नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
रहस्मयी फूलों का निशान
सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में धूप की हल्की किरणें फैल रही थीं। यशोदा मैया रसोई का काम कर रही थीं। तभी उनकी नजर एक मटकी पर पड़ी।
मटकी के ऊपर फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना हुआ था।
यशोदा कुछ पल उसे देखती रहीं।
“ये किसने बनाया?”
पास खेल रहे कान्हा ने तुरंत सिर उठाया।
“क्या हुआ मैया?”
यशोदा ने उन्हें बुलाया।
“इधर आओ और देखो।”
कान्हा मटकी के पास पहुँचे। उन्होंने निशान को बहुत ध्यान से देखा।
वह गोल आकार का था और उसके चारों ओर छोटी-छोटी पंखुड़ियाँ लगी थीं।
कान्हा ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखा।
“हम्म…”
एक दोस्त बोला—
“क्या हुआ?”
कान्हा ने कहा—
“ये किसी ने जानबूझकर बनाया है।”
यशोदा ने पूछा—
“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”
“क्योंकि पंखुड़ियाँ एक जैसी दूरी पर लगी हैं।”
दोस्त हैरान होकर बोला—
“तुमने ये कैसे देख लिया?”
कान्हा मुस्कुराए।
“क्योंकि मैं ध्यान से देख रहा हूँ।”
यशोदा ने कहा—
“बस ध्यान रखना कि किसी की चीज खराब मत करना।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“हम सिर्फ पता लगाएंगे कि इसे किसने बनाया।”
कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर निकले।
उन्होंने आँगन में चारों तरफ देखा।
जमीन पर कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ पड़ी थीं।
कान्हा ने एक पंखुड़ी उठाई।
“ये वही फूल है।”
एक दोस्त ने पूछा—
“ये फूल कहाँ मिलता है?”
दूसरे ने कहा—
“यमुना के पास।”
कान्हा बोले—
“तो निशान बनाने वाला शायद वहीं से आया होगा।”
सभी बच्चे यमुना की ओर चल पड़े।
रास्ते में छोटू और चंदू भी उनके पीछे आ गए।
कान्हा ने उन्हें देखा।
“तुम दोनों फिर आ गए?”
छोटू की घंटी बजी।
टन…
कान्हा हँसे।
“ठीक है, तुम भी चलो।”
यमुना किनारे पहुँचकर उन्होंने वही फूल देखा।
वहाँ कई पंखुड़ियाँ जमीन पर बिखरी हुई थीं।
कान्हा नीचे बैठ गए।
“यहाँ से कोई फूल लेकर गया है।”
एक दोस्त बोला—
“लेकिन कौन?”
कान्हा ने आसपास देखा।
उन्हें मिट्टी पर छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।
वे निशान नदी से दूर एक कच्चे रास्ते की ओर जा रहे थे।
कान्हा ने कहा—
“चलो।”
सभी उनके पीछे चल पड़े।
कुछ दूर जाने पर उन्हें एक छोटा सा पेड़ दिखाई दिया। पेड़ के नीचे फूलों की पंखुड़ियों का ढेर था।
कान्हा ने कहा—
“यहाँ कोई फूल जमा करता है।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“कौन हो तुम?”
सभी बच्चे चौंक गए।
एक छोटी लड़की पेड़ के पीछे से बाहर आई।
उसके हाथ में फूलों की टोकरी थी।
कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—
“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
लड़की ने कहा—
“मैं फूल इकट्ठे करती हूँ।”
कान्हा ने पूछा—
“क्या तुम नंद भवन गई थीं?”
लड़की चुप हो गई।
कान्हा ने धीरे से पूछा—
“मटकी पर फूलों का निशान तुमने बनाया था?”
लड़की ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
एक दोस्त ने पूछा—
“क्यों?”
लड़की ने कहा—
“मैं आपको बुलाना चाहती थी।”
कान्हा हैरान हुए।
“हमें?”
“हाँ।”
“लेकिन सीधे बुला सकती थीं।”
लड़की ने धीरे से कहा—
“मैं आपको जानती नहीं थी।”
कान्हा मुस्कुराए।
“अब जानती हो।”
लड़की भी मुस्कुरा दी।
उसने टोकरी से एक सुंदर फूल निकाला।
“मैं आपको ये देना चाहती थी।”
कान्हा ने फूल लिया।
“बहुत सुंदर है।”
फिर लड़की ने बताया कि वह अपनी माँ के साथ गाँव के बाहर रहती है। उसकी माँ बीमार होने के कारण घर से बाहर कम निकल पाती थीं। वह रोज फूल इकट्ठे करके गाँव की गोपियों को देती थी।
कान्हा ने पूछा—
“तो तुमने मटकी पर निशान क्यों बनाया?”
