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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

पढ़ने का समय : 10 मिनट

एपिसोड – 29 : अपने ही पिता के खिलाफ

 

पुराने रेलवे स्टेशन के बाहर दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स एक साथ जल उठीं।

 

चारों तरफ हथियारबंद लोग खड़े थे।

 

अंदर खड़े आरव, आरोही और अमन को घेर लिया गया था।

 

बाहर से आवाज आई—

 

“आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो, वरना दस मिनट में ये पूरा स्टेशन मलबे में बदल जाएगा!”

 

आरोही ने घबराकर आरव की तरफ देखा।

 

“आरव…”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“डरो मत।”

 

“लेकिन बाहर इतने लोग हैं।”

 

“हम निकल जाएंगे।”

 

अमन जमीन पर बैठा हुआ था। उसके कंधे से अभी भी खून बह रहा था।

 

उसने धीमे से कहा,

 

“हम नहीं निकल पाएंगे।”

 

आरव उसकी तरफ गया।

 

“क्यों?”

 

अमन ने कहा,

 

“क्योंकि बाहर सिर्फ आदमी नहीं हैं।”

 

“तो?”

 

“वहां बम भी हैं।”

 

आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“क्या?”

 

अमन ने खिड़की से बाहर देखा।

 

“मुझे इन लोगों का तरीका पता है।”

 

आरव ने कहा,

 

“तुम्हें कैसे?”

 

अमन हल्का सा मुस्कुराया।

 

“क्योंकि मैं सालों से इनके बीच रहा हूं।”

 

आरव ने पलटकर शेखर को देखा।

 

“पापा…”

 

शेखर चुप थे।

 

आरव उनके पास गया।

 

“आप इन लोगों को जानते हैं?”

 

शेखर ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“ये आपके आदमी हैं?”

 

“हां।”

 

आरव की आंखों में अविश्वास था।

 

“तो ये हमें मारने क्यों आए हैं?”

 

शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“मैंने आपसे पूछा!”

 

शेखर ने धीरे से कहा,

 

“क्योंकि अब मैं उनके लिए भी खतरा बन चुका हूं।”

 

आरव कुछ समझ नहीं पाया।

 

“मतलब?”

 

शेखर ने कहा,

 

“जिस संगठन को मैंने सालों पहले खत्म करने की कोशिश की थी… वो आज फिर खड़ा हो चुका है।”

 

अर्जुन ने हैरानी से पूछा,

 

“कौन-सा संगठन?”

 

शेखर ने कहा—

 

“ब्लैक क्राउन।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“ये क्या है?”

 

शेखर ने कहा,

 

“एक ऐसा संगठन जो पैसे, राजनीति और अपराध के बीच काम करता है।”

 

“और इसका मुखिया?”

 

शेखर ने विराज की तरफ देखा।

 

लेकिन विराज वहां नहीं था।

 

“विराज?”

 

शेखर ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

आरव ने पूछा,

 

“फिर कौन?”

 

शेखर की आंखों में डर उतर आया।

 

“जिसका नाम मैंने पच्चीस साल से किसी के सामने नहीं लिया।”

 

आरव ने कहा,

 

“नाम बताइए।”

 

शेखर ने धीरे से कहा—

 

“सम्राट।”

 

अमन ने अचानक सिर उठाया।

 

“सम्राट?”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

 

“तो वो अभी भी जिंदा है?”

 

आरव ने अमन की तरफ देखा।

 

“तुम उसे जानते हो?”

 

अमन ने कहा,

 

“वही आदमी जिसने मेरी मां की हत्या का आदेश दिया था।”

 

अमन की मुट्ठियां कस गईं।

 

“मैंने सालों तक विराज को दोषी समझा।”

 

“लेकिन असली आदेश सम्राट ने दिया था।”

 

शेखर ने कहा,

 

“हां।”

 

अमन ने पूछा,

 

“तो आपने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?”

