एपिसोड – 14 : मेरे खून में छुपा राज
आरोही के हाथ से वह कागज नीचे गिर चुका था।
उसकी आंखें सामने खड़े अपने चाचा पर टिकी थीं।
कुछ पल तक उसके मुंह से कोई शब्द ही नहीं निकला।
फिर उसने कांपती आवाज में पूछा,
“आपने… क्या कहा?”
चाचा ने शांत स्वर में दोहराया,
“तुम विनय मेहरा की बेटी नहीं हो।”
आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“झूठ…”
उसने सिर हिलाया।
“ये झूठ है।”
आरव तुरंत उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“आरोही, उसकी बातों पर भरोसा मत करो।”
चाचा हंस पड़ा।
“तुम हमेशा इसकी रक्षा करते रहे हो, आरव। लेकिन आज सच से इसकी रक्षा नहीं कर पाओगे।”
आरव ने गुस्से में कहा,
“चुप रहिए!”
“क्यों? डर लग रहा है कि कहीं तुम्हारा प्यार भी झूठ न निकल जाए?”
आरोही ने तुरंत आरव की तरफ देखा।
“आरव…”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मेरी तरफ देखो। चाहे कुछ भी हो, तुम मेरे लिए वही हो।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“लेकिन अगर मैं वो नहीं हूं जो मैं समझती रही?”
आरव ने बिना एक पल गंवाए कहा,
“तो भी तुम आरोही हो। मेरे लिए इतना ही काफी है।”
आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।
“मां… सच क्या है?”
मां की आंखों में आंसू थे।
उन्होंने काफी देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर धीरे से बोलीं,
“तुम्हारे चाचा सच बोल रहे हैं।”
आरोही जैसे पत्थर की हो गई।
“क्या?”
“तुम विनय की जन्म देने वाली बेटी नहीं थीं।”
“तो मेरे पिता कौन थे?”
मां ने कांपते हुए कहा,
“तुम्हारे असली पिता का नाम…”
वह रुक गईं।
आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“कौन?”
मां ने आंखें बंद कर लीं।
“अर्जुन राजवंशी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने हैरानी से पूछा,
“अर्जुन राजवंशी?”
चाचा मुस्कुराया।
“अब समझ आया?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“अर्जुन राजवंशी कौन था?”
चाचा ने कहा,
“वो आदमी जिसने दस साल पहले विराज सूद के पूरे नेटवर्क को खत्म करने की कोशिश की थी।”
आरोही ने पूछा,
“और मेरी मां?”
मां ने कहा,
“मैं अर्जुन की पत्नी थी।”
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
“तो नंदिनी कौन थीं?”
मां चुप रहीं।
चाचा ने जवाब दिया,
“नंदिनी तुम्हारी असली मां थीं।”
आरोही ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“लेकिन आपने अभी कहा कि मेरे पिता अर्जुन राजवंशी थे!”
“हां।”
“तो नंदिनी और अर्जुन…?”
“पति-पत्नी थे।”
आरोही की आंखें फैल गईं।
“फिर पापा?”
चाचा ने कहा,
“विनय मेहरा ने तुम्हें अपनी बेटी बनाकर इसलिए पाला क्योंकि अर्जुन और नंदिनी दोनों की मौत के बाद तुम्हारी जान खतरे में थी।”
आरोही का दिल टूट रहा था।
“तो विनय मेरे पिता नहीं थे?”
मां ने तुरंत कहा,
“जन्म देने वाले नहीं… लेकिन तुम्हारे पिता से कम भी नहीं।”
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
“उन्होंने मुझे कभी ये महसूस नहीं होने दिया।”
“क्योंकि वो तुमसे बहुत प्यार करते थे।”
आरव अब तक चुप था।
लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब बेचैनी थी।
उसने पूछा,
“अगर आरोही अर्जुन राजवंशी की बेटी है… तो उसे मारने की इतनी कोशिश क्यों हुई?”
चाचा ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि अर्जुन के पास एक ऐसी चीज थी, जो अगर दुनिया के सामने आ जाती तो कई बड़े लोगों का साम्राज्य खत्म हो जाता।”
कबीर ने पूछा,
“क्या चीज?”
“एक रिकॉर्ड।”
आरव ने कहा,
“किसका?”
चाचा ने जवाब दिया,
“उन सभी लोगों का, जिन्होंने मिलकर गैरकानूनी कारोबार चलाया था।”
आरोही ने पूछा,
“वो रिकॉर्ड कहां है?”
चाचा मुस्कुराया।
“यही तो तुमसे जानना है।”
आरव तुरंत उसके सामने आ गया।
“तुम्हें लगता है आरोही को कुछ पता है?”
“उसे नहीं।”
चाचा ने आरव की तरफ देखते हुए कहा,
“लेकिन उसके पास वो चीज है।”
आरोही ने अपने गले में पड़े लॉकेट को छुआ।
अचानक उसे याद आया कि नंदिनी के लॉकर से मिला लॉकेट अब उसके गले में था।
“ये?”
