श्मशान की राख
रात के करीब बारह बजे थे। आसमान पर बादल छाए हुए थे और पूरे गांव में अजीब-सी खामोशी पसरी थी। गांव से थोड़ा दूर नदी के किनारे एक पुराना श्मशान घाट था, जहां रात में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था।
लोग कहते थे कि वहां जलती चिताओं की राख में कुछ ऐसा था, जो मुर्दों की अधूरी इच्छाओं को अपने अंदर समेट लेता था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि अमावस्या की रात उस राख से किसी का नाम पुकारा जाता था।
गांव का बीस साल का लड़का मोहन इन बातों को सिर्फ अंधविश्वास मानता था।
उस रात उसके पिता अचानक बहुत बीमार पड़ गए। गांव में दवा नहीं मिली, इसलिए वैद्य के घर से जरूरी जड़ी-बूटी लेने मोहन को नदी के उस पार जाना पड़ा।
वापसी में उसे श्मशान के पास से होकर गुजरना था।
जैसे ही वह श्मशान के सामने पहुंचा, उसे पीछे से किसी बूढ़े आदमी की आवाज सुनाई दी।
“मोहन…”
मोहन के कदम वहीं रुक गए।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
वहां कोई नहीं था।
उसने खुद को समझाया, “शायद मेरा भ्रम है।”
वह आगे बढ़ने लगा।
फिर आवाज आई।
“मोहन… वापस मत जाना…”
इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।
मोहन ने डरते हुए श्मशान की तरफ देखा। वहां एक पुरानी चिता की राख हल्की-हल्की उड़ रही थी, जबकि हवा बिल्कुल बंद थी।
फिर राख के बीच उसे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।
मोहन धीरे-धीरे उसके पास गया।
वह एक छोटी-सी चांदी की अंगूठी थी।
जैसे ही उसने अंगूठी उठाई, अचानक श्मशान की सारी बुझी चिताओं से राख हवा में उठने लगी।
मोहन घबराकर पीछे हट गया।
राख हवा में घूमते-घूमते एक इंसान जैसी आकृति बनाने लगी।
आकृति ने धीमी आवाज में कहा—
“मेरी बात गांव तक पहुंचा दो…”
मोहन का शरीर डर से कांपने लगा।
“क… कौन हो तुम?”
आकृति ने जवाब दिया—
“जिसे इस श्मशान ने बीस साल से अपने अंदर छिपा रखा है।”
अचानक राख जमीन पर गिर गई और सब कुछ शांत हो गया।
मोहन अंगूठी लेकर भागता हुआ घर पहुंचा।
अगली सुबह उसने गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास से सारी बात बताई।
हरिदास का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।
“तुमने अंगूठी कहां से पाई?”
मोहन ने अंगूठी दिखा दी।
हरिदास की आंखों में डर उतर आया।
“ये अंगूठी रघुवीर की है।”
“कौन रघुवीर?”
हरिदास कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले, “बीस साल पहले गांव में एक आदमी रहता था। उसका नाम रघुवीर था। वह बहुत ईमानदार था। एक रात अचानक उसकी मौत हो गई और उसका अंतिम संस्कार इसी श्मशान में किया गया।”
“तो इसमें डरने वाली क्या बात है?”
हरिदास ने धीमे से कहा, “उसकी मौत स्वाभाविक नहीं थी।”
मोहन चौंक गया।
“क्या मतलब?”
हरिदास ने चारों तरफ देखा और धीरे से कहा—
“रघुवीर ने मरने से कुछ दिन पहले गांव के मुखिया के खिलाफ आवाज उठाई थी। उसे पता चला था कि गांव की जमीनों के कागजों में धोखा किया जा रहा है। उसने सबूत इकट्ठे कर लिए थे।”
“फिर?”
“उसके मरने के बाद सारे सबूत गायब हो गए।”
मोहन को पिछली रात की आवाज याद आ गई।
“क्या रघुवीर की आत्मा अभी भी यहीं है?”
हरिदास ने जवाब नहीं दिया।
उसी रात मोहन फिर श्मशान पहुंचा।
इस बार उसके हाथ में वही चांदी की अंगूठी थी।
जैसे ही उसने अंगूठी राख के पास रखी, अचानक जमीन के नीचे से हल्की आवाज आई।
“पीपल के पेड़ के नीचे…”
मोहन ने सामने पुराने पीपल के पेड़ को देखा।
वहां जमीन थोड़ी उभरी हुई थी।
मोहन ने हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की। कुछ देर बाद उसकी उंगलियां एक लोहे के डिब्बे से टकराईं।
डिब्बे के अंदर पुराने कागज थे।
लेकिन उनमें एक कागज ऐसा था जिसने मोहन के होश उड़ा दिए।
उस पर लिखा था—
“अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो समझ लेना मेरी मौत के पीछे गांव का मुखिया देवकरण है।”
मोहन अगले दिन यह कागज लेकर गांव के लोगों के सामने पहुंचा।
देवकरण ने कागज देखते ही उसे छीनने की कोशिश की।
लेकिन तभी हरिदास आगे आ गए।
“अब बहुत हो चुका।”
देवकरण घबरा गया।
हरिदास ने सबके सामने बताया कि बीस साल पहले रघुवीर ने उसकी जमीन की चोरी का सच पकड़ लिया था। देवकरण ने अपने लोगों की मदद से उसे रास्ते से हटाया और उसकी मौत को हादसा बताया था।
गांव में हड़कंप मच गया।
देवकरण से सवाल होने लगे।
आखिरकार पुराने डर के कारण चुप रहे कुछ लोग भी सच बोलने लगे।
देवकरण का राज खुल गया।
उस रात मोहन फिर श्मशान गया।
आसमान साफ था।
उसने रघुवीर की अंगूठी चिता की राख के पास रख दी।
कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।
फिर हल्की हवा चली।
राख धीरे-धीरे उठी और उसके सामने वही धुंधली आकृति दिखाई दी।
इस बार उसकी आवाज में डर नहीं था।
“सच सामने आ गया… अब मुझे जाने दो।”
मोहन ने सिर झुका दिया।
“तुम्हारा सच गांव तक पहुंच गया है।”
आकृति कुछ पल शांत रही।
फिर हवा में बिखरने लगी।
लेकिन जाते-जाते उसने मोहन से कहा—
“याद रखना… राख कभी झूठ नहीं बोलती। उसमें आग से ज्यादा यादें रहती हैं।”
अगली सुबह श्मशान की सारी राख नदी में बहा दी गई।
उस दिन के बाद गांव में कभी किसी ने रघुवीर की आवाज नहीं सुनी।
लेकिन श्मशान के पास वह पुराना पीपल का पेड़ आज भी खड़ा है।
लोग कहते हैं, अमावस्या की रात अगर कोई वहां से गुजरता है, तो हवा में राख उड़ती हुई दिखाई देती है।
डरने की जरूरत नहीं।
क्योंकि अब उस राख में कोई अधूरी आत्मा नहीं रहती।
बस एक पुरानी कहानी रहती है—
एक ऐसे इंसान की, जिसकी मौत को छिपाया जा सकता था, लेकिन उसकी राख में दबा सच कभी नहीं।

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