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  • प्रेत आत्मा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    वह प्रेत आत्मा जो दिखाई देती थी

     

    शहर से कुछ दूर चांदपुर नाम का एक छोटा-सा गांव था। गांव के बाहर एक पुराना स्कूल था, जो करीब दस साल से बंद पड़ा था। दिन में भी उस स्कूल की इमारत कुछ उदास-सी लगती थी, लेकिन रात होते ही लोग उस रास्ते से गुजरना पसंद नहीं करते थे।

     

    गांव में एक बात बहुत मशहूर थी।

     

    लोग कहते थे कि रात के समय स्कूल की तीसरी खिड़की के पास एक प्रेत आत्मा दिखाई देती है।

     

    किसी ने उसे दूर से देखा था, किसी ने सीढ़ियों पर खड़ी परछाई देखी थी और कुछ लोगों का कहना था कि वह कभी-कभी स्कूल के आंगन में दिखाई देती है।

     

    गांव का अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक दिन उसके दोस्त ने कहा, “तू इतना बहादुर है तो आज रात स्कूल के पास जाकर दिखा।”

     

    अमन हंस पड़ा।

     

    “भूत-वूत कुछ नहीं होते।”

     

    दोस्त बोला, “फिर डर किस बात का?”

     

    अमन ने जवाब दिया, “डर मुझे नहीं, तुम्हें लगता है।”

     

    लेकिन उस रात अमन को खुद पता नहीं था कि उसकी सोच बदलने वाली है।

     

    करीब ग्यारह बजे वह स्कूल के पास पहुंचा।

     

    आसमान में बादल थे और चारों तरफ अंधेरा था।

     

    स्कूल का मुख्य दरवाजा आधा खुला हुआ था।

     

    अमन ने मोबाइल की रोशनी जलाई और अंदर चला गया।

     

    अंदर पुराने डेस्क और टूटी कुर्सियां पड़ी थीं।

     

    दीवारों पर बच्चों के पुराने चित्र अब भी लगे थे।

     

    अमन आगे बढ़ा ही था कि अचानक उसे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    वह रुक गया।

     

    आवाज भी रुक गई।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद हवा से कुछ हिल रहा होगा।”

     

    तभी तीसरी खिड़की के पास एक सफेद कपड़ों में खड़ी आकृति दिखाई दी।

     

    अमन के कदम वहीं रुक गए।

     

    आकृति बिल्कुल स्थिर थी।

     

    चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    अमन ने मोबाइल की रोशनी उसकी तरफ की।

     

    अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह बाहर निकलने लगा।

     

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई—

     

    “रुको…”

     

    अमन वहीं जम गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वही आकृति अब सीढ़ियों के पास खड़ी थी।

     

    अमन डर गया।

     

    “तुम… कौन हो?”

     

    आकृति ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस अपना हाथ उठाकर ऊपर की मंजिल की तरफ इशारा किया।

     

    अमन कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा।

     

    फिर उसने हिम्मत करके सीढ़ियां चढ़नी शुरू कीं।

     

    ऊपर एक पुराना कमरा था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर एक मेज पर पुरानी कॉपियां और कुछ कागज रखे थे।

     

    आकृति कमरे के कोने में खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखाई दिया।

     

    वह एक युवती जैसी लग रही थी।

     

    अमन ने पूछा, “तुम मुझे यहां क्यों लाई हो?”

     

    उस आकृति ने मेज की तरफ इशारा किया।

     

    अमन ने कागज उठाया।

     

    वह स्कूल की पुरानी शिक्षिका सुधा मैडम की डायरी थी।

     

    गांव में सुधा मैडम का नाम अमन ने बचपन में सुना था।

     

    वह बच्चों को बहुत प्यार करती थीं।

     

    लेकिन करीब दस साल पहले अचानक उनकी मौत हो गई थी।

     

    लोगों ने कहा था कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी और शहर चली गईं।

     

    अमन डायरी पढ़ने लगा।

     

    उसमें लिखा था कि सुधा मैडम ने स्कूल की कुछ गलत गतिविधियों के बारे में पता लगाया था। स्कूल की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश हो रही थी और कुछ लोगों ने पुराने रिकॉर्ड बदलने की योजना बनाई थी।

     

    सुधा मैडम ने इसका विरोध किया था।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य था—

     

    “अगर मैं सच सबके सामने नहीं ला पाई, तो शायद यह स्कूल खुद गवाही देगा।”

     

    अमन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने आकृति की तरफ देखा।

     

    “क्या तुम सुधा मैडम हो?”

     

    आकृति ने धीरे से सिर झुका दिया।

     

    अमन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने पूछा, “तुम चाहती क्या हो?”

     

    आकृति ने कमरे की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    अमन ने दीवार पर हाथ लगाया।

     

    एक जगह दीवार बाकी हिस्से से थोड़ी अलग थी।

     

    उसने पास पड़ी लोहे की छड़ से धीरे से उसे हटाया।

     

    अंदर एक छोटा लकड़ी का बक्सा था।

     

    बक्से में स्कूल के पुराने दस्तावेज थे।

     

    जमीन के असली कागज भी उसी में रखे थे।

     

    अमन समझ गया कि सुधा मैडम ने शायद इन्हें सुरक्षित रखने के लिए छिपाया था।

     

    लेकिन तभी नीचे से किसी के दरवाजा खोलने की आवाज आई।

     

    अमन घबरा गया।

     

    “यहां कोई और है?”

     

    आकृति धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ी।

     

    अमन ने बाहर झांका।

     

    दो आदमी स्कूल के अंदर आ रहे थे।

     

    वे पुराने कमरे में कुछ ढूंढ रहे थे।

     

    अमन समझ गया कि वे वही लोग हो सकते हैं जो स्कूल की जमीन के कागज हासिल करना चाहते थे।

     

    वह चुपचाप पीछे हट गया।

     

    आकृति ने अचानक खिड़की की तरफ इशारा किया।

     

    अमन ने खिड़की खोली और बाहर निकलकर पीछे की सीढ़ियों से स्कूल से बाहर आ गया।

     

    वह सीधे गांव के सरपंच और पुलिस को लेकर वापस आया।

     

    पुराने दस्तावेज देखकर मामला दोबारा खुला।

     

    जांच में पता चला कि स्कूल की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश वर्षों से चल रही थी।

     

    सुधा मैडम ने इसका विरोध किया था और असली कागज सुरक्षित कर दिए थे।

     

    उनकी मौत के बाद लोगों ने मामला दबा दिया था।

     

    अब सारे सबूत सामने आ गए।

     

    स्कूल की जमीन बच गई।

     

    कुछ दिनों बाद स्कूल की मरम्मत शुरू हुई।

     

    अमन एक शाम अकेला पुराने स्कूल के बाहर खड़ा था।

     

    सूरज ढल चुका था।

     

    वही तीसरी खिड़की सामने थी।

     

    अमन ने धीरे से कहा, “सुधा मैडम… आपका सच सबके सामने आ गया।”

     

    कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर तीसरी खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।

     

    एक सफेद आकृति वहां खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ था।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “अब आप जा सकती हैं।”

     

    आकृति ने धीरे से हाथ उठाया।

     

    फिर जैसे हवा में घुलती हुई वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    उस रात के बाद स्कूल में किसी ने सुधा मैडम की आत्मा को नहीं देखा।

     

    लेकिन स्कूल की तीसरी खिड़की के नीचे एक छोटी-सी पट्टिका लगा दी गई—

     

    “सुधा मैडम — जिन्होंने सच को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया।”

     

    अमन अक्सर वहां बच्चों को पढ़ते हुए देखता था।

     

    उसे अब भूत से डर नहीं लगता था।

     

    क्योंकि उसने समझ लिया था कि हर दिखाई देने वाली आत्मा डराने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएं इसलिए दिखाई देती हैं क्योंकि उनकी कोई अधूरी बात दुनिया तक पहुंचनी बाकी होती है।

     

    और जब वह बात पूरी हो जाती है…

     

    तो वह आत्मा भी हमेशा के लिए शांति से चली जाती है।

  • पैरों के निशान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पैरों के निशान जो अंधेरे में दिखते थे

     

    शहर से दूर बसे एक छोटे से गांव देवपुर में शाम होते ही एक अजीब सन्नाटा छा जाता था। गांव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी, जो कई सालों से बंद पड़ी थी। दिन में वह हवेली बस एक टूटी-फूटी इमारत लगती थी, लेकिन रात होते ही उसकी तरफ कोई देखना भी पसंद नहीं करता था।

     

    लोग कहते थे कि आधी रात के बाद हवेली के आंगन में पैरों के निशान दिखाई देते हैं।

     

    सबसे अजीब बात यह थी कि वे निशान जमीन पर नहीं, बल्कि अंधेरे में दिखाई देते थे।

     

    गांव का नमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था। वह उन्नीस साल का था और उसे हमेशा लगता था कि लोग छोटी-सी बात को बढ़ाकर भूत की कहानी बना देते हैं।

     

    एक शाम नमन अपने दोस्त रोहित के साथ खेत से लौट रहा था।

     

    रोहित ने हवेली की तरफ देखते हुए कहा, “आज जल्दी घर चल। अंधेरा होने वाला है।”

     

    नमन हंस पड़ा।

     

    “तू अभी भी उन पैरों के निशानों से डरता है?”

     

    रोहित बोला, “मैंने खुद देखे हैं।”

     

    “कैसे निशान?”

     

    “छोटे-छोटे पैरों के। जैसे किसी बच्चे के हों। लेकिन उनके आसपास कोई रोशनी नहीं होती। बस अंधेरे में वही निशान दिखाई देते हैं।”

     

    नमन ने मजाक में कहा, “आज मैं खुद जाकर देखूंगा।”

     

    रोहित ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पागल है क्या?”

     

    लेकिन नमन नहीं माना।

     

    रात करीब साढ़े दस बजे वह अकेला हवेली के पास पहुंच गया।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा था।

     

    नमन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    हवेली का बड़ा दरवाजा बंद था।

     

    वह वापस जाने ही वाला था कि अचानक उसकी नजर जमीन पर पड़ी।

     

    कुछ दूर तक छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    नमन के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।

     

    वह निशान हल्की सफेद चमक जैसे दे रहे थे।

     

    नमन ने टॉर्च बंद कर दी।

     

    अब निशान और साफ दिखाई दे रहे थे।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    वे निशान हवेली के अंदर जा रहे थे।

     

    नमन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसे रोहित की बात याद आ गई।

     

    फिर भी उसके मन में सवाल था—ये निशान आखिर थे किसके?

