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पीछे देखना मना है..!!

पढ़ने का समय : 8 मिनट

बूढ़ी औरत की आवाज कुएँ के भीतर गूँजी—

 

“पीछे देखो…”

 

अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

 

नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“भैया, मत सुनना।”

 

लेकिन इस बार आवाज फिर आई।

 

“अमित… पीछे देखो।”

 

आवाज बिल्कुल बूढ़ी औरत की थी।

 

अमित ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।

 

बूढ़ी औरत वहीं खड़ी थी।

 

लेकिन कुछ अजीब था।

 

उसकी लालटेन बुझ चुकी थी।

 

फिर भी उसके आसपास हल्की नीली रोशनी थी।

 

अमित ने पूछा—

 

“आपने कहा था पीछे मत देखना।”

 

बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

 

“मैंने?”

 

अमित चुप हो गया।

 

नैना अचानक उसके सामने आ गई।

 

“भैया, यह वह नहीं है।”

 

बूढ़ी औरत का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

 

उसकी त्वचा काली पड़ गई।

 

आँखें खाली हो गईं।

 

फिर उसके चेहरे पर कोई चेहरा नहीं रहा।

 

सिर्फ एक गहरा अंधेरा।

 

अमित पीछे हट गया।

 

“तो असली बूढ़ी औरत कहाँ है?”

 

काली आकृति ने कहा—

 

“तुमने उसे बहुत पहले छोड़ दिया।”

 

अमित ने चारों तरफ देखा।

 

“वह कहाँ है?”

 

“उस जगह जहाँ हर वह इंसान जाता है जो पीछे देखता है।”

 

अचानक कुएँ की दीवारें हिलने लगीं।

 

नैना ने अमित का हाथ पकड़ लिया।

 

“हमें यहाँ से निकलना होगा।”

 

दोनों ऊपर की तरफ भागे।

 

बूढ़ी औरत भी उनके पीछे आई।

 

लेकिन जैसे ही वे कुएँ से बाहर निकले, अमित ने देखा कि मंदिर के सामने तीन लोग खड़े थे।

 

एक उसकी माँ।

 

दूसरा उसका पिता।

 

तीसरा रवि।

 

तीनों बिल्कुल चुप।

 

अमित की माँ ने कहा—

 

“बेटा… घर चलो।”

 

अमित वहीं रुक गया।

 

नैना ने फुसफुसाकर कहा—

 

“ये तीनों असली नहीं हैं।”

 

रवि आगे बढ़ा।

 

“अमित, मैं हूँ।”

 

अमित ने उसे देखा।

 

“अगर तुम रवि हो तो मुझे बताओ… पहली बार मैंने तुम्हें कहाँ देखा था?”

 

रवि मुस्कुराया।

 

“कॉलेज में।”

 

अमित ने सिर हिलाया।

 

“गलत।”

 

रवि का चेहरा बदलने लगा।

 

अमित बोला—

 

“मैंने तुम्हें स्कूल में देखा था।”

 

रवि का चेहरा अचानक काला पड़ गया।

 

उसने चीख मारी और गायब हो गया।

 

अब उसके पिता आगे आए।

 

“बेटा…”

 

अमित की आँखें भर आईं।

 

“पापा।”

 

नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“सावधान।”

 

अमित ने पूछा—

 

“पापा, आपने मुझे क्यों बचाया था?”

 

आकृति चुप रही।

 

“क्योंकि मैं आपका बेटा था?”

 

कोई जवाब नहीं।

 

“या इसलिए कि आपको डर था कि अगर मैं मर गया तो आपका सौदा पूरा नहीं होगा?”

 

आकृति का चेहरा बदल गया।

 

अमित समझ गया।

 

“आपने मुझे नहीं बचाया था।”

 

उसने कहा—

 

“आपने सिर्फ अपना वादा बचाया था।”

 

आकृति चीखते हुए गायब हो गई।

 

अब उसकी माँ की आकृति सामने थी।

 

“अमित…”

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

“आप मेरी माँ नहीं हैं।”

 

आकृति हँसी।

 

“कैसे पता?”

 

“क्योंकि मेरी माँ मुझे कभी पीछे मुड़कर देखने के लिए नहीं कहेंगी।”

 

आकृति भी धुएँ में बदल गई।

 

अब मंदिर के सामने सिर्फ अमित, नैना और बूढ़ी औरत खड़े थे।

 

अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

 

“अब सच बताइए।”

 

बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

 

“मैं भी तुम्हारे पिता के साथ इस सब में शामिल थी।”

 

“आपने मुझे जंगल में क्यों बचाया?”