 

“क्योंकि तुम बदला लेने के पीछे भागते हुए मर जाते।”

 

अमन हंस पड़ा।

 

“और अब?”

 

“अब तुम्हें सच पता है।”

 

अमन ने कहा,

 

“अब मैं सम्राट को ढूंढूंगा।”

 

आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

 

“पहले तुम्हारा इलाज होगा।”

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम सच में मुझे भाई मानते हो?”

 

आरव ने बिना सोचे कहा,

 

“हां।”

 

अमन की आंखें नम हो गईं।

 

“तो फिर मुझे बचाना।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“तुम्हें मरने नहीं दूंगा।”

 

 

फिर से बाहर से आवाज आई—

 

“पांच मिनट बाकी हैं!”

 

कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

 

“हमें कोई रास्ता निकालना होगा।”

 

आरव ने पूछा,

 

“पीछे का रास्ता?”

 

कबीर ने कहा,

 

“पुरानी सुरंग है।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कहां जाती है?”

 

“रेलवे यार्ड तक।”

 

अमन ने कहा,

 

“वह रास्ता बंद है।”

 

कबीर ने कहा,

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

“मैं कई बार यहां से भाग चुका हूं।”

 

आरव ने कहा,

 

“तो दूसरा रास्ता?”

 

अमन ने कुछ पल सोचा।

 

“एक रास्ता है।”

 

“कहां?”

 

“पुराने कंट्रोल रूम के नीचे।”

 

शेखर अचानक बोले,

 

“नहीं।”

 

सब उनकी तरफ देखने लगे।

 

“वह रास्ता इस्तेमाल नहीं कर सकते।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

शेखर ने कहा,

 

“क्योंकि वहां…”

 

वह रुक गए।

 

“क्या?”

 

“वहां ब्लैक क्राउन का पुराना हथियारघर है।”

 

आरोही ने कहा,

 

“मतलब?”

 

“अगर वहां कोई गोली चली…”

 

शेखर ने कहा,

 

“पूरा स्टेशन उड़ सकता है।”

 

आरव ने चारों तरफ देखा।

 

“तो हमें स्टेशन से बाहर नहीं जाना।”

 

सब उसे देखने लगे।

 

“हमें उन्हें स्टेशन के अंदर बुलाना होगा।”

 

कबीर ने कहा,

 

“तुम पागल हो?”

 

आरव ने कहा,

 

“अगर हम बाहर गए तो वे हमें गोली मार देंगे।”

 

“और अंदर बुलाए तो?”

 

“तब उनके बम हमारे नियंत्रण में होंगे।”

 

आरोही ने कहा,

 

“लेकिन ये बहुत खतरनाक है।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“मैं जानता हूं।”

 

“फिर भी?”

 

“हां।”

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तो मैं भी साथ हूं।”

 

आरव ने कहा,

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डालना चाहता।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“तुम्हें लगता है मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूंगी?”

 

आरव कुछ नहीं बोला।

 

आरोही ने कहा,

 

“हमने तय किया था ना… सच कितना भी खतरनाक हो, साथ जानेंगे।”

 

आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

 

“ठीक है।”

 

कबीर ने अपनी बंदूक उठाई।

 

“मैं बाहर जाऊंगा।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि वो मुझे अपना आदमी समझते हैं।”

 

“और?”

 

“मैं उन्हें गलत दिशा में भेज सकता हूं।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम्हें खुद को खतरे में डालने की जरूरत नहीं।”

 

कबीर मुस्कुराया।

 

“भाई के लिए इतना तो कर सकता हूं।”

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम सच में आरव के दोस्त हो?”

 

कबीर ने कहा,

 

“भाई से ज्यादा।”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“तो जाओ।”

 

कबीर बाहर जाने लगा।

 

आरव ने पीछे से कहा,

 

“कबीर!”