     

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया।

     

    दरवाजा बिना छुए ही थोड़ा खुल गया।

     

    किर्रर…

     

    नमन पीछे हट गया।

     

    कुछ सेकंड तक वह वहीं खड़ा रहा।

     

    फिर उसने हिम्मत की और अंदर चला गया।

     

    अंदर धूल और पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं था।

     

    लेकिन अंधेरा होते ही वे चमकते निशान फिर दिखाई देने लगे।

     

    वे सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

     

    नमन उनके पीछे चल पड़ा।

     

    पहली मंजिल पर पहुंचकर निशान एक कमरे के सामने रुक गए।

     

    कमरे का दरवाजा बंद था।

     

    नमन ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर एक पुरानी लकड़ी की मेज थी और दीवार पर एक बच्चे की तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    “अंश, उम्र 8 वर्ष।”

     

    नमन कुछ देर तस्वीर को देखता रहा।

     

    तभी पीछे से हल्की आवाज आई।

     

    “मुझे ढूंढ रहे हो?”

     

    नमन पलट गया।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसकी सांसें तेज हो गईं।

     

    फिर जमीन पर एक नया पैरों का निशान दिखाई दिया।

     

    नमन ने देखा कि निशान कमरे के कोने तक जा रहे थे।

     

    वह वहां पहुंचा तो उसे एक पुराना लकड़ी का बक्सा मिला।

     

    बक्से में कुछ कागज और एक छोटी डायरी थी।

     

    डायरी शायद अंश के पिता की थी।

     

    नमन ने पन्ने पलटने शुरू किए।

     

    एक जगह लिखा था—

     

    “अंश को मैं जितना समझता था, वह उससे कहीं ज्यादा समझदार था। उसने कुछ ऐसा देख लिया है जिसे हमें छिपाना नहीं चाहिए।”

     

    नमन की उत्सुकता बढ़ गई।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “पुराने कुएं के पास रात में कोई आता है। अंश ने उसे देखा है। वह कहता है कि वहां जमीन के नीचे कुछ छिपाया गया है।”

     

    नमन चौंक गया।

     

    तभी हवेली के नीचे से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    नमन घबरा गया।

     

    वह बाहर निकलने लगा, लेकिन चमकते पैरों के निशान फिर उसके सामने आ गए।

     

    इस बार वे सीढ़ियों से नीचे जा रहे थे।

     

    नमन उनके पीछे चला।

     

    नीचे एक पुराना कमरा था।

     

    कमरे के फर्श पर एक लोहे का ढक्कन लगा था।

     

    निशान वहीं जाकर खत्म हो गए।

     

    नमन ने ढक्कन उठाया।

     

    नीचे एक छोटी सुरंग थी।

     

    वह आगे नहीं गया।

     

    उसे लगा कि अब किसी बड़े व्यक्ति को बताना जरूरी है।

     

    वह सुबह होते ही गांव के सरपंच और हरिया काका को लेकर हवेली पहुंचा।

     

    हरिया काका ने डायरी पढ़ी तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “मैं अंश को जानता था,” उन्होंने कहा। “वह बच्चा अचानक गायब हो गया था। उसके परिवार ने कहा था कि वह शहर चला गया, लेकिन गांव में किसी ने उसे जाते नहीं देखा।”

     

    सब लोग उस पुराने कुएं के पास पहुंचे।

     

    वहां खुदाई करने पर उन्हें कुछ पुराने संदूक मिले।

     

    संदूकों में गांव की जमीन से जुड़े कागज थे। पता चला कि कई साल पहले कुछ लोगों ने गरीब किसानों की जमीन के कागज चोरी करके अपने नाम करने की कोशिश की थी।

     

    अंश ने शायद यह सब देख लिया था।

     

    लेकिन अंश के साथ आखिर हुआ क्या था?

     

    यह सवाल अभी भी बाकी था।

     

    नमन ने फिर हवेली की तरफ देखा।

     

    उस रात वह अकेला नहीं गया।

     

    वह सरपंच और हरिया काका के साथ वापस हवेली पहुंचा।

     

    रात होते ही वही पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    इस बार वे हवेली के पीछे बने एक छोटे कमरे तक गए।

     

    कमरे की दीवार के पीछे एक पुराना लकड़ी का पैनल था।

     

    उसे हटाने पर एक छोटी-सी जगह मिली।

     

    वहां एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।

     

    उसमें अंश की एक चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी में लिखा था—

     

    “अगर कोई मुझे ढूंढे तो उसे बताना कि मैंने कुछ गलत नहीं किया। मैं चाहता हूं कि गांव के लोगों की जमीन उन्हें वापस मिले।”

     

    हरिया काका की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उन्होंने कहा, “बच्चा सच बचाना चाहता था।”

     

    अंश का परिवार बाद में गांव छोड़कर चला गया था। किसी को पता नहीं था कि वे कहां गए।

     

    लेकिन उसकी चिट्ठी ने वर्षों पुराना मामला खोल दिया।

     

    जांच हुई और जमीन के कागजों की सच्चाई सामने आ गई। कई लोगों को अपनी जमीन वापस मिली।

     

    कुछ दिनों बाद नमन फिर हवेली के सामने खड़ा था।

     

    अब वहां पैरों के निशान दिखाई नहीं देते थे।

     

    वह कुछ देर अंधेरे में खड़ा रहा।

     

    फिर अचानक उसे जमीन पर आखिरी बार दो छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    वे हवेली से बाहर की ओर जा रहे थे।

     

    नमन उन्हें देखते हुए मुस्कुरा दिया।

     

    “अब तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, अंश। तुम्हारा सच सबके सामने आ चुका है।”

     

    कुछ पल बाद निशान धीरे-धीरे गायब हो गए।

     

    उस रात के बाद देवपुर की हवेली में कभी वे पैरों के निशान नहीं दिखे।

     

    लोगों ने उस जगह को डर की जगह समझना बंद कर दिया।

     

    नमन जब भी वहां से गुजरता, उसे लगता जैसे अंधेरे में किसी बच्चे की मासूम आवाज कह रही हो—

     

    “सच को जितना भी छिपाओ, एक दिन वह अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है।”

     

    और शायद यही वजह थी कि अंधेरे में दिखाई देने वाले वे पैरों के निशान किसी को डराने नहीं आते थे।

     

    वे सिर्फ यह याद दिलाने आते थे कि अधूरा सच अपने पीछे निशान जरूर छोड़ जाता है।

  • एक मधुर धुन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक मधुर धुन

     

    शहर से बहुत दूर, पहाड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—सुरमई। इस गाँव की सबसे खास बात थी वहाँ बहने वाली एक पतली-सी नदी, जिसका पानी पत्थरों से टकराकर ऐसी आवाज करता था जैसे कोई धीमी धुन बजा रहा हो। गाँव के लोग उसे प्यार से “मधुर नदी” कहते थे।

     

    उसी गाँव में सोलह साल की एक लड़की रहती थी—रागिनी। उसके नाम की तरह ही उसके मन में भी संगीत बसा था। वह जब भी उदास होती, नदी के किनारे जाकर बैठ जाती और घंटों पानी की आवाज सुनती रहती।

     

    रागिनी के पास एक पुरानी बाँसुरी थी। वह बाँसुरी उसके पिता की थी, जो कभी गाँव के सबसे अच्छे बाँसुरी वादक हुआ करते थे। कई साल पहले एक बीमारी के कारण उनका निधन हो गया था। जाते-जाते उन्होंने अपनी बाँसुरी रागिनी को देते हुए कहा था, “जब भी मन बहुत भारी हो जाए, इसे बजा लेना। संगीत मन की उन बातों को भी कह देता है, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।”

     

    रागिनी ने वह बात हमेशा याद रखी थी।

     

    लेकिन एक परेशानी थी—उसे बाँसुरी बजाना ठीक से नहीं आता था।

     

    वह रोज कोशिश करती। कभी सुर बिगड़ जाता, कभी आवाज इतनी तेज निकलती कि पास बैठे पक्षी उड़ जाते। गाँव के कुछ बच्चे उसका मजाक भी उड़ाते।

     

    “रागिनी, तुमसे बाँसुरी नहीं बजेगी,” एक दिन मोहन ने हँसते हुए कहा।

     

    रागिनी मुस्कुरा दी।

     

    “शायद अभी नहीं आती… लेकिन एक दिन जरूर आएगी।”

     

    मोहन ने कंधे उचकाए और चला गया।

     

    उस रात रागिनी नदी के किनारे बैठी थी। आसमान में चाँद साफ दिखाई दे रहा था। उसने बाँसुरी होंठों से लगाई और धीरे से फूँक मारी।

     

    इस बार आवाज अलग थी।

     

    बहुत हल्की… बहुत मीठी।

     

    रागिनी ने दोबारा बजाया।

     

    नदी की आवाज के साथ बाँसुरी का सुर जैसे मिल गया। कुछ पल के लिए उसे लगा जैसे आसपास की पूरी दुनिया शांत हो गई हो।

     

    तभी पीछे से आवाज आई, “यही सुर है।”

     

    रागिनी पलटकर देखती है।

     

    वहाँ गाँव के बूढ़े संगीतकार हरिदास बाबा खड़े थे।

     

    रागिनी ने उन्हें प्रणाम किया।

     

    “बाबा, आप कब आए?”

     

    “जब तुम्हारी बाँसुरी ने मुझे बुलाया।”

     

    रागिनी हँस पड़ी।

     

    “बाँसुरी भी किसी को बुलाती है क्या?”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “सच्चा संगीत बुलाता है। बस उसे सुनने वाला दिल चाहिए।”

     

    उस दिन के बाद हरिदास बाबा ने रागिनी को बाँसुरी सिखाना शुरू कर दिया।

     

    वह उसे रोज नदी के किनारे बुलाते और कहते, “सुर सिर्फ उँगलियों से नहीं निकलता, रागिनी। उसे दिल से निकालना पड़ता है।”

     

    रागिनी घंटों अभ्यास करती।

     

    धीरे-धीरे उसकी बाँसुरी में मिठास आने लगी।

     

    लेकिन तभी गाँव में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    कई महीनों से बारिश नहीं हुई थी। खेत सूखने लगे थे। कुएँ का पानी कम हो गया था। गाँव के लोग परेशान थे। जिन खेतों में कभी हरी फसल लहराती थी, वहाँ अब सूखी मिट्टी दिखाई देती थी।

     

    गाँव के मुखिया ने सबको बुलाकर कहा, “अगर अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई, तो हमें अपने परिवारों को लेकर शहर की ओर जाना पड़ेगा।”

     

    यह सुनकर रागिनी का मन उदास हो गया।

     

    वह उसी शाम नदी के पास गई।

     

    मधुर नदी भी पहले जैसी नहीं रही थी। पानी बहुत कम हो गया था।

     

    रागिनी ने बाँसुरी निकाली, लेकिन उसके हाथ रुक गए।

     

    “बाबा, क्या संगीत सच में किसी की मदद कर सकता है?”

