एक मधुर धुन
शहर से बहुत दूर, पहाड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—सुरमई। इस गाँव की सबसे खास बात थी वहाँ बहने वाली एक पतली-सी नदी, जिसका पानी पत्थरों से टकराकर ऐसी आवाज करता था जैसे कोई धीमी धुन बजा रहा हो। गाँव के लोग उसे प्यार से “मधुर नदी” कहते थे।
उसी गाँव में सोलह साल की एक लड़की रहती थी—रागिनी। उसके नाम की तरह ही उसके मन में भी संगीत बसा था। वह जब भी उदास होती, नदी के किनारे जाकर बैठ जाती और घंटों पानी की आवाज सुनती रहती।
रागिनी के पास एक पुरानी बाँसुरी थी। वह बाँसुरी उसके पिता की थी, जो कभी गाँव के सबसे अच्छे बाँसुरी वादक हुआ करते थे। कई साल पहले एक बीमारी के कारण उनका निधन हो गया था। जाते-जाते उन्होंने अपनी बाँसुरी रागिनी को देते हुए कहा था, “जब भी मन बहुत भारी हो जाए, इसे बजा लेना। संगीत मन की उन बातों को भी कह देता है, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।”
रागिनी ने वह बात हमेशा याद रखी थी।
लेकिन एक परेशानी थी—उसे बाँसुरी बजाना ठीक से नहीं आता था।
वह रोज कोशिश करती। कभी सुर बिगड़ जाता, कभी आवाज इतनी तेज निकलती कि पास बैठे पक्षी उड़ जाते। गाँव के कुछ बच्चे उसका मजाक भी उड़ाते।
“रागिनी, तुमसे बाँसुरी नहीं बजेगी,” एक दिन मोहन ने हँसते हुए कहा।
रागिनी मुस्कुरा दी।
“शायद अभी नहीं आती… लेकिन एक दिन जरूर आएगी।”
मोहन ने कंधे उचकाए और चला गया।
उस रात रागिनी नदी के किनारे बैठी थी। आसमान में चाँद साफ दिखाई दे रहा था। उसने बाँसुरी होंठों से लगाई और धीरे से फूँक मारी।
इस बार आवाज अलग थी।
बहुत हल्की… बहुत मीठी।
रागिनी ने दोबारा बजाया।
नदी की आवाज के साथ बाँसुरी का सुर जैसे मिल गया। कुछ पल के लिए उसे लगा जैसे आसपास की पूरी दुनिया शांत हो गई हो।
तभी पीछे से आवाज आई, “यही सुर है।”
रागिनी पलटकर देखती है।
वहाँ गाँव के बूढ़े संगीतकार हरिदास बाबा खड़े थे।
रागिनी ने उन्हें प्रणाम किया।
“बाबा, आप कब आए?”
“जब तुम्हारी बाँसुरी ने मुझे बुलाया।”
रागिनी हँस पड़ी।
“बाँसुरी भी किसी को बुलाती है क्या?”
बाबा मुस्कुराए।
“सच्चा संगीत बुलाता है। बस उसे सुनने वाला दिल चाहिए।”
उस दिन के बाद हरिदास बाबा ने रागिनी को बाँसुरी सिखाना शुरू कर दिया।
वह उसे रोज नदी के किनारे बुलाते और कहते, “सुर सिर्फ उँगलियों से नहीं निकलता, रागिनी। उसे दिल से निकालना पड़ता है।”
रागिनी घंटों अभ्यास करती।
धीरे-धीरे उसकी बाँसुरी में मिठास आने लगी।
लेकिन तभी गाँव में एक बड़ी परेशानी आ गई।
कई महीनों से बारिश नहीं हुई थी। खेत सूखने लगे थे। कुएँ का पानी कम हो गया था। गाँव के लोग परेशान थे। जिन खेतों में कभी हरी फसल लहराती थी, वहाँ अब सूखी मिट्टी दिखाई देती थी।
गाँव के मुखिया ने सबको बुलाकर कहा, “अगर अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई, तो हमें अपने परिवारों को लेकर शहर की ओर जाना पड़ेगा।”
यह सुनकर रागिनी का मन उदास हो गया।
वह उसी शाम नदी के पास गई।
मधुर नदी भी पहले जैसी नहीं रही थी। पानी बहुत कम हो गया था।
रागिनी ने बाँसुरी निकाली, लेकिन उसके हाथ रुक गए।
“बाबा, क्या संगीत सच में किसी की मदद कर सकता है?”
