🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

Blog

  • सुनसान रास्ता..(part-6)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव और कबीर जंगल से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए।

     

    सुबह होने वाली थी।

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    उसने कबीर को गले लगा लिया।

     

    लेकिन कबीर बिल्कुल चुप था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने सड़क के किनारे लगे बोर्ड की तरफ इशारा किया।

     

    वहां फिर वही शब्द लिखे थे—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    आरव ने डरते हुए कहा—

     

    “अब तो हम बाहर आ गए हैं।”

     

    कबीर ने धीरे से उसकी तरफ देखा और कहा—

     

    “हम दोनों नहीं आए हैं।”

     

    आरव ने उसकी बात का मतलब नहीं समझा।

     

    तभी सड़क पर एक ट्रक आया और उसकी हेडलाइट की रोशनी दोनों पर पड़ी।

     

    आरव ने जमीन पर देखा।

     

    कबीर की परछाई वहां थी।

     

    लेकिन आरव की परछाई…

     

    नहीं थी।

     

    उसका दिल बैठ गया।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    वही गीले पैरों की आवाज।

     

    कबीर ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “भैया… जो भी हो, पीछे मत देखना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके कान के पास वही आवाज आई—

     

    “बहुत अच्छा… तुमने पीछे नहीं देखा।”

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “लेकिन अब कोई और देख चुका है।”

     

    आरव ने धीरे से सामने देखा।

     

    सड़क के दूसरी तरफ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह उनकी तरफ देख रहा था।

     

    उस आदमी ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    और उसी पल उसकी परछाई जमीन से गायब हो गई।

     

    आरव समझ गया…

     

    ये कहानी खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसी समय उसकी जेब में रखा मोबाइल अपने आप बजने लगा।

     

    स्क्रीन पर एक मैसेज था—

     

    “अगला नंबर तुम्हारा नहीं… उस आदमी का है।”

     

    और नीचे लिखा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    End

  • सुनसान रास्ता..(part-5)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके कंधे पर रखा हाथ धीरे-धीरे ठंडा होता जा रहा था।

     

    कबीर सामने खड़ा चिल्लाया—

     

    “भैया! पीछे मत देखना!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कबीर, ये औरत कौन है?”

     

    कबीर ने जवाब दिया—

     

    “ये कोई औरत नहीं है।”

     

    आरव की सांस अटक गई।

     

    कबीर बोला—

     

    “ये उस मकान की रखवाली करने वाली आत्मा है। जो भी इंसान इसे पीछे मुड़कर देखता है, उसकी परछाई उससे अलग हो जाती है।”

     

    आरव ने नीचे जमीन की तरफ देखा।

     

    उसकी अपनी परछाई वहां नहीं थी।

     

    वह गायब हो चुकी थी।

     

    तभी पीछे खड़ी चीज ने हंसते हुए कहा—

     

    “अब तुम मेरे हो।”

     

    आरव ने अचानक जेब से मोबाइल निकाला और कैमरा ऑन कर दिया।

     

    मोबाइल की स्क्रीन में उसने देखा…

     

    उसके पीछे कोई बूढ़ी औरत नहीं थी।

     

    बल्कि एक बहुत लंबी, काली आकृति खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

     

    आरव ने हिम्मत करके आंखें बंद कीं और कबीर की तरफ दौड़ पड़ा।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों मकान से बाहर भागने लगे।

     

    जैसे ही वे दरवाजे से बाहर निकले, पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी—

     

    “आरव… तुम जा सकते हो, लेकिन अपनी परछाई यहीं छोड़कर!”

     

    आरव ने जमीन पर देखा।

     

    उसकी परछाई अब भी मकान के अंदर खड़ी थी।

     

    और वह…

     

    उसे हाथ हिला रही थी।

  • सुनसान रास्ता..(part-4)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव सीढ़ियों के पास खड़ा कांप रहा था।

     

    अचानक ऊपर से एक पुरानी गेंद नीचे आकर उसके पैरों से टकराई।

     

    गेंद पर लाल रंग से लिखा था—

     

    “आरव भैया।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    यह वही गेंद थी जो उसने अपने छोटे भाई कबीर को दस साल पहले दी थी।

     

    तभी ऊपर से बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों भाग गए थे?”

     

    आरव को सब याद आने लगा।

     

    दस साल पहले वह और कबीर इसी जंगल में खेल रहे थे।

     

    अचानक उन्हें वही पुराना मकान मिला था।

     

    कबीर अंदर चला गया था।

     

    आरव डरकर बाहर भाग गया था।

     

    उसने कभी किसी को यह नहीं बताया कि कबीर आखिरी बार इसी मकान में गया था।

     

    आरव ने कांपते हुए कहा—

     

    “कबीर… मुझे माफ कर दो।”

     

    ऊपर से हंसी की आवाज आई।

     

    “मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल आवाज बदल गई।

     

    अब वह बूढ़ी औरत की आवाज थी—

     

    “लेकिन उसने नहीं किया।”

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर कबीर खड़ा था।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    और उसके पीछे वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    कबीर ने उंगली अपने होंठों पर रखी और धीरे से कहा—

     

    “भैया… पीछे मत देखना।”

     

    आरव समझ नहीं पाया।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

     

    और कान में फुसफुसाया—

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

  • सुनसान रास्ता..(part-3]

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव बाइक लेकर उस पुराने मकान के सामने रुक गया।

     

    उसे लगा कि शायद अंदर कोई इंसान होगा जो उसकी मदद कर सकता है।

     

    जैसे ही उसने दरवाजा खोला, दरवाजा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    दीवारों पर पुराने परिवार की तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर देखकर आरव के कदम रुक गए।

     

    तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।

     

    बीच में एक बूढ़ी औरत थी।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर के एक कोने में…

     

    आरव खुद खड़ा था।

     

    उसके हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचा लो…”

     

    आरव डरते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    हर सीढ़ी पर किसी के पैरों के निशान थे।

     

    गीले पैरों के निशान।

     

    और वे निशान ऊपर से नीचे की तरफ आ रहे थे।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    तभी पीछे से वही आवाज आई—

     

    “तुम आखिर वापस आ ही गए।”

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “जिसे तुमने दस साल पहले जंगल में छोड़ दिया था।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसे अचानक अपने बचपन की एक घटना याद आ गई।

     

    दस साल पहले इसी जंगल में उसका छोटा भाई गायब हुआ था।

     

    लेकिन आरव को याद था…

     