     

    हरिदास बाबा पास ही बैठे थे।

     

    उन्होंने कहा, “संगीत बारिश नहीं ला सकता, लेकिन लोगों के दिलों में उम्मीद जरूर जगा सकता है।”

     

    रागिनी कुछ नहीं बोली।

     

    अगले दिन गाँव में एक घोषणा हुई। गाँव के पुराने मंदिर में एक बड़ा संगीत समारोह रखा जाएगा। जो भी चाहे, अपनी कला दिखा सकता था। मुखिया ने कहा कि समारोह से मिलने वाले पैसों से गाँव के लिए पानी की व्यवस्था की जाएगी।

     

    रागिनी ने भी अपना नाम लिखवा दिया।

     

    मोहन ने उसे देखकर कहा, “तुम बाँसुरी बजाओगी?”

     

    रागिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “अगर सबके सामने सुर बिगड़ गया तो?”

     

    रागिनी कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तो मैं दोबारा कोशिश करूँगी।”

     

    समारोह की रात पूरा गाँव मंदिर के सामने इकट्ठा हुआ।

     

    किसी ने गीत गाया, किसी ने ढोल बजाया, किसी ने कविता सुनाई।

     

    आखिर में रागिनी का नाम पुकारा गया।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    उसके सामने सैकड़ों लोग बैठे थे।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    उसे पिता याद आए।

     

    उसे हरिदास बाबा की बात याद आई।

     

    “सुर दिल से निकालना।”

     

    रागिनी ने आँखें बंद कीं और बाँसुरी होंठों से लगा ली।

     

    पहला सुर निकला।

     

    बहुत धीमा।

     

    फिर दूसरा सुर।

     

    उसके बाद बाँसुरी से ऐसी धुन निकली कि पूरा वातावरण शांत हो गया।

     

    नदी की धीमी आवाज, रात की ठंडी हवा और बाँसुरी का संगीत जैसे एक-दूसरे में घुल गए।

     

    लोग बिना हिले उसे सुनते रहे।

     

    मोहन की आँखें भी चमक उठीं।

     

    धुन खत्म हुई तो कुछ पल तक कोई आवाज नहीं हुई।

     

    फिर अचानक पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा।

     

    रागिनी ने आँखें खोलीं।

     

    हरिदास बाबा की आँखों में आँसू थे।

     

    “आज तुम्हारे पिता बहुत खुश होते,” उन्होंने कहा।

     

    उस रात समारोह से अच्छी-खासी रकम जमा हुई। गाँव वालों ने उससे पानी के लिए एक पुराना कुआँ साफ करवाया और दूर पहाड़ी से पानी लाने की व्यवस्था शुरू की।

     

    कुछ दिनों बाद आसमान में बादल दिखाई दिए।

     

    पहली बारिश की बूंद रागिनी की हथेली पर गिरी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    फिर बारिश तेज हो गई।

     

    बच्चे खुशी से नाचने लगे। खेतों की मिट्टी भीग गई। सूखी नदी में धीरे-धीरे पानी बढ़ने लगा।

     

    रागिनी बारिश में खड़ी होकर हँस रही थी।

     

    मोहन उसके पास आया और बोला, “तुम्हारी बाँसुरी सच में कमाल की है।”

     

    रागिनी ने मुस्कुराकर कहा, “बाँसुरी की नहीं… उम्मीद की ताकत है।”

     

    हरिदास बाबा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।

     

    उन्होंने धीरे से कहा, “यही होती है मधुर धुन। जो कानों से सुनाई दे, वह संगीत है… लेकिन जो दिल में उम्मीद जगा दे, वही असली धुन है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    रागिनी ने संगीत सीखना जारी रखा। उसने गाँव के बच्चों को भी बाँसुरी और गीत सिखाने शुरू कर दिए।

     

    मधुर नदी फिर से बहने लगी थी।

     

    और हर शाम जब सूरज पहाड़ों के पीछे छिपता, गाँव की गलियों में एक मीठी बाँसुरी की आवाज गूँजती।

     

    लोग कहते थे कि वह सिर्फ एक धुन नहीं थी।

     

    वह रागिनी के पिता की याद थी।

     

    वह हरिदास बाबा की सीख थी।

     

    वह पूरे गाँव की उम्मीद थी।

     

    और शायद इसीलिए उसकी आवाज सुनते ही हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।

     

    क्योंकि कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानियों का हल किसी बड़े चमत्कार में नहीं होता।

     

    कभी वह बस एक छोटी-सी कोशिश में छिपा होता है…

     

    और कभी-कभी, किसी के दिल से निकली एक मधुर धुन में।

  • अंधियारे का अंत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 4 और अंतिम भाग: अंधियारे का अंत

     

    कमरे में दीपक बुझ चुका था। बाहर चांदनी रात थी, लेकिन कमरे के अंदर ऐसा अंधेरा था कि किसी का चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    चांदनी पीछे हट गई।

     

    उसके सामने वही आदमी खड़ा था, जिसे दादी ने देवराज बताया था।

     

    और कमरे के दूसरे कोने में उसकी बड़ी बहन चांदनी खड़ी थी।

     

    “चांदनी… भागो!”

     

    बहन की आवाज सुनते ही चांदनी का डर थोड़ा कम हुआ।

     

    उसने पूछा, “दीदी, आप यहां कैसे?”

     

    देवराज ने गुस्से में कहा, “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    बड़ी चांदनी उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    “अब बहुत हो चुका, देवराज।”

     

    देवराज हंस पड़ा।

     

    “इतने साल बाद भी तुमने हार नहीं मानी?”

     

    बड़ी चांदनी ने कहा, “मैंने हार नहीं मानी थी। मैं सिर्फ सही समय का इंतजार कर रही थी।”

     

    तभी दरवाजा खुला और गौरी अंदर आ गई।

     

    उसके पीछे चांदनी की मां और दादी भी थीं।

     

    मां ने अपनी बड़ी बेटी को देखते ही आंखों पर हाथ रख लिया।

     

    “चांदनी…”

     

    बड़ी चांदनी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “राधिका।”

     

    दोनों बहनें एक-दूसरे के पास आईं।

     

    राधिका ने अपनी बड़ी बहन को गले लगा लिया।

     

    कई सालों का इंतजार उस एक पल में खत्म हो गया।

     

    चांदनी उन्हें देखती रही।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि खुशी मनाए या इतने सालों के दर्द पर रोए।

     

    उसने पूछा, “दीदी, आप इतने साल कहां थीं?”

     

    बड़ी चांदनी ने धीरे से कहा, “उस रात मुझे हवेली से बाहर ले जाया गया था। देवराज मुझे डराकर एक पुराने मंदिर के पास छोड़ गया था। मैं किसी तरह वहां से बच निकली, लेकिन जब वापस आई तो हवेली बंद हो चुकी थी।”

     

    देवराज ने बीच में कहा, “झूठ!”

     

    बड़ी चांदनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर झूठ है तो फिर तुम्हें इतने सालों से मेरे वापस आने का डर क्यों था?”

     

    देवराज चुप हो गया।

     

    दादी ने कहा, “अब सच बोलने का समय है।”

     

    देवराज ने गुस्से में कहा, “तुम लोग सच जानकर भी क्या कर लोगे?”

     

    चांदनी ने कहा, “सच को छिपाने के लिए झूठ बोलने की जरूरत पड़ती है। लेकिन सच को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती।”

     

    देवराज कुछ नहीं बोला।

     

    बड़ी चांदनी ने एक पुराना कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारे पिता के हस्ताक्षर वाला दस्तावेज है।”

     

    देवराज ने कागज देखते ही चेहरा फेर लिया।

     

    राधिका बोली, “पिताजी ने अपनी संपत्ति दोनों बेटियों के नाम की थी। लेकिन देवराज ने कागज बदलकर पूरी संपत्ति अपने नाम करने की कोशिश की थी।”

     

    दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना को जब यह पता चला तो उन्होंने उसे घर से निकाल दिया।”

     

    देवराज ने गुस्से में कहा, “मैंने सिर्फ अपना हक मांगा था!”

     

    राधिका ने जवाब दिया, “हक मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है।”

     

    कुछ पल तक कोई नहीं बोला।

     

    फिर देवराज ने कहा, “तुम्हारे पिता ने मुझे अपमानित किया था। मैंने सिर्फ बदला लिया।”

     

    बड़ी चांदनी ने कहा, “बदला लेने के लिए एक परिवार की जिंदगी बर्बाद कर दी?”

     

    देवराज की आंखों में पछतावे की जगह अभी भी गुस्सा था।

     

    लेकिन अब उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा था।

     

    राधिका ने दूसरा कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारे खिलाफ सबसे बड़ा सबूत है।”

     

    देवराज चौंक गया।

     

    “ये तुम्हें कहां मिला?”

     

    “उसी पुराने संदूक में, जिसे तुमने समझा था कि कभी कोई नहीं ढूंढ पाएगा।”

     

    चांदनी को अब समझ आया कि हवेली का सारा रहस्य इन्हीं कागजों के इर्द-गिर्द था।

     

    देवराज ने कई सालों तक परिवार को डराकर रखा था ताकि कोई उन दस्तावेजों तक न पहुंच सके।

     

    राधिका ने कहा, “मैंने इतने साल इंतजार किया क्योंकि मेरे पास अकेले सच साबित करने का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन अब मेरी बहन, मेरी बेटी और पूरा परिवार मेरे साथ है।”

     

    चांदनी ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    मां ने उसकी आंखों से आंसू पोंछे।

     

    “मुझे माफ कर देना बेटा। मैंने तुम्हें सच नहीं बताया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम्हें भी कुछ न हो जाए।”

     

    चांदनी ने मां को गले लगा लिया।

     

    “आपने मुझे सच से दूर रखा, लेकिन अब मैं आपसे नाराज नहीं हूं।”

     

    गौरी ने धीरे से कहा, “तो आखिर इतने सालों से हवेली की खिड़की में दीपक कौन जलाता था?”

     

    बड़ी चांदनी मुस्कुराई।

     

    “मैं।”

     

    चांदनी ने हैरानी से पूछा, “आप?”

     

    “हां। मैं हर पूर्णिमा की रात हवेली में आती थी। मैं चाहती थी कि कोई न कोई उस घर के सच तक पहुंचे।”

     

    “लेकिन आप हमें दिखाई कैसे देती थीं?”