लड़की बोली—
“मैं चाहती थी कि आप मुझे पहचान लें।”
कान्हा ने कहा—
“अब तो पहचान लिया।”
एक दोस्त बोला—
“लेकिन तुम्हें डर नहीं लगा कि मैया नाराज होंगी?”
लड़की ने सिर हिलाया।
“मुझे लगा था शायद कोई मुझे समझेगा नहीं।”
कान्हा ने कहा—
“अगर किसी से बात करनी हो तो छिपकर निशान बनाने की जरूरत नहीं। सीधे आ जाना।”
लड़की ने मुस्कुराकर कहा—
“ठीक है।”
कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।
“हम इसे भी दोस्त बना लेते हैं।”
सभी बच्चों ने हामी भरी।
तभी चंदू लड़की की फूलों वाली टोकरी के पास गया और उसे सूँघने लगा।
लड़की हँस पड़ी।
“ये भी फूल पसंद करता है?”
कान्हा बोले—
“इसे हर चीज पसंद है।”
चंदू ने टोकरी को नाक से हल्का सा धक्का दिया।
फूल थोड़े बिखर गए।
कान्हा ने कहा—
“चंदू!”
सब हँस पड़े।
कान्हा और उनके दोस्तों ने मिलकर फूल फिर से टोकरी में रख दिए।
लड़की ने कहा—
“धन्यवाद।”
कान्हा बोले—
“दोस्त धन्यवाद नहीं कहते।”
फिर वे सब गाँव की ओर लौटने लगे।
रास्ते में कान्हा ने लड़की से पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“मेरा नाम गौरी है।”
“गौरी, तुम्हें फूल बहुत पसंद हैं?”
“हाँ।”
“तो कल हमारे साथ फूलों की माला बनाना।”
गौरी ने खुशी से सिर हिलाया।
घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।
“मिल गया रहस्य?”
कान्हा मुस्कुराए।
“हाँ।”
उन्होंने गौरी की कहानी सुनाई।
यशोदा ने प्यार से कहा—
“तो तुमने एक नई दोस्त बना ली।”
कान्हा बोले—
“हाँ।”
फिर उन्होंने मटकी पर बने फूलों के निशान को साफ कर दिया।
यशोदा ने पूछा—
“इसे मिटा क्यों रहे हो?”
कान्हा बोले—
“अब इसकी जरूरत नहीं। गौरी सीधे हमारे घर आएगी।”
यशोदा मुस्कुरा दीं।
अगले दिन गौरी सच में नंद भवन आई।
उसने फूलों की बड़ी टोकरी लाई थी।
कान्हा और उसके दोस्तों ने फूलों की माला बनानी शुरू की।
किसी की माला छोटी बनी, किसी की टेढ़ी।
कान्हा की माला में एक फूल बार-बार निकल जाता।
गौरी हँसकर बोली—
“कान्हा, तुमसे माला नहीं बन रही।”
कान्हा ने कहा—
“मैं तो जानबूझकर इसे ऐसा बना रहा हूँ।”
दोस्त बोला—
“झूठ!”
सब हँस पड़े।
आखिर में उन्होंने मिलकर एक सुंदर माला बनाई।
कान्हा ने उसे छोटू के गले में डाल दिया।
छोटू की घंटी के साथ फूल भी झूलने लगे।
टन… टन…
कान्हा ने कहा—
“देखो, आज छोटू सबसे सुंदर लग रहा है।”
चंदू ने भी आगे आकर माला सूँघी।
कान्हा बोले—
“तुम्हारे लिए भी बनाएँगे।”
शाम तक पूरा आँगन फूलों की खुशबू से भर गया।
उस दिन कान्हा ने एक छोटी सी बात सीखी—
कभी-कभी कोई अजीब हरकत परेशानी पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि किसी तक पहुँचने की कोशिश में की जाती है। इसलिए किसी बात को समझने से पहले उसके पीछे की वजह जानना जरूरी है।
रात को यशोदा ने पूछा—
“आज क्या सीखा?”
कान्हा ने कहा—
“जिसे मदद चाहिए, उसे डरना नहीं चाहिए। और हमें भी किसी को बिना समझे गलत नहीं समझना चाहिए।”
यशोदा ने उनके माथे पर प्यार से हाथ रखा।
“बहुत अच्छी बात सीखी।”
कान्हा मुस्कुराए और सो गए।
लेकिन अगली सुबह वृंदावन में एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।
नंद बाबा की कुछ गायें चरते-चरते बहुत दूर निकल गई थीं। उनमें से एक छोटी गाय रास्ता भूल गई थी।
कान्हा ने उसकी घंटी की आवाज सुनी।
उन्होंने तुरंत कहा—
“ये आवाज गाँव की तरफ से नहीं आ रही।”
और फिर कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस घंटी की आवाज का पीछा करने निकल पड़े।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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