    उसका भाई कभी मिला ही नहीं था।

  • सुनसान रास्ता…(part-2)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव ने कॉल तुरंत काट दिया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    उसे महसूस हो रहा था कि बाइक की पिछली सीट पर कोई बैठा है।

     

    सीट थोड़ी नीचे दबी हुई थी।

     

    लेकिन आरव ने पीछे देखने की हिम्मत नहीं की।

     

    उसने बाइक तेज कर दी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसके कान के पास फिर वही फुसफुसाहट आई—

     

    “आरव… मुझे घर जाना है।”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक उसकी बाइक की हेडलाइट बंद हो गई।

     

    सड़क पूरी तरह अंधेरे में डूब गई।

     

    तभी सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखाई दी।

     

    उसने सफेद साड़ी पहन रखी थी और उसके बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    बूढ़ी औरत ने हाथ उठाकर बाइक रोकने का इशारा किया।

     

    आरव किसी तरह उसके पास से बाइक निकालकर आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कुछ मीटर आगे जाकर शीशे में देखा…

     

    वही बूढ़ी औरत बाइक की पिछली सीट पर बैठी थी।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    वह पीछे मुड़ने ही वाला था कि बूढ़ी औरत ने उसके कान में कहा—

     

    “अगर पीछे देखा… तो अगली सुबह तुम्हारी नहीं होगी।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं और बाइक दौड़ाता रहा।

     

    कुछ देर बाद उसे दूर एक पुराना मकान दिखाई दिया।

     

    मकान के बाहर वही बोर्ड लगा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    और इस बार उसके नीचे खून से लिखा था—

     

    “वो घर तक साथ आती है।”

  • सुनसान रास्ता…(part-1)

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    रात के करीब 11 बज रहे थे। आरव अपनी बाइक से गाँव लौट रहा था। रास्ता सुनसान था और चारों तरफ घना जंगल था।

     

    अचानक उसकी बाइक बंद हो गई।

     

    आरव ने कई बार सेल्फ स्टार्ट दबाया, लेकिन बाइक चालू नहीं हुई। तभी उसे पीछे से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    जैसे कोई गीले पैरों से उसके पीछे चल रहा हो।

     

    आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और आवाज की तरफ देखने ही वाला था कि उसकी नजर सड़क किनारे लगे एक पुराने बोर्ड पर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    आरव घबरा गया।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने धीरे से फुसफुसाया—

     

    “तुमने पढ़ लिया… अब पीछे मत देखना।”

     

    आरव का पूरा शरीर कांपने लगा।

     

    उसने सामने देखा तो उसकी बंद बाइक अपने आप स्टार्ट हो चुकी थी।

     

    लेकिन तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    कॉल उठाते ही दूसरी तरफ से उसी की आवाज सुनाई दी—

     

    “आरव… बाइक मत चलाना। वो तुम्हारे पीछे बैठी है।”

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    बूढ़ी औरत की आवाज कुएँ के भीतर गूँजी—

     

    “पीछे देखो…”

     

    अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, मत सुनना।”

     

    लेकिन इस बार आवाज फिर आई।

     

    “अमित… पीछे देखो।”

     

    आवाज बिल्कुल बूढ़ी औरत की थी।

     

    अमित ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।

     

    बूढ़ी औरत वहीं खड़ी थी।

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    उसकी लालटेन बुझ चुकी थी।

     

    फिर भी उसके आसपास हल्की नीली रोशनी थी।

     

    अमित ने पूछा—

     

    “आपने कहा था पीछे मत देखना।”

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “मैंने?”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    नैना अचानक उसके सामने आ गई।

     

    “भैया, यह वह नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें खाली हो गईं।

     

    फिर उसके चेहरे पर कोई चेहरा नहीं रहा।

     

    सिर्फ एक गहरा अंधेरा।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तो असली बूढ़ी औरत कहाँ है?”

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “तुमने उसे बहुत पहले छोड़ दिया।”

     

    अमित ने चारों तरफ देखा।

     

    “वह कहाँ है?”

     

    “उस जगह जहाँ हर वह इंसान जाता है जो पीछे देखता है।”

     

    अचानक कुएँ की दीवारें हिलने लगीं।

     

    नैना ने अमित का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों ऊपर की तरफ भागे।

     

    बूढ़ी औरत भी उनके पीछे आई।

     

    लेकिन जैसे ही वे कुएँ से बाहर निकले, अमित ने देखा कि मंदिर के सामने तीन लोग खड़े थे।

     

    एक उसकी माँ।

     

    दूसरा उसका पिता।

     

    तीसरा रवि।

     

    तीनों बिल्कुल चुप।

     

    अमित की माँ ने कहा—

     

    “बेटा… घर चलो।”

     

    अमित वहीं रुक गया।

     

    नैना ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “ये तीनों असली नहीं हैं।”

     

    रवि आगे बढ़ा।

     

    “अमित, मैं हूँ।”

     

    अमित ने उसे देखा।

     

    “अगर तुम रवि हो तो मुझे बताओ… पहली बार मैंने तुम्हें कहाँ देखा था?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “कॉलेज में।”

     

    अमित ने सिर हिलाया।

     

    “गलत।”

     

    रवि का चेहरा बदलने लगा।

     

    अमित बोला—

     

    “मैंने तुम्हें स्कूल में देखा था।”

     

    रवि का चेहरा अचानक काला पड़ गया।

     

    उसने चीख मारी और गायब हो गया।

     

    अब उसके पिता आगे आए।

     

    “बेटा…”

     

    अमित की आँखें भर आईं।

     

    “पापा।”

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “सावधान।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “पापा, आपने मुझे क्यों बचाया था?”

     

    आकृति चुप रही।

     

    “क्योंकि मैं आपका बेटा था?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “या इसलिए कि आपको डर था कि अगर मैं मर गया तो आपका सौदा पूरा नहीं होगा?”

     

    आकृति का चेहरा बदल गया।

     

    अमित समझ गया।

     

    “आपने मुझे नहीं बचाया था।”

     

    उसने कहा—

     

    “आपने सिर्फ अपना वादा बचाया था।”

     

    आकृति चीखते हुए गायब हो गई।

     

    अब उसकी माँ की आकृति सामने थी।

     

    “अमित…”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “आप मेरी माँ नहीं हैं।”

     

    आकृति हँसी।

     

    “कैसे पता?”

