नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और यमुना की बहती नाव
शाम का समय था। यमुना के किनारे ठंडी हवा चल रही थी। कान्हा अपनी पतंग समेटकर घर लौटने ही वाले थे कि उनका दोस्त दौड़ता हुआ आया।
“कान्हा! जल्दी चलो!”
कान्हा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
दोस्त ने कहा—
“हमारी गेंद नाव में रह गई है और नाव किनारे से छूटकर पानी में चली गई!”
कान्हा ने यमुना की ओर देखा। सचमुच एक छोटी सी नाव धीरे-धीरे पानी के साथ दूर जा रही थी। उसमें बच्चों की लाल गेंद पड़ी थी।
एक दोस्त बोला—
“अब गेंद वापस नहीं मिलेगी।”
कान्हा ने कहा—
“गेंद तो मिल सकती है, लेकिन पहले ये देखना होगा कि नाव कहाँ जा रही है।”
सब बच्चे किनारे पर खड़े होकर नाव को देखने लगे।
नाव बहुत दूर नहीं गई थी, लेकिन पानी का बहाव तेज था।
कान्हा ने कहा—
“हम पानी में नहीं उतरेंगे।”
एक दोस्त ने पूछा—
“तो फिर गेंद कैसे आएगी?”
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
उन्हें किनारे पर पड़ी एक लंबी बाँस की लकड़ी दिखाई दी।
“इससे कोशिश कर सकते हैं।”
उन्होंने बाँस उठाया, लेकिन नाव अभी भी काफी दूर थी।
एक दोस्त बोला—
“ये वहाँ तक नहीं पहुँचेगा।”
कान्हा ने कहा—
“तो कोई और तरीका सोचते हैं।”
तभी नंद बाबा वहाँ पहुँच गए।
“क्या हुआ?”
कान्हा ने सारी बात बताई।
नंद बाबा ने नदी की ओर देखा।
“नाव को पकड़ने की कोशिश मत करना। पानी का बहाव तेज है।”
कान्हा ने पूछा—
“बाबा, फिर गेंद?”
नंद बाबा मुस्कुराए।
“गेंद से ज्यादा जरूरी तुम सब हो।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“हाँ बाबा।”
उन्होंने नाव को ध्यान से देखा।
नाव किनारे से दूर जाकर एक शांत हिस्से की तरफ बढ़ रही थी।
नंद बाबा बोले—
“अगर हवा इसी दिशा में रही तो नाव थोड़ी देर में उस दूसरे किनारे के पास जा सकती है।”
कान्हा की आँखें चमक उठीं।
“तो हम वहीं से उसे पकड़ सकते हैं!”
नंद बाबा ने कहा—
“हाँ, लेकिन मेरे साथ।”
सभी बच्चे नंद बाबा के साथ सुरक्षित रास्ते से आगे बढ़ने लगे।
कान्हा बार-बार नाव को देखते।
“अभी वहाँ है!”
कुछ देर बाद नाव धीरे-धीरे किनारे की तरफ आने लगी।
नंद बाबा ने एक लंबी रस्सी ली और किनारे पर खड़े होकर उसे नाव की तरफ बढ़ाया।
इस बार नाव पास थी।
उन्होंने सावधानी से रस्सी नाव के अगले हिस्से में अटका दी।
धीरे-धीरे नाव किनारे खिंच आई।
कान्हा ने अंदर झाँका।
“गेंद!”
उन्होंने गेंद उठा ली।
सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।
“मिल गई!”
कान्हा ने गेंद दोस्त को दे दी।
दोस्त ने कहा—
“तुम्हारी वजह से मिल गई।”
कान्हा हँसे।
“नहीं, बाबा की वजह से।”
नंद बाबा मुस्कुराए।
“और तुम्हारी समझदारी की वजह से भी।”
वापस लौटते समय कान्हा चुप थे।
नंद बाबा ने पूछा—
“क्या सोच रहे हो?”
