नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और रास्ता भूली गाय
अगली सुबह वृंदावन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रात की बारिश के बाद मिट्टी से मीठी खुशबू उठ रही थी। नंद बाबा रोज की तरह गायों को चराने के लिए तैयार कर रहे थे।
कान्हा भी जल्दी उठकर आँगन में पहुँच गए।
छोटू और चंदू उन्हें देखते ही उनके पास आ गए।
टन… टन…
कान्हा हँस पड़े।
“तुम दोनों तो मुझसे पहले ही तैयार हो!”
नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—
“आज गायों को गाँव के पश्चिम वाले मैदान में ले जाना है। वहाँ घास बहुत हरी है।”
कान्हा ने पूछा—
“मैं भी चलूँ?”
“हाँ, लेकिन ध्यान रखना कि कोई गाय बहुत दूर न चली जाए।”
कान्हा ने गंभीर होकर कहा—
“मैं सबका ध्यान रखूँगा।”
सभी गायें धीरे-धीरे मैदान की तरफ चल पड़ीं।
कान्हा कभी किसी बछड़े के पास जाते, कभी किसी गाय को रास्ते से भटकने से रोकते।
उनके दोस्त भी मदद कर रहे थे।
दोपहर के करीब नंद बाबा ने गायों को एक जगह इकट्ठा करना शुरू किया।
उन्होंने एक-एक करके गिनती की।
“एक… दो… तीन…”
फिर अचानक वे रुक गए।
“एक गाय कम है।”
कान्हा तुरंत चौकन्ने हो गए।
“कौन सी?”
नंद बाबा ने चारों तरफ देखा।
“सुरभि नहीं दिखाई दे रही।”
कान्हा ने पूछा—
“वही सफेद गाय?”
“हाँ।”
कान्हा ने ध्यान से सुना।
दूर कहीं से बहुत हल्की घंटी की आवाज आ रही थी।
टन…
कान्हा ने हाथ उठाया।
“बाबा! उधर से आवाज आ रही है।”
नंद बाबा ने ध्यान लगाया।
कुछ पल बाद उन्हें भी घंटी सुनाई दी।
“हाँ, आवाज उसी तरफ से है।”
कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस दिशा में चल पड़े।
रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ था।
कुछ दूर जाने पर घंटी की आवाज फिर सुनाई दी।
टन… टन…
कान्हा बोले—
“वह ज्यादा दूर नहीं है।”
एक दोस्त ने पूछा—
“तुम्हें कैसे पता?”
कान्हा मुस्कुराए।
“घंटी की आवाज तेज हो रही है।”
वे आगे बढ़ते गए।
लेकिन अचानक रास्ता दो दिशाओं में बँट गया।
एक रास्ता नदी की तरफ जाता था और दूसरा घने पेड़ों की तरफ।
घंटी की आवाज दोनों तरफ से आती हुई लग रही थी।
एक दोस्त बोला—
“अब किस तरफ जाएँ?”
कान्हा कुछ देर चुप रहे।
उन्होंने जमीन पर देखा।
मिट्टी पर गाय के खुरों के निशान थे।
उन्होंने कहा—
“इधर।”
सब उनके पीछे चल पड़े।
कुछ दूर जाने पर उन्हें घास कुचली हुई दिखाई दी।
“गाय यहाँ से गई है।”
तभी फिर आवाज आई।
टन…
कान्हा दौड़ पड़े।
पेड़ों के बीच एक खुला स्थान था।
वहाँ सुरभि खड़ी थी।
लेकिन वह अकेली नहीं थी।
उसके पास एक छोटा सा बछड़ा भी था।
कान्हा ने हैरानी से पूछा—
“ये कौन है?”
नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए।
उन्होंने बछड़े को देखा और मुस्कुराए।
“शायद सुरभि ने इसे यहाँ पाया है।”
बछड़ा बहुत छोटा था और अपनी माँ से अलग लग रहा था।
कान्हा उसके पास बैठ गए।
“तुम यहाँ अकेले कैसे आए?”
बछड़े ने धीरे से आवाज की।
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
“इसकी माँ कहाँ है?”