     

    बड़ी चांदनी ने कहा, “शायद इसलिए क्योंकि तुम मुझे ढूंढने के लिए तैयार थीं। कई बार इंसान डर के पीछे छिपे सच को तभी देख पाता है, जब वह खुद उसे देखने की हिम्मत करे।”

     

    चांदनी मुस्कुरा दी।

     

    उसे अब समझ आ गया था कि जिस अंधियारे से वह डर रही थी, असल में वह अंधियारा उसके मन का था।

     

    सुबह होते ही परिवार गांव के बुजुर्गों के पास गया।

     

    पुराने दस्तावेज सबके सामने रखे गए।

     

    देवराज के झूठ और धोखे का सच सामने आ गया।

     

    गांव वालों ने भी स्वीकार किया कि इतने सालों से हवेली के बारे में फैली डरावनी बातें पूरी सच्चाई नहीं थीं।

     

    देवराज के खिलाफ कार्रवाई की गई और परिवार को उसकी संपत्ति वापस मिल गई।

     

    कुछ दिनों बाद हवेली की सफाई शुरू हुई।

     

    जहां कभी लोग जाने से डरते थे, वहां अब बच्चे खेलने लगे।

     

    ऊपर की वही खिड़की, जहां हर पूर्णिमा को रहस्यमयी दीपक जलता था, अब खुली रहती थी।

     

    एक शाम चांदनी और उसकी बड़ी बहन छत पर बैठी थीं।

     

    आसमान में पूरा चांद चमक रहा था।

     

    चांदनी ने पूछा, “दीदी, आपने इतने साल अकेले कैसे बिताए?”

     

    बड़ी चांदनी ने मुस्कुराकर कहा, “उम्मीद के सहारे।”

     

    “आपको यकीन था कि परिवार आपको ढूंढ लेगा?”

     

    “नहीं। लेकिन मुझे यकीन था कि एक दिन सच जरूर सामने आएगा।”

     

    चांदनी ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “आज ये हवेली डरावनी नहीं लग रही।”

     

    बड़ी बहन ने कहा, “क्योंकि अब इसके अंदर कोई राज नहीं छिपा।”

     

    तभी मां ऊपर आईं।

     

    “तुम दोनों यहां बैठी हो? नीचे आओ, खाना तैयार है।”

     

    चांदनी हंसते हुए बोली, “मां, आज चांद बहुत सुंदर है।”

     

    मां मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारे नाम जैसा।”

     

    चांदनी ने अपनी बड़ी बहन की तरफ देखा।

     

    “और उनका नाम भी तो चांदनी है।”

     

    दोनों बहनें हंस पड़ीं।

     

    मां ने दोनों को गले लगा लिया।

     

    उस रात हवेली में पहली बार कोई डर नहीं था।

     

    न कोई रहस्यमयी आवाज।

     

    न कोई बंद दरवाजा।

     

    न कोई छिपा हुआ राज।

     

    सिर्फ परिवार की हंसी थी।

     

    कुछ दिनों बाद गांव के लोगों ने हवेली के बाहर एक छोटा-सा बगीचा बना दिया।

     

    चांदनी और उसकी बहन वहां फूल लगाने लगीं।

     

    गौरी भी रोज उनकी मदद करने आने लगी।

     

    एक दिन गौरी ने मजाक में कहा, “अब अगर रात को यहां कोई परछाईं दिखाई दे तो?”

     

    चांदनी हंसते हुए बोली, “तो पहले पूछेंगे कि उसे भी चाय चाहिए या नहीं।”

     

    तीनों हंसने लगीं।

     

    सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

     

    आसमान पर हल्की चांदनी फैलने लगी।

     

    चांदनी ने हवेली की ऊपरी खिड़की की तरफ देखा।

     

    वहां एक दीपक जल रहा था।

     

    वह कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर उसकी बड़ी बहन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अब उसे बुझने दो।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब किसी को रास्ता दिखाने की जरूरत नहीं है।”

     

    दोनों बहनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।

     

    दीपक की लौ धीरे-धीरे बुझ गई।

     

    लेकिन चांद की रोशनी पहले से ज्यादा चमक रही थी।

     

    चांदनी मुस्कुराई।

     

    उसे आखिर समझ आ गया था कि चांदनी रात का असली अंधियारा हवेली में नहीं था, बल्कि उन लोगों के झूठ और डर में था, जिन्होंने सालों तक सच को छिपाए रखा।

     

    और जिस रात सच सामने आया, उसी रात वह अंधियारा हमेशा के लिए खत्म हो गया।

     

    समाप्त।

  • मां का छिपा सच

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 3: मां का छिपा हुआ सच

     

    “और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”

     

    उस लड़की की बात सुनकर चांदनी और गौरी जैसे पत्थर की हो गईं।

     

    चांदनी कुछ पल तक उसे देखती रही। उसके हाथ में पकड़ा पत्र कांप रहा था।

     

    “मेरी मां… रघुवीर सिंह की बेटी?”

     

    लड़की ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    चांदनी ने तुरंत पूछा, “लेकिन मेरी मां ने मुझे कभी इसके बारे में क्यों नहीं बताया?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस कुएं के पास रखे पुराने संदूक की तरफ देखने लगी।

     

    चांदनी ने फिर पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरा नाम भी चांदनी था।”

     

    चांदनी का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “मतलब… तुम वही लड़की हो जो सालों पहले गायब हो गई थी?”

     

    लड़की ने कुछ पल उसकी आंखों में देखा।

     

    “गायब हुई थी… लेकिन मरी नहीं थी।”

     

    गौरी ने हैरानी से पूछा, “फिर इतने साल कहां थीं?”

     

    लड़की ने कुएं की तरफ देखा।

     

    “इसका जवाब तुम्हारी मां के पास है।”

     

    चांदनी के मन में हजारों सवाल उठ रहे थे।

     

    “तुम मुझे डराने के लिए यहां क्यों आई हो?”

     

    लड़की ने कहा, “मैं तुम्हें डराने नहीं आई। मैं चाहती हूं कि तुम्हें सच पता चले। क्योंकि अब वही लोग दोबारा इस रहस्य के पीछे हैं।”

     

    “कौन लोग?”

     

    लड़की ने जवाब देने के बजाय दूर गांव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सुबह होने से पहले घर लौट जाना चाहिए।”

     

    चांदनी ने कहा, “नहीं। मैं अब बिना सच जाने वापस नहीं जाऊंगी।”

     

    लड़की ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी हो।”

     

    इतना कहकर वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    चांदनी ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल वह धुंधली रोशनी में गायब हो गई।

     

    गौरी ने कांपते हुए पूछा, “ये क्या था?”

     

    चांदनी ने जमीन पर पड़े पत्र को उठाया।

     

    “मुझे मां से बात करनी होगी।”

     

    दोनों घर लौट आईं।

     

    सुबह होते ही चांदनी ने मां के सामने वह पत्र रख दिया।

     

    मां ने पत्र देखा और उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये तुम्हें कहां मिला?”

     

    “पुराने कुएं के पास।”

     

    मां ने कांपते हाथों से कुर्सी पकड़ ली।

     

    “तुम वहां भी गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने तुम्हें मना किया था।”

     

    चांदनी की आवाज में इस बार गुस्सा था।

     

    “आपने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम इस सब से दूर रहो।”

     

    “लेकिन मैं पहले ही इस सब के बीच आ चुकी हूं।”

     

    कुछ देर तक कमरे में खामोशी रही।

     

    फिर मां ने धीरे से कहना शुरू किया।

     

    “हां, मैं रघुवीर सिंह की बेटी हूं।”

     

    चांदनी की आंखें भर आईं।

     

    “आपने इतने साल ये बात हमसे छिपाई?”

     

    “मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

     

    मां ने बताया कि उनका असली नाम राधिका था। बचपन में वह अपनी बड़ी बहन चांदनी के साथ उसी हवेली में रहती थीं।

     

    दोनों बहनों में बहुत प्यार था।

     

    लेकिन एक रात हवेली में अचानक हंगामा हुआ।

     

    उनके पिता किसी से बहस कर रहे थे।

     

    राधिका को उनकी बातों का मतलब समझ नहीं आया।

     

    उसी रात उनकी बड़ी बहन चांदनी गायब हो गई।

     

    “मैंने उसे बहुत ढूंढा,” राधिका ने कहा, “लेकिन वह नहीं मिली।”

     

    “फिर आप गांव में कैसे आईं?”

     

    “मेरे पिता के दोस्त ने मुझे अपनी बेटी की तरह पाला। उन्होंने मेरा नाम बदल दिया ताकि कोई मुझे पहचान न सके।”

     

    चांदनी ने पूछा, “लेकिन मेरी बहन कहां थी?”

     

    मां ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “लेकिन वह तो कल रात मेरे सामने थी।”

     

    मां अचानक चौंक गईं।

     

    “तुमने उसे देखा?”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “तो इसका मतलब… वो वापस आ गई है।”

     

    चांदनी ने पूछा, “मां, आपको किस बात का डर है?”

     

    मां ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

     

    दादी कमरे में आईं।

     

    उन्होंने कहा, “अब इससे कुछ मत छिपाओ।”

     

    मां ने दादी की तरफ देखा।

     

    दादी बोलीं, “इतने साल हमने चुप रहकर गलती की है।”

     

    चांदनी ने कहा, “मुझे सब जानना है।”

     

    दादी ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम्हारे नाना का मानना था कि हवेली में सिर्फ परिवार का झगड़ा नहीं हुआ था। किसी ने उनकी संपत्ति हड़पने की कोशिश की थी।”

     

    “किसने?”

     

    “उनके सबसे करीबी आदमी ने।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्या वह आदमी अभी जिंदा है?”

     

    दादी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    चांदनी और गौरी एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    “कौन?”

     

    दादी ने नाम लिया—

     

    “देवराज।”

     

    चांदनी ने यह नाम पहली बार सुना था।

     

    मां बोलीं, “देवराज तुम्हारे नाना का भरोसेमंद आदमी था। वह घर के सारे काम और संपत्ति के कागज संभालता था।”

     

    “और फिर?”

     

    “एक रात तुम्हारे नाना ने उसे कुछ कागजों के साथ पकड़ लिया। शायद वह संपत्ति अपने नाम करवाने की कोशिश कर रहा था।”

     

    “फिर मेरी मौसी… यानी बड़ी चांदनी?”

     

    मां ने कहा, “उसी रात वह गायब हुई।”

     

    चांदनी के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “क्या देवराज ने उसे…?”

     

    मां ने तुरंत कहा, “हमें नहीं पता। लेकिन तुम्हारे नाना ने उसके बाद देवराज पर भरोसा नहीं किया।”

     

    दादी ने कहा, “और कुछ ही दिनों बाद तुम्हारे नाना भी गायब हो गए।”

     

    कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    चांदनी को अचानक पिछली रात की बात याद आई।

     

    वह लड़की बार-बार कह रही थी कि सच उसके अपने घर में छिपा है।

     

    “मां, अगर मौसी जिंदा हैं तो वह अब तक हवेली में क्यों थीं?”

