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टैग: #बच्चों कि कहानियां

  • कान्हा और गाय की घंटी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और गाय की नई घंटी

     

    अगली सुबह नंद भवन के आँगन में एक नई आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा ने खेलते-खेलते अपना सिर उठाया।

     

    “ये कैसी आवाज है?”

     

    उनके दोस्त ने कहा—

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    सभी बच्चे दौड़कर आँगन में पहुँचे।

     

    वहाँ नंद बाबा एक सुंदर सी गाय के गले में नया घंटी वाला पट्टा बाँध रहे थे। घंटी चमक रही थी और उसके हिलते ही मधुर आवाज निकल रही थी।

     

    कान्हा उस गाय के पास जाकर खड़े हो गए।

     

    उन्होंने घंटी को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, ये नई है?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। आज इसे नई घंटी पहनाई है।”

     

    कान्हा ने घंटी को हल्के से छुआ।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अब जब ये दूर जाएगी, तो इसकी आवाज से पता चल जाएगा कि ये कहाँ है।”

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “तो अगर मैं भी इसे पहन लूँ तो आपको पता चल जाएगा कि मैं कहाँ हूँ?”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें घंटी की जरूरत नहीं है। तुम्हारी शरारतों की आवाज दूर से ही सुनाई दे जाती है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने मुँह बना लिया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अच्छा, नाराज मत हो।”

     

    कान्हा फिर घंटी को देखने लगे।

     

    उसके साथ लाल रंग का सुंदर पट्टा भी लगा था।

     

    उनके मन में तुरंत एक विचार आया।

     

    उन्होंने अपने दोस्त को आँख से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गया कि कुछ होने वाला है।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर ये घंटी किसी और को पहना दें तो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “किसे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    नंद बाबा गाय को लेकर बाहर चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ पीछे-पीछे चल दिए।

     

    गाय थोड़ी दूर जाकर पेड़ के नीचे घास खाने लगी।

     

    कान्हा उसकी घंटी की आवाज सुनते रहे।

     

    टन… टन…

     

    उन्हें यह आवाज बहुत पसंद आ रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम इसे इतना ध्यान से क्यों सुन रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “हम भी ऐसा खेल खेलेंगे।”

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “कैसा?”

     

    “एक बच्चा आँखें बंद करेगा और बाकी घंटी बजाकर अलग-अलग जगह छिपेंगे। उसे आवाज सुनकर सबको ढूँढ़ना होगा।”

     

    सभी बच्चों को खेल पसंद आ गया।

     

    उन्होंने एक छोटी घंटी ली जो घर के पुराने सामान में पड़ी थी।

     

    पहली बारी कान्हा की थी।

     

    उन्होंने आँखों पर कपड़ा बाँध लिया।

     

    दोस्त घंटी बजाते हुए इधर-उधर भागने लगे।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा आवाज सुनकर एक तरफ दौड़ते।

     

    लेकिन दोस्त दूसरी तरफ चले जाते।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम लोग मुझे परेशान कर रहे हो!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    आखिरकार कान्हा ने आवाज का पीछा किया और एक दोस्त को पकड़ लिया।

     

    “पकड़ लिया!”

     

    दोस्त बोला—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम्हारी हँसी से।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कुछ देर तक खेल चलता रहा।

     

    तभी नंद बाबा की गाय वहाँ से निकलकर दूसरी तरफ चली गई।

     

    उसकी घंटी बज रही थी।

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    “रुको।”

     

    सबने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गाय कहाँ जा रही है?”

     

    उन्होंने देखा कि गाय रास्ते से हटकर झाड़ियों की तरफ चली गई थी।

     

    कान्हा उसके पीछे गए।

     

    वहाँ एक छोटा बछड़ा खड़ा था, जो अपनी माँ के पीछे जाना चाहता था लेकिन रस्सी के कारण रुक गया था।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अरे, तुम यहाँ हो!”

