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अंधियारे का अंत

पढ़ने का समय : 7 मिनट

चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 4 और अंतिम भाग: अंधियारे का अंत

 

कमरे में दीपक बुझ चुका था। बाहर चांदनी रात थी, लेकिन कमरे के अंदर ऐसा अंधेरा था कि किसी का चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

 

चांदनी पीछे हट गई।

 

उसके सामने वही आदमी खड़ा था, जिसे दादी ने देवराज बताया था।

 

और कमरे के दूसरे कोने में उसकी बड़ी बहन चांदनी खड़ी थी।

 

“चांदनी… भागो!”

 

बहन की आवाज सुनते ही चांदनी का डर थोड़ा कम हुआ।

 

उसने पूछा, “दीदी, आप यहां कैसे?”

 

देवराज ने गुस्से में कहा, “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

 

बड़ी चांदनी उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

 

“अब बहुत हो चुका, देवराज।”

 

देवराज हंस पड़ा।

 

“इतने साल बाद भी तुमने हार नहीं मानी?”

 

बड़ी चांदनी ने कहा, “मैंने हार नहीं मानी थी। मैं सिर्फ सही समय का इंतजार कर रही थी।”

 

तभी दरवाजा खुला और गौरी अंदर आ गई।

 

उसके पीछे चांदनी की मां और दादी भी थीं।

 

मां ने अपनी बड़ी बेटी को देखते ही आंखों पर हाथ रख लिया।

 

“चांदनी…”

 

बड़ी चांदनी की आंखों में आंसू आ गए।

 

“राधिका।”

 

दोनों बहनें एक-दूसरे के पास आईं।

 

राधिका ने अपनी बड़ी बहन को गले लगा लिया।

 

कई सालों का इंतजार उस एक पल में खत्म हो गया।

 

चांदनी उन्हें देखती रही।

 

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खुशी मनाए या इतने सालों के दर्द पर रोए।

 

उसने पूछा, “दीदी, आप इतने साल कहां थीं?”

 

बड़ी चांदनी ने धीरे से कहा, “उस रात मुझे हवेली से बाहर ले जाया गया था। देवराज मुझे डराकर एक पुराने मंदिर के पास छोड़ गया था। मैं किसी तरह वहां से बच निकली, लेकिन जब वापस आई तो हवेली बंद हो चुकी थी।”

 

देवराज ने बीच में कहा, “झूठ!”

 

बड़ी चांदनी ने उसकी तरफ देखा।

 

“अगर झूठ है तो फिर तुम्हें इतने सालों से मेरे वापस आने का डर क्यों था?”

 

देवराज चुप हो गया।

 

दादी ने कहा, “अब सच बोलने का समय है।”

 

देवराज ने गुस्से में कहा, “तुम लोग सच जानकर भी क्या कर लोगे?”

 

चांदनी ने कहा, “सच को छिपाने के लिए झूठ बोलने की जरूरत पड़ती है। लेकिन सच को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती।”

 

देवराज कुछ नहीं बोला।

 

बड़ी चांदनी ने एक पुराना कागज निकाला।

 

“ये तुम्हारे पिता के हस्ताक्षर वाला दस्तावेज है।”

 

देवराज ने कागज देखते ही चेहरा फेर लिया।

 

राधिका बोली, “पिताजी ने अपनी संपत्ति दोनों बेटियों के नाम की थी। लेकिन देवराज ने कागज बदलकर पूरी संपत्ति अपने नाम करने की कोशिश की थी।”

 

दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना को जब यह पता चला तो उन्होंने उसे घर से निकाल दिया।”

 

देवराज ने गुस्से में कहा, “मैंने सिर्फ अपना हक मांगा था!”

 

राधिका ने जवाब दिया, “हक मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है।”

 

कुछ पल तक कोई नहीं बोला।

 

फिर देवराज ने कहा, “तुम्हारे पिता ने मुझे अपमानित किया था। मैंने सिर्फ बदला लिया।”

 

बड़ी चांदनी ने कहा, “बदला लेने के लिए एक परिवार की जिंदगी बर्बाद कर दी?”

 

देवराज की आंखों में पछतावे की जगह अभी भी गुस्सा था।

 

लेकिन अब उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा था।

 

राधिका ने दूसरा कागज निकाला।

 

“ये तुम्हारे खिलाफ सबसे बड़ा सबूत है।”

 

देवराज चौंक गया।

 

“ये तुम्हें कहां मिला?”

 

“उसी पुराने संदूक में, जिसे तुमने समझा था कि कभी कोई नहीं ढूंढ पाएगा।”

 

चांदनी को अब समझ आया कि हवेली का सारा रहस्य इन्हीं कागजों के इर्द-गिर्द था।

 

देवराज ने कई सालों तक परिवार को डराकर रखा था ताकि कोई उन दस्तावेजों तक न पहुंच सके।

 

राधिका ने कहा, “मैंने इतने साल इंतजार किया क्योंकि मेरे पास अकेले सच साबित करने का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन अब मेरी बहन, मेरी बेटी और पूरा परिवार मेरे साथ है।”

 

चांदनी ने अपनी मां की तरफ देखा।

 

मां ने उसकी आंखों से आंसू पोंछे।

 

“मुझे माफ कर देना बेटा। मैंने तुम्हें सच नहीं बताया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम्हें भी कुछ न हो जाए।”

 

चांदनी ने मां को गले लगा लिया।

 

“आपने मुझे सच से दूर रखा, लेकिन अब मैं आपसे नाराज नहीं हूं।”

 

गौरी ने धीरे से कहा, “तो आखिर इतने सालों से हवेली की खिड़की में दीपक कौन जलाता था?”

