जादुई पक्षियों की नगरी
बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसी नगरी थी, जिसके बारे में इंसानों की दुनिया में बहुत कम लोग जानते थे। उस नगरी का नाम था पंखलोक। वहाँ घर पत्थरों से नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे पंखों, चमकती बेलों और पेड़ों की मजबूत शाखाओं से बने थे। वहाँ इंसान नहीं, बल्कि तरह-तरह के जादुई पक्षी रहते थे।
किसी के पंख नीले थे, किसी के लाल, किसी के चाँदी जैसे सफेद और किसी के सुनहरे। हर पक्षी के पास कोई न कोई खास शक्ति थी। कोई बारिश बुला सकता था, कोई अंधेरे में रास्ता दिखा सकता था और कोई घायल पक्षियों को अपनी मीठी आवाज से शांत कर सकता था।
उस नगरी की रानी थी पंखरानी सुरम्या। उसके पंख मोर के पंखों जैसे रंग-बिरंगे थे और उसके माथे पर एक छोटा-सा चमकता मुकुट था।
पंखलोक में एक पुरानी परंपरा थी। नगरी के बीचों-बीच एक विशाल पेड़ था, जिसे जीवन-वृक्ष कहा जाता था। उसके पत्ते कभी नहीं सूखते थे। कहा जाता था कि जब तक जीवन-वृक्ष हरा रहेगा, तब तक पंखलोक सुरक्षित रहेगा।
लेकिन एक दिन अचानक जीवन-वृक्ष के पत्ते मुरझाने लगे।
पक्षियों में डर फैल गया।
“रानी माँ, ये क्या हो रहा है?” एक छोटी चिड़िया ने घबराकर पूछा।
सुरम्या ने पेड़ को ध्यान से देखा। उसके चेहरे की चिंता बढ़ गई।
“मुझे लगता है किसी ने जीवन-वृक्ष की जादुई रोशनी चुरा ली है।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
उसी समय एक बूढ़ा उल्लू आगे आया। उसका नाम था उलूक बाबा।
उसने धीमी आवाज में कहा, “रानी, कई साल पहले एक काला पक्षी इस नगरी से निकाला गया था। उसका नाम था कालपंख। वह जादुई शक्ति चाहता था। हो सकता है वह वापस आ गया हो।”
सुरम्या ने पूछा, “लेकिन वह कहाँ है?”
उलूक बाबा ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “काले पहाड़ के उस पार उसकी गुफा है। वहाँ जाना आसान नहीं है।”
सभा में कोई पक्षी आगे नहीं आया।
तभी एक छोटी-सी नीली चिड़िया आगे बढ़ी।
उसका नाम था नीरा।
नीरा आकार में छोटी थी, लेकिन उसके अंदर बहुत साहस था।
“मैं जाऊँगी,” उसने कहा।
कुछ पक्षी हँसने लगे।
“तुम? इतनी छोटी होकर?”
नीरा ने शांत होकर कहा, “बड़ा शरीर हमेशा बड़ी हिम्मत नहीं देता।”
रानी सुरम्या मुस्कुराई।
“नीरा, रास्ता बहुत कठिन है।”
“मुझे पता है,” नीरा बोली, “लेकिन अगर मैं कोशिश ही न करूँ तो जीवन-वृक्ष को कौन बचाएगा?”
रानी ने उसे एक चमकता हुआ पंख दिया।
“जब भी तुम्हें रास्ता न मिले, यह पंख तुम्हें सही दिशा दिखाएगा।”
नीरा उड़ चली।
पहले उसने घने बादलों का जंगल पार किया। वहाँ पेड़ों के बीच इतनी धुंध थी कि कुछ दिखाई नहीं देता था। तभी उसे दूर से रोने की आवाज सुनाई दी।
नीरा नीचे उतरी तो एक नन्हा सफेद पक्षी काँटों में फँसा हुआ था।
“मुझे बचा लो,” वह बोला।
नीरा ने बिना देर किए काँटों को हटाया और उसे बाहर निकाल दिया।
सफेद पक्षी ने कहा, “तुमने मेरी मदद की है। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”
उसका नाम था चांदू।
दोनों आगे बढ़े।
कुछ दूर जाकर उन्हें एक चौड़ी नदी मिली। पानी बहुत तेज था।
चांदू बोला, “हम इसे पार कैसे करेंगे?”