     

    बछड़ा बेचैनी से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा तुरंत आए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा।

     

    “ये अपनी माँ के पास जाना चाहता है।”

     

    उन्होंने उसे खोल दिया।

     

    बछड़ा दौड़कर अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी ने हमें इसका रास्ता बता दिया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा? छोटी सी चीज भी कितने काम आती है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    उस दिन से कान्हा को घंटी की आवाज और भी अच्छी लगने लगी।

     

    शाम को वह गाय के पास बैठे रहे।

     

    वह उसे प्यार से सहलाते और घंटी की आवाज सुनते।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें देखा।

     

    “कान्हा, आज तुम्हें घंटी से इतनी दोस्ती कैसे हो गई?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें गायों की बहुत चिंता रहती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “ये हमारे घर का हिस्सा हैं।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    तभी कान्हा ने अचानक कहा—

     

    “मैया, मुझे भी एक घंटी चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैं बाहर जाऊँ तो आपको पता रहे कि मैं कहाँ हूँ।”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तुम्हें घंटी पहनाने की जरूरत नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारी आवाज से ही पहचान लूँगी।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अगर मैं चुप रहा तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तब तुम्हारे दोस्त तुम्हें ढूँढ़ते हुए जरूर शोर मचाएँगे।”

     

    कान्हा और उनके दोस्त हँसने लगे।

     

    अगले दिन कान्हा ने एक नई शरारत की योजना बनाई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “आज हम सब अपनी-अपनी छोटी घंटियाँ पहनेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “हम देखेंगे कि कौन सबसे ज्यादा देर तक बिना आवाज किए चल सकता है।”

     

    सभी ने घंटियाँ बाँध लीं।

     

    लेकिन जैसे ही वे चलने लगे—

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    सबकी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “कोई भी चुप नहीं चल सकता!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारी वजह से ये खेल भी खराब हो गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “खराब नहीं, मजेदार हो गया।”

     

    सभी बच्चे दौड़ने लगे।

     

    घंटियों की आवाज पूरे रास्ते में गूँजने लगी।

     

    गाँव की गोपियाँ बाहर आ गईं।

     

    एक गोपी ने पूछा—

     

    “ये कैसी बारात निकल रही है?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “लगता है कान्हा ने बच्चों को गाय बना दिया है।”

     

    कान्हा जोर से हँसे।

     

    “हम गाय नहीं हैं!”

     

    गोपियाँ भी हँसने लगीं।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने बच्चों की घंटियाँ देखीं।

     

    “ये सब क्या है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम घंटी वाला खेल खेल रहे हैं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, लेकिन किसी की गाय की घंटी मत खोलना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं खोलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “कान्हा, तुमने तो सोचा था गाय की घंटी खुद पहनोगे।”

     

    यशोदा ने सुन लिया।

     

    “क्या कहा?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    दोस्त भाग गया।

     

    यशोदा ने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तुम गाय की घंटी पहनने वाले थे?”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “बस सोच रहा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मेरे कान्हा को हर चीज खुद करके देखनी होती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मुझे सब जानना है।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “जानना अच्छी बात है, लेकिन हर चीज करने से पहले पूछना भी जरूरी है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    रात को नंद बाबा घर लौटे।

     

    कान्हा उनके पास बैठकर बोले—

     

    “बाबा, आपकी गाय की घंटी बहुत अच्छी है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हें पसंद है?”

     

    “बहुत।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो कल तुम मेरे साथ गायों को चराने चलना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “और मैं उनकी घंटियाँ भी सुनूँगा?”

     

    “जितनी चाहो।”

     

    कान्हा ने नंद बाबा को गले लगा लिया।

     

    उस रात कान्हा बहुत खुश थे।

     

    उन्होंने सोने से पहले यशोदा से कहा—

     

    “मैया, कल मैं बाबा के साथ गायों के पास जाऊँगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “किस बात का?”

     

    “गायों से दूर मत जाना।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”

     

    • यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    अगली सुबह कान्हा पहली बार नंद बाबा के साथ गायों को लेकर वृंदावन के खुले मैदानों की ओर जाने वाले थे।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही कान्हा को एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी जिसने उन्हें चौंका दिया—

     

    एक बहुत छोटा बछड़ा अपनी माँ से अलग होकर अकेला खड़ा था।

     

    कान्हा तुरंत उसकी ओर दौड़ पड़े।

     

    और इस बार उनकी शरारत नहीं, उनकी ममता और समझदारी सबको देखने को मिलने वाली थी।