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पीछे देखना मना है..!!

पढ़ने का समय : 8 मिनट

अमित दरवाजे पर खड़ा था।

 

उसके सामने सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी।

 

लेकिन उसके पैरों के नीचे दो परछाइयाँ थीं।

 

एक उसकी अपनी।

 

और दूसरी…

 

उसके ठीक पीछे खड़ी किसी चीज की।

 

अमित ने धीरे-धीरे सिर घुमाने की कोशिश की।

 

नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“भैया, मत देखना!”

 

अमित रुक गया।

 

“लेकिन पीछे कोई है।”

 

“मुझे पता है।”

 

“वह कौन है?”

 

नैना ने काँपती आवाज में कहा—

 

“वही, जिससे हम भाग रहे हैं।”

 

अमित ने अपनी परछाईं की तरफ देखा।

 

दोनों परछाइयाँ एक साथ हिल रही थीं।

 

लेकिन दूसरी परछाईं की गर्दन उसकी तरफ नहीं, बल्कि दूसरी दिशा में मुड़ी हुई थी।

 

जैसे वह किसी और को देख रही हो।

 

अमित ने फुसफुसाकर पूछा—

 

“नैना, क्या वह मेरे अंदर है?”

 

नैना ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“फिर?”

 

“वह तुम्हारी परछाईं के अंदर है।”

 

अमित ने अपनी मुट्ठी कस ली।

 

“उसे बाहर कैसे निकालें?”

 

नैना ने कहा—

 

“सूरज निकलने से पहले।”

 

अमित ने बाहर आसमान की तरफ देखा।

 

पूर्व दिशा में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी।

 

सुबह होने में ज्यादा समय नहीं था।

 

बूढ़ी औरत उनके पीछे खड़ी थी।

 

उसके चेहरे पर चिंता थी।

 

“अगर सूरज निकलने से पहले दूसरी परछाईं अलग नहीं हुई, तो वह हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी।”

 

अमित ने पूछा,

 

“और अगर सूरज निकल गया?”

 

“तो तुम दोनों एक हो जाओगे।”

 

“और फिर?”

 

“फिर वह तुम्हारी जिंदगी जीएगी।”

 

अमित ने डरकर पूछा,

 

“मेरी जगह?”

 

“हाँ।”

 

उसी समय पीछे से दरवाजा जोर से बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

नैना ने अमित का हाथ पकड़कर कहा—

 

“हमें मंदिर जाना होगा।”

 

“कौन सा मंदिर?”

 

“वही जहाँ पापा गए थे।”

 

बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

 

“वहाँ अभी भी वह चीज मौजूद है।”

 

अमित ने पूछा,

 

“क्या?”

 

“वह पत्थर।”

 

“कौन सा पत्थर?”

 

“जिस पर पहली बार उसका नाम लिखा गया था।”

 

तीनों घर से बाहर निकल पड़े।

 

सड़क सुनसान थी।

 

बारिश रुक चुकी थी।

 

लेकिन जमीन अब भी गीली थी।

 

अमित बाइक की तरफ बढ़ा।

 

उसने देखा कि बाइक के पास फिर वही छोटे पैरों के निशान थे।

 

नैना ने कहा—

 

“उसने हमारा रास्ता पकड़ लिया है।”

 

अमित ने बाइक स्टार्ट की।

 

“बैठो।”

 

नैना पीछे बैठ गई।

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“मैं रास्ता बताऊँगी।”

 

अमित ने बाइक तेज कर दी।

 

जंगल की ओर जाते हुए उसे बार-बार लगता रहा कि कोई उसके पीछे बैठा है।

 

कभी उसके कंधे पर ठंडी साँस महसूस होती।

 

कभी उसके कान के पास कोई फुसफुसाता।

 

“अमित…”

 

वह जवाब नहीं देता।

 

कुछ देर बाद उसने देखा कि पीछे बैठे नैना के पैर जमीन को छू रहे थे।

 

अमित ने चौंककर पूछा—

 

“तुम्हारे पैर…”

 

नैना ने कहा,

 

“मत देखो।”

 

अमित ने सामने देखा।

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैं पूरी तरह इस दुनिया में नहीं हूँ।”

 

बूढ़ी औरत ने कहा—

 

“वह सही कह रही है।”

 

अमित ने बाइक रोक दी।

 

“हम कितनी दूर हैं?”