 

“क्योंकि मुझे अपनी गलती सुधारनी थी।”

 

“और आपने मुझे उस घर में क्यों भेजा?”

 

“क्योंकि मुझे पता था कि अगर तुमने अपनी यादें वापस नहीं पाईं, तो वह कभी नहीं जाएगी।”

 

अमित ने पूछा—

 

“वह कौन है?”

 

बूढ़ी औरत ने नैना की तरफ देखा।

 

“जिसे तुमने अवनि समझा… वह कोई आत्मा नहीं है।”

 

“तो?”

 

“वह डर है।”

 

अमित चुप रहा।

 

“हर इंसान के अंदर एक डर होता है। लेकिन कुछ लोग अपने डर को इतना बड़ा बना देते हैं कि वह उनसे अलग होकर एक रूप ले लेता है।”

 

बूढ़ी औरत ने कहा—

 

“तुम्हारे पिता ने अपने डर को आईने में कैद करने की कोशिश की। लेकिन वह डर तुम्हारे परिवार की यादों, अपराधबोध और मौत से जुड़ गया।”

 

अमित ने नैना की तरफ देखा।

 

“और नैना?”

 

“नैना उसकी पहली शिकार थी।”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“लेकिन मैं आखिरी नहीं थी।”

 

अमित ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

नैना ने मंदिर के पीछे जंगल की तरफ देखा।

 

“क्योंकि उसने तुम्हारे डर से एक नया रूप बना लिया है।”

 

“कौन सा?”

 

नैना ने अमित की तरफ देखा।

 

“तुम।”

 

अमित की साँस रुक गई।

 

उसे अचानक समझ आया।

 

दूसरा अमित सिर्फ उसका प्रतिबिंब नहीं था।

 

वह उसके अंदर मौजूद डर था।

 

उसकी सारी बेचैनी।

 

उसका अपराधबोध।

 

नैना को बचा न पाने का दर्द।

 

पिता से नफरत।

 

माँ से नाराजगी।

 

और सबसे बड़ा डर—

 

अकेले रह जाने का।

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

“तो उसे खत्म कैसे करूँ?”

 

बूढ़ी औरत ने कहा—

 

“उसे खत्म नहीं कर सकते।”

 

“फिर?”

 

“उसे स्वीकार करना होगा।”

 

अमित ने पूछा—

 

“कैसे?”

 

“पीछे देखो।”

 

नैना ने तुरंत कहा—

 

“नहीं!”

 

बूढ़ी औरत ने कहा—

 

“आज पहली बार पीछे देखना जरूरी है।”

 

अमित चौंक गया।

 

“लेकिन यही तो नियम था।”

 

“नियम डर ने बनाया था।”

 

अमित ने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कीं।

 

फिर उसने साँस ली।

 

एक…

 

दो…

 

तीन…

 

और वह पीछे मुड़ गया।

 

उसके पीछे दूसरा अमित खड़ा था।

 

लेकिन अब वह भयानक नहीं था।

 

वह सिर्फ एक डरा हुआ बच्चा था।

 

आठ साल का अमित।

 

वही बच्चा जो उस रात कमरे के बाहर खड़ा अपनी बहन की चीख सुन रहा था।

 

बच्चा रो रहा था।

 

“मैंने उसे बचाया नहीं।”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

वह बच्चे के पास गया।

 

“तुम बच्चे थे।”

 

“लेकिन मैंने पीछे देखा था।”

 

“तुम्हें सच नहीं पता था।”

 

“मैं डर गया था।”

 

“डरना गलत नहीं है।”

 

बच्चे ने ऊपर देखा।

 

“फिर नैना क्यों मर गई?”

 

अमित घुटनों के बल बैठ गया।

 

“क्योंकि बड़ों ने गलत फैसले लिए थे।”

 

बच्चा रोता रहा।

 

अमित ने उसे गले लगा लिया।

 

“तुम्हारी गलती नहीं थी।”

 

जैसे ही उसने यह कहा, बच्चे का शरीर धुएँ में बदलने लगा।

 

दूर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

 

जंगल के पेड़ हिलने लगे।

 

मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

 

और काली परछाईं आसमान में उठने लगी।

 

नैना ने कहा—

 

“भैया, यह खत्म हो रही है।”

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम भी?”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“मुझे भी जाना होगा।”

 

“नहीं।”

 

“भैया, मैं बारह साल से इंतजार कर रही थी।”

 

“मैं तुम्हें फिर नहीं खो सकता।”

 

नैना ने उसके माथे पर हाथ रखा।

 

“तुमने मुझे खोया नहीं था।”

 

“फिर?”