 

कबीर रुका।

 

“वापस आना।”

 

कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

 

“जरूर।”

कबीर ने स्टेशन का दरवाजा खोला और हाथ ऊपर कर दिए।

 

“गोली मत चलाना!”

 

बाहर खड़े लोग उसकी तरफ दौड़े।

 

एक आदमी ने पूछा,

 

“बाकी लोग कहां हैं?”

 

कबीर ने कहा,

 

“अंदर।”

 

“आरव?”

 

“हां।”

 

“अमन?”

 

“वो भी।”

 

“तुम्हें बाहर क्यों भेजा?”

 

कबीर ने कहा,

 

“समझौते के लिए।”

 

वह आदमी हंसा।

 

“समझौता अब नहीं होगा।”

 

कबीर ने कहा,

 

“अगर तुमने स्टेशन उड़ाया तो आरव भी मरेगा और अमन भी।”

 

“हमें वही चाहिए।”

 

कबीर चौंका।

 

“दोनों?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

वह आदमी मुस्कुराया।

 

“क्योंकि दोनों जिंदा रहे तो सम्राट की गद्दी खतरे में है।”

 

कबीर को पहली बार समझ आया—

 

सम्राट आरव और अमन दोनों से डरता था।

 

इधर आरव और आरोही पुराने कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ रहे थे।

 

अमन भी उनके साथ था।

 

शेखर पीछे से चिल्लाए,

 

“आरव!”

 

आरव पलटा।

 

“क्या?”

 

शेखर ने कहा,

 

“अगर तुम वहां जा रहे हो तो ये ले जाओ।”

 

उन्होंने आरव को एक पुरानी चाबी दी।

 

आरव ने पूछा,

 

“ये क्या है?”

 

“सम्राट के हथियारघर की चाबी।”

 

आरव ने हैरानी से कहा,

 

“आपके पास ये कब से है?”

 

“पच्चीस साल से।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“आपने इसे कभी इस्तेमाल क्यों नहीं किया?”

 

शेखर ने कहा,

 

“क्योंकि मुझे डर था कि एक दिन मेरे बच्चों के खिलाफ यही इस्तेमाल होगा।”

 

आरव ने कहा,

 

“अब यही हमारी रक्षा करेगा।”

 

तीनों सुरंग में उतर गए।

 

अंधेरा बहुत गहरा था।

 

आरोही आरव का हाथ पकड़े हुए थी।

 

अमन आगे चल रहा था।

 

अचानक उसने हाथ उठाकर सबको रोक दिया।

 

“रुको।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

अमन ने दीवार पर हाथ रखा।

 

“यहां कैमरा है।”

 

कबीर की आवाज वायरलेस पर आई—

 

“आरव, सुन रहे हो?”

 

“हां।”

 

“मैंने बाहर वालों को कुछ देर रोक लिया है।”

 

“कितना समय?”

 

“लगभग पांच मिनट।”

 

“बहुत है।”

 

अमन ने कहा,

 

“नहीं।”

 

“क्या?”

 

“हमारे पास सिर्फ दो मिनट हैं।”

 

“क्यों?”

 

अमन ने दीवार के नीचे लगा लाल बल्ब दिखाया।

 

“ये बम का संकेत है।”

 

आरोही डर गई।

 

“कितने बम हैं?”

 

अमन ने कहा,

 

“पूरी सुरंग में।”

 

आरव ने पूछा,

 

“उन्हें निष्क्रिय कैसे करेंगे?”

 

अमन ने कहा,

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तो?”

 

अमन मुस्कुराया।

 

“लेकिन मेरी मां जानती थी।”

 

 

अमन ने अपनी जेब से एक छोटा कागज निकाला।

 

“ये मुझे आज से दस साल पहले मिला था।”

 

आरव ने उसे लिया।

 

उस पर एक नक्शा बना था।

 

नक्शे में सुरंग और एक छोटा कमरा दिखाया गया था।

 

आरोही ने कहा,

 

“यहां!”

 

“क्या?”