कान्हा बोले—
“आज समझ आया कि हर चीज को पाने के लिए तुरंत दौड़ना जरूरी नहीं। पहले सोचना चाहिए।”
नंद बाबा ने कहा—
“बिल्कुल। यही समझदारी है।”
अगले दिन बच्चों ने तय किया कि वे यमुना किनारे खेलेंगे, लेकिन इस बार पानी से थोड़ी दूरी पर।
कान्हा ने गेंद हाथ में ली और कहा—
“आज हम ऐसा खेल खेलेंगे जिसमें कोई पानी के पास नहीं जाएगा।”
सबने हामी भरी।
खेल शुरू हुआ।
कान्हा गेंद एक दोस्त को देते, दोस्त दूसरे को।
कुछ देर बाद गेंद अचानक एक पेड़ के पीछे जा गिरी।
एक बच्चा उसे लेने दौड़ा।
कान्हा ने कहा—
“रुको! धीरे जाना।”
बच्चा रुक गया।
कान्हा खुद उसके साथ गए।
वहाँ गेंद के पास एक छोटा पक्षी बैठा था।
उसका पंख शायद किसी सूखी टहनी में उलझ गया था।
कान्हा धीरे से बैठ गए।
“डरो मत।”
उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।
नंद बाबा ने सावधानी से टहनी हटाई।
पक्षी आजाद होकर उड़ गया।
कान्हा उसे आसमान में जाते हुए देखते रहे।
एक दोस्त बोला—
“आज तो हमारी गेंद से ज्यादा काम पक्षी का हो गया।”
कान्हा हँसे।
“गेंद तो फिर मिल जाती। इसे मदद की जरूरत थी।”
शाम होते-होते सभी बच्चे घर लौटने लगे।
रास्ते में कान्हा ने देखा कि छोटू और चंदू उनके पीछे-पीछे आ रहे हैं।
कान्हा ने कहा—
“तुम दोनों यहाँ कैसे?”
दोनों बछड़ों की घंटियाँ बजने लगीं।
टन… टन…
कान्हा हँस पड़े।
“अच्छा! अब तुम भी हमारे साथ खेलना चाहते हो?”
चंदू आगे बढ़ा और कान्हा की गेंद सूँघने लगा।
कान्हा बोले—
“इसे मत खाना!”
दोस्त जोर से हँसने लगे।
चंदू ने गेंद को नाक से धक्का दिया और गेंद लुढ़कती हुई दूर चली गई।
कान्हा उसके पीछे दौड़े।
“अरे चंदू!”
छोटू भी पीछे दौड़ पड़ा।
कुछ ही क्षणों में पूरा रास्ता बच्चों और दोनों बछड़ों की दौड़ से भर गया।
घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने पूछा—
“आज फिर क्या शरारत हुई?”
कान्हा ने कहा—
“आज हमने किसी की गेंद बचाई, एक पक्षी की मदद की और चंदू ने गेंद को फिर भगा दिया।”
यशोदा हँस पड़ीं।
“तो आज का दिन अच्छा रहा।”
कान्हा बोले—
“बहुत अच्छा।”
उस रात कान्हा आँगन में लेटे हुए आसमान के तारों को देख रहे थे।
उन्होंने यशोदा से पूछा—
“मैया, क्या तारे भी कभी रास्ता भूलते हैं?”
यशोदा ने कहा—
“शायद नहीं। वे अपनी जगह चमकते रहते हैं।”
कान्हा ने कहा—
“फिर अगर कोई रास्ता भूल जाए तो?”
यशोदा ने प्यार से कहा—
“उसे रास्ता दिखाने वाला कोई न कोई जरूर मिल जाता है।”
कान्हा मुस्कुराए।
उन्हें छोटू, चंदू, अपने दोस्त और आज मिला वह छोटा पक्षी याद आ गया।
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
लेकिन अगले दिन सुबह वृंदावन में एक और हलचल मचने वाली थी।
नंद बाबा के आँगन में रखी मटकी पर किसी ने फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना दिया था।
यशोदा मैया ने उसे देखा तो हैरान रह गईं।
“ये किसने बनाया?”
कान्हा ने निशान देखा।
उनके चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गई।
“मैया… मुझे लगता है हमें इसका रहस्य पता लगाना पड़ेगा।”
और इस बार निशान उन्हें वृंदावन की एक ऐसी जगह तक ले जाने वाला था, जहाँ बच्चों ने पहले कभी जाने की हिम्मत नहीं की थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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