एक दीवार, जिस पर वीर की आखिरी निशानी थी
शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा गांव था—सूरजपुर। गांव के बीचों-बीच एक पुराना मकान था, जिसकी बाहरी दीवार बाकी घरों से बिल्कुल अलग थी। उस दीवार पर नीले रंग से बनी एक छोटी-सी तस्वीर थी—एक उड़ता हुआ पक्षी और उसके नीचे लिखा था—
“हिम्मत कभी खत्म नहीं होती।”
गांव के लोग उस दीवार के पास से गुजरते तो कुछ पल जरूर रुकते। क्योंकि वह तस्वीर किसी कलाकार ने नहीं बनाई थी।
उसे बनाया था वीर ने।
वीर गांव का एक सीधा-सादा और मेहनती लड़का था। उम्र मुश्किल से पच्चीस साल थी। उसे चित्र बनाने का बहुत शौक था। वह गांव की दीवारों पर छोटे-छोटे चित्र बनाता और बच्चों को भी चित्रकारी सिखाता था।
उसका सपना था कि एक दिन गांव में बच्चों के लिए एक छोटी-सी कला की जगह बनाएगा।
लेकिन वीर का सपना अधूरा रह गया।
एक साल पहले वह शहर गया था। वहां नौकरी की तलाश में गया वीर वापस नहीं लौट सका। उसके साथ हुई एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई।
उस दिन से उसके परिवार के लिए जैसे समय रुक गया था।
वीर की मां सरोज रोज शाम उसी दीवार के सामने बैठती थीं।
लोग उनसे कहते, “माता जी, अब इस दीवार को रंगवा दीजिए। पुरानी हो गई है।”
सरोज हर बार मना कर देतीं।
“नहीं, इसे ऐसे ही रहने दो। यही तो मेरे वीर की आखिरी निशानी है।”
वीर की छोटी बहन नंदिनी अपनी मां को देखती और चुप रहती।
उसे भी वह दीवार बहुत प्यारी थी।
एक दिन गांव के सरपंच ने घोषणा की कि मुख्य सड़क को चौड़ा करने के लिए पुराने मकान को तोड़ा जाएगा। उसके साथ वह दीवार भी टूटने वाली थी।
यह सुनते ही नंदिनी परेशान हो गई।
वह सरपंच के पास पहुंची।
“काका, वो दीवार मत तुड़वाइए।”
सरपंच ने समझाते हुए कहा, “बेटी, सड़क जरूरी है। दीवार को दूसरी जगह बना देंगे।”
नंदिनी बोली, “लेकिन वीर भैया की आखिरी निशानी दूसरी जगह कैसे हो सकती है?”
सरपंच के पास कोई जवाब नहीं था।
अगले दिन मजदूर दीवार नापने पहुंचे।
सरोज दरवाजे के पास खड़ी होकर सब देखती रहीं।
उनकी आंखों में आंसू थे।
उन्होंने धीरे से दीवार को छुआ।
“वीर… मैं तुम्हारी ये निशानी भी नहीं बचा पा रही।”
नंदिनी ने मां का हाथ पकड़ लिया।
“मां, हम कोशिश करेंगे।”
उस रात नंदिनी ने वीर की पुरानी चीजें निकालनी शुरू कीं।
एक पुराने संदूक में उसे वीर की स्केचबुक मिली।
उसमें गांव के कई चित्र बने थे।
किसी पन्ने पर खेत थे, किसी पर नदी, किसी पर बच्चे।
लेकिन आखिरी कुछ पन्नों पर एक ही तस्वीर बार-बार बनी थी।
एक दीवार।
और उसके सामने खेलते बच्चे।
नंदिनी ने आखिरी पन्ना पलटा।
नीचे वीर ने लिखा था—
“अगर कभी मेरा बनाया चित्र मिट जाए, तो कोई बच्चा उसे फिर से बना दे। तस्वीर मिट सकती है, सपना नहीं।”
नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए।
उसे अचानक एक विचार आया।
अगली सुबह उसने गांव के बच्चों को बुलाया।
“तुम सब वीर भैया को जानते थे?”
बच्चों ने सिर हिलाया।
“तो क्या तुम उनकी दीवार बचाने में मेरी मदद करोगे?”
सबने एक साथ कहा, “हां!”