 

“बस थोड़ा।”

 

सामने जंगल के बीच एक पुराना मंदिर दिखाई दिया।

 

मंदिर की दीवारें टूटी हुई थीं।

 

दरवाजे पर कोई मूर्ति नहीं थी।

 

बस एक बड़ा पत्थर रखा था।

 

उस पत्थर पर पुराने अक्षरों में कुछ लिखा था।

 

अमित उतरकर उसके पास गया।

 

उसने हाथ से धूल हटाई।

 

नीचे शब्द दिखाई दिए—

 

“जो पीछे देखता है, वह अपना रास्ता खो देता है।”

 

अमित ने पूछा,

 

“यही है?”

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“नहीं।”

 

उसने पत्थर के पीछे जाने को कहा।

 

वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था।

 

कुआँ पूरी तरह सूखा था।

 

लेकिन उसके अंदर से पानी टपकने की आवाज आ रही थी।

 

टप…

 

टप…

 

टप…

 

अमित ने नीचे झाँका।

 

अंदर बिल्कुल अंधेरा था।

 

अचानक कुएँ के अंदर से किसी बच्चे की आवाज आई—

 

“भैया…”

 

अमित पीछे हट गया।

 

नैना ने कहा—

 

“वह मुझे बुला रही है।”

 

“कौन?”

 

“मेरी दूसरी याद।”

 

अमित ने पूछा,

 

“दूसरी याद?”

 

नैना ने कहा—

 

“मेरी मौत की।”

 

अमित ने रस्सी उठाई।

 

“मैं नीचे जा रहा हूँ।”

 

बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“अकेले मत जाना।”

 

अमित ने कहा,

 

“मैं जाऊँगा।”

 

नैना बोली—

 

“मैं भी।”

 

तीनों कुएँ के अंदर उतरने लगे।

 

कुछ ही देर में वे नीचे पहुँच गए।

 

वहाँ एक छोटी सुरंग थी।

 

सुरंग की दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

 

एक चित्र में एक बच्ची आईने के सामने खड़ी थी।

 

दूसरे में एक आदमी उसके पीछे खड़ा था।

 

तीसरे चित्र में बच्ची गायब थी।

 

और चौथे चित्र में एक लड़का आईने के सामने खड़ा था।

 

अमित ने कहा,

 

“यह मैं हूँ।”

 

बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

आगे दीवार पर एक आखिरी चित्र था।

 

उसमें दो बच्चे खड़े थे।

 

लेकिन उनके पीछे सिर्फ एक परछाईं थी।

 

नैना ने कहा—

 

“यही रात थी।”

 

अमित ने पूछा,

 

“फिर क्या हुआ?”

 

नैना ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं बचाया था।”

 

“तो?”

 

“उन्होंने तुम्हें बचाया था।”

 

“और तुम?”

 

“मुझे उन्होंने उसके हवाले कर दिया।”

 

अमित की आँखें भर आईं।

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उसने शर्त रखी थी।”

 

“क्या शर्त?”

 

नैना ने कहा—

 

“उसे दो आत्माओं में से एक चुननी थी।”

 

“और पापा ने…”

 

“तुम्हें चुना।”

 

अमित ने दीवार पर मुक्का मारा।

 

“उन्होंने ऐसा कैसे किया?”

 

नैना ने कहा—

 

“क्योंकि तुम उनके बेटे थे।”

 

अमित कुछ नहीं बोला।

 

तभी सुरंग के अंत से भारी कदमों की आवाज आई।

 

ठक…

 

ठक…

 

ठक…

 

बूढ़ी औरत ने लालटेन बुझा दी।

 

“वह आ गई।”

 

सामने अंधेरे में दो लाल आँखें दिखाई दीं।

 

फिर आवाज आई—

 

“अमित…”

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

“मैं नहीं डरूँगा।”

 

आवाज हँसी।

 

“तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

 

अचानक अंधेरे में उसके पिता दिखाई दिए।

 

वह घायल थे।

 

चेहरे पर खून था।

 

उन्होंने अमित की तरफ हाथ बढ़ाया।

 

“बेटा… मुझे बचाओ।”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

नैना ने कहा—

 

“वह पापा नहीं हैं।”

 

अमित ने कहा,

 

“मुझे पता है।”

 

पिता की आकृति मुस्कुराई।

 

“तो पीछे क्यों नहीं देखते?”