नीरा ने अपना चमकता पंख पानी के ऊपर रखा। अचानक पानी शांत हो गया और नदी के बीच एक रास्ता बन गया।
दोनों नदी पार कर गए।
आखिर वे काले पहाड़ तक पहुँचे।
पहाड़ के अंदर एक विशाल गुफा थी। वहाँ चारों तरफ काली धुंध फैली हुई थी।
अचानक गुफा के अंदर से भारी आवाज आई।
“कौन आया है?”
नीरा ने हिम्मत करके कहा, “मैं नीरा हूँ। जीवन-वृक्ष की रोशनी वापस लेने आई हूँ।”
अंधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं।
कालपंख सामने आ गया।
वह बहुत बड़ा काला पक्षी था। उसके पंखों से जैसे धुआँ निकल रहा था।
“तुम मुझे रोकने आई हो?” उसने हँसते हुए पूछा।
“मैं तुम्हें रोकने नहीं,” नीरा बोली, “तुम्हें समझाने आई हूँ।”
कालपंख कुछ पल चुप रहा।
“समझाने? मुझे?”
“हाँ। तुमने जीवन-वृक्ष की रोशनी क्यों चुराई?”
कालपंख ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि इस नगरी में किसी ने मुझे स्वीकार नहीं किया। मैं भी शक्तिशाली बनना चाहता था। जब सबने मुझे कमजोर समझा, तो मैंने सोचा कि अगर मेरे पास सबसे बड़ी शक्ति होगी, तो सब मुझसे डरेंगे।”
नीरा ने कहा, “डर से सम्मान नहीं मिलता।”
कालपंख ने गुस्से में पंख फड़फड़ाए।
“तुम मुझे क्या समझाओगी?”
तभी गुफा की छत से पत्थर गिरने लगा। कालपंख ने नीरा और चांदू को धक्का देकर सुरक्षित जगह कर दिया।
नीरा ने देखा कि कालपंख बुरा बनना नहीं चाहता था। वह बस अपने अकेलेपन से परेशान था।
नीरा बोली, “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो मेरे साथ पंखलोक चलो।”
कालपंख ने हैरानी से पूछा, “क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे?”
“शायद तुरंत नहीं,” नीरा बोली, “लेकिन तुम्हें एक मौका जरूर मिलना चाहिए।”
कालपंख ने कुछ देर सोचा। फिर उसने जीवन-वृक्ष की रोशनी से भरा चमकता पत्थर बाहर निकाला।
“ले जाओ इसे।”
तीनों पंखलोक लौट आए।
जैसे ही रोशनी जीवन-वृक्ष में वापस रखी गई, सूखे पत्ते फिर से हरे हो गए। पूरे पंखलोक में रंग-बिरंगी रोशनी फैल गई।
पक्षी खुशी से उड़ने लगे।
रानी सुरम्या ने कालपंख की ओर देखा।
“तुम वापस क्यों आए?”
कालपंख ने सिर झुकाकर कहा, “क्योंकि एक छोटी-सी चिड़िया ने मुझे बताया कि शक्ति पाने से ज्यादा जरूरी है किसी का विश्वास पाना।”
रानी कुछ पल चुप रही।
फिर उसने कहा, “गलती बड़ी थी, लेकिन उसे सुधारने की इच्छा भी बड़ी है।”
उस दिन से कालपंख को पंखलोक में रहने की अनुमति मिल गई।
नीरा को नगरी की सबसे बहादुर चिड़िया का सम्मान दिया गया।
लेकिन नीरा ने पुरस्कार लेते हुए कहा, “मैं अकेली बहादुर नहीं थी। चांदू ने मेरा साथ दिया और कालपंख ने अपनी गलती स्वीकार की। असली जादू यही है कि जब कोई गिर जाए, तो उसे उठने का मौका दिया जाए।”
उस दिन से पंखलोक में एक नया नियम बना।
किसी को उसकी कमजोरी के कारण छोटा नहीं समझा जाएगा।
और कहते हैं, आज भी उन ऊँचे पहाड़ों के बीच अगर किसी को रात में रंग-बिरंगे पक्षियों की आवाज सुनाई दे, तो समझ लेना कि कहीं पास ही पंखलोक की नगरी है।
वहाँ आज भी जीवन-वृक्ष हरा है, आसमान में जादुई पक्षी उड़ते हैं और हर सुबह सूरज की पहली किरण उनके पंखों पर पड़कर पूरी नगरी को सोने जैसा चमका देती है।
पंखलोक का सबसे बड़ा रहस्य कोई जादुई पेड़ या चमकता पत्थर नहीं था।
उस नगरी का असली जादू था—दया, दोस्ती और किसी को बदलने का एक मौका देना।

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