 

“मैं हमेशा तुम्हारी यादों में थी।”

 

अमित रोने लगा।

 

नैना धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

 

“अब पीछे मत देखना।”

 

अमित ने कहा—

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अब तुम्हें आगे जीना है।”

 

नैना गायब हो गई।

 

मंदिर के सामने अचानक तेज रोशनी फैल गई।

 

काली परछाईं चीखती हुई आकाश में उठी और फिर हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।

 

हवा शांत हो गई।

 

पक्षियों की आवाज आने लगी।

 

सूरज पूरी तरह निकल चुका था।

 

बूढ़ी औरत ने लंबी साँस ली।

 

“सब खत्म हो गया।”

 

अमित ने पूछा—

 

“क्या सच में?”

 

बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

 

“हाँ।”

 

फिर वह धीरे-धीरे धुंध में बदलने लगी।

 

अमित चौंका।

 

“आप भी?”

 

उसने कहा—

 

“मैंने भी उस रात पीछे देखा था।”

 

“तो?”

 

“अब मेरा इंतजार खत्म हुआ।”

 

अमित कुछ कह पाता, उससे पहले वह गायब हो गई।

 

मंदिर के सामने सिर्फ उसकी लालटेन बची।

 

अमित ने उसे उठा लिया।

 

कई घंटे बाद वह अपने घर पहुँचा।

 

घर बिल्कुल शांत था।

 

उसने दरवाजा खोला।

 

अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

 

इस बार वह असली थीं।

 

उन्होंने अमित को देखते ही गले लगा लिया।

 

दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

 

उस दिन के बाद घर का बंद कमरा हमेशा के लिए खोल दिया गया।

 

अंदर कोई आईना नहीं था।

 

सिर्फ नैना की एक पुरानी तस्वीर थी।

 

अमित ने वह तस्वीर दीवार पर लगा दी।

 

तस्वीर के नीचे उसने एक वाक्य लिखा—

 

“कुछ दरवाजे डर से बंद होते हैं, लेकिन उन्हें खोलने की चाबी साहस होता है।”

 

कई महीने बीत गए।

 

अमित ने अपनी जिंदगी दोबारा शुरू कर दी।

 

रात में अब उसे कोई आवाज नहीं बुलाती थी।

 

कोई कदमों की आहट नहीं आती थी।

 

कोई परछाईं उसके पीछे नहीं चलती थी।

 

लेकिन एक रात…

 

ठीक 15 अगस्त को…

 

अमित अपने कमरे में सो रहा था।

 

अचानक उसकी आँख खुल गई।

 

कमरे में अंधेरा था।

 

खिड़की से चाँद की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी।

 

अमित ने पानी पीने के लिए उठना चाहा।

 

तभी उसे पीछे से बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

 

“भैया…”

 

अमित का शरीर जम गया।

 

वह धीरे से पलटा।

 

कमरे में कोई नहीं था।

 

फर्श पर सिर्फ उसकी परछाईं थी।

 

एक ही परछाईं।

 

अमित ने राहत की साँस ली।

 

तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

 

एक नया संदेश था।

 

कोई नंबर नहीं।

 

सिर्फ एक लाइन—

 

“तुमने पीछे देखना सीख लिया… लेकिन क्या तुमने यह सीखा कि किस पर भरोसा करना है?”

 

अमित ने स्क्रीन बंद कर दी।

 

उसने खिड़की की तरफ देखा।

 

और बाहर सड़क पर…

 

एक छोटी बच्ची लाल फ्रॉक पहने खड़ी थी।

 

वह मुस्कुरा रही थी।

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

इस बार उसने पीछे नहीं देखा।

 

क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

 

डर हमेशा पीछे से नहीं आता।

 

कभी-कभी वह हमारे साथ चलता है।

 

और उसे हराने का एक ही तरीका है—

 

उसकी तरफ देखना… और कहना—

 

“अब मैं तुमसे नहीं डरता।”

 

समाप्त।

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