 

अमित ने कहा—

 

“क्योंकि अब मुझे पता है कि डर मुझे पीछे नहीं, आगे देखना सिखा रहा है।”

 

उसने जेब से टूटे आईने का टुकड़ा निकाला।

 

काली आकृति अचानक पीछे हट गई।

 

बूढ़ी औरत चिल्लाई—

 

“आईने को जमीन पर रखो!”

 

अमित ने टुकड़ा जमीन पर रखा।

 

नैना ने उसके सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कर लीं।

 

बूढ़ी औरत ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

 

काली आकृति चीखने लगी।

 

अमित की दूसरी परछाईं जमीन से अलग होने लगी।

 

पहले पैरों से।

 

फिर शरीर से।

 

फिर सिर से।

 

एक काली आकृति जमीन से उठकर सामने खड़ी हो गई।

 

अब वह बिल्कुल स्पष्ट थी।

 

उसका चेहरा नहीं था।

 

लेकिन उसके अंदर अमित का चेहरा बन रहा था।

 

वह बोली—

 

“अगर मुझे छोड़ दिया, तो तुम अधूरे रहोगे।”

 

अमित ने कहा—

 

“मैं अधूरा रहना पसंद करूँगा।”

 

“तुम मुझे हमेशा याद करोगे।”

 

“तो करूँगा।”

 

“तुम्हें डर लगेगा।”

 

“तो लगेगा।”

 

“तुम अकेले हो जाओगे।”

 

अमित ने नैना की तरफ देखा।

 

“नहीं।”

 

नैना मुस्कुराई।

 

अमित ने कहा—

 

“मैं अकेला नहीं हूँ।”

 

काली आकृति अचानक नैना की तरफ झपटी।

 

अमित ने बीच में आकर उसे रोक लिया।

 

उसका हाथ काली आकृति के अंदर चला गया।

 

अमित को लगा जैसे उसका शरीर बर्फ बन गया हो।

 

लेकिन उसने हाथ नहीं हटाया।

 

“नैना!”

 

नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

दोनों ने एक साथ आँखें बंद कर लीं।

 

काली आकृति चीखने लगी।

 

बाहर से पक्षियों के चहचहाने की आवाज आने लगी।

 

सुबह होने वाली थी।

 

बूढ़ी औरत चिल्लाई—

 

“बस कुछ सेकंड और!”

 

अमित ने पूरी ताकत से काली आकृति को आईने के टुकड़े की तरफ धकेला।

 

आकृति उसमें खिंचने लगी।

 

एक भयानक चीख के साथ वह आईने के अंदर बंद हो गई।

 

उसी समय सूरज की पहली किरण कुएँ के अंदर पहुँची।

 

आईना टूट गया।

 

काली धुंध गायब हो गई।

 

अमित जमीन पर गिर पड़ा।

 

नैना भी उसके पास बैठ गई।

 

कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

 

फिर अमित ने धीरे से पूछा—

 

“क्या सब खत्म हो गया?”

 

नैना ने मुस्कुराकर कहा—

 

“हाँ।”

 

बूढ़ी औरत ने कुछ नहीं कहा।

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या हुआ?”

 

बूढ़ी औरत के चेहरे पर डर था।

 

उसने जमीन की तरफ इशारा किया।

 

अमित ने नीचे देखा।

 

उसकी अपनी परछाईं वहाँ थी।

 

लेकिन नैना की नहीं।

 

और फिर…

 

कुएँ की दीवार पर एक नई परछाईं दिखाई दी।

 

तीन सिर वाली।

 

नैना ने धीरे से कहा—

 

“भैया… हमने गलत चीज को बंद किया है।”

 

अमित ने पूछा—

 

“क्या मतलब?”

 

नैना ने काँपते हुए कहा—

 

“वह अकेली नहीं थी।”

 

दूर जंगल में किसी ने धीरे से कहा—

 

“पीछे देखो…”

 

और इस बार आवाज बूढ़ी औरत की थी।

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