चाचा की नजर लॉकेट पर टिक गई।
“हां।”
आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।
“इस लॉकेट में क्या है?”
चाचा बोला,
“तुम्हें खुद नहीं पता।”
कबीर ने लॉकेट को ध्यान से देखा।
“इसे खोलो।”
आरोही ने लॉकेट खोला।
अंदर पहले की तरह नंदिनी की छोटी तस्वीर थी।
लेकिन तस्वीर के पीछे एक बेहद छोटा-सा नंबर दिखाई दिया।
A-27-09.
कबीर ने कहा,
“ये कोई कोड है।”
आरव ने पूछा,
“तुम इसे डिकोड कर सकते हो?”
“कोशिश कर सकता हूं।”
चाचा ने अचानक कहा,
“तुम्हें पता भी है कि तुम किस चीज से खेल रहे हो?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“जो भी है, अब हम उसे खत्म करके रहेंगे।”
चाचा हंस पड़ा।
“तुम्हें लगता है ये सिर्फ एक पुरानी फाइल का मामला है?”
वह आरोही की तरफ देखकर बोला,
“तुम्हारी असली मां की मौत इसी कोड की वजह से हुई थी।”
आरोही का चेहरा बदल गया।
“नंदिनी मां की मौत…?”
“हां।”
“क्या उन्होंने इसे छुपाया था?”
“उन्होंने इसे तुम्हारे पास छोड़ दिया था।”
“मेरे पास?”
“हां।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“लेकिन मुझे तो कुछ पता ही नहीं।”
चाचा ने कहा,
“क्योंकि तुम्हें बचपन में ही भूलने के लिए मजबूर कर दिया गया था।”
आरव ने गुस्से में कहा,
“किसने?”
चाचा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता ने।”
आरव चौंक गया।
“मेरे पिता?”
“हां।”
आरोही अचानक सिर पकड़कर बैठ गई।
उसके दिमाग में कुछ धुंधली तस्वीरें घूमने लगीं।
एक बड़ा कमरा…
एक महिला रो रही थी…
एक आदमी उसे गोद में लेकर भाग रहा था…
और एक छोटी बच्ची लगातार कह रही थी “मुझे मां के पास जाना है।”
आरोही ने आंखें खोल दीं।
“मुझे कुछ याद आ रहा है।”
आरव उसके पास बैठ गया।
“क्या?”
“मैंने… नंदिनी मां को देखा था।”
मां ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें याद है?”
आरोही ने आंखें बंद कीं।
“बहुत थोड़ा।”
“वो मुझे गोद में लेकर रो रही थीं।”
फिर उसने अपने सिर पर हाथ रखा।
“और एक आदमी…”
आरव ने पूछा,
“कौन?”
आरोही की सांस तेज हो गई।
“वो आदमी… जिसने मुझे उनसे दूर किया था।”
चाचा का चेहरा अचानक बदल गया।
“तुम्हें उसका चेहरा याद है?”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं।”
फिर कुछ पल बाद उसकी आंखें फैल गईं।
“लेकिन… उसकी आवाज याद है।”
आरव ने पूछा,
“क्या कह रहा था?”
आरोही ने कांपते हुए कहा,
“वो कह रहा था…”
उसकी आवाज अचानक धीमी हो गई।
“अगर बच्ची जिंदा रही, तो सब बर्बाद हो जाएगा।”
कमरे में मौजूद सभी लोग चुप हो गए।
अद्वैत ने अचानक कहा,
“मेरे पास एक और रिकॉर्डिंग है।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“मेरे पिता की।”
उसने फोन में एक ऑडियो फाइल खोली।
आवाज आई “अर्जुन की बेटी को बचाना जरूरी है। अगर वो जिंदा रही तो एक दिन सच सामने आएगा।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
फिर रिकॉर्डिंग में एक दूसरी आवाज सुनाई दी।
सिर्फ दो शब्द “उसे खत्म करो।”
आरोही कांप गई।
“ये आवाज…”
उसने आंखें बंद कर लीं।
“मैंने ये आवाज पहले सुनी है।”
आरव ने पूछा,
“कहां?”
आरोही ने धीरे से कहा,
“मेरे सपने में।”
सब चुप हो गए।
आरव ने चाचा की तरफ देखा।
“अब सब सच बताइए।”
चाचा ने कहा,
“मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं।”
आरव हंस पड़ा।
“तो बंदूक लेकर यहां क्यों आए?”
“क्योंकि मुझे पता था कि तुम मेरी बात नहीं मानोगे।”
“और मेरी मां को?”
“उन्हें सिर्फ इसलिए लाया ताकि वो तुम्हें यहां तक ला सकें।”
आरोही ने पूछा,
“आपने मां को नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया?”
