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खुली किताब

पढ़ने का समय : 6 मिनट

खुली किताब, ना जाने क्या था वो राज

 

शहर के एक पुराने मोहल्ले में काव्या नाम की एक लड़की रहती थी। उम्र करीब बाईस साल थी। वह शांत स्वभाव की थी और हर किसी से बहुत कम बात करती थी। मोहल्ले के लोग उसे देखकर अक्सर कहते, “काव्या तो खुली किताब है, उसके अंदर ऐसा क्या छिपा होगा जो किसी को पता ही नहीं?”

 

काव्या का जीवन बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देता था। सुबह घर का काम, फिर कॉलेज और शाम को अपनी मां के साथ बैठकर बातें करना। लेकिन उसके कमरे की एक पुरानी लकड़ी की अलमारी ऐसी थी, जिसे वह किसी को छूने तक नहीं देती थी।

 

उस अलमारी में एक मोटी-सी नीली डायरी रखी थी।

 

वह डायरी काव्या हमेशा अपने साथ रखती थी।

 

एक दिन उसकी सहेली रिया उसके घर आई।

 

रिया ने मजाक करते हुए कहा, “तुम्हारी जिंदगी में कुछ तो ऐसा है जो तुम हमसे छिपा रही हो।”

 

काव्या हंस दी।

 

“ऐसा कुछ नहीं है।”

 

रिया ने अलमारी की तरफ देखते हुए कहा, “फिर ये अलमारी हमेशा बंद क्यों रहती है?”

 

काव्या का चेहरा अचानक बदल गया।

 

“बस… इसमें पुरानी चीजें हैं।”

 

रिया ने ज्यादा सवाल नहीं किया, लेकिन उसे समझ आ गया कि बात कुछ और है।

 

उस रात काव्या अपने कमरे में बैठी डायरी खोलकर कुछ लिख रही थी।

 

उसने लिखा—

 

“आज फिर किसी ने उस अलमारी के बारे में पूछा। मुझे डर लग रहा है कि कहीं वह राज सबके सामने न आ जाए।”

 

इतना लिखकर उसने डायरी बंद कर दी।

 

अगले दिन कॉलेज में काव्या को एक अजीब-सा लिफाफा मिला।

 

लिफाफे पर सिर्फ उसका नाम लिखा था।

 

अंदर एक छोटी-सी चिट्ठी थी—

 

“तुमने जिस राज को इतने साल छिपाकर रखा है, अब उसे छिपाना मुश्किल होगा।”

 

काव्या के हाथ कांपने लगे।

 

वह चिट्ठी तुरंत फाड़कर बैग में रख ली।

 

उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह चिट्ठी किसने भेजी।

 

उस दिन वह सीधे घर पहुंची और कमरे की अलमारी खोली।

 

नीली डायरी वहीं थी।

 

लेकिन उसके नीचे रखा एक छोटा डिब्बा गायब था।

 

काव्या घबरा गई।

 

वह डिब्बा उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज था।

 

उसमें एक पुरानी फोटो और एक अस्पताल की पर्ची थी।

 

सत्रह साल पहले की।

 

काव्या तब सिर्फ पांच साल की थी।

 

उस दिन उसके पिता उसे लेकर कहीं गए थे और लौटकर कभी नहीं आए।

 

परिवार ने सबको यही बताया था कि उनके पिता की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।

 

लेकिन काव्या को बचपन से लगता था कि कहानी कुछ और है।

 

उसकी मां ने हमेशा उस बात को टाल दिया था।

 

कुछ साल पहले काव्या को घर की सफाई करते समय एक पुराना कागज मिला था। उसमें लिखा था कि उसके पिता का इलाज एक दूसरे शहर के अस्पताल में हुआ था।

 

काव्या ने उस दिन से अपने पिता की सच्चाई जानने की कोशिश शुरू कर दी थी।

 

उसने कई साल तक सबूत जमा किए।

 

फोटो, पुराने कागज, अस्पताल की पर्चियां और कुछ चिट्ठियां।

 

लेकिन वह अपनी मां को दुख नहीं देना चाहती थी।

 

इसीलिए उसने सब कुछ उस नीली डायरी में छिपाकर रखा था।

 

अब वह डिब्बा गायब था।

 

काव्या ने अपनी मां से पूछा, “मां, मेरी पुरानी चीजों में से एक डिब्बा गायब है। आपने देखा है?”

