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दरवाजे पर कोई है

पढ़ने का समय : 6 मिनट

दरवाजे पर कोई है

 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। बिजली बार-बार चमकती और फिर पूरा घर अंधेरे में डूब जाता।

 

सिया अपने कमरे में बैठी खिड़की से बारिश देख रही थी। उसके माता-पिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे और आज उसे घर में अकेले ही रहना था।

 

अचानक—

 

ठक… ठक… ठक…

 

सिया चौंक गई।

 

उसने घड़ी की तरफ देखा।

 

ग्यारह बजकर सात मिनट।

 

इतनी रात को कौन आया होगा?

 

उसने कुछ देर तक आवाज को नजरअंदाज किया।

 

फिर वही आवाज आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

इस बार पहले से थोड़ी तेज।

 

सिया धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

 

“कौन है?”

 

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

 

सिया कुछ पल दरवाजे के पास खड़ी रही।

 

फिर उसने दोबारा पूछा, “कौन है दरवाजे पर?”

 

सन्नाटा।

 

सिर्फ बारिश की आवाज।

 

सिया ने दरवाजे की झिरी से बाहर देखने की कोशिश की, लेकिन बाहर अंधेरा था।

 

उसने फोन उठाया और अपने बड़े भाई आरव को कॉल किया।

 

“भैया…”

 

“हाँ सिया, क्या हुआ?”

 

“दरवाजे पर कोई है।”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

“तुमने दरवाजा तो नहीं खोला?”

 

“नहीं।”

 

“अच्छा किया। पहले देखो बाहर कौन है। अगर पहचान में नहीं आता तो दरवाजा मत खोलना।”

 

सिया ने दरवाजे के पास लगी छोटी सी कैमरा स्क्रीन देखी।

 

स्क्रीन पर कोई नहीं था।

 

“भैया, बाहर कोई दिखाई नहीं दे रहा।”

 

“फिर आवाज कहाँ से आ रही है?”

 

सिया के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

 

तभी—

 

ठक… ठक… ठक…

 

इस बार आवाज दरवाजे से नहीं, बल्कि घर के पीछे वाले हिस्से से आई।

 

सिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“भैया… आवाज पीछे से आई है।”

 

“तुम अपने कमरे में जाओ। दरवाजा बंद करो। मैं अभी पड़ोसी को फोन करता हूँ।”

 

सिया जल्दी से अपने कमरे में चली गई।

 

उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गई।

 

कुछ मिनट बीते।

 

फिर फोन की घंटी बजी।

 

आरव का कॉल था।

 

“सिया, पड़ोसी शर्मा अंकल तुम्हारे घर के बाहर पहुँच रहे हैं।”

 

“ठीक है भैया।”

 

सिया ने राहत की साँस ली।

 

लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी दस्तक हुई।

 

टक… टक…

 

सिया का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

वह खिड़की की तरफ देखने लगी।

 

बाहर बारिश थी।

 

और शीशे पर किसी की उँगलियों के निशान दिखाई दे रहे थे।

 

सिया पीछे हट गई।

 

“भैया…”

 

उसने फोन कान से लगाया।

 

“क्या हुआ?”

 

“मेरी खिड़की पर भी किसी ने दस्तक दी है।”

 

आरव की आवाज गंभीर हो गई।

 

“खिड़की मत खोलना।”

 

“मैं नहीं खोल रही।”

 

तभी बाहर से एक धीमी आवाज आई।

 

“सिया…”

 

सिया के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

 

उस आवाज ने उसका नाम लिया था।

 

“भैया… किसी ने मेरा नाम लिया।”

 

“किसने?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

फिर वही आवाज आई।

 

“सिया… दरवाजा खोलो।”

 

सिया की आँखों में डर भर गया।

 

लेकिन तभी उसे कुछ अजीब लगा।

 

वह आवाज बाहर से नहीं, बल्कि घर के अंदर से आती हुई लग रही थी।

 

सिया धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

 

“सिया, बाहर मत जाना!” आरव फोन पर चिल्लाया।

 

लेकिन सिया रुक नहीं सकी।

 

आवाज उसे नीचे वाले कमरे की तरफ ले जा रही थी।

 

वहाँ एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी, जिसे उसके पिता हमेशा बंद रखते थे।

 

अचानक अलमारी के अंदर से आवाज आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

सिया कुछ कदम पीछे हट गई।

 

“भैया…”

 

“क्या हुआ?”

 

“आवाज अलमारी के अंदर से आ रही है।”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला, “उस अलमारी को मत खोलना।”

 

सिया ने पूछा, “लेकिन अंदर कोई है तो?”

 

“शर्मा अंकल आने वाले हैं। उनके आने तक इंतजार करो।”

 

तभी बाहर मुख्य दरवाजे पर तेज दस्तक हुई।

 

धड़ाम! धड़ाम!