चाचा की आंखों में दर्द आ गया।
“क्योंकि तुम्हारी मां ने भी कभी मुझे बचाया था।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“आपका उनसे क्या रिश्ता है?”
चाचा ने जवाब नहीं दिया।
वह बस इतना बोला “कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते।”
फिर उसने आरव की तरफ देखा।
“लेकिन अब तुम्हें एक और सच जानना होगा।”
आरव ने पूछा,
“क्या?”
“तुम्हारे पिता की मौत के बाद… उन्होंने तुम्हारे नाम पर एक संपत्ति छोड़ी थी।”
“कौन-सी?”
“एक पुरानी हवेली।”
कबीर ने पूछा,
“कहां?”
चाचा ने एक पता बताया।
आरव का चेहरा गंभीर हो गया।
“ये वही हवेली है… जिसे मेरे पिता ने कभी बेचने से मना किया था।”
“हां।”
“वहां क्या है?”
चाचा ने कहा,
“अर्जुन राजवंशी की आखिरी डायरी।”
आरोही ने तुरंत पूछा,
“मेरे पिता की?”
“हां।”
“और उसमें?”
चाचा ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,
“उस आदमी का नाम है जिसने नंदिनी, अर्जुन, विनय और राजवीर… चारों की जिंदगी बर्बाद की।”
रात काफी हो चुकी थी।
आरव ने फैसला किया कि सुबह होते ही वे हवेली जाएंगे।
लेकिन आरोही को नींद नहीं आ रही थी।
वह घर की छत पर खड़ी आसमान देख रही थी।
आरव उसके पास आया।
“सोई नहीं?”
“नहीं।”
“बहुत कुछ बदल गया ना?”
आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“मेरी पूरी पहचान बदल गई।”
आरव ने कहा,
“तुम्हारी पहचान नहीं बदली।”
“कैसे?”
“तुम अभी भी वही आरोही हो, जिसे मैं बचपन से जानता हूं।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“अगर मैं किसी और की बेटी हूं तो?”
“तो क्या हुआ?”
“तुम्हारे परिवार वाले मुझे स्वीकार करेंगे?”
आरव ने बिना सोचे कहा,
“मुझे अपने परिवार से ज्यादा तुम्हारी जरूरत है।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“तुम इतना प्यार कैसे कर लेते हो?”
आरव मुस्कुराया।
“शायद ये भी हमारे माता-पिता की साजिश है।”
आरोही हंस पड़ी।
“कैसी साजिश?”
“उन्होंने बचपन में ही तय कर दिया था कि तुम मुझे परेशान करोगी।”
“मैं?”
“हां।”
“तो फिर तुम भी कम नहीं थे।”
दोनों हंसने लगे।
लेकिन अगले ही पल आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।
“एक बात का वादा करो।”
“क्या?”
“जो भी सच सामने आए… तुम मेरा हाथ नहीं छोड़ोगी।”
आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,
“तुम भी मेरा हाथ मत छोड़ना।”
“कभी नहीं।”
अगली सुबह आरव, आरोही, कबीर और अद्वैत पुरानी हवेली पहुंचे।
हवेली सालों से बंद थी।
दरवाजा खोलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ने लगी।
दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।
आरव एक तस्वीर के सामने रुक गया।
उसमें उसके पिता, विनय, नंदिनी और अर्जुन साथ खड़े थे।
आरोही तस्वीर को देखकर भावुक हो गई।
“मेरी मां…”
तभी कबीर ने कहा,
“यहां कुछ अजीब है।”
दीवार के नीचे एक निशान था।
A-27-09
वही कोड।
आरव ने दीवार को दबाया।
एक छिपा हुआ दरवाजा खुल गया।
अंदर एक छोटा कमरा था।
बीच में एक मेज।
मेज पर एक डायरी रखी थी।
आरोही ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।
पहले पन्ने पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही के लिए।”
उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे।
उसने डायरी खोली।
पहली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“आरोही मेरी बेटी है… लेकिन उसका जन्म जिस रात हुआ, उस रात एक और बच्चा भी पैदा
हुआ था।”
आरव ने हैरानी से पूछा,
“एक और बच्चा?”
आरोही ने अगला पन्ना पलटा।
वहां लिखा था “और उस बच्चे का संबंध आज तुम्हारी जिंदगी से है।”
आरोही ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
उसकी नजर आरव पर गई।
आरव भी उसे देख रहा था।
दोनों के दिल में एक ही सवाल उठा वो दूसरा बच्चा कौन था?
तभी डायरी के आखिरी पन्ने से एक तस्वीर नीचे गिरी।
तस्वीर में दो नवजात बच्चे थे।
एक बच्ची…
और एक बच्चा।
पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी “इन दोनों को कभी एक-दूसरे से दूर मत होने देना।”
आरव ने तस्वीर उठाई।
उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे नाम पर पड़ी।
उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
क्योंकि उस बच्चे का नाम था “आरव।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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