     

    मां ने कहा, “शायद वह किसी वजह से वापस नहीं आ सकीं।”

     

    तभी बाहर किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    सभी चौंक गए।

     

    चांदनी खिड़की के पास गई।

     

    बाहर आंगन में कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर एक पुराना कागज पड़ा था।

     

    चांदनी बाहर गई और उसे उठा लाई।

     

    कागज पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, वह हवेली में नहीं है।”

     

    चांदनी ने कागज पलटा।

     

    पीछे एक पुराने मंदिर का नाम लिखा था।

     

    गौरी ने पूछा, “ये क्या है?”

     

    चांदनी बोली, “शायद अगला सुराग।”

     

    मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम कहीं नहीं जाओगी।”

     

    “लेकिन मां—”

     

    “नहीं!”

     

    मां की आवाज में पहली बार इतना डर था कि चांदनी चुप हो गई।

     

    दादी ने मां को देखा।

     

    “राधिका, अब इसे रोकना मुश्किल है।”

     

    मां की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे डर है कि अगर उसने सच जान लिया तो…”

     

    चांदनी ने पूछा, “तो क्या?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात चांदनी अपने कमरे में बैठी रही।

     

    उसके पास अब तीन चीजें थीं—पुरानी पायल, वह पत्र और मंदिर का नाम।

     

    आधी रात के करीब पायल फिर से हिली।

     

    छन…

     

    चांदनी ने उसे उठाया।

     

    इस बार पायल के नीचे एक बहुत छोटा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मुझ पर भरोसा करो। मंदिर के पीछे पुराने पीपल के पेड़ के नीचे तुम्हारे नाना का आखिरी राज है।”

     

    चांदनी ने कागज पढ़ा।

     

    तभी खिड़की के बाहर किसी की परछाईं दिखाई दी।

     

    वह तुरंत खिड़की तक गई।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन आंगन के रास्ते पर मिट्टी में पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान घर से बाहर नहीं…

     

    बल्कि घर के अंदर की तरफ जा रहे थे।

     

    चांदनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ी।

     

    कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    और दरवाजे के पास एक आदमी खड़ा था।

     

    चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “बहुत खोज लिया तुमने।”

     

    चांदनी पीछे हट गई।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    आदमी ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    “जिस सच को तुम्हारा परिवार इतने सालों से छिपाता आया है… उसे जानने की कीमत बहुत बड़ी है।”

     

    चांदनी ने हिम्मत करके पूछा—

     

    “क्या तुम देवराज हो?”

     

    आदमी कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “तुम्हें मेरा नाम किसने बताया?”

     

    चांदनी समझ गई कि उसके सामने वही आदमी था, जिसका नाम दादी ने लिया था।

     

    लेकिन वह कुछ और पूछ पाती, उससे पहले कमरे की खिड़की जोर से बंद हुई।

     

    दीपक बुझ गया।

     

    और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूंजी—

     

    “चांदनी… भागो!”

     

    चांदनी ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वही उसकी बड़ी बहन खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    और उसकी नजर सीधे देवराज पर थी।

  • बंद कमरे का सच

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 2: बंद कमरे का सच

     

    कमरे में अचानक दीपक जलते ही चांदनी और गौरी कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गईं।

     

    अंधेरे में जो आवाज गूंजी थी, वह अभी भी उनके कानों में गूंज रही थी।

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    चांदनी ने कांपती आवाज में पूछा, “कौन हो तुम?”

     

    कमरे में कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    गौरी ने चांदनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चांदनी, चलो यहां से। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    “पहले पता करते हैं कि ये आवाज किसकी है।”

     

    “तुम्हें हर चीज की सच्चाई जाननी जरूरी है क्या?”

     

    “हां।”

     

    गौरी ने परेशान होकर कहा, “तुम्हारी यही आदत एक दिन हमें बड़ी मुसीबत में डाल देगी।”

     

    चांदनी कुछ बोलती, उससे पहले दीपक की लौ अचानक तेज हुई।

     

    दीवार पर एक परछाईं बनी।

     

    वही लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने डरते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    इस बार कोई जवाब नहीं आया।

     

    बस परछाईं धीरे-धीरे दीवार पर आगे बढ़ी और एक पुराने चित्र के पास जाकर रुक गई।

     

    चांदनी उस चित्र के पास गई।

     

    चित्र में एक परिवार खड़ा था।

     

    एक आदमी, एक औरत और उनके बीच एक छोटी लड़की।

     

    चांदनी ने चित्र को ध्यान से देखा।

     

    उस लड़की का चेहरा देखकर वह चौंक गई।

     

    “ये तो वही लड़की है।”

     

    गौरी ने पूछा, “जिसे हमने नीचे देखा था?”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    चित्र के नीचे नाम लिखा था—

     

    “रघुवीर सिंह का परिवार।”

     

    चांदनी ने धीरे से कहा, “तो इस हवेली के मालिक का नाम रघुवीर सिंह था।”

     

    तभी मेज पर रखी तस्वीर हवा से हिलने लगी।

     

    तस्वीर के पीछे से एक छोटा कागज नीचे गिरा।

     

    चांदनी ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, उसका जवाब इस घर में नहीं, तुम्हारे अपने घर में छिपा है।”

     

    चांदनी की सांस रुक गई।

     

    “मेरे घर में?”

     

    गौरी बोली, “ये क्या मतलब हुआ?”

     

    चांदनी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसके दिमाग में अपनी मां की बातें घूमने लगीं।

     

    मां हमेशा इस हवेली का नाम सुनते ही चुप क्यों हो जाती थीं?

     

    दादी ने भी उसे आधा सच ही क्यों बताया?

     

    और सबसे बड़ी बात—हवेली की लड़की का नाम भी चांदनी क्यों था?

     

    तभी नीचे से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    गौरी घबरा गई।

     

    “कोई अंदर आया है!”

     

    चांदनी ने दीपक उठा लिया।

     

    दोनों कमरे से बाहर निकलीं।

     

    सीढ़ियों के नीचे कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    गौरी ने फुसफुसाकर कहा, “जब हम आए थे तब दरवाजा बंद था।”

     

    चांदनी ने कहा, “हमें यहां से निकलना चाहिए।”

     

    दोनों तेजी से नीचे आईं और हवेली से बाहर निकल गईं।

     

    घर लौटते समय चांदनी बिल्कुल चुप थी।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    “मुझे लगता है मेरी मां कुछ जानती हैं।”

     

    अगली सुबह चांदनी ने मां से सीधे सवाल किया।

     

    “मां, क्या आपका इस हवेली से कोई संबंध है?”

     

    मां के हाथ रुक गए।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “क्योंकि मैं कल रात वहां गई थी।”

     

    मां के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तुम हवेली गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए था!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां जो हुआ था, उसे दोबारा छेड़ना ठीक नहीं है।”

     

    चांदनी की आंखें भर आईं।

     

    “मां, मुझे सच जानने का हक है।”

     

    मां कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे जन्म से पहले की बात है।”

     

    चांदनी ध्यान से सुनने लगी।

     

    “जब मैं छोटी थी, तब उस हवेली में रघुवीर सिंह का परिवार रहता था। उनकी एक बेटी थी। उसका नाम चांदनी था।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात वह लड़की गायब हो गई।”

     

    “और?”

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “उस रात तुम्हारे नाना वहां गए थे।”

     

    चांदनी चौंक गई।

     

    “नाना?”

     

    “हां। उन्होंने कुछ देखा था। लेकिन उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    चांदनी को यकीन नहीं हुआ।

     

    “मां, आप कुछ छिपा रही हैं।”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहती हूं।”

     

    “किससे?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    दोनों चुप हो गईं।

     

    बाहर दादी खड़ी थीं।

     

    दादी अंदर आईं और चांदनी को देखते ही समझ गईं कि अब बात छिपाना मुश्किल है।

     

    उन्होंने कहा, “अब इसे सच बता देना चाहिए।”

     

    मां ने कहा, “लेकिन मां…”

     

    दादी बोलीं, “अगर इसे सच नहीं बताया तो ये खुद उसे ढूंढने जाएगी।”

     

    चांदनी ने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपको सब पता है?”

     

    दादी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    फिर उन्होंने अपनी पुरानी संदूकची खोली।

     

    उसमें से एक कपड़े में लिपटी हुई छोटी-सी चीज निकाली।

     

    वह एक चांदी की पायल थी।

     

    चांदनी ने पायल देखते ही कहा, “ये तो…”

     

    दादी बोलीं, “ये उसी लड़की की थी।”

     

    चांदनी ने पायल हाथ में ले ली।

     

    उसी पल उसे रात का दृश्य याद आया।

     

    वह लड़की सीढ़ियों पर खड़ी थी।

     

    उसके पैर में एक पायल थी।

     

    चांदनी के हाथ कांपने लगे।

     

    “लेकिन ये पायल आपके पास कैसे आई?”

     

    दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना इसे हवेली से लेकर आए थे।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन्हें लगा था कि लड़की शायद किसी मुसीबत में थी।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्या वह जिंदा थी?”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    “हमें कभी पता नहीं चला।”

     

    चांदनी की आंखों में डर और सवाल दोनों थे।

     

    “तो फिर हर पूर्णिमा की रात जो दिखाई देती है… वो कौन है?”

     

    दादी ने जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात चांदनी ने पायल अपने पास रख ली।

     

    उसे नींद नहीं आई।

     

    आधी रात को अचानक पायल से हल्की-सी आवाज आई।

     

    छन…

     

    चांदनी उठकर बैठ गई।

     

    पायल खुद-ब-खुद हिल रही थी।

     

    वह डरते हुए उसके पास गई।

     

    पायल के नीचे एक छोटा कागज रखा था।

     

    उसने कागज खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पुराने कुएं के पास आओ।”

     

    चांदनी ने तुरंत खिड़की से बाहर देखा।

     

    दूर वही लड़की खड़ी थी।

     

    वह कुछ पल चांदनी को देखती रही।

     

    फिर मुड़कर गांव के पुराने कुएं की तरफ चल दी।

     

    चांदनी ने बिना किसी को जगाए घर से निकलने का फैसला किया।

     

    लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।

     

    गौरी पहले से बाहर उसका इंतजार कर रही थी।

     

    “मुझे पता था तू जाएगी।”

     

    चांदनी मुस्कुराई।

     

    “चल।”

     

    दोनों पुराने कुएं तक पहुंचीं।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर मिट्टी थोड़ी उखड़ी हुई थी।

     

    चांदनी नीचे बैठी और हाथों से मिट्टी हटाने लगी।

     

    कुछ देर बाद उसे लकड़ी का एक छोटा संदूक मिला।

     

    उसने संदूक खोला।

     

    अंदर पुराने कागज, एक तस्वीर और एक पत्र था।

     

    तस्वीर में रघुवीर सिंह की बेटी थी।

     

    उसके साथ एक छोटी लड़की भी खड़ी थी।

     

    चांदनी ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “मेरी बेटी के बाद उसकी छोटी बहन की जिम्मेदारी मेरी दोस्त की बेटी संभालेगी।”

     

    चांदनी का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “दोस्त की बेटी?”

