नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और टूटी हुई मटकी
वृंदावन की उस सुबह सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था। गलियों में गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और घरों से ताजे दूध की खुशबू आ रही थी। कान्हा अपने दोस्तों और गौरी के साथ फूलों की मालाएँ बना रहे थे।
तभी गाँव के दूसरी ओर से एक घबराई हुई आवाज सुनाई दी—
“अरे! मेरी मटकी गिर गई!”
कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।
“चलो!”
सभी बच्चे दौड़कर वहाँ पहुँचे।
एक गोपी जमीन पर बैठी अपनी टूटी हुई मटकी को देख रही थीं। मटकी का एक हिस्सा टूट गया था और उसमें रखा दूध मिट्टी में फैल गया था।
गोपी बहुत दुखी थीं।
“इतनी मेहनत से दूध निकाला था। सब व्यर्थ हो गया।”
कान्हा उनके पास बैठ गए।
“चाची, आप परेशान मत हो।”
गोपी बोलीं—
“लेकिन अब क्या होगा? मेरे पास दूसरी मटकी भी नहीं है।”
कान्हा ने टूटे हुए बर्तन को देखा।
“इसे अभी जोड़ नहीं सकते, लेकिन दूध को बचाया जा सकता है।”
उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—
“जल्दी से साफ बर्तन लाओ।”
दो बच्चे पास के घर से एक खाली बर्तन ले आए।
कान्हा ने कहा—
“जो दूध बचा है, उसे इसमें डाल दो।”
गोपी ने सावधानी से बचा हुआ दूध दूसरे बर्तन में डाल दिया।
काफी दूध मिट्टी में जा चुका था, लेकिन थोड़ा बच गया था।
गोपी ने कहा—
“कम से कम इतना तो बच गया।”
कान्हा मुस्कुराए।
“जो बच गया, उसके लिए खुश होना चाहिए।”
तभी नंद बाबा वहाँ आ गए।
उन्होंने पूछा—
“क्या हुआ?”
गोपी ने पूरी बात बताई।
नंद बाबा ने टूटी मटकी देखी।
“इसे किसने रखा था?”
गोपी ने कहा—
“मैंने इसे आँगन के किनारे रखा था। शायद बिल्ली के पीछे भागते हुए चंदू ने इसे धक्का दे दिया।”
कान्हा ने तुरंत चंदू की तरफ देखा।
चंदू कुछ दूर खड़ा था।
उसकी छोटी घंटी धीरे-धीरे बज रही थी।
टन…
कान्हा उसके पास गए।
“चंदू, क्या तुमने मटकी गिराई?”
चंदू ने सिर झुका लिया।
बच्चे हँसने लगे।
लेकिन कान्हा ने उन्हें रोक दिया।
“हँसो मत।”
उन्होंने चंदू को समझाया—
“अगर तुम्हें किसी चीज से खेलना हो तो रास्ते से दूर खेलना चाहिए।”
फिर कान्हा गोपी के पास गए।
“चाची, इसे जानबूझकर नहीं गिराया।”
गोपी ने चंदू को देखा।
उनका गुस्सा कम हो गया।
“हाँ, लगता है गलती से हुआ।”
उन्होंने चंदू के सिर पर हाथ फेर दिया।
चंदू ने उनकी हथेली सूँघी।
कान्हा मुस्कुराए।
“अब इसे समझ आ गया होगा।”
गोपी बोलीं—
“लेकिन मेरी मटकी टूट गई।”
कान्हा ने कहा—
“हम आपके लिए नई मटकी लाएँगे।”
नंद बाबा ने कहा—
“हाँ, आज ही कुम्हार के घर से एक नई मटकी ले आएँगे।”
गोपी ने राहत की साँस ली।
“धन्यवाद।”
कान्हा बोले—
“लेकिन उससे पहले हम यह दूध साफ करेंगे।”
सभी बच्चों ने मिलकर आँगन साफ करना शुरू किया।
किसी ने पानी डाला, किसी ने मिट्टी समतल की और किसी ने टूटे हुए टुकड़े एक तरफ रखे।
गौरी ने कहा—
“इन टुकड़ों का क्या करेंगे?”
कान्हा ने उन्हें देखा।
“फेंकेंगे नहीं।”
एक दोस्त ने पूछा—
“फिर?”
कान्हा बोले—
“कुम्हार चाचा से पूछेंगे। शायद इन्हें देखकर वे समझ सकें कि मटकी कहाँ से कमजोर थी।”
नंद बाबा ने उनकी बात सुनी तो मुस्कुराए।
“बहुत अच्छा विचार है।”
दोपहर में सभी कुम्हार के घर पहुँचे।
कुम्हार चाचा ने टूटी मटकी देखी।
उन्होंने कहा—
“मटकी के इस हिस्से में मिट्टी ठीक से नहीं लगी थी। इसलिए चोट लगते ही टूट गई।”
कान्हा ने पूछा—
“क्या इसे दोबारा बनाया जा सकता है?”
