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पैरों के निशान

पढ़ने का समय : 6 मिनट

पैरों के निशान जो अंधेरे में दिखते थे

 

शहर से दूर बसे एक छोटे से गांव देवपुर में शाम होते ही एक अजीब सन्नाटा छा जाता था। गांव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी, जो कई सालों से बंद पड़ी थी। दिन में वह हवेली बस एक टूटी-फूटी इमारत लगती थी, लेकिन रात होते ही उसकी तरफ कोई देखना भी पसंद नहीं करता था।

 

लोग कहते थे कि आधी रात के बाद हवेली के आंगन में पैरों के निशान दिखाई देते हैं।

 

सबसे अजीब बात यह थी कि वे निशान जमीन पर नहीं, बल्कि अंधेरे में दिखाई देते थे।

 

गांव का नमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था। वह उन्नीस साल का था और उसे हमेशा लगता था कि लोग छोटी-सी बात को बढ़ाकर भूत की कहानी बना देते हैं।

 

एक शाम नमन अपने दोस्त रोहित के साथ खेत से लौट रहा था।

 

रोहित ने हवेली की तरफ देखते हुए कहा, “आज जल्दी घर चल। अंधेरा होने वाला है।”

 

नमन हंस पड़ा।

 

“तू अभी भी उन पैरों के निशानों से डरता है?”

 

रोहित बोला, “मैंने खुद देखे हैं।”

 

“कैसे निशान?”

 

“छोटे-छोटे पैरों के। जैसे किसी बच्चे के हों। लेकिन उनके आसपास कोई रोशनी नहीं होती। बस अंधेरे में वही निशान दिखाई देते हैं।”

 

नमन ने मजाक में कहा, “आज मैं खुद जाकर देखूंगा।”

 

रोहित ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“पागल है क्या?”

 

लेकिन नमन नहीं माना।

 

रात करीब साढ़े दस बजे वह अकेला हवेली के पास पहुंच गया।

 

चारों तरफ घना अंधेरा था।

 

नमन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

 

हवेली का बड़ा दरवाजा बंद था।

 

वह वापस जाने ही वाला था कि अचानक उसकी नजर जमीन पर पड़ी।

 

कुछ दूर तक छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

 

नमन के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।

 

वह निशान हल्की सफेद चमक जैसे दे रहे थे।

 

नमन ने टॉर्च बंद कर दी।

 

अब निशान और साफ दिखाई दे रहे थे।

 

एक…

 

दो…

 

तीन…

 

वे निशान हवेली के अंदर जा रहे थे।

 

नमन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

उसे रोहित की बात याद आ गई।

 

फिर भी उसके मन में सवाल था—ये निशान आखिर थे किसके?

 

वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया।

 

दरवाजा बिना छुए ही थोड़ा खुल गया।

 

किर्रर…

 

नमन पीछे हट गया।

 

कुछ सेकंड तक वह वहीं खड़ा रहा।

 

फिर उसने हिम्मत की और अंदर चला गया।

 

अंदर धूल और पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं था।

 

लेकिन अंधेरा होते ही वे चमकते निशान फिर दिखाई देने लगे।

 

वे सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

 

नमन उनके पीछे चल पड़ा।

 

पहली मंजिल पर पहुंचकर निशान एक कमरे के सामने रुक गए।

 

कमरे का दरवाजा बंद था।

 

नमन ने दरवाजा खोला।

 

अंदर एक पुरानी लकड़ी की मेज थी और दीवार पर एक बच्चे की तस्वीर लगी थी।

 

तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

 

“अंश, उम्र 8 वर्ष।”

 

नमन कुछ देर तस्वीर को देखता रहा।

 

तभी पीछे से हल्की आवाज आई।

 

“मुझे ढूंढ रहे हो?”

 

नमन पलट गया।

 

कमरे में कोई नहीं था।

 

उसकी सांसें तेज हो गईं।

 

फिर जमीन पर एक नया पैरों का निशान दिखाई दिया।

 

नमन ने देखा कि निशान कमरे के कोने तक जा रहे थे।

 

वह वहां पहुंचा तो उसे एक पुराना लकड़ी का बक्सा मिला।

 

बक्से में कुछ कागज और एक छोटी डायरी थी।

 

डायरी शायद अंश के पिता की थी।

 

नमन ने पन्ने पलटने शुरू किए।

 

एक जगह लिखा था—

 

“अंश को मैं जितना समझता था, वह उससे कहीं ज्यादा समझदार था। उसने कुछ ऐसा देख लिया है जिसे हमें छिपाना नहीं चाहिए।”

 