बच्चों ने गांव के लोगों से हस्ताक्षर करवाने शुरू किए।
नंदिनी ने पंचायत में आवेदन दिया कि सड़क को थोड़ा मोड़कर उस दीवार को बचाया जाए।
लेकिन सड़क बनाने वाली टीम ने साफ कह दिया कि नक्शे में बदलाव करना आसान नहीं होगा।
नंदिनी निराश होकर घर लौट आई।
उसे लगा कि शायद दीवार नहीं बच पाएगी।
उस शाम वह दीवार के सामने बैठी थी।
तभी उसे वीर की एक पुरानी बात याद आई।
वीर अक्सर कहता था, “नंदू, अगर कोई रास्ता बंद हो जाए तो रोना मत। दूसरा रास्ता ढूंढना।”
नंदिनी मुस्कुरा दी।
“ठीक है भैया, दूसरा रास्ता ढूंढती हूं।”
अगले दिन वह शहर के कार्यालय गई और अधिकारियों से मिली। उसने सड़क की योजना देखी और पता लगाया कि सड़क को थोड़ा आगे से मोड़ने पर दीवार बच सकती थी।
उसने अधिकारियों को पुराने कागज और गांव वालों के हस्ताक्षर दिखाए।
कई दिनों की भागदौड़ के बाद आखिरकार सड़क की योजना में छोटा-सा बदलाव कर दिया गया।
दीवार बच गई।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
नंदिनी ने वीर की स्केचबुक में लिखी बात को सच करने का फैसला किया।
उसने गांव के बच्चों के लिए उसी दीवार के पास एक छोटी-सी चित्रकारी की जगह बना दी।
हर रविवार बच्चे वहां आते और दीवार के पास चित्र बनाते।
कुछ ही महीनों में वह जगह रंग-बिरंगी तस्वीरों से भर गई।
एक बच्चा दीवार पर सूरज बनाता।
दूसरा नदी।
कोई पेड़ बनाता तो कोई घर।
एक दिन एक छोटी लड़की ने दीवार पर वही उड़ता हुआ पक्षी बनाया, जो वीर ने बनाया था।
उसके नीचे उसने लिखा—
“हिम्मत कभी खत्म नहीं होती।”
सरोज ने वह तस्वीर देखी तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।
नंदिनी ने पूछा, “मां, आप रो क्यों रही हैं?”
सरोज मुस्कुराईं।
“आज पहली बार ये दीवार मुझे वीर की याद दिलाकर दुखी नहीं कर रही।”
नंदिनी ने मां की तरफ देखा।
सरोज बोलीं, “अब लगता है मेरा बेटा यहां कहीं गया ही नहीं। देख, उसके सपने अभी भी यहीं हैं।”
धीरे-धीरे उस जगह की पहचान पूरे गांव में बन गई।
लोग उसे “वीर की दीवार” कहने लगे।
कई साल बीत गए।
नंदिनी ने वीर के सपने को आगे बढ़ाया। उसने गांव के बच्चों को चित्रकारी सिखानी शुरू कर दी।
एक दिन शहर से कुछ लोग गांव आए। उन्होंने बच्चों की बनाई तस्वीरें देखीं और उनमें से कई बच्चों को आगे सीखने के लिए छात्रवृत्ति देने का फैसला किया।
नंदिनी दीवार के सामने खड़ी होकर मुस्कुरा रही थी।
उसे लगा जैसे वीर कहीं पास खड़ा होकर कह रहा हो—
“देखा नंदू, मैंने कहा था ना… सपना मत छोड़ना।”
नंदिनी ने दीवार पर हाथ रखा।
वही पुराना नीला पक्षी अब भी वहां था।
रंग थोड़ा फीका पड़ चुका था, लेकिन तस्वीर मिटने का नाम नहीं ले रही थी।
नंदिनी ने धीरे से कहा—
“भैया, तुम्हारी आखिरी निशानी अब सिर्फ ये दीवार नहीं है।”
उसने सामने खेलते बच्चों की तरफ देखा।
“तुम्हारी आखिरी निशानी अब इन बच्चों के सपने हैं।”
हवा चली।
दीवार पर बना पक्षी जैसे उड़ता हुआ दिखाई दिया।
सरोज ने आसमान की तरफ देखा और मुस्कुराईं।
वीर चला गया था, लेकिन उसकी सोच, उसकी मेहनत और उसका सपना गांव में जिंदा था।
और वह पुरानी दीवार आज भी यही कहती थी—
इंसान चला जाता है, लेकिन अगर वह किसी के जीवन में उम्मीद छोड़ जाए, तो उसकी निशानी कभी खत्म नहीं होती।

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