 

बड़ी चांदनी मुस्कुराई।

 

“मैं।”

 

चांदनी ने हैरानी से पूछा, “आप?”

 

“हां। मैं हर पूर्णिमा की रात हवेली में आती थी। मैं चाहती थी कि कोई न कोई उस घर के सच तक पहुंचे।”

 

“लेकिन आप हमें दिखाई कैसे देती थीं?”

 

बड़ी चांदनी ने कहा, “शायद इसलिए क्योंकि तुम मुझे ढूंढने के लिए तैयार थीं। कई बार इंसान डर के पीछे छिपे सच को तभी देख पाता है, जब वह खुद उसे देखने की हिम्मत करे।”

 

चांदनी मुस्कुरा दी।

 

उसे अब समझ आ गया था कि जिस अंधियारे से वह डर रही थी, असल में वह अंधियारा उसके मन का था।

 

सुबह होते ही परिवार गांव के बुजुर्गों के पास गया।

 

पुराने दस्तावेज सबके सामने रखे गए।

 

देवराज के झूठ और धोखे का सच सामने आ गया।

 

गांव वालों ने भी स्वीकार किया कि इतने सालों से हवेली के बारे में फैली डरावनी बातें पूरी सच्चाई नहीं थीं।

 

देवराज के खिलाफ कार्रवाई की गई और परिवार को उसकी संपत्ति वापस मिल गई।

 

कुछ दिनों बाद हवेली की सफाई शुरू हुई।

 

जहां कभी लोग जाने से डरते थे, वहां अब बच्चे खेलने लगे।

 

ऊपर की वही खिड़की, जहां हर पूर्णिमा को रहस्यमयी दीपक जलता था, अब खुली रहती थी।

 

एक शाम चांदनी और उसकी बड़ी बहन छत पर बैठी थीं।

 

आसमान में पूरा चांद चमक रहा था।

 

चांदनी ने पूछा, “दीदी, आपने इतने साल अकेले कैसे बिताए?”

 

बड़ी चांदनी ने मुस्कुराकर कहा, “उम्मीद के सहारे।”

 

“आपको यकीन था कि परिवार आपको ढूंढ लेगा?”

 

“नहीं। लेकिन मुझे यकीन था कि एक दिन सच जरूर सामने आएगा।”

 

चांदनी ने आसमान की तरफ देखा।

 

“आज ये हवेली डरावनी नहीं लग रही।”

 

बड़ी बहन ने कहा, “क्योंकि अब इसके अंदर कोई राज नहीं छिपा।”

 

तभी मां ऊपर आईं।

 

“तुम दोनों यहां बैठी हो? नीचे आओ, खाना तैयार है।”

 

चांदनी हंसते हुए बोली, “मां, आज चांद बहुत सुंदर है।”

 

मां मुस्कुराईं।

 

“तुम्हारे नाम जैसा।”

 

चांदनी ने अपनी बड़ी बहन की तरफ देखा।

 

“और उनका नाम भी तो चांदनी है।”

 

दोनों बहनें हंस पड़ीं।

 

मां ने दोनों को गले लगा लिया।

 

उस रात हवेली में पहली बार कोई डर नहीं था।

 

न कोई रहस्यमयी आवाज।

 

न कोई बंद दरवाजा।

 

न कोई छिपा हुआ राज।

 

सिर्फ परिवार की हंसी थी।

 

कुछ दिनों बाद गांव के लोगों ने हवेली के बाहर एक छोटा-सा बगीचा बना दिया।

 

चांदनी और उसकी बहन वहां फूल लगाने लगीं।

 

गौरी भी रोज उनकी मदद करने आने लगी।

 

एक दिन गौरी ने मजाक में कहा, “अब अगर रात को यहां कोई परछाईं दिखाई दे तो?”

 

चांदनी हंसते हुए बोली, “तो पहले पूछेंगे कि उसे भी चाय चाहिए या नहीं।”

 

तीनों हंसने लगीं।

 

सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

 

आसमान पर हल्की चांदनी फैलने लगी।

 

चांदनी ने हवेली की ऊपरी खिड़की की तरफ देखा।

 

वहां एक दीपक जल रहा था।

 

वह कुछ पल उसे देखती रही।

 

फिर उसकी बड़ी बहन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

 

“अब उसे बुझने दो।”

 

चांदनी ने पूछा, “क्यों?”

 

“क्योंकि अब किसी को रास्ता दिखाने की जरूरत नहीं है।”

 

दोनों बहनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।

 

दीपक की लौ धीरे-धीरे बुझ गई।

 

लेकिन चांद की रोशनी पहले से ज्यादा चमक रही थी।

 

चांदनी मुस्कुराई।

 

उसे आखिर समझ आ गया था कि चांदनी रात का असली अंधियारा हवेली में नहीं था, बल्कि उन लोगों के झूठ और डर में था, जिन्होंने सालों तक सच को छिपाए रखा।

 

और जिस रात सच सामने आया, उसी रात वह अंधियारा हमेशा के लिए खत्म हो गया।

 

समाप्त।

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