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चुनरी वाली चुड़ैल

पढ़ने का समय : 6 मिनट

घुटनों तक लटकी चुनरी वाली चुड़ैल

राजपुर गांव में एक ऐसा रास्ता था, जिस पर दिन में भी लोग अकेले जाने से डरते थे।

गांव से बाजार जाने वाला वही रास्ता सबसे छोटा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से लोग उसे छोड़कर लंबा रास्ता अपनाने लगे थे।

क्योंकि उस रास्ते पर दोपहर के समय एक औरत दिखाई देती थी।

लाल चुनरी ओढ़े।

उसकी चुनरी सिर से शुरू होकर घुटनों तक लटकी रहती थी। चेहरा कभी साफ दिखाई नहीं देता था। वह बस धीरे-धीरे सड़क के बीचों-बीच चलती रहती।

और सबसे डरावनी बात यह थी कि…

जिसकी नजर उससे टकराती, उसकी मौत कुछ ही मिनटों में हो जाती।

गांव में इस बात की इतनी दहशत थी कि लोग दोपहर में भी अपनी खिड़कियां बंद रखते।

एक दिन राजपुर का रहने वाला रमेश बाजार से घर लौट रहा था।

उसने दूर सड़क पर एक लाल चुनरी देखी।

वह अचानक रुक गया।

“हे भगवान…”

वह औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

रमेश ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

उसे गांव के बुजुर्गों की बात याद थी।

“उसे देखना मत। उसकी आंखों में आंखें मत डालना।”

रमेश सिर झुकाकर आगे बढ़ने लगा।

तभी पीछे से धीमी आवाज आई।

“रमेश…”

उसके कदम वहीं रुक गए।

उसने पलटकर नहीं देखा।

आवाज फिर आई।

“रमेश…”

इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास से आई।

रमेश का शरीर कांपने लगा।

उसने आंखें बंद कर लीं।

लेकिन तभी सड़क पर उसकी नजर सामने पड़े एक छोटे पत्थर पर गई।

पत्थर के पास लाल चुनरी का एक कोना पड़ा था।

रमेश डर गया।

वह भागने ही वाला था कि सामने से आती हवा में चुनरी थोड़ा ऊपर उठी।

रमेश की नजर अनजाने में उस औरत के चेहरे पर चली गई।

बस कुछ पल के लिए।

उसने दो चमकती हुई आंखें देखीं।

औरत मुस्कुराई।

रमेश के हाथ से सामान गिर गया।

वह पीछे हटने लगा।

“नहीं…”

लेकिन कुछ ही मिनट बाद वह सड़क के किनारे बेहोश होकर गिर पड़ा।

जब गांव वालों ने उसे देखा, तब तक उसकी सांसें थम चुकी थीं।

उस दिन गांव में फिर वही सवाल उठ गया।

आखिर वह चुड़ैल कौन थी?

गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास ने सबको बुलाकर कहा,

“मैंने इस औरत को पहले भी देखा है। बहुत साल पहले।”

लोग चुप हो गए।

हरिदास ने धीरे से कहा,

“करीब बीस साल पहले इसी रास्ते से एक लड़की रोज अपने मायके जाया करती थी। उसका नाम था सुहानी।”

“फिर क्या हुआ था?” किसी ने पूछा।

हरिदास कुछ देर चुप रहा।

“एक दिन वह इसी रास्ते पर गायब हो गई।”

“गायब?”

“हां। उसका कभी पता नहीं चला।”

गांव की चंदा ने पूछा,

“लेकिन उसका चुड़ैल से क्या संबंध है?”

हरिदास ने उसकी ओर देखा।

“यही तो कोई नहीं जानता।”

अगले दिन चंदा की सहेली मीना बाजार जाने के लिए उसी रास्ते पर निकल गई।

चंदा ने उसे रोकते हुए कहा,

“मत जा। दूसरा रास्ता ले ले।”

मीना हंस पड़ी।

“दिन के उजाले में भी डरोगी?”

चंदा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैं मजाक नहीं कर रही।”

मीना ने हाथ छुड़ाया।

“मैं दस मिनट में लौट आऊंगी।”

चंदा उसे जाते हुए देखती रही।

कुछ देर बाद गांव के बाहर से एक बच्चे की चीख सुनाई दी।

“लाल चुनरी!”

चंदा का दिल बैठ गया।

वह दौड़कर बाहर आई।

सड़क बिल्कुल खाली थी।

लेकिन बीच रास्ते पर मीना की चप्पल पड़ी थी।

मीना कहीं नहीं थी।

उस रात गांव में किसी ने खाना नहीं खाया।

हरिदास ने कहा,

“अब हमें उस औरत का सच पता करना ही होगा।”

चंदा ने पूछा,

“कैसे?”

हरिदास ने कहा,

“सुहानी की कहानी से शुरू करेंगे।”

अगली सुबह चंदा और हरिदास गांव के पुराने मंदिर के पीछे बने एक टूटे हुए कमरे में गए।

हरिदास ने मिट्टी से ढका एक पुराना संदूक खोला।

उसमें कुछ पुराने कागज और एक तस्वीर थी।

तस्वीर में एक जवान लड़की खड़ी थी।

सिर पर लाल चुनरी।

चंदा तस्वीर देखते ही सिहर गई।

“यही है…”

हरिदास ने सिर हिलाया।

“सुहानी।”

तभी संदूक के अंदर से एक पुराना कागज नीचे गिरा।

चंदा ने उसे उठाया।

उस पर लिखा था—

“जिस दिन मेरी लाल चुनरी सड़क पर दिखाई दे, समझ लेना मैं सच बताने वापस आ गई हूं।”

चंदा ने घबराकर हरिदास की तरफ देखा।

“इसका मतलब?”

हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसी समय बाहर से पायल की आवाज आई।

छन…

छन…

छन…

दोनों जम गए।

दिन के ठीक बारह बजे थे।

खिड़की से बाहर देखा तो सड़क पर वही लाल चुनरी वाली औरत खड़ी थी।

इस बार वह गांव की तरफ देख रही थी।

हरिदास ने फुसफुसाकर कहा,

“आंखें मत मिलाना।”

चंदा ने धीरे से पूछा,

“अगर हम उसका चेहरा नहीं देखेंगे तो उसे कैसे रोकेंगे?”

हरिदास ने कहा,

“शायद रोकना ही गलत होगा। शायद हमें उसकी बात सुननी होगी।”

अचानक औरत ने हाथ उठाया।

उसकी उंगली गांव के पुराने कुएं की तरफ थी।

फिर वह धीरे-धीरे चलने लगी।

चंदा और हरिदास कुछ दूरी से उसके पीछे चल पड़े।

औरत कुएं के पास जाकर रुक गई।

उसने अपनी लाल चुनरी जमीन पर गिरा दी।

पहली बार उसका चेहरा साफ दिखाई दिया।

वह डरावना नहीं था।

बल्कि उसकी आंखों में गहरा दुख था।

चंदा ने कांपते हुए पूछा,

“तुम सुहानी हो?”

औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

हरिदास की आंखें फैल गईं।

सुहानी ने कुएं की तरफ इशारा किया।

हरिदास अचानक सब समझ गया।

“तुम्हें यहां छिपाया गया था…”

सुहानी की आंखों से आंसू बहने लगे।

चंदा ने पूछा,

“किसने?”

सुहानी ने सड़क की तरफ देखा।

फिर गांव के एक पुराने मकान की ओर इशारा किया।

वह मकान गांव के सबसे अमीर आदमी के परिवार का था।

हरिदास का चेहरा बदल गया।

“नहीं…”

उसी समय पीछे से एक आवाज आई।

“तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?”

दोनों पलटे।

गांव का सरपंच खड़ा था।

सुहानी को देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया।

उसने कांपते हुए कहा,

“इसे देखकर भी तुम जिंदा हो?”

चंदा ने पूछा,

“आप इसे जानते हैं?”

सरपंच पीछे हटने लगा।

“नहीं…”

हरिदास ने उसकी ओर देखा।

“झूठ मत बोलो।”

सरपंच चुप रहा।

तभी सुहानी ने जमीन से लाल चुनरी उठाई और सरपंच के सामने रख दी।

सरपंच कांपने लगा।

“मैंने कुछ नहीं किया था…”

हरिदास चौंका।

“तो फिर किसने किया था?”

सरपंच ने सिर झुका लिया।

“उस समय गांव का जमींदार…”

वह आगे कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली।

सुहानी की चुनरी हवा में लहराई।

सड़क पर अचानक सन्नाटा छा गया।

सरपंच घबराकर पीछे हटने लगा।

लेकिन सुहानी ने उसे छुआ तक नहीं।

बस उसकी ओर देखकर बोली,

“सच बोलो।”

सरपंच की आंखों में डर उतर आया।

उसने सबके सामने पुराना राज खोल दिया।

सुहानी को कभी किसी ने नहीं मारा था।

वह उस रात गांव छोड़कर चली गई थी।

लेकिन जाते समय उसकी लाल चुनरी कुएं के पास गिर गई थी।

लोगों ने उसके गायब होने की कहानी को डर और अफवाहों में बदल दिया।

और वर्षों बाद जब सुहानी की मौत दूसरे शहर में हुई, तब उसकी आखिरी इच्छा थी कि गांव वालों को सच्चाई पता चले।

लेकिन फिर सवाल था—

फिर रास्ते पर दिखाई देने वाली चुड़ैल कौन थी?

हरिदास ने सुहानी की तरफ देखा।

“अगर तुम सुहानी नहीं हो… तो तुम कौन हो?”

लाल चुनरी वाली औरत कुछ पल चुप रही।

फिर उसने अपनी चुनरी उठाई।

हवा में चुनरी लहराई।

और उसके पीछे खड़ी एक दूसरी परछाईं दिखाई दी।

एक और लाल चुनरी।

घुटनों तक लटकी हुई।

चंदा के मुंह से चीख निकल गई।

सुहानी ने धीरे से अपना सिर झुका लिया।

दूसरी परछाईं सड़क की ओर बढ़ने लगी।

हरिदास फुसफुसाया

“अब समझ आया…”

“क्या?”

“सुहानी चुड़ैल नहीं थी…”

वह डरते हुए बोला”वह तो लोगों को असली चुड़ैल से बचाने के लिए यहां आती थी।”

चंदा ने सड़क की ओर देखा।

दूसरी लाल चुनरी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।

और इस बार…उसके पीछे कोई चेहरा नहीं था।

सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

और गांव के रास्ते पर फिर से वही आवाज गूंजी

छन… छन… छन…

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