     

    गौरी ने पूछा, “कौन?”

     

    चांदनी ने पत्र खोला।

     

    पहली ही पंक्ति पढ़ते ही उसके हाथ कांपने लगे।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरी बेटी चांदनी वापस न आए, तो उसकी छोटी बहन को मेरी सबसे भरोसेमंद दोस्त के पास भेज देना।”

     

    चांदनी ने धीरे से कहा—

     

    “लेकिन रघुवीर सिंह की तो सिर्फ एक बेटी थी…”

     

    तभी पीछे से वही धीमी आवाज आई—

     

    “नहीं… दो बेटियां थीं।”

     

    चांदनी और गौरी ने एक साथ पीछे देखा।

     

    वही लड़की उनके सामने खड़ी थी।

     

    चांदनी की सांस अटक गई।

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”

     

    चांदनी के हाथ से पत्र जमीन पर गिर गया।

     

    उसके सामने अब सिर्फ हवेली का नहीं…

     

    बल्कि उसके अपने परिवार का सबसे बड़ा राज खुलने वाला था।

  • वो आ गया…

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वो आ गया…

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के आखिरी छोर पर बने छोटे-से मोहल्ले में लगभग हर घर की बत्तियां बुझ चुकी थीं। सड़क बिल्कुल शांत थी। कभी-कभी किसी दूर जाती गाड़ी की आवाज आती और फिर सब कुछ पहले जैसा खामोश हो जाता।

     

    उसी मोहल्ले में आरव अपने माता-पिता और छोटी बहन रिया के साथ रहता था।

     

    उस रात उसके माता-पिता एक रिश्तेदार के घर गए हुए थे और रिया अपनी सहेली के घर रुक गई थी। घर में सिर्फ आरव था।

     

    आरव पढ़ाई कर रहा था कि अचानक बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने घड़ी देखी।

     

    “इस वक्त कौन आया?”

     

    वह कुर्सी से उठा और दरवाजे के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज पहले से थोड़ी तेज थी।

     

    आरव ने दरवाजे की छोटी खिड़की से बाहर देखा।

     

    सामने का बरामदा खाली था।

     

    “शायद कोई शरारत कर रहा है।”

     

    वह वापस कमरे में चला गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने किताब खोली, उसका फोन बज उठा।

     

    स्क्रीन पर रिया का नाम था।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    “हां, बोल।”

     

    रिया की आवाज बहुत धीमी थी—

     

    “भैया… दरवाजा मत खोलना।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी सहेली के घर के बाहर कोई बहुत देर से खड़ा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    “पता नहीं। वो बस सड़क की तरफ देख रहा है।”

     

    आरव खिड़की के पास गया।

     

    बाहर फिर वही सुनसान सड़क थी।

     

    “तुम घबराओ मत। अपनी सहेली के घर में ही रहना।”

     

    “भैया…”

     

    “हां?”

     

    रिया कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन अचानक फोन कट गया।

     

    आरव ने दोबारा फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    उसने बेचैनी में मोबाइल मेज पर रखा।

     

    तभी उसके घर के बाहर से आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके हाथ से फोन लगभग गिर गया।

     

    आवाज बहुत धीमी थी।

     

    लेकिन वह साफ सुन सकता था।

     

    किसी ने उसका नाम लिया था।

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    इस बार आवाज घर के पीछे से आई थी।

     

    आरव तुरंत पीछे मुड़ा।

     

    घर के पीछे वाला कमरा कई महीनों से बंद पड़ा था। वहां पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं था।

     

    उस कमरे का दरवाजा अचानक अपने आप थोड़ा खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने हिम्मत करके दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “बस बहुत हो गया।”

     

    वह अपने कमरे में लौट आया।

     

    तभी ऊपर की मंजिल से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “ऊपर तो कोई नहीं है…”

     

    वह सीढ़ियों के पास पहुंचा।

     

    ऊपर पूरा अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    सीढ़ियों पर एक-एक कदम रखते हुए ऊपर जाने लगा।

     

    पहली मंजिल पर पहुंचकर उसने देखा कि गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    यह कमरा उसके दादा का था।

     

    दादा की मृत्यु को कई साल हो चुके थे और तब से कमरा लगभग बंद ही रहता था।

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    कमरे में रखी पुरानी अलमारी खुली हुई थी।

     

    फर्श पर कुछ पुराने कागज बिखरे थे।

     

    एक कागज पर उसकी नजर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जब वह आए, तो उसका नाम मत लेना।”

     

    आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    “वह कौन?”

     

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई—

     

    “मैं…”

     

    आरव ने झटके से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने तुरंत कमरे से बाहर निकलने की कोशिश की।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    उसने हैंडल घुमाया।

     

    “खुलो!”

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    फिर कमरे की खिड़की पर किसी की परछाईं दिखाई दी।

     

    आरव कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    परछाईं धीरे-धीरे खिड़की से हट गई।

     

    फिर कमरे के बाहर से कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने सांस रोक ली।

     

    कदमों की आवाज दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई।

     

    कुछ सेकंड बाद किसी ने दरवाजे पर हाथ रखा।

     

    आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश नहीं की।

     

    तभी बाहर से एक आवाज आई—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे यहां आने से रोका था।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “लेकिन अब वो नहीं हैं।”

     

    अचानक दरवाजा खुल गया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    गलियारा खाली था।

     

    वह भागकर सीढ़ियों की तरफ आया।

     

    तभी नीचे से मुख्य दरवाजा खुलने की आवाज आई।

     

    चर्ररर…

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    दरवाजे के पास एक लंबी परछाईं दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर आ रही थी।

     

    आरव ने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर के पास बैठ गया।

     

    उसका फोन फिर बजा।

     

    इस बार रिया का फोन था।

     

    “भैया!”

     

    “रिया! तुम ठीक हो?”

     

    “हां, लेकिन आप घर में अकेले हो?”

     

    “हां।”

     

    रिया कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “भैया… अभी मैं घर के बाहर खड़ी हूं।”

     

    आरव का दिल जैसे रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैं अभी घर पहुंची हूं।”

     

    आरव ने घबराकर पूछा—

     

    “लेकिन तुमने तो कहा था कि तुम अपनी सहेली के घर हो!”

     

    रिया बोली—

     

    “मैं थी। लेकिन मुझे लगा कोई मुझे घर तक छोड़ने आया है।”

     

    “कौन?”

     

    रिया ने धीरे से कहा—

     

    “वही आदमी जो हमारे घर के बाहर खड़ा है।”

     

    आरव ने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

     

    सड़क पर रिया खड़ी थी।

     

    उसके पीछे एक लंबी परछाईं थी।

     

    आरव ने घबराकर दरवाजा खोला और बाहर जाने लगा।

     

    तभी उसके दादा के कमरे से फिर वही आवाज आई—

     

    “उसे अंदर मत आने देना।”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    कमरे के अंदर रखी पुरानी मेज पर एक डायरी खुली हुई थी।

     

    वह दौड़कर उसके पास गया।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “वो इंसान नहीं है। वह उन लोगों के घर आता है, जहां पुराने घर का एक राज छिपा हो। उसे रोकने का एक ही तरीका है—उस राज को स्वीकार करना।”

     

    आरव ने तेजी से पुराने कागज देखे।

     

    उसे पता चला कि वर्षों पहले उनके घर की जमीन को लेकर एक बड़ा विवाद हुआ था। उसके दादा ने किसी निर्दोष परिवार को उनका हक दिलाने की कोशिश की थी, लेकिन वह परिवार गांव छोड़कर चला गया था।

     

    शायद उसी अधूरे अन्याय की वजह से यह रहस्य इतने वर्षों से घर से जुड़ा था।

     

    आरव ने डायरी हाथ में ली और बाहर आ गया।

     

    सामने वह परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “मैं सच जानता हूं।”

     

    परछाईं रुक गई।

     

    “मेरे दादा ने जो गलती की थी, मैं उसे छिपाऊंगा नहीं।”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर वह परछाईं धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    रिया दौड़कर आरव के पास आ गई।

     

    “भैया!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    परछाईं सड़क के आखिरी छोर तक गई और अचानक गायब हो गई।

     

    सुबह मोहल्ले के बुजुर्गों को सारी बात बताई गई।

     

    पुराने कागजों की जांच हुई और सच सामने आया कि कई साल पहले जमीन का अधिकार वास्तव में दूसरे परिवार का था।

     

    आरव के परिवार ने वह जमीन उन्हें वापस कर दी।

     

    उस दिन के बाद घर में कभी कोई अजीब आवाज नहीं आई।

     

    कई महीनों बाद आरव उसी कमरे में बैठा दादा की डायरी पढ़ रहा था।

     

    अचानक खिड़की से ठंडी हवा आई।

     

    डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटा।

     

    उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

     

    “अब मैं जा रहा हूं।”

     

    आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    बस दूर सड़क पर एक परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

    और उस रात के बाद मोहल्ले में किसी ने उसे दोबारा नहीं देखा।

     

    लेकिन आज भी जब कभी उस पुराने घर के पास रात में हवा अचानक ठंडी हो जाती है, लोग कहते हैं—

     

    “डरना मत… वो आ गया था, अपना सच लेने… और सच मिलते ही चला गया।”

  • अंधेरी नगरी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    अंधेरी नगरी और कातिल निगाहें

     

    शहर का नाम था काली नगरी।

     

    दिन में यह शहर बाकी शहरों जैसा ही दिखाई देता था। बाजारों में भीड़ रहती, दुकानें खुलतीं और लोग अपने काम में व्यस्त रहते। लेकिन जैसे ही सूरज डूबता, पूरा शहर बदल जाता।

     

    सड़कें सुनसान हो जातीं। घरों के दरवाजे बंद हो जाते और लोग खिड़कियों पर भी पर्दे डाल देते।

     

    क्योंकि इस शहर में एक अजीब डर था।

     

    लोग कहते थे कि रात में गलियों में एक जोड़ी कातिल निगाहें घूमती हैं।

     

    जिसकी नजर उन आंखों से मिल जाती, उसके बाद वह इंसान हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    पुलिस ने कई बार तलाश की, लेकिन हर बार कोई सुराग नहीं मिला।

     

    इसी शहर में आरव नाम का एक लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक रात उसका दोस्त निखिल उसके घर आया।

     

    “आरव, आज मेरे घर चलना मत। देर हो गई है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तुम भी इन अफवाहों पर विश्वास करने लगे?”