     

    “क्योंकि मेरी माँ मुझे कभी पीछे मुड़कर देखने के लिए नहीं कहेंगी।”

     

    आकृति भी धुएँ में बदल गई।

     

    अब मंदिर के सामने सिर्फ अमित, नैना और बूढ़ी औरत खड़े थे।

     

    अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “अब सच बताइए।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं भी तुम्हारे पिता के साथ इस सब में शामिल थी।”

     

    “आपने मुझे जंगल में क्यों बचाया?”

     

    “क्योंकि मुझे अपनी गलती सुधारनी थी।”

     

    “और आपने मुझे उस घर में क्यों भेजा?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि अगर तुमने अपनी यादें वापस नहीं पाईं, तो वह कभी नहीं जाएगी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “वह कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने नैना की तरफ देखा।

     

    “जिसे तुमने अवनि समझा… वह कोई आत्मा नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    “वह डर है।”

     

    अमित चुप रहा।

     

    “हर इंसान के अंदर एक डर होता है। लेकिन कुछ लोग अपने डर को इतना बड़ा बना देते हैं कि वह उनसे अलग होकर एक रूप ले लेता है।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने अपने डर को आईने में कैद करने की कोशिश की। लेकिन वह डर तुम्हारे परिवार की यादों, अपराधबोध और मौत से जुड़ गया।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “और नैना?”

     

    “नैना उसकी पहली शिकार थी।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “लेकिन मैं आखिरी नहीं थी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    नैना ने मंदिर के पीछे जंगल की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि उसने तुम्हारे डर से एक नया रूप बना लिया है।”

     

    “कौन सा?”

     

    नैना ने अमित की तरफ देखा।

     

    “तुम।”

     

    अमित की साँस रुक गई।

     

    उसे अचानक समझ आया।

     

    दूसरा अमित सिर्फ उसका प्रतिबिंब नहीं था।

     

    वह उसके अंदर मौजूद डर था।

     

    उसकी सारी बेचैनी।

     

    उसका अपराधबोध।

     

    नैना को बचा न पाने का दर्द।

     

    पिता से नफरत।

     

    माँ से नाराजगी।

     

    और सबसे बड़ा डर—

     

    अकेले रह जाने का।

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “तो उसे खत्म कैसे करूँ?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “उसे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे स्वीकार करना होगा।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    “पीछे देखो।”

     

    नैना ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं!”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “आज पहली बार पीछे देखना जरूरी है।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “लेकिन यही तो नियम था।”

     

    “नियम डर ने बनाया था।”

     

    अमित ने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कीं।

     

    फिर उसने साँस ली।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और वह पीछे मुड़ गया।

     

    उसके पीछे दूसरा अमित खड़ा था।

     

    लेकिन अब वह भयानक नहीं था।

     

    वह सिर्फ एक डरा हुआ बच्चा था।

     

    आठ साल का अमित।

     

    वही बच्चा जो उस रात कमरे के बाहर खड़ा अपनी बहन की चीख सुन रहा था।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    “मैंने उसे बचाया नहीं।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह बच्चे के पास गया।

     

    “तुम बच्चे थे।”

     

    “लेकिन मैंने पीछे देखा था।”

     

    “तुम्हें सच नहीं पता था।”

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “डरना गलत नहीं है।”

     

    बच्चे ने ऊपर देखा।

     

    “फिर नैना क्यों मर गई?”

     

    अमित घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “क्योंकि बड़ों ने गलत फैसले लिए थे।”

     

    बच्चा रोता रहा।

     

    अमित ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम्हारी गलती नहीं थी।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा, बच्चे का शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    दूर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    जंगल के पेड़ हिलने लगे।

     

    मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

     

    और काली परछाईं आसमान में उठने लगी।

     

    नैना ने कहा—

     

    “भैया, यह खत्म हो रही है।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मुझे भी जाना होगा।”

     

    “नहीं।”

     

    “भैया, मैं बारह साल से इंतजार कर रही थी।”

     

    “मैं तुम्हें फिर नहीं खो सकता।”

     

    नैना ने उसके माथे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने मुझे खोया नहीं था।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं हमेशा तुम्हारी यादों में थी।”

     

    अमित रोने लगा।

     

    नैना धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

     

    “अब पीछे मत देखना।”

     

    अमित ने कहा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब तुम्हें आगे जीना है।”

     

    नैना गायब हो गई।

     

    मंदिर के सामने अचानक तेज रोशनी फैल गई।

     

    काली परछाईं चीखती हुई आकाश में उठी और फिर हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।

     

    हवा शांत हो गई।

     

    पक्षियों की आवाज आने लगी।

     

    सूरज पूरी तरह निकल चुका था।

     

    बूढ़ी औरत ने लंबी साँस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्या सच में?”

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    फिर वह धीरे-धीरे धुंध में बदलने लगी।

     

    अमित चौंका।

     

    “आप भी?”

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने भी उस रात पीछे देखा था।”

     

    “तो?”

     

    “अब मेरा इंतजार खत्म हुआ।”

     

    अमित कुछ कह पाता, उससे पहले वह गायब हो गई।

     

    मंदिर के सामने सिर्फ उसकी लालटेन बची।

     

    अमित ने उसे उठा लिया।

     

    कई घंटे बाद वह अपने घर पहुँचा।

     

    घर बिल्कुल शांत था।

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

     

    इस बार वह असली थीं।

     

    उन्होंने अमित को देखते ही गले लगा लिया।

     

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

     

    उस दिन के बाद घर का बंद कमरा हमेशा के लिए खोल दिया गया।

     

    अंदर कोई आईना नहीं था।

     

    सिर्फ नैना की एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    अमित ने वह तस्वीर दीवार पर लगा दी।

     

    तस्वीर के नीचे उसने एक वाक्य लिखा—

     

    “कुछ दरवाजे डर से बंद होते हैं, लेकिन उन्हें खोलने की चाबी साहस होता है।”

     

    कई महीने बीत गए।

     

    अमित ने अपनी जिंदगी दोबारा शुरू कर दी।

     

    रात में अब उसे कोई आवाज नहीं बुलाती थी।

     

    कोई कदमों की आहट नहीं आती थी।

     

    कोई परछाईं उसके पीछे नहीं चलती थी।

     

    लेकिन एक रात…

     

    ठीक 15 अगस्त को…

     

    अमित अपने कमरे में सो रहा था।

     

    अचानक उसकी आँख खुल गई।

     

    कमरे में अंधेरा था।

     

    खिड़की से चाँद की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी।

     

    अमित ने पानी पीने के लिए उठना चाहा।

     

    तभी उसे पीछे से बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “भैया…”

     

    अमित का शरीर जम गया।

     

    वह धीरे से पलटा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    फर्श पर सिर्फ उसकी परछाईं थी।

     

    एक ही परछाईं।

     

    अमित ने राहत की साँस ली।

     

    तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    एक नया संदेश था।

     

    कोई नंबर नहीं।

     

    सिर्फ एक लाइन—

     

    “तुमने पीछे देखना सीख लिया… लेकिन क्या तुमने यह सीखा कि किस पर भरोसा करना है?”