 

मां कुछ पल चुप रहीं।

 

फिर बोलीं, “नहीं।”

 

काव्या ने मां की आंखों में देखा।

 

उसे पहली बार लगा कि शायद मां कुछ जानती हैं।

 

उस रात घर की घंटी बजी।

 

बाहर एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

 

उसने काव्या को देखते ही कहा, “तुम बिल्कुल अपने पिता जैसी दिखती हो।”

 

काव्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“आप मेरे पिता को जानते थे?”

 

आदमी ने सिर हिलाया।

 

“मैं उनका दोस्त था।”

 

काव्या ने उसे अंदर बुलाया।

 

आदमी ने बताया कि उसके पिता की मौत सड़क दुर्घटना में नहीं हुई थी।

 

उस रात वे एक जरूरी कागज लेकर शहर से बाहर जा रहे थे। रास्ते में दुर्घटना हुई और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल पहुंचने के बाद कई दिनों तक उनका इलाज चला।

 

“लेकिन फिर मां ने क्यों कहा कि उनकी मौत हो गई?”

 

आदमी ने कहा, “क्योंकि तुम्हारे पिता की हालत बहुत खराब थी। उन्हें डर था कि अगर तुमसे मिलने की कोशिश करेंगे तो तुम्हारी मां और तुम्हें खतरा हो सकता है।”

 

काव्या को कुछ समझ नहीं आया।

 

“खतरा किससे?”

 

आदमी ने धीरे से जवाब दिया, “तुम्हारे पिता ने एक बड़ी धोखाधड़ी का सच पता लगाया था। कुछ लोग नहीं चाहते थे कि वह सच सामने आए।”

 

काव्या की सांसें तेज हो गईं।

 

तभी उसकी मां कमरे में आ गईं।

 

मां की आंखों में आंसू थे।

 

उन्होंने कहा, “अब बहुत हो गया।”

 

काव्या ने मां का हाथ पकड़ लिया।

 

“मां, सच क्या है?”

 

मां ने आखिरकार वह राज खोल दिया जिसे उन्होंने सत्रह साल से अपने दिल में दबाकर रखा था।

 

काव्या के पिता की मौत दुर्घटना के कुछ दिनों बाद अस्पताल में हुई थी। लेकिन मरने से पहले उन्होंने एक सबूत अपनी पत्नी को सौंपा था।

 

वह सबूत एक पुराने मामले में शामिल लोगों को बेनकाब कर सकता था।

 

काव्या की मां ने उस सबूत को सुरक्षित रखा और काव्या से सारी बात इसलिए छिपाई क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी किसी खतरे में पड़े।

 

काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“तो आपने मुझसे इतने साल झूठ क्यों बोला?”

 

मां ने उसे गले लगाते हुए कहा, “क्योंकि मैं तुम्हें खोने से डरती थी।”

 

कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा रहा।

 

फिर काव्या ने नीली डायरी उठाई।

 

उसने आखिरी पन्ना खोला।

 

वहां उसके पिता की लिखावट में कुछ शब्द थे—

 

“अगर मेरी बेटी कभी यह पढ़े, तो उसे बताना कि मैंने उससे कभी कुछ छिपाना नहीं चाहा। मैं बस चाहता था कि वह सुरक्षित रहे।”

 

काव्या ने डायरी सीने से लगा ली।

 

उसे लगा जैसे इतने वर्षों बाद उसके पिता ने उससे बात की हो।

 

अगले दिन काव्या और उसकी मां ने सारे सबूत पुलिस को सौंप दिए। पुराने मामले की जांच दोबारा शुरू हुई।

 

काव्या के लिए सबसे बड़ा राज अब राज नहीं रहा था।

 

उसने अपनी डायरी का आखिरी पन्ना खोला और लिखा—

 

“मैं सच से भागती रही, लेकिन सच ने मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ा। आज समझ आया कि कुछ राज छिपाने के लिए नहीं, सही समय आने पर सामने लाने के लिए होते हैं।”

 

काव्या सचमुच एक खुली किताब थी।

 

लेकिन उस किताब का सबसे जरूरी पन्ना इतने वर्षों से बंद था।

 

अब वह पन्ना खुल चुका था।

 

और उसमें कोई डर नहीं था।

 

सिर्फ एक पिता का अपनी बेटी के लिए अधूरा प्यार था, एक मां की मजबूरी थी और एक ऐसा सच था, जिसने काव्या को हमेशा के लिए बदल दिया था।

 

उस दिन के बाद काव्या ने अपनी नीली डायरी बंद करके अलमारी में नहीं रखी।

 

उसने उसे अपनी मेज पर रख दिया।

 

क्योंकि अब उसे किसी राज को छिपाने की जरूरत नहीं थी।

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