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कोई मरता नहीं था

पढ़ने का समय : 6 मिनट

जिस घर में कोई मरता नहीं था

 

शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव था देवगढ़। गांव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुराना मकान था, जिसे लोग “अमर हवेली” कहते थे।

 

अजीब बात ये थी कि उस घर में पिछले सौ सालों से रहने वाला कोई भी इंसान कभी मरा नहीं था।

 

लोगों को यह बात सुनने में अच्छी लगती थी, लेकिन गांव का कोई आदमी उस घर के पास तक नहीं जाता था।

 

कहा जाता था कि जो भी उस घर में रहने जाता है, वह बूढ़ा तो होता है, बीमार भी पड़ता है, लेकिन उसकी मौत कभी नहीं होती।

 

इसी गांव में एक दिन अमन नाम का लड़का अपनी मां के साथ आया। उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और उसकी मां को गांव में पुश्तैनी जमीन मिली थी।

 

अमन ने घर के बारे में सुना तो हंसते हुए बोला,

 

“मां, लोग भी न… कुछ भी कहानी बना लेते हैं। कोई इंसान मरता नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है?”

 

पास खड़े बूढ़े हरिदास ने उसकी बात सुन ली।

 

उन्होंने अमन की तरफ देखते हुए कहा,

 

“बेटा, कहानी नहीं है। मैंने अपनी आंखों से उस घर के लोगों को देखा है।”

 

अमन मुस्कुराया।

 

“तो फिर वो लोग अभी तक जिंदा हैं?”

 

हरिदास का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

 

“हां… लेकिन जिंदा रहना और जिंदगी जीना दो अलग बातें हैं।”

 

अमन कुछ समझ नहीं पाया।

 

उस रात अमन और उसकी मां गांव के एक पुराने मकान में रुके। आधी रात को अचानक उनके दरवाजे पर दस्तक हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

अमन ने दरवाजा खोला।

 

सामने हरिदास खड़े थे।

 

उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

 

“कल अगर कोई तुम्हें अमर हवेली में जाने को कहे… तो मत जाना।”

 

अमन ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

 

बस जाते-जाते इतना बोले,

 

“उस घर में मौत नहीं आती… लेकिन वहां से कोई वापस भी नहीं आता।”

 

अगली सुबह अमन अपनी मां के साथ खेत देखने निकला। रास्ते में उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई।

 

औरत ने अमन को देखते ही कहा,

 

“तुम उसी घर के नए मालिक हो न?”

 

अमन चौंक गया।

 

“आपको कैसे पता?”

 

औरत ने मुस्कुराकर कहा,

 

“क्योंकि तुम्हारे परिवार का नंबर आ गया है।”

 

अमन को उसकी बात अजीब लगी।

 

“कौन-सा नंबर?”

 

औरत कुछ बोलती, उससे पहले उसकी मां ने अमन को वहां से चलने के लिए कहा।

 

उस शाम उन्हें पुराने कागज मिले, जिनमें लिखा था कि अमर हवेली उनके परिवार की ही थी।

 

अमन ने जिद की,

 

“मां, हमें वो घर देखना चाहिए।”

 

मां ने मना किया।

 

लेकिन अमन अकेला ही हवेली पहुंच गया।

 

लोहे का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

 

चर्ररर…

 

अंदर धूल से भरा आंगन था। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

 

लेकिन उन चित्रों में एक चीज अजीब थी।

 

हर तस्वीर में एक ही परिवार दिखाई दे रहा था।

 

और हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

 

1920… 1935… 1951… 1970… 1992… 2010…

 

अमन ने गौर से देखा।

 

तस्वीरों में मौजूद लोग उम्र में लगभग एक जैसे थे।

 

तभी पीछे से आवाज आई,

 

“तुम आ ही गए।”

 

अमन पलटा।

 

एक बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

 

उसकी आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

 

“आप कौन हैं?”

 

बूढ़े ने कहा,

 

“इस घर का रखवाला।”

 

“यहां कौन रहता है?”

 

बूढ़ा मुस्कुराया।

 

“तुम्हारे अपने लोग।”

 

अमन ने दीवार पर लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

 

“ये लोग कौन हैं?”

