश आने वाली है।”
कान्हा ने कहा—
“हमें जल्दी चलना होगा।”
सब बच्चे और बछड़े तेजी से लौटने लगे।
लेकिन रास्ते में चंदू एक रंग-बिरंगे फूल के पास रुक गया।
उसने फूल सूँघा।
कान्हा बोले—
“चंदू, अभी फूल नहीं। घर चलो।”
चंदू वहीं खड़ा रहा।
कान्हा ने उसका सिर सहलाया।
“अगर हम देर करेंगे तो मैया चिंता करेंगी।”
चंदू ने आखिरकार कदम बढ़ाया।
रास्ते में कान्हा ने छोटू और चंदू को बीच में रखा और दोस्तों को दोनों तरफ चलने को कहा।
कुछ देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं।
लेकिन इस बार सब सुरक्षित थे।
जब वे गाँव पहुँचे तो यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी थीं।
कान्हा को देखते ही उन्होंने राहत की साँस ली।
“कहाँ चले गए थे तुम लोग?”
कान्हा ने छोटू और चंदू की तरफ इशारा किया।
“ये दोनों जंगल में चले गए थे।”
यशोदा ने दोनों बछड़ों को देखा।
“और तुम इनके पीछे चले गए?”
कान्हा ने धीरे से कहा—
“हाँ।”
यशोदा ने चिंता से पूछा—
“तुम्हें पता है जंगल कितना बड़ा है?”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“पता है मैया।”
यशोदा ने उन्हें अपने पास बुलाया।
“किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन बिना बड़े को बताए ऐसी जगह नहीं जाना चाहिए। अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?”
कान्हा चुप रहे।
फिर बोले—
“मुझे माफ कर दो।”
यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।
“बस आगे से ध्यान रखना।”
नंद बाबा भी वहाँ आ गए।
उन्होंने छोटू और चंदू को देखकर कहा—
“अब इन्हें कुछ दिन गाँव के पास ही रखना होगा।”
कान्हा बोले—
“बाबा, मैं इनकी देखभाल करूँगा।”
नंद बाबा मुस्कुराए।
“तुम करोगे, लेकिन अकेले नहीं।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
शाम को बारिश रुक गई।
कान्हा दोनों बछड़ों के साथ आँगन में बैठे थे।
उन्होंने छोटू की घंटी बजाई।
टन…
फिर चंदू की।
टन…
दोनों आवाजें अलग थीं।
कान्हा मुस्कुराए।
“अब मैं दोनों को आँखें बंद करके भी पहचान सकता हूँ।”
एक दोस्त ने पूछा—
“अगर दोनों एक साथ भाग गए तो?”
कान्हा बोले—
“मैं दोनों को पकड़ लूँगा।”
दोस्त हँसने लगा।
“तुम्हें अपने ऊपर बहुत भरोसा है।”
कान्हा भी हँसे।
“दोस्तों को छोड़ना नहीं चाहिए।”
कुछ देर बाद कान्हा ने मिट्टी पर दो छोटे-छोटे चित्र बनाए।
एक छोटू का और दूसरा चंदू का।
उन्होंने दोनों चित्रों के ऊपर फूल रख दिए।
यशोदा ने दूर से पूछा—
“ये क्या बना रहे हो?”
कान्हा बोले—
“अपने दोस्तों का घर।”
यशोदा मुस्कुराईं।
“और इसमें तुम्हारा घर कहाँ है?”
कान्हा ने चित्र के बीच में एक छोटा सा निशान बनाया।
“यहाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं इनके बीच रहूँगा।”
यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।
रात को कान्हा सोने गए तो दोनों बछड़ों की घंटियों की आवाज अभी भी बाहर से सुनाई दे रही थी।
टन… टन…
कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—
“अब तुम दोनों कहीं मत जाना।”
बाहर से जैसे छोटू ने जवाब दिया।
टन…
कान्हा मुस्कुराते हुए सो गए।
लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई परेशानी आने वाली थी।
सुबह-सुबह गाँव की एक गोपी दौड़ती हुई नंद भवन पहुँची।
वह बहुत परेशान थी।
उसने कहा—
“यशोदा! मेरी मटकी से रोज थोड़ा-थोड़ा मक्खन गायब हो रहा है। आज मैंने किसी को घर के पास देखा है।”
कान्हा यह सुन रहे थे।
उनके दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
कान्हा ने धीरे से कहा—
“मुझे लगता है हमें पता लगाना चाहिए कि मक्खन कौन ले जा रहा है।”
दोस्त ने पूछा—
“तुम?”
कान्हा मुस्कुराए।
“नहीं। इस बार हम जासूस बनेंगे।”
और इस तरह शुरू होने वाली थी वृंदावन की सबसे मजेदार मक्खन वाली पहेली।
समाप्त। 🌸

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