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सुनसान रास्ता..(part-6)

पढ़ने का समय : 2 मिनट

 

 

आरव और कबीर जंगल से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए।

 

सुबह होने वाली थी।

 

आरव ने राहत की सांस ली।

 

उसने कबीर को गले लगा लिया।

 

लेकिन कबीर बिल्कुल चुप था।

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

कबीर ने सड़क के किनारे लगे बोर्ड की तरफ इशारा किया।

 

वहां फिर वही शब्द लिखे थे—

 

“पीछे देखना मना है।”

 

आरव ने डरते हुए कहा—

 

“अब तो हम बाहर आ गए हैं।”

 

कबीर ने धीरे से उसकी तरफ देखा और कहा—

 

“हम दोनों नहीं आए हैं।”

 

आरव ने उसकी बात का मतलब नहीं समझा।

 

तभी सड़क पर एक ट्रक आया और उसकी हेडलाइट की रोशनी दोनों पर पड़ी।

 

आरव ने जमीन पर देखा।

 

कबीर की परछाई वहां थी।

 

लेकिन आरव की परछाई…

 

नहीं थी।

 

उसका दिल बैठ गया।

 

तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

 

छप… छप… छप…

 

वही गीले पैरों की आवाज।

 

कबीर ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

“भैया… जो भी हो, पीछे मत देखना।”

 

आरव ने आंखें बंद कर लीं।

 

उसके कान के पास वही आवाज आई—

 

“बहुत अच्छा… तुमने पीछे नहीं देखा।”

 

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

 

फिर आवाज आई—

 

“लेकिन अब कोई और देख चुका है।”

 

आरव ने धीरे से सामने देखा।

 

सड़क के दूसरी तरफ एक आदमी खड़ा था।

 

वह उनकी तरफ देख रहा था।

 

उस आदमी ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

 

और उसी पल उसकी परछाई जमीन से गायब हो गई।

 

आरव समझ गया…

 

ये कहानी खत्म नहीं हुई थी।

 

क्योंकि उसी समय उसकी जेब में रखा मोबाइल अपने आप बजने लगा।

 

स्क्रीन पर एक मैसेज था—

 

“अगला नंबर तुम्हारा नहीं… उस आदमी का है।”

 

और नीचे लिखा था—

 

“पीछे देखना मना है।”

 

End

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