नमन की उत्सुकता बढ़ गई।

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“पुराने कुएं के पास रात में कोई आता है। अंश ने उसे देखा है। वह कहता है कि वहां जमीन के नीचे कुछ छिपाया गया है।”

 

नमन चौंक गया।

 

तभी हवेली के नीचे से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

नमन घबरा गया।

 

वह बाहर निकलने लगा, लेकिन चमकते पैरों के निशान फिर उसके सामने आ गए।

 

इस बार वे सीढ़ियों से नीचे जा रहे थे।

 

नमन उनके पीछे चला।

 

नीचे एक पुराना कमरा था।

 

कमरे के फर्श पर एक लोहे का ढक्कन लगा था।

 

निशान वहीं जाकर खत्म हो गए।

 

नमन ने ढक्कन उठाया।

 

नीचे एक छोटी सुरंग थी।

 

वह आगे नहीं गया।

 

उसे लगा कि अब किसी बड़े व्यक्ति को बताना जरूरी है।

 

वह सुबह होते ही गांव के सरपंच और हरिया काका को लेकर हवेली पहुंचा।

 

हरिया काका ने डायरी पढ़ी तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।

 

“मैं अंश को जानता था,” उन्होंने कहा। “वह बच्चा अचानक गायब हो गया था। उसके परिवार ने कहा था कि वह शहर चला गया, लेकिन गांव में किसी ने उसे जाते नहीं देखा।”

 

सब लोग उस पुराने कुएं के पास पहुंचे।

 

वहां खुदाई करने पर उन्हें कुछ पुराने संदूक मिले।

 

संदूकों में गांव की जमीन से जुड़े कागज थे। पता चला कि कई साल पहले कुछ लोगों ने गरीब किसानों की जमीन के कागज चोरी करके अपने नाम करने की कोशिश की थी।

 

अंश ने शायद यह सब देख लिया था।

 

लेकिन अंश के साथ आखिर हुआ क्या था?

 

यह सवाल अभी भी बाकी था।

 

नमन ने फिर हवेली की तरफ देखा।

 

उस रात वह अकेला नहीं गया।

 

वह सरपंच और हरिया काका के साथ वापस हवेली पहुंचा।

 

रात होते ही वही पैरों के निशान दिखाई दिए।

 

इस बार वे हवेली के पीछे बने एक छोटे कमरे तक गए।

 

कमरे की दीवार के पीछे एक पुराना लकड़ी का पैनल था।

 

उसे हटाने पर एक छोटी-सी जगह मिली।

 

वहां एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।

 

उसमें अंश की एक चिट्ठी थी।

 

चिट्ठी में लिखा था—

 

“अगर कोई मुझे ढूंढे तो उसे बताना कि मैंने कुछ गलत नहीं किया। मैं चाहता हूं कि गांव के लोगों की जमीन उन्हें वापस मिले।”

 

हरिया काका की आंखों में आंसू आ गए।

 

उन्होंने कहा, “बच्चा सच बचाना चाहता था।”

 

अंश का परिवार बाद में गांव छोड़कर चला गया था। किसी को पता नहीं था कि वे कहां गए।

 

लेकिन उसकी चिट्ठी ने वर्षों पुराना मामला खोल दिया।

 

जांच हुई और जमीन के कागजों की सच्चाई सामने आ गई। कई लोगों को अपनी जमीन वापस मिली।

 

कुछ दिनों बाद नमन फिर हवेली के सामने खड़ा था।

 

अब वहां पैरों के निशान दिखाई नहीं देते थे।

 

वह कुछ देर अंधेरे में खड़ा रहा।

 

फिर अचानक उसे जमीन पर आखिरी बार दो छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

 

वे हवेली से बाहर की ओर जा रहे थे।

 

नमन उन्हें देखते हुए मुस्कुरा दिया।

 

“अब तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, अंश। तुम्हारा सच सबके सामने आ चुका है।”

 

कुछ पल बाद निशान धीरे-धीरे गायब हो गए।

 

उस रात के बाद देवपुर की हवेली में कभी वे पैरों के निशान नहीं दिखे।

 

लोगों ने उस जगह को डर की जगह समझना बंद कर दिया।

 

नमन जब भी वहां से गुजरता, उसे लगता जैसे अंधेरे में किसी बच्चे की मासूम आवाज कह रही हो—

 

“सच को जितना भी छिपाओ, एक दिन वह अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है।”

 

और शायद यही वजह थी कि अंधेरे में दिखाई देने वाले वे पैरों के निशान किसी को डराने नहीं आते थे।

 

वे सिर्फ यह याद दिलाने आते थे कि अधूरा सच अपने पीछे निशान जरूर छोड़ जाता है।

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