     

    अमित ने स्क्रीन बंद कर दी।

     

    उसने खिड़की की तरफ देखा।

     

    और बाहर सड़क पर…

     

    एक छोटी बच्ची लाल फ्रॉक पहने खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    इस बार उसने पीछे नहीं देखा।

     

    क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    डर हमेशा पीछे से नहीं आता।

     

    कभी-कभी वह हमारे साथ चलता है।

     

    और उसे हराने का एक ही तरीका है—

     

    उसकी तरफ देखना… और कहना—

     

    “अब मैं तुमसे नहीं डरता।”

     

    समाप्त।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अमित दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसके सामने सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी।

     

    लेकिन उसके पैरों के नीचे दो परछाइयाँ थीं।

     

    एक उसकी अपनी।

     

    और दूसरी…

     

    उसके ठीक पीछे खड़ी किसी चीज की।

     

    अमित ने धीरे-धीरे सिर घुमाने की कोशिश की।

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, मत देखना!”

     

    अमित रुक गया।

     

    “लेकिन पीछे कोई है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “वह कौन है?”

     

    नैना ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “वही, जिससे हम भाग रहे हैं।”

     

    अमित ने अपनी परछाईं की तरफ देखा।

     

    दोनों परछाइयाँ एक साथ हिल रही थीं।

     

    लेकिन दूसरी परछाईं की गर्दन उसकी तरफ नहीं, बल्कि दूसरी दिशा में मुड़ी हुई थी।

     

    जैसे वह किसी और को देख रही हो।

     

    अमित ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “नैना, क्या वह मेरे अंदर है?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “वह तुम्हारी परछाईं के अंदर है।”

     

    अमित ने अपनी मुट्ठी कस ली।

     

    “उसे बाहर कैसे निकालें?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “सूरज निकलने से पहले।”

     

    अमित ने बाहर आसमान की तरफ देखा।

     

    पूर्व दिशा में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी।

     

    सुबह होने में ज्यादा समय नहीं था।

     

    बूढ़ी औरत उनके पीछे खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर चिंता थी।

     

    “अगर सूरज निकलने से पहले दूसरी परछाईं अलग नहीं हुई, तो वह हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर सूरज निकल गया?”

     

    “तो तुम दोनों एक हो जाओगे।”

     

    “और फिर?”

     

    “फिर वह तुम्हारी जिंदगी जीएगी।”

     

    अमित ने डरकर पूछा,

     

    “मेरी जगह?”

     

    “हाँ।”

     

    उसी समय पीछे से दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    नैना ने अमित का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “हमें मंदिर जाना होगा।”

     

    “कौन सा मंदिर?”

     

    “वही जहाँ पापा गए थे।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “वहाँ अभी भी वह चीज मौजूद है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “वह पत्थर।”

     

    “कौन सा पत्थर?”

     

    “जिस पर पहली बार उसका नाम लिखा गया था।”

     

    तीनों घर से बाहर निकल पड़े।

     

    सड़क सुनसान थी।

     

    बारिश रुक चुकी थी।

     

    लेकिन जमीन अब भी गीली थी।

     

    अमित बाइक की तरफ बढ़ा।

     

    उसने देखा कि बाइक के पास फिर वही छोटे पैरों के निशान थे।

     

    नैना ने कहा—

     

    “उसने हमारा रास्ता पकड़ लिया है।”

     

    अमित ने बाइक स्टार्ट की।

     

    “बैठो।”

     

    नैना पीछे बैठ गई।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “मैं रास्ता बताऊँगी।”

     

    अमित ने बाइक तेज कर दी।

     

    जंगल की ओर जाते हुए उसे बार-बार लगता रहा कि कोई उसके पीछे बैठा है।

     

    कभी उसके कंधे पर ठंडी साँस महसूस होती।

     

    कभी उसके कान के पास कोई फुसफुसाता।

     

    “अमित…”

     

    वह जवाब नहीं देता।

     

    कुछ देर बाद उसने देखा कि पीछे बैठे नैना के पैर जमीन को छू रहे थे।

     

    अमित ने चौंककर पूछा—

     

    “तुम्हारे पैर…”

     

    नैना ने कहा,

     

    “मत देखो।”

     

    अमित ने सामने देखा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं पूरी तरह इस दुनिया में नहीं हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “वह सही कह रही है।”

     

    अमित ने बाइक रोक दी।

     

    “हम कितनी दूर हैं?”

     

    “बस थोड़ा।”

     

    सामने जंगल के बीच एक पुराना मंदिर दिखाई दिया।

     

    मंदिर की दीवारें टूटी हुई थीं।

     

    दरवाजे पर कोई मूर्ति नहीं थी।

     

    बस एक बड़ा पत्थर रखा था।

     

    उस पत्थर पर पुराने अक्षरों में कुछ लिखा था।

     

    अमित उतरकर उसके पास गया।

     

    उसने हाथ से धूल हटाई।

     

    नीचे शब्द दिखाई दिए—

     

    “जो पीछे देखता है, वह अपना रास्ता खो देता है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “यही है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    उसने पत्थर के पीछे जाने को कहा।

     

    वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था।

     

    कुआँ पूरी तरह सूखा था।

     

    लेकिन उसके अंदर से पानी टपकने की आवाज आ रही थी।

     

    टप…

     

    टप…

     

    टप…

     

    अमित ने नीचे झाँका।

     

    अंदर बिल्कुल अंधेरा था।

     

    अचानक कुएँ के अंदर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    नैना ने कहा—

     

    “वह मुझे बुला रही है।”

     

    “कौन?”