कुम्हार बोले—
“मिट्टी को फिर से गूँधकर दूसरी चीज बनाई जा सकती है।”
कान्हा खुश हुए।
“तो इसे बेकार नहीं कहना चाहिए।”
कुम्हार मुस्कुराए।
“बिल्कुल नहीं।”
उन्होंने बच्चों को चाक पर नई मिट्टी रखकर दिखाई।
चाक घूमने लगा।
घुर्र… घुर्र…
धीरे-धीरे मिट्टी का आकार बदलने लगा।
कान्हा मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे।
“इतनी साधारण मिट्टी से मटकी कैसे बन जाती है?”
कुम्हार बोले—
“मिट्टी को आकार देने के लिए धैर्य चाहिए। थोड़ा पानी, सही दबाव और लगातार ध्यान।”
कान्हा ने कहा—
“मतलब जल्दी करेंगे तो मटकी बिगड़ सकती है?”
“हाँ।”
कान्हा ने यह बात ध्यान से याद कर ली।
फिर उन्होंने पूछा—
“क्या मैं भी बना सकता हूँ?”
कुम्हार हँस पड़े।
“क्यों नहीं?”
कान्हा चाक के पास बैठ गए।
उन्होंने मिट्टी को हाथ लगाया।
पहले तो मिट्टी एक तरफ फैल गई।
दोस्त हँसने लगे।
कान्हा बोले—
“हँसो मत! मैं सीख रहा हूँ।”
उन्होंने फिर कोशिश की।
इस बार मिट्टी थोड़ी सी ऊपर उठी।
कान्हा की आँखें चमक उठीं।
“देखो!”
लेकिन अगले ही पल आकार फिर बिगड़ गया।
कान्हा खुद हँस पड़े।
“ये मुझसे नाराज है।”
कुम्हार ने कहा—
“मिट्टी नाराज नहीं होती। उसे समय चाहिए।”
कान्हा बोले—
“तो मैं इसे समय दूँगा।”
काफी कोशिश के बाद उन्होंने एक छोटी सी कटोरी बना ली।
वह बिल्कुल गोल नहीं थी।
लेकिन कान्हा बहुत खुश थे।
उन्होंने उसे उठाकर कहा—
“ये मेरी है!”
कुम्हार बोले—
“हाँ। इसे सूखने देना। फिर इसे पकाकर मजबूत कर देंगे।”
कान्हा ने कटोरी गोपी को देने की बात कही।
“इसमें आप छोटू और चंदू के लिए पानी रख सकती हैं।”
गोपी की आँखों में खुशी आ गई।
“तुमने इतनी छोटी चीज में भी मेरे लिए खुशी ढूँढ़ ली।”
शाम को सब घर लौटे।
कान्हा ने चंदू को अपनी बनाई हुई कटोरी दिखाई।
“देखो, ये तुम्हारे लिए है। लेकिन इसे गिराना मत!”
चंदू ने कटोरी सूँघी।
कान्हा तुरंत उसे थोड़ा दूर कर बोले—
“पहले सूखने दो!”
सभी बच्चे हँस पड़े।
उस रात यशोदा ने कान्हा से पूछा—
“आज क्या सीखा?”
कान्हा ने कहा—
“टूटी हुई चीज हमेशा बेकार नहीं होती। उसे फिर से काम में लाया जा सकता है।”
यशोदा ने पूछा—
“और?”
“गलती हो जाए तो उसे छिपाना नहीं चाहिए। उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।”
यशोदा ने कान्हा को गले लगा लिया।
“आज तुमने बहुत अच्छी बात सीखी।”
कान्हा मुस्कुराए।
बाहर आँगन में छोटू और चंदू की घंटियाँ बज रही थीं।
टन… टन…
कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—
“कल मैं दोनों को नई कटोरी में पानी पिलाऊँगा।”
लेकिन अगले दिन सुबह जब कान्हा आँगन में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि उनकी बनाई हुई कटोरी गायब थी।
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
“मेरी कटोरी कहाँ गई?”
गौरी ने जमीन पर कुछ छोटे-छोटे मिट्टी के निशान देखे।
“कान्हा, शायद कोई इसे लेकर गया है।”
कान्हा नीचे झुक गए।
निशान आँगन से बाहर जा रहे थे।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“लगता है हमारी अगली खोज शुरू हो गई।”
और वे उन निशानों के पीछे चल पड़े।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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