आरव सीढ़ियों के पास खड़ा कांप रहा था।
अचानक ऊपर से एक पुरानी गेंद नीचे आकर उसके पैरों से टकराई।
गेंद पर लाल रंग से लिखा था—
“आरव भैया।”
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
यह वही गेंद थी जो उसने अपने छोटे भाई कबीर को दस साल पहले दी थी।
तभी ऊपर से बच्चे की आवाज आई—
“भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों भाग गए थे?”
आरव को सब याद आने लगा।
दस साल पहले वह और कबीर इसी जंगल में खेल रहे थे।
अचानक उन्हें वही पुराना मकान मिला था।
कबीर अंदर चला गया था।
आरव डरकर बाहर भाग गया था।
उसने कभी किसी को यह नहीं बताया कि कबीर आखिरी बार इसी मकान में गया था।
आरव ने कांपते हुए कहा—
“कबीर… मुझे माफ कर दो।”
ऊपर से हंसी की आवाज आई।
“मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”
आरव ने राहत की सांस ली।
लेकिन अगले ही पल आवाज बदल गई।
अब वह बूढ़ी औरत की आवाज थी—
“लेकिन उसने नहीं किया।”
आरव ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों के आखिरी छोर पर कबीर खड़ा था।
उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।
और उसके पीछे वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।
कबीर ने उंगली अपने होंठों पर रखी और धीरे से कहा—
“भैया… पीछे मत देखना।”
आरव समझ नहीं पाया।
तभी उसके पीछे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
और कान में फुसफुसाया—
“अब तुम्हारी बारी है।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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