     

    “मेरी दूसरी याद।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “दूसरी याद?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “मेरी मौत की।”

     

    अमित ने रस्सी उठाई।

     

    “मैं नीचे जा रहा हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अकेले मत जाना।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    नैना बोली—

     

    “मैं भी।”

     

    तीनों कुएँ के अंदर उतरने लगे।

     

    कुछ ही देर में वे नीचे पहुँच गए।

     

    वहाँ एक छोटी सुरंग थी।

     

    सुरंग की दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

     

    एक चित्र में एक बच्ची आईने के सामने खड़ी थी।

     

    दूसरे में एक आदमी उसके पीछे खड़ा था।

     

    तीसरे चित्र में बच्ची गायब थी।

     

    और चौथे चित्र में एक लड़का आईने के सामने खड़ा था।

     

    अमित ने कहा,

     

    “यह मैं हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आगे दीवार पर एक आखिरी चित्र था।

     

    उसमें दो बच्चे खड़े थे।

     

    लेकिन उनके पीछे सिर्फ एक परछाईं थी।

     

    नैना ने कहा—

     

    “यही रात थी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं बचाया था।”

     

    “तो?”

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाया था।”

     

    “और तुम?”

     

    “मुझे उन्होंने उसके हवाले कर दिया।”

     

    अमित की आँखें भर आईं।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसने शर्त रखी थी।”

     

    “क्या शर्त?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “उसे दो आत्माओं में से एक चुननी थी।”

     

    “और पापा ने…”

     

    “तुम्हें चुना।”

     

    अमित ने दीवार पर मुक्का मारा।

     

    “उन्होंने ऐसा कैसे किया?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम उनके बेटे थे।”

     

    अमित कुछ नहीं बोला।

     

    तभी सुरंग के अंत से भारी कदमों की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन बुझा दी।

     

    “वह आ गई।”

     

    सामने अंधेरे में दो लाल आँखें दिखाई दीं।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं नहीं डरूँगा।”

     

    आवाज हँसी।

     

    “तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

     

    अचानक अंधेरे में उसके पिता दिखाई दिए।

     

    वह घायल थे।

     

    चेहरे पर खून था।

     

    उन्होंने अमित की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “बेटा… मुझे बचाओ।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    नैना ने कहा—

     

    “वह पापा नहीं हैं।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    पिता की आकृति मुस्कुराई।

     

    “तो पीछे क्यों नहीं देखते?”

     

    अमित ने कहा—

     

    “क्योंकि अब मुझे पता है कि डर मुझे पीछे नहीं, आगे देखना सिखा रहा है।”

     

    उसने जेब से टूटे आईने का टुकड़ा निकाला।

     

    काली आकृति अचानक पीछे हट गई।

     

    बूढ़ी औरत चिल्लाई—

     

    “आईने को जमीन पर रखो!”

     

    अमित ने टुकड़ा जमीन पर रखा।

     

    नैना ने उसके सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    बूढ़ी औरत ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    काली आकृति चीखने लगी।

     

    अमित की दूसरी परछाईं जमीन से अलग होने लगी।

     

    पहले पैरों से।

     

    फिर शरीर से।

     

    फिर सिर से।

     

    एक काली आकृति जमीन से उठकर सामने खड़ी हो गई।

     

    अब वह बिल्कुल स्पष्ट थी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    लेकिन उसके अंदर अमित का चेहरा बन रहा था।

     

    वह बोली—

     

    “अगर मुझे छोड़ दिया, तो तुम अधूरे रहोगे।”

     

    अमित ने कहा—

     

    “मैं अधूरा रहना पसंद करूँगा।”

     

    “तुम मुझे हमेशा याद करोगे।”

     

    “तो करूँगा।”

     

    “तुम्हें डर लगेगा।”

     

    “तो लगेगा।”

     

    “तुम अकेले हो जाओगे।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “नहीं।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    अमित ने कहा—

     

    “मैं अकेला नहीं हूँ।”

     

    काली आकृति अचानक नैना की तरफ झपटी।

     

    अमित ने बीच में आकर उसे रोक लिया।

     

    उसका हाथ काली आकृति के अंदर चला गया।

     

    अमित को लगा जैसे उसका शरीर बर्फ बन गया हो।

     

    लेकिन उसने हाथ नहीं हटाया।

     

    “नैना!”

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों ने एक साथ आँखें बंद कर लीं।

     

    काली आकृति चीखने लगी।

     

    बाहर से पक्षियों के चहचहाने की आवाज आने लगी।

     

    सुबह होने वाली थी।

     

    बूढ़ी औरत चिल्लाई—

     

    “बस कुछ सेकंड और!”

     

    अमित ने पूरी ताकत से काली आकृति को आईने के टुकड़े की तरफ धकेला।

     

    आकृति उसमें खिंचने लगी।

     

    एक भयानक चीख के साथ वह आईने के अंदर बंद हो गई।

     

    उसी समय सूरज की पहली किरण कुएँ के अंदर पहुँची।

     

    आईना टूट गया।

     

    काली धुंध गायब हो गई।

     

    अमित जमीन पर गिर पड़ा।

     

    नैना भी उसके पास बैठ गई।

     

    कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर अमित ने धीरे से पूछा—

     

    “क्या सब खत्म हो गया?”

     

    नैना ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    बूढ़ी औरत के चेहरे पर डर था।

     

    उसने जमीन की तरफ इशारा किया।

     

    अमित ने नीचे देखा।

     

    उसकी अपनी परछाईं वहाँ थी।

     

    लेकिन नैना की नहीं।

     

    और फिर…

     

    कुएँ की दीवार पर एक नई परछाईं दिखाई दी।

     

    तीन सिर वाली।

     

    नैना ने धीरे से कहा—

     

    “भैया… हमने गलत चीज को बंद किया है।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्या मतलब?”

     

    नैना ने काँपते हुए कहा—

     

    “वह अकेली नहीं थी।”

     

    दूर जंगल में किसी ने धीरे से कहा—

     

    “पीछे देखो…”

     

    और इस बार आवाज बूढ़ी औरत की थी।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बारह बजाने लगीं।

     

    टन…

     

    टन…

     

    टन…

     

    हर घंटी के साथ घर की दीवारें जैसे काँप रही थीं।

     

    अमित कमरे के बीचोंबीच खड़ा था।

     

    एक तरफ नैना थी।

     

    दूसरी तरफ उसका दूसरा रूप।

     

    और फर्श के नीचे से अब भी किसी चीज के खरोंचने की आवाज आ रही थी।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें मार दूँ?”