 

बूढ़े ने कहा,

 

“तुम्हारे दादा… परदादा… और उनसे भी पहले के लोग।”

 

अमन के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“लेकिन ये सब तो मर चुके हैं।”

 

बूढ़ा धीरे-धीरे उसके करीब आया।

 

“नहीं। इस घर में कोई नहीं मरता।”

 

अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

अमन ने ऊपर देखा।

 

बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“ऊपर मत जाना।”

 

लेकिन तभी एक कमरे का दरवाजा खुला।

 

अंदर से एक आदमी बाहर आया।

 

अमन उसे देखते ही पीछे हट गया।

 

वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

 

“पापा?”

 

वह आदमी मुस्कुराया।

 

“अमन…”

 

अमन की आंखों में आंसू आ गए।

 

“आप जिंदा हैं?”

 

उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

बस कहा,

 

“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

 

अमन उसके पास जाने लगा।

 

तभी बूढ़े ने चिल्लाकर कहा,

 

“भागो!”

 

अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

 

दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

 

और दीवारों पर लगी तस्वीरों के चेहरे बदलने लगे।

 

अब हर तस्वीर में अमन दिखाई दे रहा था।

 

कहीं वह बच्चा था।

 

कहीं बूढ़ा।

 

कहीं बिल्कुल वैसा ही जैसा अभी था।

 

अमन घबराकर दरवाजे की ओर भागा।

 

लेकिन रास्ते में उसके पिता खड़े थे।

 

उन्होंने कहा,

 

“अगर बाहर गए तो मैं हमेशा के लिए अकेला रह जाऊंगा।”

 

अमन रुक गया।

 

“आप मेरे पिता नहीं हैं।”

 

उस आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

 

उसका चेहरा धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा।

 

और उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े दिखाई दिए।

 

वे सभी अमन के परिवार के पुराने सदस्य थे।

 

सबकी आंखें अमन पर थीं।

 

तभी बूढ़ा चिल्लाया,

 

“इसे बाहर निकालो!”

 

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

 

फर्श पर बनी एक काली रेखा चमकी और अमन उसके बीच खिंचता चला गया।

 

अगले ही पल सब शांत हो गया।

 

सुबह अमन की मां हवेली के बाहर पहुंची।

 

दरवाजा खुला था।

 

अंदर अमन नहीं था।

 

सिर्फ एक नई तस्वीर दीवार पर टंगी थी।

 

उस तस्वीर में अमन खड़ा था।

 

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

 

नीचे तारीख लिखी थी

11 अगस्त 2026

 

मां चीख पड़ी।

 

तभी पीछे से हरिदास की आवाज आई,

 

“अब समझ आया कि इस घर में कोई क्यों नहीं मरता?”

 

मां ने कांपते हुए पूछा,“क्यों?”

 

हरिदास ने कहा,

 

“क्योंकि मौत उन्हें लेने आती ही नहीं…”

 

उन्होंने हवेली की तरफ देखा।

 

“यह घर इंसानों को मारता नहीं है। यह उनकी मौत अपने अंदर कैद कर लेता है।”

मां ने रोते हुए पूछा,

 

“तो अमन?”

 

हरिदास ने धीरे से कहा,

 

“अब वह जिंदा है… हमेशा जिंदा रहेगा।”

मां ने राहत की सांस ली।

 

लेकिन हरिदास ने अगली बात कही तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“लेकिन वह अब इंसानों की दुनिया में नहीं है।”

 

उसी समय हवेली के अंदर से अमन की आवाज आई

 

“मां…”

 

मां दौड़कर अंदर जाने लगी।

 

हरिदास ने उसे रोक लिया।

“मत जाना!”

“वो मेरा बेटा है!”

हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

 

“वह आवाज अमन की नहीं है।”

 

अंदर से फिर आवाज आई“मां… मुझे बचा लो…”

मां दरवाजे पर खड़ी रोती रही।

 

और हवेली की दीवार पर लगी नई तस्वीर में अमन की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

 

उसकी जगह उसके चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

फिर तस्वीर के नीचे लिखी तारीख अपने आप बदल गई।

11 अगस्त 2026 मिट गई।

 

उसकी जगह लिखा आया अगला नाम: अमन की मां।

 

और उसी पल हवेली का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

धड़ाम!

उस दिन के बाद देवगढ़ गांव में एक और बात मशहूर हो गई “जिस घर में कोई मरता नहीं था, वहां रहने वालों की उम्र जरूर बढ़ती थी… लेकिन हर पीढ़ी के साथ वह घर एक नए इंसान को अपना बना लेता था।”

और सबसे डरावनी बात?

बस उसकी दीवार पर अब एक नई तस्वीर के लिए जगह खाली थी।

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