     

    निखिल ने गंभीर होकर कहा, “अफवाह होती तो अब तक इतने लोग गायब क्यों होते?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात उसे अपनी दादी की दवा लेने बाजार जाना पड़ा।

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

     

    जैसे ही आरव पुरानी गली में पहुंचा, उसे लगा कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    वह रुका।

     

    पीछे देखा।

     

    गली खाली थी।

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक खिड़की में दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    वह कुछ समझ पाता, उससे पहले खिड़की बंद हो गई।

     

    आरव तेजी से आगे बढ़ा।

     

    तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—

     

    “रुको!”

     

    आरव पलटा।

     

    एक लड़की काले दुपट्टे में उसके सामने खड़ी थी।

     

    “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    आरव ने कहा, “दवा लेने जा रहा हूं।”

     

    लड़की ने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। आगे मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां से कोई वापस नहीं आता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की कुछ पल चुप रही।

     

    “मेरा नाम तारा है।”

     

    तभी दूर से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    तारा घबरा गई।

     

    “चलो!”

     

    दोनों पास की एक पुरानी हवेली में छिप गए।

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें उन आंखों के बारे में क्या पता है?”

     

    तारा ने धीमी आवाज में कहा, “बहुत कुछ।”

     

    “तो बताओ।”

     

    “ये आंखें किसी भूत की नहीं हैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    तारा ने कहा, “इस शहर में पिछले पांच सालों से लोग गायब हो रहे हैं। सबको लगता है कि कोई अदृश्य ताकत उन्हें उठा ले जाती है। लेकिन असली सच इंसानों से भी ज्यादा डरावना है।”

     

    “कौन है इसके पीछे?”

     

    तारा ने हवेली की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    वहां पुराने शहर का नक्शा बना था।

     

    “इन सभी गायब हुए लोगों के घर एक ही रास्ते के आसपास थे।”

     

    आरव ने नक्शा देखा।

     

    “तो?”

     

    “ये रास्ता सीधे शहर के पुराने महल तक जाता है।”

     

    आरव ने पूछा, “पुराना महल तो बीस साल से बंद है।”

     

    “हां।”

     

    “फिर वहां कौन रहता है?”

     

    तारा ने कहा, “यही पता लगाने मैं यहां आई हूं।”

     

    दोनों उसी रात महल की ओर निकल पड़े।

     

    महल का बड़ा दरवाजा आधा खुला था।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    तारा ने आरव का हाथ पकड़कर कहा, “सावधान रहना।”

     

    वे धीरे-धीरे अंदर बढ़े।

     

    अचानक सामने दीवार पर दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तारा ने फुसफुसाकर कहा, “यही हैं… कातिल निगाहें।”

     

    लेकिन तभी उन आंखों के नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम दोनों यहां क्यों आए हो?”

     

    आरव ने पूछा, “लोग कहां गायब हो रहे हैं?”

     

    बूढ़ा कुछ देर उन्हें देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “क्योंकि इस शहर का असली मालिक कोई इंसान नहीं… उसका लालच है।”

     

    बूढ़े ने उन्हें एक तहखाने में ले जाकर दिखाया कि वहां पुराने कागज और जमीन के दस्तावेज रखे थे।

     

    असल में शहर के कुछ बड़े लोग गरीब लोगों की जमीन हड़पना चाहते थे। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता, उसे डराकर शहर से गायब कर दिया जाता।

     

    और कातिल निगाहें कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थीं।

     

    वे एक गुप्त सुरंग में लगाए गए चमकीले शीशों और रोशनी का हिस्सा थीं, जिनसे लोगों को दूर से ऐसा लगता था जैसे अंधेरे में कोई डरावनी आंखें उन्हें देख रही हों।

     

    लेकिन एक सवाल बाकी था।

     

    “लोगों को गायब कौन करता है?” आरव ने पूछा।

     

    बूढ़े ने जवाब दिया—

     

    “शहर का सबसे बड़ा व्यापारी… रुद्रसेन।”

     

    तारा ने तुरंत कहा, “लेकिन वह तो लोगों की मदद करने के लिए मशहूर है।”

     

    बूढ़ा हंस पड़ा।

     

    “सबसे खतरनाक चेहरा वही होता है जो हमेशा नेक दिखाई दे।”

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—

     

    “बहुत बातें हो गईं।”

     

    तीनों पलटे।

     

    दरवाजे पर रुद्रसेन खड़ा था।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    रुद्रसेन ने कहा, “तुम दोनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा, “लोगों को क्यों गायब किया?”

     

    रुद्रसेन ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि डर सबसे सस्ता हथियार है।”

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि तारा पहले ही सारे दस्तावेजों की तस्वीरें अपने फोन में ले चुकी थी।

     

    उसने मौका मिलते ही वे तस्वीरें पुलिस को भेज दीं।

     

    कुछ ही देर में महल को पुलिस ने घेर लिया।

     

    रुद्रसेन पकड़ा गया।

     

    उसके साथ कई और लोगों के नाम सामने आए।

     

    अगली सुबह पहली बार काली नगरी के लोगों ने बिना डर के अपने घरों के दरवाजे खोले।

    रात हुई।

    लेकिन इस बार किसी खिड़की में चमकती आंखें नहीं थीं।

    आरव उसी पुरानी गली से गुजर रहा था।तारा उसके साथ थी।

    आरव ने मुस्कुराकर कहा

    “तो खत्म हुआ कातिल निगाहों का डर।”

     

    तारा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा

    “डर कभी खत्म नहीं होता आरव… बस उसका सच सामने आ जाता है।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    लेकिन शहर के सबसे पुराने मकान की बंद खिड़की के पीछे…

     

    अचानक दो चमकती आंखें फिर दिखाई दीं।

     

    कुछ सेकंड बाद खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    और अंधेरे में किसी की धीमी आवाज सुनाई दी

    “कहानी खत्म नहीं हुई…”

  • कोई मरता नहीं था

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस घर में कोई मरता नहीं था

     

    शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव था देवगढ़। गांव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुराना मकान था, जिसे लोग “अमर हवेली” कहते थे।

     

    अजीब बात ये थी कि उस घर में पिछले सौ सालों से रहने वाला कोई भी इंसान कभी मरा नहीं था।

     

    लोगों को यह बात सुनने में अच्छी लगती थी, लेकिन गांव का कोई आदमी उस घर के पास तक नहीं जाता था।

     

    कहा जाता था कि जो भी उस घर में रहने जाता है, वह बूढ़ा तो होता है, बीमार भी पड़ता है, लेकिन उसकी मौत कभी नहीं होती।

     

    इसी गांव में एक दिन अमन नाम का लड़का अपनी मां के साथ आया। उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और उसकी मां को गांव में पुश्तैनी जमीन मिली थी।

     

    अमन ने घर के बारे में सुना तो हंसते हुए बोला,

     

    “मां, लोग भी न… कुछ भी कहानी बना लेते हैं। कोई इंसान मरता नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है?”

     

    पास खड़े बूढ़े हरिदास ने उसकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने अमन की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “बेटा, कहानी नहीं है। मैंने अपनी आंखों से उस घर के लोगों को देखा है।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर वो लोग अभी तक जिंदा हैं?”

     

    हरिदास का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “हां… लेकिन जिंदा रहना और जिंदगी जीना दो अलग बातें हैं।”

     

    अमन कुछ समझ नहीं पाया।

     

    उस रात अमन और उसकी मां गांव के एक पुराने मकान में रुके। आधी रात को अचानक उनके दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    सामने हरिदास खड़े थे।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

     

    “कल अगर कोई तुम्हें अमर हवेली में जाने को कहे… तो मत जाना।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस जाते-जाते इतना बोले,

     

    “उस घर में मौत नहीं आती… लेकिन वहां से कोई वापस भी नहीं आता।”

     

    अगली सुबह अमन अपनी मां के साथ खेत देखने निकला। रास्ते में उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई।

     

    औरत ने अमन को देखते ही कहा,

     

    “तुम उसी घर के नए मालिक हो न?”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे परिवार का नंबर आ गया है।”

     

    अमन को उसकी बात अजीब लगी।

     

    “कौन-सा नंबर?”

     

    औरत कुछ बोलती, उससे पहले उसकी मां ने अमन को वहां से चलने के लिए कहा।

     

    उस शाम उन्हें पुराने कागज मिले, जिनमें लिखा था कि अमर हवेली उनके परिवार की ही थी।

     

    अमन ने जिद की,

     

    “मां, हमें वो घर देखना चाहिए।”

     

    मां ने मना किया।

     

    लेकिन अमन अकेला ही हवेली पहुंच गया।

     

    लोहे का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    अंदर धूल से भरा आंगन था। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    लेकिन उन चित्रों में एक चीज अजीब थी।

     

    हर तस्वीर में एक ही परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    और हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    1920… 1935… 1951… 1970… 1992… 2010…

     

    अमन ने गौर से देखा।

     

    तस्वीरों में मौजूद लोग उम्र में लगभग एक जैसे थे।

     

    तभी पीछे से आवाज आई,

     

    “तुम आ ही गए।”

     

    अमन पलटा।

     

    एक बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    उसकी आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “इस घर का रखवाला।”

     

    “यहां कौन रहता है?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे अपने लोग।”

     

    अमन ने दीवार पर लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “तुम्हारे दादा… परदादा… और उनसे भी पहले के लोग।”

     

    अमन के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन ये सब तो मर चुके हैं।”

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे उसके करीब आया।

     

    “नहीं। इस घर में कोई नहीं मरता।”

     

    अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    लेकिन तभी एक कमरे का दरवाजा खुला।

     

    अंदर से एक आदमी बाहर आया।

     

    अमन उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “अमन…”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आप जिंदा हैं?”

     

    उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस कहा,

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमन उसके पास जाने लगा।

     

    तभी बूढ़े ने चिल्लाकर कहा,

     

    “भागो!”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

     

    दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

     

    और दीवारों पर लगी तस्वीरों के चेहरे बदलने लगे।

     

    अब हर तस्वीर में अमन दिखाई दे रहा था।

     

    कहीं वह बच्चा था।

     

    कहीं बूढ़ा।

     

    कहीं बिल्कुल वैसा ही जैसा अभी था।

     

    अमन घबराकर दरवाजे की ओर भागा।

     

    लेकिन रास्ते में उसके पिता खड़े थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अगर बाहर गए तो मैं हमेशा के लिए अकेला रह जाऊंगा।”

     

    अमन रुक गया।

     

    “आप मेरे पिता नहीं हैं।”

     

    उस आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा।

     

    और उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े दिखाई दिए।

     

    वे सभी अमन के परिवार के पुराने सदस्य थे।

     

    सबकी आंखें अमन पर थीं।

     

    तभी बूढ़ा चिल्लाया,

     

    “इसे बाहर निकालो!”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फर्श पर बनी एक काली रेखा चमकी और अमन उसके बीच खिंचता चला गया।

     

    अगले ही पल सब शांत हो गया।

     

    सुबह अमन की मां हवेली के बाहर पहुंची।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर अमन नहीं था।

     

    सिर्फ एक नई तस्वीर दीवार पर टंगी थी।

     

    उस तस्वीर में अमन खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी

    11 अगस्त 2026

     

    मां चीख पड़ी।

     

    तभी पीछे से हरिदास की आवाज आई,

     

    “अब समझ आया कि इस घर में कोई क्यों नहीं मरता?”