     

    नैना ने आँसू पोंछे।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे अंदर जो है, वह अब पूरी तरह जाग चुकी है।”

     

    “अगर मैं तुम्हें मार दूँ तो वह भी मर जाएगी?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “शायद।”

     

    दूसरा अमित हँस पड़ा।

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम चुप रहो।”

     

    दूसरा अमित बोला,

     

    “तुम्हें पता है वह क्या चाहती है?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी आत्मा।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरी?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम उसके लिए सिर्फ एक इंसान नहीं हो।”

     

    दूसरा अमित धीरे-धीरे अमित के करीब आया।

     

    “तुम उस रात बच गए थे। तुम्हारी आत्मा का आधा हिस्सा आईने में बंद कर दिया गया। और वही आधा हिस्सा मैं हूँ।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “तो?”

     

    “तो अब तुम्हारी आत्मा अधूरी है।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अगर मैं तुम्हारे अंदर वापस आ गया, तो तुम पूरे हो जाओगे।”

     

    अमित ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “और फिर?”

     

    “फिर तुम और मैं एक हो जाएँगे।”

     

    “और अवनि?”

     

    दूसरा अमित कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “वह भी यही चाहती है।”

     

    अचानक घर के अंदर एक तेज हवा चली।

     

    सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    लालटेन की लौ बुझ गई।

     

    अंधेरे में नैना की आवाज आई—

     

    “भैया… भागो!”

     

    अमित ने उसकी आवाज की दिशा में हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन उसी समय किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    पकड़ बहुत ठंडी थी।

     

    अमित ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

     

    “कौन?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    अमित जम गया।

     

    यह वही नियम था।

     

    वही शब्द।

     

    लेकिन इस बार आवाज उसकी अपनी थी।

     

    उसने धीरे-धीरे आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं पीछे नहीं देखूँगा।”

     

    फुसफुसाहट हँसी।

     

    “तुमने हमेशा यही कहा।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तू कौन है?”

     

    “तुम्हारी पहली याद।”

     

    अचानक अमित के दिमाग में एक दृश्य चमका।

     

    वह बहुत छोटा था।

     

    शायद तीन साल का।

     

    उसकी माँ उसे गोद में लिए बैठी थीं।

     

    सामने नैना खड़ी थी।

     

    लेकिन नैना तब सिर्फ एक नवजात बच्ची थी।

     

    अमित की माँ ने उसे देखते हुए कहा था—

     

    “इसे किसी कीमत पर आईने के सामने मत ले जाना।”

     

    फिर दृश्य बदल गया।

     

    अमित के पिता एक पुराने मंदिर में बैठे थे।

     

    उनके सामने एक साधु था।

     

    साधु ने कहा—

     

    “आपकी बेटी साधारण बच्ची नहीं है।”

     

    पिता ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “उसके जन्म के समय कुछ उसके साथ आया है।”

     

    “क्या?”

     

    साधु ने जवाब नहीं दिया।

     

    फिर उसने जमीन पर एक वृत्त बनाया।

     

    “इसे आईने में बाँधना होगा।”

     

    अमित की आँखें खुल गईं।

     

    “तो यह सब नैना के जन्म से शुरू हुआ था।”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा,

     

    “हाँ।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप उस साधु को जानती थीं?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

     

    “वह मेरा पति था।”

     

    अमित स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने तुम्हारे परिवार को यह सब शुरू करने में मदद की थी।”

     

    अमित की माँ ने कहा,

     

    “हमारे पास कोई रास्ता नहीं था।”

     

    अमित गुस्से में बोला,

     

    “हर कोई यही कहता है! कोई रास्ता नहीं था!”

     

    वह चीखा—

     

    “लेकिन किसी ने मुझसे नहीं पूछा!”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    अमित की माँ रोने लगीं।

     

    “तुम सही हो।”

     

    “नैना को क्यों चुना?”

     

    “क्योंकि वह सबसे कमजोर थी।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “वह मेरी बहन थी!”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर आपने उसे मरने दिया?”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    नैना की आवाज आई—

     

    “माँ झूठ नहीं बोल रही।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    नैना अब पहले से ज्यादा धुंधली दिखाई दे रही थी।

     

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    “लेकिन?”

     

    “लेकिन पापा ने उन्हें रोक दिया।”

     

    अमित की मुट्ठियाँ कस गईं।

     

    “पापा ने ऐसा क्यों किया?”

     

    नैना ने कहा,

     

    “क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर मैं उसके साथ रहूँगी, तो तुम बच जाओगे।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैंने मान लिया।”

     

    “क्यों?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि मैं बड़ी बहन थी।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “लेकिन तुम तो मुझसे छोटी थीं।”

     

    नैना चुप हो गई।

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    फिर अचानक उसे एक बात समझ आई।

     

    “रुको…”

     

    “क्या?”

     

    “मैं तुमसे छोटा था।”

     

    नैना ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “लेकिन मेरी यादों में नैना हमेशा मुझसे बड़ी थी।”

     

    माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    अमित ने पूछा—

     

    “असल में नैना कौन थी?”

     

    कमरे में एक तेज चीख गूँजी।

     

    सारी दीवारें काँपने लगीं।

     

    और नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    अब वह छोटी बच्ची नहीं थी।

     

    वह एक वयस्क महिला जैसी दिख रही थी।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह बोली—

     

    “तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तू नैना नहीं है।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “बहुत देर से समझे।”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन जला दी।

     

    पीली रोशनी में सामने खड़ी आकृति साफ दिखाई देने लगी।

     

    उसके शरीर का आधा हिस्सा नैना जैसा था।

     

    दूसरा आधा काली परछाईं जैसा।

     

    बूढ़ी औरत ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    आकृति पीछे हटने लगी।

     

    अमित ने पूछा,

     

    “इसे कैसे रोकें?”

     

    “तुम्हें अपना नाम बोलना होगा।”

     

    “मेरा नाम?”

     

    “हाँ।”

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “पहले अपना नाम।”

     

    फिर उसने अमित की माँ की तरफ देखा।

     

    “फिर अपनी बहन का।”

     

    फिर टूटे आईने की तरफ।

     

    “और अंत में उसका।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “उसका नाम अवनि है।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “अवनि उसका झूठा नाम है।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “फिर असली नाम?”