 

सिया घबरा गई।

 

फिर एक आवाज आई—

 

“सिया! दरवाजा खोलो!”

 

सिया ने आवाज पहचानी।

 

“शर्मा अंकल?”

 

“हाँ बेटी, जल्दी दरवाजा खोलो।”

 

सिया दरवाजे तक पहुँची, लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

 

शर्मा अंकल हमेशा उसे “बेटी” कहते थे।

 

लेकिन इस आवाज में कुछ अजीब था।

 

“अंकल, आप अपना नाम बताइए।”

 

बाहर कुछ देर सन्नाटा रहा।

 

फिर आवाज आई—

 

“मैं… शर्मा हूँ।”

 

सिया और डर गई।

 

“आपका पहला नाम?”

 

फिर चुप्पी।

 

सिया पीछे हट गई।

 

“भैया, ये शर्मा अंकल नहीं हैं।”

 

आरव ने तुरंत कहा, “दरवाजा बिल्कुल मत खोलना।”

 

तभी बाहर से आवाज बदल गई।

 

“सिया… तुम मुझे पहचानती नहीं?”

 

सिया की आँखें फैल गईं।

 

यह आवाज उसके पिता जैसी थी।

 

वही आवाज।

 

वही बोलने का तरीका।

 

लेकिन उसके पिता को गुजरे तीन साल हो चुके थे।

 

सिया की आँखों में आँसू आ गए।

 

“पापा…?”

 

आरव ने फोन पर कहा, “सिया! उसकी बात मत सुनो।”

 

बाहर से फिर आवाज आई—

 

“बेटा, दरवाजा खोलो।”

 

सिया कुछ पल के लिए भावुक हो गई।

 

लेकिन तभी उसे पिता की एक बात याद आई।

 

जब वह छोटी थी, पिता ने उसे समझाया था—

 

“अगर कभी कोई अजनबी मेरी आवाज निकालकर तुम्हें बुलाए, तो उसकी बात पर विश्वास मत करना। पहले कोई ऐसी बात पूछना जो सिर्फ हम दोनों जानते हों।”

 

सिया ने दरवाजे की तरफ देखकर पूछा—

 

“पापा, आपने मुझे मेरी पहली बाँसुरी कब दी थी?”

 

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

 

कुछ सेकंड बाद आवाज आई—

 

“जब तुम दस साल की थीं।”

 

सिया की आँखों से आँसू निकल आए।

 

गलत जवाब।

 

उसे बाँसुरी नौ साल की उम्र में मिली थी।

 

उसे समझ आ गया कि बाहर जो भी था, वह उसके पिता नहीं थे।

 

तभी दूर से किसी गाड़ी की आवाज सुनाई दी।

 

शर्मा अंकल सच में आ गए थे।

 

उन्होंने बाहर से आवाज लगाई—

 

“सिया! मैं हूँ, शर्मा अंकल। पुलिस को भी फोन कर दिया है। दरवाजा मत खोलना, हम बाहर हैं।”

 

कुछ ही देर में पुलिस भी पहुँच गई।

 

बाहर खड़े व्यक्ति को पकड़ लिया गया।

 

पूछताछ में पता चला कि वह घर में चोरी करने की कोशिश कर रहा था। उसे घर के बारे में कुछ जानकारी थी और उसने सिया को डराने के लिए अलग-अलग आवाजें निकालने की कोशिश की थी।

 

सिया ने राहत की साँस ली।

 

कुछ देर बाद आरव भी घर पहुँच गया।

 

उसने सिया को गले लगाया।

 

“तुमने बहुत समझदारी दिखाई।”

 

सिया ने धीरे से कहा, “भैया… अगर पापा की वो बात मुझे याद नहीं आती तो?”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“तो शायद आज कहानी कुछ और होती।”

 

सुबह बारिश रुक चुकी थी।

 

सूरज की हल्की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं।

 

सिया ने घर का दरवाजा खोला।

 

बाहर सब शांत था।

 

वह कुछ देर दरवाजे को देखती रही।

 

फिर मुस्कुराकर बोली—

 

“कल रात दरवाजे पर सच में कोई था…”

 

आरव ने पूछा, “कौन?”

 

सिया ने बाहर देखते हुए कहा—

 

“डर।”

 

आरव चुप रहा।

 

सिया ने आगे कहा—

 

“लेकिन मैंने दरवाजा नहीं खोला। इसलिए डर अंदर नहीं आ पाया।”

 

उस दिन के बाद सिया ने एक बात हमेशा याद रखी—

 

हर दस्तक का जवाब देना जरूरी नहीं होता।

 

कभी-कभी समझदारी यही होती है कि दरवाजा बंद रखा जाए…

 

क्योंकि बाहर कौन है, यह जानने से ज्यादा जरूरी है कि अंदर कौन सुरक्षित है।

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