 

“ये कमरा।”

 

“हां।”

 

“इसके नीचे कुछ लिखा है।”

 

आरव ने ध्यान से देखा।

 

नीचे लिखा था—

 

“जहां पहला सच दफन है, वहीं आखिरी रास्ता खुलेगा।”

 

अमन ने कहा,

 

“पहला सच?”

 

आरव ने सोचा।

 

“कमरा नंबर 17?”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

आरोही ने अचानक कहा,

 

“अस्पताल!”

 

आरव उसकी तरफ मुड़ा।

 

“क्या?”

 

“तुम दोनों का जन्म अस्पताल में हुआ था।”

 

अमन की आंखें फैल गईं।

 

“पुराना सिटी अस्पताल…”

 

आरव ने कहा,

 

“वही जगह जहां सिया मरी थी।”

 

अमन ने कहा,

 

“और जहां हमारे जन्म के रिकॉर्ड बदले गए थे।”

 

तभी सुरंग में अचानक स्पीकर चालू हो गया।

 

एक भारी आवाज गूंजी—

 

“बहुत होशियार हो गए हो तुम लोग।”

 

आरव रुक गया।

 

“कौन?”

 

आवाज आई—

 

“जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

 

आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

 

“सम्राट?”

 

आवाज में हंसी थी।

 

“आखिरकार तुमने मेरा नाम तो लिया।”

 

आरव ने कहा,

 

“सामने आओ।”

 

“इतनी जल्दी क्या है?”

 

“तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद की।”

 

“नहीं आरव।”

 

आवाज शांत थी।

 

“तुम्हारी जिंदगी मैंने नहीं… तुम्हारे पिता ने बर्बाद की।”

 

आरव चौंक गया।

 

“मेरे पिता?”

 

“हां।”

 

शेखर की आवाज पीछे से आई—

 

“सम्राट, चुप हो जाओ।”

 

सम्राट हंसा।

 

“शेखर, अब सच छुपाने का समय खत्म हो गया है।”

 

आरव ने कहा,

 

“क्या सच?”

 

सम्राट बोला—

 

“तुम्हारे पिता ने ही सिया को मरने के लिए छोड़ा था।”

 

अमन का चेहरा बदल गया।

 

“झूठ!”

 

सम्राट ने कहा,

 

“अगर यकीन नहीं है तो पुराने सिटी अस्पताल के तहखाने में जाना।”

 

“वहां तुम्हें सिया की आखिरी रिकॉर्डिंग मिलेगी।”

 

अमन कांपने लगा।

 

“मेरी मां की?”

 

“हां।”

 

सम्राट ने कहा—

 

“और उस रिकॉर्डिंग में सिया ने खुद बताया है कि उसकी मौत के लिए जिम्मेदार कौन था।”

 

अमन ने आरव की तरफ देखा।

 

आरव की आंखों में भी बेचैनी थी।

 

तभी सम्राट की आवाज फिर आई—

 

“और आरव… उस रिकॉर्डिंग में तुम्हारे बारे में भी एक ऐसा सच है, जिसे सुनने के बाद तुम खुद अपने पिता से नफरत करने लगोगे।”

 

स्पीकर बंद हो गया।

 

सुरंग में फिर सन्नाटा छा गया।

 

अमन ने मुट्ठी कस ली।

 

“हम अस्पताल जाएंगे।”

 

आरव ने कहा,

 

“हां।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“लेकिन पहले ये बम?”

 

अमन ने लाल बल्ब की तरफ देखा।

 

“अगर हम दो मिनट में इसे नहीं रोक पाए…”

 

वह रुक गया।

 

आरव ने पूछा,

 

“तो?”

 

अमन ने कहा—

 

“तो पुराने रेलवे स्टेशन के साथ हम सब भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।”

 

और उसी पल…

 

घड़ी में सिर्फ 01:59 मिनट बाकी थे।

 

जारी रहेगा…

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