     

    बूढ़ी औरत ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “मृत्यु।”

     

    कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।

     

    अमित ने यह शब्द दोहराया—

     

    “मृत्यु?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “उसका कोई इंसानी नाम नहीं है। तुम्हारे पिता ने उसे अवनि इसलिए कहा था क्योंकि असली नाम बोलते ही उसका दरवाजा खुल जाता है।”

     

    अचानक फर्श पर पड़ी दरार चौड़ी हो गई।

     

    उसमें से काली धुंध बाहर आने लगी।

     

    नैना की आकृति चीखने लगी।

     

    “भैया! अब!”

     

    अमित ने अपनी पूरी ताकत से कहा—

     

    “मैं अमित हूँ!”

     

    घर में एक तेज धमाका हुआ।

     

    दूसरा अमित पीछे हट गया।

     

    अमित ने फिर कहा—

     

    “मैं नैना का भाई हूँ!”

     

    नैना के चेहरे पर पहली बार शांति आई।

     

    काली धुंध पीछे हटने लगी।

     

    अमित ने आखिरी शब्द बोलने के लिए मुँह खोला।

     

    लेकिन तभी माँ ने उसका मुँह पकड़ लिया।

     

    “मत बोलो!”

     

    अमित ने हैरानी से उन्हें देखा।

     

    माँ चिल्लाईं—

     

    “अगर तुमने उसका असली नाम लिया, तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे अंदर आ जाएगी!”

     

    अमित रुक गया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “नहीं! यही आखिरी परीक्षा है!”

     

    अमित दोनों की बातों के बीच फँस गया।

     

    काली धुंध अब उसकी तरफ बढ़ रही थी।

     

    नैना चीख रही थी—

     

    “भैया, भरोसा करो!”

     

    दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।

     

    “किसी पर भरोसा मत करना।”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “मुझे किसी पर भरोसा नहीं करना।”

     

    सब शांत हो गया।

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    “मुझे अपने ऊपर भरोसा करना है।”

     

    उसने फर्श पर पड़ा टूटा हुआ आईने का सबसे बड़ा टुकड़ा उठाया।

     

    और उसे अपने सामने कर लिया।

     

    आईने के टुकड़े में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार प्रतिबिंब मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    वह रो रहा था।

     

    और उसके पीछे एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    नैना।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “भैया… मुझे घर जाना है।”

     

    अमित ने आईने को जमीन पर रख दिया।

     

    “तो चलो।”

     

    जैसे ही उसने नैना का हाथ पकड़ने की कोशिश की, काली धुंध ने उसे चारों तरफ से घेर लिया।

     

    एक भयानक आवाज आई—

     

    “तुमने नियम तोड़ा।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    आवाज आई—

     

    “तुमने पीछे देखा।”

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    और इस बार…

     

    उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

     

    सिर्फ एक खुला दरवाजा।

     

    दरवाजे के बाहर सुबह की हल्की रोशनी थी।

     

    बूढ़ी औरत चीखी—

     

    “भागो!”

     

    अमित नैना का हाथ पकड़कर दरवाजे की ओर दौड़ा।

     

    लेकिन बाहर निकलने से ठीक पहले नैना रुक गई।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    उसने पीछे देखा।

     

    “मुझे लगता है…”

     

    वह काँपने लगी।

     

    “…वह तुम्हारे साथ बाहर आ गई है।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कौन?”

     

    नैना ने उसके पीछे इशारा किया।

     

    अमित धीरे-धीरे मुड़ा।

     

    और उसने देखा—

     

    उसकी अपनी परछाईं जमीन पर नहीं थी।

     

    वहाँ एक नहीं, दो परछाइयाँ थीं।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

     

    अमित कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

     

    उसके हाथ में लोहे की कुर्सी थी और सामने टूटे हुए आईने के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही शरीर।

     

    वही आवाज।

     

    दूसरा अमित।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “इतने सालों से तुम मुझे ढूँढ रहे थे।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “तू मेरे अंदर था?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    दूसरा अमित धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “जिस रात नैना उस कमरे में गई थी, उसी रात तुम्हारे पिता ने एक गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारी आत्मा का एक हिस्सा आईने में बंद कर दिया।”

     

    अमित का सिर घूमने लगा।

     

    “मेरी आत्मा का हिस्सा?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वह चीज तुम्हें पूरी तरह अपने साथ ले जाना चाहती थी।”

     

    दूसरा अमित हँसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने सोचा कि अगर तुम्हारा आधा हिस्सा इस दुनिया में रहेगा और आधा हिस्सा आईने के पीछे, तो वह तुम्हें नहीं ले जा पाएगी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “फिर तू कौन है?”

     

    “मैं वही हिस्सा हूँ जिसे तुम्हारे पिता ने बंद किया था।”

     

    अमित ने टूटे हुए आईने की तरफ देखा।

     

    “तो इतने सालों से मैं…”

     

    “अधूरा था।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नैना ने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    दूसरा अमित कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि नैना जानती थी कि अगर तुम्हें सच पता चल गया, तो वह तुम्हें बचा नहीं पाएगी।”

     

    कमरे के दूसरे कोने से धीमी आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    अमित ने देखा।

     

    टूटे हुए आईने के बीच नैना खड़ी थी।

     

    उसका शरीर धुंधला था।

     

    “नैना?”

     

    उसने सिर उठाया।

     

    “हाँ।”

     

    अमित उसके पास जाना चाहता था।

     

    लेकिन दूसरा अमित उसके सामने आ गया।

     

    “उसे मत छूना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब वह आधी इस दुनिया में है और आधी दूसरी दुनिया में।”

     

    “मैं उसे वापस ला सकता हूँ?”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “शायद।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम्हें अपनी यादें पूरी करनी होंगी।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर मैंने कर लीं?”

     

    “तो तुम्हें पता चल जाएगा कि उस रात वास्तव में क्या हुआ था।”

     

    अचानक नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।

     

    “अमित!”

     

    वह सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।

     

    दूसरा अमित भी उसके पीछे आया।

     

    नीचे पहुँचकर अमित ने देखा कि उसकी माँ फर्श पर बैठी थीं।

     

    बूढ़ी औरत दरवाजे के पास खड़ी थी।

     

    घर की सभी खिड़कियाँ खुली थीं।

     

    बाहर तेज हवा चल रही थी।

     

    माँ ने अमित को देखते ही कहा—

     

    “बेटा, तुमने आईना तोड़ दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ी औरत का चेहरा उतर गया।

     

    “तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आईना सिर्फ दरवाजा था।”

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “दरवाजा किसका?”