हरिदास बाबा पास ही बैठे थे।
उन्होंने कहा, “संगीत बारिश नहीं ला सकता, लेकिन लोगों के दिलों में उम्मीद जरूर जगा सकता है।”
रागिनी कुछ नहीं बोली।
अगले दिन गाँव में एक घोषणा हुई। गाँव के पुराने मंदिर में एक बड़ा संगीत समारोह रखा जाएगा। जो भी चाहे, अपनी कला दिखा सकता था। मुखिया ने कहा कि समारोह से मिलने वाले पैसों से गाँव के लिए पानी की व्यवस्था की जाएगी।
रागिनी ने भी अपना नाम लिखवा दिया।
मोहन ने उसे देखकर कहा, “तुम बाँसुरी बजाओगी?”
रागिनी ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“अगर सबके सामने सुर बिगड़ गया तो?”
रागिनी कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तो मैं दोबारा कोशिश करूँगी।”
समारोह की रात पूरा गाँव मंदिर के सामने इकट्ठा हुआ।
किसी ने गीत गाया, किसी ने ढोल बजाया, किसी ने कविता सुनाई।
आखिर में रागिनी का नाम पुकारा गया।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसके सामने सैकड़ों लोग बैठे थे।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसे पिता याद आए।
उसे हरिदास बाबा की बात याद आई।
“सुर दिल से निकालना।”
रागिनी ने आँखें बंद कीं और बाँसुरी होंठों से लगा ली।
पहला सुर निकला।
बहुत धीमा।
फिर दूसरा सुर।
उसके बाद बाँसुरी से ऐसी धुन निकली कि पूरा वातावरण शांत हो गया।
नदी की धीमी आवाज, रात की ठंडी हवा और बाँसुरी का संगीत जैसे एक-दूसरे में घुल गए।
लोग बिना हिले उसे सुनते रहे।
मोहन की आँखें भी चमक उठीं।
धुन खत्म हुई तो कुछ पल तक कोई आवाज नहीं हुई।
फिर अचानक पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा।
रागिनी ने आँखें खोलीं।
हरिदास बाबा की आँखों में आँसू थे।
“आज तुम्हारे पिता बहुत खुश होते,” उन्होंने कहा।
उस रात समारोह से अच्छी-खासी रकम जमा हुई। गाँव वालों ने उससे पानी के लिए एक पुराना कुआँ साफ करवाया और दूर पहाड़ी से पानी लाने की व्यवस्था शुरू की।
कुछ दिनों बाद आसमान में बादल दिखाई दिए।
पहली बारिश की बूंद रागिनी की हथेली पर गिरी।
वह मुस्कुराई।
फिर बारिश तेज हो गई।
बच्चे खुशी से नाचने लगे। खेतों की मिट्टी भीग गई। सूखी नदी में धीरे-धीरे पानी बढ़ने लगा।
रागिनी बारिश में खड़ी होकर हँस रही थी।
मोहन उसके पास आया और बोला, “तुम्हारी बाँसुरी सच में कमाल की है।”
रागिनी ने मुस्कुराकर कहा, “बाँसुरी की नहीं… उम्मीद की ताकत है।”
हरिदास बाबा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।
उन्होंने धीरे से कहा, “यही होती है मधुर धुन। जो कानों से सुनाई दे, वह संगीत है… लेकिन जो दिल में उम्मीद जगा दे, वही असली धुन है।”
समय बीतता गया।
रागिनी ने संगीत सीखना जारी रखा। उसने गाँव के बच्चों को भी बाँसुरी और गीत सिखाने शुरू कर दिए।
मधुर नदी फिर से बहने लगी थी।
और हर शाम जब सूरज पहाड़ों के पीछे छिपता, गाँव की गलियों में एक मीठी बाँसुरी की आवाज गूँजती।
लोग कहते थे कि वह सिर्फ एक धुन नहीं थी।
वह रागिनी के पिता की याद थी।
वह हरिदास बाबा की सीख थी।
वह पूरे गाँव की उम्मीद थी।
और शायद इसीलिए उसकी आवाज सुनते ही हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।
क्योंकि कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानियों का हल किसी बड़े चमत्कार में नहीं होता।
कभी वह बस एक छोटी-सी कोशिश में छिपा होता है…
और कभी-कभी, किसी के दिल से निकली एक मधुर धुन में।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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