नंद बाबा बोले—
“शायद हमें इसकी माँ भी ढूँढ़नी होगी।”
कान्हा ने कहा—
“तो आज दो खोज करनी होंगी।”
सब बच्चे हँस पड़े।
लेकिन इस बार कान्हा बहुत ध्यान से बछड़े को देखते रहे।
उन्होंने कहा—
“पहले इसे सुरभि के साथ सुरक्षित गाँव ले चलते हैं। फिर इसकी माँ ढूँढ़ेंगे।”
नंद बाबा ने सिर हिलाया।
सुरभि आगे चलने लगी और बछड़ा उसके साथ।
कान्हा दोनों के पीछे चलते रहे।
वापस मैदान में पहुँचकर उन्होंने बाकी गायों को देखा।
एक गाय बार-बार बछड़े की ओर देखने लगी।
कान्हा ने गौर किया।
“बाबा, ये गाय इसे देख रही है।”
नंद बाबा ने कहा—
“शायद इसे पहचानती है।”
बछड़ा धीरे-धीरे उस गाय की ओर बढ़ा।
गाय ने उसे सूँघा और उसके पास खड़ी हो गई।
कान्हा की आँखें चमक उठीं।
“बाबा! शायद यही इसकी माँ है!”
बछड़ा अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया।
गाय ने उसे प्यार से चाटा।
कान्हा खुशी से ताली बजाने लगे।
“मिल गई!”
दोस्त भी खुशी से चिल्लाए।
नंद बाबा ने कहा—
“देखा कान्हा? कभी-कभी किसी को सही जगह पहुँचाने के लिए बस ध्यान से देखना पड़ता है।”
कान्हा ने कहा—
“हाँ। अगर हमने ध्यान नहीं दिया होता तो ये दोनों अलग रह जाते।”
शाम को गायों को वापस गाँव लाया गया।
सुरभि भी अपने झुंड के साथ लौट आई।
कान्हा ने उसकी घंटी बजाई।
टन…
“अब तुम रास्ता नहीं भूलना।”
सुरभि ने जैसे जवाब में सिर हिलाया।
घर पहुँचकर यशोदा मैया ने पूछा—
“आज क्या हुआ?”
कान्हा ने सारी कहानी सुनाई।
यशोदा ने कहा—
“तो आज तुमने दो दोस्तों को उनके परिवार से मिलाया।”
कान्हा मुस्कुराए।
“हाँ मैया।”
फिर छोटू और चंदू आ गए।
कान्हा ने दोनों को देखकर कहा—
“तुम दोनों भी कभी रास्ता मत भूलना।”
चंदू ने कान्हा की धोती को हल्का सा खींचा।
कान्हा हँस पड़े।
“अच्छा, तुम मुझे ही रास्ता दिखाओगे?”
यशोदा भी हँसने लगीं।
उस रात कान्हा आँगन में बैठे थे। आसमान साफ था और तारों की रोशनी दिखाई दे रही थी।
उन्होंने यशोदा से पूछा—
“मैया, क्या हर किसी का कोई अपना होता है?”
यशोदा ने कहा—
“हाँ बेटा। परिवार हो, दोस्त हों या कोई ऐसा जो हमारी चिंता करे—हर किसी को अपनापन चाहिए।”
कान्हा ने कहा—
“तो हमें किसी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”
यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।
“यही तो सबसे बड़ी बात है।”
कान्हा कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले—
“मैया, कल मैं सब गायों के लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”
यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—
“ठीक है। लेकिन फूल तोड़ते समय पौधे को नुकसान मत पहुँचाना।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“गिरे हुए फूल इकट्ठे करेंगे।”
“बहुत अच्छे।”
अगली सुबह कान्हा और उनके दोस्त पेड़ों के नीचे गिरे हुए फूल इकट्ठे करने लगे।
गौरी भी उनके साथ थी।
सब मिलकर फूलों की छोटी-छोटी मालाएँ बनाने लगे।
कान्हा ने एक माला सुरभि के गले में डाली।
फिर दूसरी छोटू के गले में।
चंदू अपनी माला पहनने से पहले ही उसे सूँघने लगा।
कान्हा बोले—
“इसे खाना मत!”
सब हँस पड़े।
लेकिन तभी गाँव के दूसरी तरफ से तेज आवाज आई।
“बचाओ! मेरी मटकी गिर गई!”
सभी बच्चे उस तरफ दौड़े।
वहाँ एक गोपी की बड़ी मटकी जमीन पर गिर गई थी और उसके अंदर का दूध बहने लगा था।
कान्हा ने तुरंत कहा—
“जल्दी से कपड़ा लाओ!”
सभी बच्चे मदद करने लगे।
लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उस मटकी के गिरने के पीछे एक छोटी सी गलती थी, जो अगले अध्याय में पूरे गाँव को एक नई सीख देने वाली थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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