     

    बूढ़ी औरत ने घर की दीवार की तरफ देखा।

     

    “उस दुनिया का जहाँ वह रहती है।”

     

    “तो आईना तोड़ने से वह बंद हो जाएगी?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “अब वह बिना आईने के भी आ सकती है।”

     

    अचानक घर की सारी लाइटें जल गईं।

     

    फिर बंद।

     

    फिर जल गईं।

     

    फिर बंद।

     

    हर बार रोशनी बुझने पर कमरे में किसी न किसी चीज की आकृति दिखाई देती।

     

    पहली बार—

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    दूसरी बार—

     

    एक बूढ़ी औरत।

     

    तीसरी बार—

     

    अमित के पिता।

     

    चौथी बार—

     

    अमित खुद।

     

    पाँचवीं बार जब लाइट जली, तो कमरे में कोई नहीं था।

     

    सिर्फ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों से नीचे आए।

     

    फिर अमित की माँ के पास जाकर रुक गए।

     

    माँ काँपने लगीं।

     

    “वह आ गई।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    माँ ने जवाब नहीं दिया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने उसका नाम ‘छाया’ रखा था।”

     

    अमित ने कहा,

     

    “आपने कहा था उसका नाम नहीं लेना चाहिए।”

     

    “वह उसका असली नाम नहीं है।”

     

    “तो असली नाम क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    अचानक माँ ने कहा—

     

    “मुझे पता है।”

     

    अमित ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको?”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझे उसका असली नाम बताया था।”

     

    “फिर आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने कहा था कि अगर तुमने वह नाम सुन लिया, तो वह तुम्हारे पास आ जाएगी।”

     

    “अब तो वह आ ही चुकी है।”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    “नाम बताइए।”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “अवनि।”

     

    अमित ने जैसे ही यह नाम सुना, घर के अंदर तापमान अचानक गिर गया।

     

    उसकी साँस से धुआँ निकलने लगा।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें अपने आप हिलने लगीं।

     

    फिर ऊपर से एक भयानक चीख आई।

     

    “माँ!”

     

    अमित ने ऊपर देखा।

     

    नैना सीढ़ियों के ऊपर खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा डर से भरा था।

     

    “तुमने उसका नाम क्यों लिया?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “मुझे नहीं पता था कि वह इतनी जल्दी सुन लेगी।”

     

    नैना ने चीखकर कहा—

     

    “वह अब सब सुन सकती है!”

     

    अचानक घर का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई।

     

    “सब लोग एक जगह रहो।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “क्या होगा अब?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “जिसका नाम लिया गया है, वह अपना रास्ता खुद बना लेती है।”

     

    फर्श पर एक लंबी काली दरार दिखाई देने लगी।

     

    वह धीरे-धीरे फैलती हुई अमित के पैरों तक आ गई।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    दरार के अंदर से ठंडी हवा निकल रही थी।

     

    फिर किसी ने नीचे से उसका पैर पकड़ लिया।

     

    अमित चीख पड़ा।

     

    माँ और बूढ़ी औरत ने उसे खींचकर पीछे किया।

     

    लेकिन काली दरार से एक हाथ बाहर आ चुका था।

     

    लंबी उंगलियाँ।

     

    काले नाखून।

     

    और हाथ पर एक लाल धागा बँधा हुआ था।

     

    अमित ने उस धागे को पहचान लिया।

     

    वही धागा उसकी बहन नैना बचपन में पहनती थी।

     

    “यह नैना का है।”

     

    नैना सीढ़ियों से नीचे दौड़ी।

     

    “भैया, इसे मत छूना!”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    अमित ने उस हाथ को छू लिया।

     

    अचानक उसके दिमाग में एक तेज आवाज गूँजी।

     

    और उसके सामने बारह साल पुरानी रात का दृश्य खुल गया।

     

    वह आठ साल का अमित था।

     

    नैना उसके सामने खड़ी थी।

     

    उसके पिता कमरे के दरवाजे पर थे।

     

    पिता कह रहे थे—

     

    “अमित, पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन इस बार अमित ने देखा।

     

    नैना के पीछे एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    उसने नैना के कान में कुछ कहा।

     

    नैना ने अमित की तरफ देखा।

     

    फिर उसने उसे धक्का देकर कमरे से बाहर कर दिया।

     

    दरवाजा बंद हो गया।

     

    अंदर से उसकी चीख आई—

     

    “भैया, भागो!”

     

    फिर उसके पिता की आवाज—

     

    “नहीं!”

     

    फिर एक भयानक गर्जना।

     

    और फिर…

     

    सन्नाटा।

     

    अमित ने आँखें खोल दीं।

     

    वह फर्श पर पड़ा था।

     

    माँ उसके पास बैठी थीं।

     

    बूढ़ी औरत उसके माथे पर पानी डाल रही थी।

     

    नैना उसके सामने खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह रो रही थी।

     

    “भैया… तुम्हें सब याद आ गया?”

     

    अमित ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो अब तुम्हें यह भी याद होगा कि मैंने तुम्हें क्यों बचाया था।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे बचाया नहीं था।”

     

    नैना चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    अमित की आवाज काँप रही थी।

     

    “तुमने उस रात मुझे बाहर भेजकर खुद को उसके हवाले कर दिया था।”

     

    नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन एक बात तुमने मुझसे छिपाई।”

     

    नैना चुप रही।

     

    “तुम सिर्फ मेरी बहन नहीं थीं।”

     

    नैना का चेहरा बदल गया।

     

    अमित ने कहा—

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले ही वह चीज तुम्हारे अंदर थी।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा—

     

    “अब सच्चाई सामने आ गई है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तो नैना कौन है?”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आवाज अब बहुत धीमी थी—

     

    “मैं तुम्हारी बहन हूँ…”

     

    फिर उसके पीछे एक काली परछाईं उभरी।

     

    “…लेकिन मेरे अंदर वह भी रहती है।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    नैना ने रोते हुए कहा—

     

    “भैया, अगर मुझे बचाना है तो तुम्हें मुझे मारना होगा।”

     

    अमित स्तब्ध रह गया।

     

    और तभी उसके पीछे से दूसरी आवाज आई—

     

    “लेकिन अगर तुमने नैना को मारा…”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “तो मैं हमेशा के लिए तुम्हारे शरीर में रह जाऊँगा।”

     

    घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बारह बजाने लगीं।

     

    और अमावस्या की रात अभी शुरू ही हुई थी।