     

    मां ने कांपते हुए पूछा,“क्यों?”

     

    हरिदास ने कहा,

     

    “क्योंकि मौत उन्हें लेने आती ही नहीं…”

     

    उन्होंने हवेली की तरफ देखा।

     

    “यह घर इंसानों को मारता नहीं है। यह उनकी मौत अपने अंदर कैद कर लेता है।”

    मां ने रोते हुए पूछा,

     

    “तो अमन?”

     

    हरिदास ने धीरे से कहा,

     

    “अब वह जिंदा है… हमेशा जिंदा रहेगा।”

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन हरिदास ने अगली बात कही तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन वह अब इंसानों की दुनिया में नहीं है।”

     

    उसी समय हवेली के अंदर से अमन की आवाज आई

     

    “मां…”

     

    मां दौड़कर अंदर जाने लगी।

     

    हरिदास ने उसे रोक लिया।

    “मत जाना!”

    “वो मेरा बेटा है!”

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “वह आवाज अमन की नहीं है।”

     

    अंदर से फिर आवाज आई“मां… मुझे बचा लो…”

    मां दरवाजे पर खड़ी रोती रही।

     

    और हवेली की दीवार पर लगी नई तस्वीर में अमन की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसके चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

    फिर तस्वीर के नीचे लिखी तारीख अपने आप बदल गई।

    11 अगस्त 2026 मिट गई।

     

    उसकी जगह लिखा आया अगला नाम: अमन की मां।

     

    और उसी पल हवेली का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    धड़ाम!

    उस दिन के बाद देवगढ़ गांव में एक और बात मशहूर हो गई “जिस घर में कोई मरता नहीं था, वहां रहने वालों की उम्र जरूर बढ़ती थी… लेकिन हर पीढ़ी के साथ वह घर एक नए इंसान को अपना बना लेता था।”

    और सबसे डरावनी बात?

    बस उसकी दीवार पर अब एक नई तस्वीर के लिए जगह खाली थी।

  • श्रापित आईना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित आईना

     

    शहर से दूर, घने जंगलों के बीच एक विशाल लेकिन उजड़ा हुआ महल खड़ा था। लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। कहते थे कि उस हवेली में लगा एक पुराना आईना इंसान का चेहरा नहीं, बल्कि उसकी मौत दिखाता था।

     

    जो भी उस आईने में अपनी आखिरी झलक देख लेता, वह सात दिनों के भीतर रहस्यमयी तरीके से मर जाता।

     

    इसी वजह से कई सालों से उस हवेली के आसपास कोई नहीं जाता था।

     

    लेकिन अदिति इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी। वह इतिहास की शोधकर्ता थी और पुरानी हवेलियों के रहस्यों पर काम करती थी। उसे भूत-प्रेत की कहानियाँ नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सच्चाई खोजने का शौक था।

     

    एक दिन उसे काली हवेली के बारे में पता चला।

     

    लोगों ने उसे बहुत समझाया।

     

    “बेटी, वहाँ मत जाना। जिसने भी उस आईने को देखा है, वह कभी नहीं बचा।”

     

    अदिति मुस्कुराई।

     

    “अगर हर अफवाह सच होती, तो दुनिया में कोई ज़िंदा नहीं बचता।”

     

    अगली सुबह वह कैमरा, डायरी और टॉर्च लेकर हवेली पहुँच गई।

     

    हवेली का विशाल दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। अंदर हर तरफ धूल, मकड़ी के जाले और टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे सदियों से वहाँ कोई आया ही न हो।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर बढ़ती गई।

     

    अचानक उसकी नज़र एक बड़े से कमरे पर पड़ी।

     

    कमरे के बीचोंबीच सोने की नक्काशी वाला एक विशाल आईना रखा था।

     

    उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।

     

    अदिति ने रूमाल से धूल साफ की।

     

    जैसे ही उसने आईने में देखा, उसका दिल धड़कना बंद होने जैसा हो गया।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ उसने खुद को एक गहरी खाई के किनारे खड़ा देखा।

     

    अचानक पीछे से किसी ने उसे ज़ोर से धक्का दिया।

     

    आईने में दिख रही अदिति चीखती हुई खाई में गिर गई।

     

    और उसी पल आईना फिर सामान्य हो गया।

     

    अदिति के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “यह… यह क्या था?”

     

    उसने खुद को समझाया कि शायद यह कोई भ्रम था।

     

    वह जल्दी से हवेली से बाहर निकल आई।

     

    लेकिन उसी रात उसे वही सपना आया।

     

    वही खाई…

     

    वही धक्का…

     

    वही चीख…

     

    अगले दिन उसने गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति से मुलाकात की।

     

    बुज़ुर्ग ने उसकी बात सुनकर गहरी साँस ली।

     

    “तुमने उस आईने में देख लिया?”

     

    अदिति ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग बोले, “अब तुम्हारे पास सिर्फ़ सात दिन हैं।”

     

    “लेकिन यह सब होता क्यों है?”

     

    बुज़ुर्ग ने बताया कि बहुत साल पहले उस हवेली में राजा वीरेंद्र रहता था। उसे अपनी सुंदरता और शक्ति पर बहुत घमंड था।

     

    एक दिन एक साधु महल में आए और पानी माँगा।

     

    राजा ने उनका अपमान कर दिया।

     

    साधु ने क्रोधित होकर कहा,

     

    “जिस चेहरे पर तुझे इतना घमंड है, अब यही चेहरा हर उस इंसान की मौत का कारण बनेगा जो इस आईने में झाँकेगा।”

     

    उसी दिन से वह आईना श्रापित हो गया।

     

    अदिति अब भी पूरी तरह विश्वास नहीं कर रही थी।

     

    उसने तय किया कि वह इस रहस्य का वैज्ञानिक कारण ढूँढेगी।

     

    उसने हवेली के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।

     

    तीसरे दिन उसे तहखाने में एक गुप्त कमरा मिला।

     

    वहाँ सैकड़ों पुरानी डायरियाँ रखी थीं।

     

    एक डायरी राजा की बेटी राजकुमारी वैदेही की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “यह आईना मौत नहीं दिखाता… यह उस व्यक्ति को दिखाता है जो तुम्हारी मौत का कारण बनेगा। अगर उसे समय रहते पहचान लिया जाए, तो श्राप टूट सकता है।”

     

    अदिति चौंक गई।

     

    यानी उसकी मौत तय नहीं थी।

     

    लेकिन उसे धक्का देने वाला कौन था?

     

    उसने आईने में दिखे चेहरे को याद करने की कोशिश की।

     

    चेहरा साफ नहीं दिखा था।

     

    सिर्फ़ हाथ दिखाई दिया था।

     

    उस हाथ में एक चाँदी की अंगूठी थी, जिस पर साँप बना हुआ था।

     

    अचानक अदिति को याद आया।

     

    ऐसी अंगूठी तो उसके साथ काम करने वाले उसके सहयोगी करण के हाथ में थी।

     

    लेकिन करण तो उसका सबसे अच्छा दोस्त था।

     

    क्या वह सचमुच उसे मार सकता था?

     

    अदिति को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने करण से इस बारे में कुछ नहीं कहा।

     

    छठे दिन करण अचानक उसके घर आया।

     

    “तुम फिर उस हवेली में चलोगी? मुझे भी देखना है।”

     

    अदिति ने हामी भर दी।

     

    दोनों शाम को हवेली पहुँचे।

     

    करण बार-बार उसी आईने के सामने जाने की ज़िद कर रहा था।

     

    अदिति अब सतर्क थी।

     

    जैसे ही वह खाई वाले कमरे के पास पहुँची, अचानक करण ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसकी आँखों में अजीब लालच था।

     

    “मुझे माफ़ कर देना अदिति।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    करण बोला,

     

    “मुझे हवेली का खज़ाना चाहिए। मैंने पुरानी किताबों में पढ़ा है कि यह खज़ाना तभी मिलेगा जब कोई उस आईने का श्राप अपने साथ ले जाएगा।”

     

    यह सुनकर अदिति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “तो तुम मुझे मारना चाहते थे?”

     

    करण हँसने लगा।

     

    “हाँ… क्योंकि आईने ने मुझे भी यही रास्ता बताया था।”

     

    इतना कहकर उसने अदिति को धक्का देने की कोशिश की।

     

    लेकिन अदिति पहले से तैयार थी।

     

    वह एक कदम पीछे हट गई।

     

    करण का संतुलन बिगड़ गया।

     

    वह खुद पुराने लकड़ी के फर्श पर गिर पड़ा।

     

    फर्श टूट गया और वह सीधे नीचे बने गहरे गड्ढे में जा गिरा।

     

    उसकी चीख पूरी हवेली में गूँज उठी।

     

    कुछ ही सेकंड में सब शांत हो गया।

     

    अदिति काँपते हुए नीचे पहुँची।

     

    लेकिन करण की साँसें थम चुकी थीं।

     

    उसी समय हवेली ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी।

     

    वह भागकर फिर उसी आईने वाले कमरे में पहुँची।

     

    आईने में अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    पहली बार उसमें मौत की कोई तस्वीर नहीं थी।

     

    तभी आईने के अंदर से एक हल्की रोशनी निकली।

     

    उस रोशनी में राजकुमारी वैदेही की आकृति दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “श्राप खत्म हो चुका है। यह आईना कभी मौत नहीं दिखाता था। यह सिर्फ़ इंसान के सबसे बड़े दुश्मन की पहचान कराता था। लेकिन लालच में अंधे लोगों ने इसे मौत का आईना समझ लिया।”

     

    इतना कहते ही आईने में दरार पड़ने लगी।

     

    कुछ ही पलों में वह हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया।

     

    सदियों पुराना श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    अदिति हवेली से बाहर निकल आई।

     

    उसने पूरी घटना किसी को नहीं बताई।

     

    लोगों को सिर्फ़ इतना पता चला कि काली हवेली अब श्रापमुक्त हो चुकी है।

     

    कुछ महीनों बाद उस हवेली को एक ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर दिया गया।

    दूर-दूर से लोग उसे देखने आने लगे।

     

    लेकिन अदिति ने कभी किसी को उस टूटे हुए आईने के बारे में नहीं बताया।

     

    क्योंकि वह जान चुकी थी कि दुनिया में सबसे खतरनाक श्राप किसी आईने में नहीं होता…

     

    वह इंसान के लालच और विश्वासघात में छिपा होता है।