संभाल कर रखो जो भी हासिल है,
*बाद में वो मन्नतों से भी नहीं मिलता दोस्त..*
❤️😇
संभाल कर रखो जो भी हासिल है,
*बाद में वो मन्नतों से भी नहीं मिलता दोस्त..*
❤️😇
कभी एक जान होने का दावा करने वाले,
*आज अनजान बनकर महफ़िल से गुज़र गए।*💕💕💕
कुछ पीड़ाएं चीखने की इजाजत नहीं देती…🤫
*उन्हें मौन रहके ही स्वीकारना पड़ता हैं..!!!😔*
फिर सुबह ये एहसास हुआ मुझे,
कुछ रिश्ते साथ होकर भी साथ नहीं होते,
जो ख्वाबों में भी हाथ छोड़ जाए,
वो अक्सर किस्मत में नहीं होते…!!
🥀✨
अजीबो-गरीब दस्तूर है इस दुनिया का भी यारों,
*दिल साफ़ रखो तो लोग रूह पर ही दाग़ लगा देते हैं।*
राजस्थान के एक छोटे से गांव देवगढ़ में हर सुबह सूरज की पहली किरणें पीले रेतीले टीलों को सुनहरा रंग दे जाती थीं। मिट्टी के घरों, बकरियों की मिमियाहट, और औरतों के गीतों से गूंजता गांव बहुत सुंदर लगता था, लेकिन उस सुंदरता के पीछे छुपा था एक ऐसा सच, जिसे सबने परंपरा का नाम दे रखा था — बाल विवाह।
इसी गांव में रहती थी फुलवा, मात्र 9 साल की एक चंचल और होशियार लड़की। उसकी आंखों में सपने थे — पढ़ने के, उड़ने के, और कुछ कर दिखाने के। लेकिन गांव की पुरानी परंपराओं को उसकी इच्छाओं से कोई मतलब नहीं था।
फुलवा अपने मिट्टी के आंगन में गुड़ियों की शादी खेल रही थी, जब उसकी मां गोमती ने उसे बुलाया, “फुलवा, ज़रा जल्दी आ, तेरे लिए कुछ खास बात है।”
फुलवा दौड़ती हुई आई और देखा कि घर के आंगन में गांव के कुछ बड़े लोग बैठे हैं। उसकी मां, पिता बंशीलाल, और एक अजनबी परिवार वहां मौजूद था।
कुछ ही पलों में बात समझ आ गई — फुलवा की सगाई हो रही थी। उसका रिश्ता तय हो चुका था 12 साल के मोहन से, जो पास के गांव बाडमेर का था।
फुलवा ने पूछा, “पर मां, ये लोग कौन हैं? ये सब क्या हो रहा है?”
मां ने मुस्कुराकर कहा, “तेरी शादी की बात चल रही है बिटिया। तू अब बड़ी हो गई है।”
फुलवा को कुछ समझ नहीं आया, पर गुड़ियों की शादी की तरह अपनी शादी का ख्याल सुनकर वो थोड़ा मुस्कुरा दी, उसे लगा जैसे कोई खेल हो रहा हो।
शादी का मंडप सजा, ढोल-नगाड़ों की आवाज़ें आईं, और गुड़ियों की शादी खेलने वाली फुलवा खुद किसी के घर की बहू बन गई। शादी के बाद विदाई की रात जब उसे मोहन के साथ उसके गांव ले जाया गया, तब असल जिंदगी की कठोरता सामने आई।
मोहन का परिवार कठोर और रूढ़िवादी था। उसकी सास चंदा देवी हर बात में दोष निकालती। “बहू है, काम सीखो, खाना बनाओ, पानी भरो… अब किताबों का वक्त नहीं।”
फुलवा को स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी। उसके हाथ में अब किताब की जगह झाड़ू और बेलन था।
मोहन खुद एक सीधा-सादा लड़का था। वह भी समझ नहीं पाता था कि कैसे दो बच्चों की ज़िंदगी एक झूठी परंपरा के बोझ तले कुचल दी गई है।
एक दिन गांव में एक नई मास्टरनी आई — नीला दीदी, जो शहर से पढ़ी-लिखी थी। उन्होंने गांव की लड़कियों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया। वो घर-घर जाकर माताओं को समझातीं कि “लड़कियों का पढ़ना जरूरी है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।”
फुलवा ने दूर से नीला दीदी को देखा। उसे लगा जैसे कोई सपना उसके सामने आ गया हो।
जब नीला दीदी उसके घर आईं और चंदा देवी से बात करने लगीं, तो फुलवा ने हिम्मत करके कहा, “दीदी, मैं पढ़ना चाहती हूं।”
उसकी सास ने तुरंत झाड़ू उठाकर कहा, “बहू हो, अपने काम से काम रखो। पढ़ाई का क्या काम? घर चलाना सीखो।”
लेकिन उस दिन फुलवा की आंखों में पहली बार एक चिंगारी जली थी।
रात को जब मोहन और फुलवा बात कर रहे थे, फुलवा ने धीरे से पूछा, “मोहन, क्या हम बच्चे हैं?”
मोहन ने सिर झुका लिया, “हां, शायद हैं।”
“तो फिर ये शादी क्यों?”
मोहन बोला, “क्योंकि हमारे मां-बाप ने कहा कि यही रीत है।”
“लेकिन क्या रीत से बड़ा हमारा सपना नहीं हो सकता?” फुलवा ने पूछा।
ये सवाल मोहन के दिल में भी गूंजने लगे। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती होने लगी। वो अब मिलकर सोचने लगे कि कैसे इस परिस्थिति से बाहर निकला जाए।
6. कानून की दस्तक
एक दिन गांव में एक NGO की महिला आईं। उन्होंने बताया कि बाल विवाह गैरकानूनी है और सरकार इसके खिलाफ कड़े कदम उठा रही है। उन्होंने कई बालिकाओं को बाल विवाह से बचाया है।
फुलवा और मोहन ने हिम्मत कर उन महिलाओं से मिलकर अपनी बात कही। पहली बार किसी ने उन्हें पूरी सहानुभूति से सुना।
फुलवा ने रोते हुए कहा, “मुझे स्कूल जाना है। मुझे बच्चा बनने दो, अभी बहू नहीं बनना है।”
NGO की टीम ने केस दर्ज करवाया। गांव में हड़कंप मच गया। बंशीलाल और चंदा देवी जैसे लोगों को यह अपनी इज्जत पर हमला लगा।
“लड़की हाथ से निकल गई,” बंशीलाल ने गुस्से में कहा।
लेकिन कानून ने इस बार परंपरा को झुका दिया। फुलवा और मोहन की शादी को शून्य घोषित किया गया। उन्हें अलग कर दिया गया, और दोनों को बाल संरक्षण गृह में भेजा गया जहां वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते थे।
समय बीता। फुलवा ने जमकर पढ़ाई की। उसे स्कॉलरशिप मिली और वह जयपुर के एक स्कूल में दाखिल हुई। वहीं मोहन ने भी कड़ी मेहनत से आगे बढ़ना शुरू किया।
कभी गुड़ियों से शादी खेलती फुलवा, अब बाल विवाह विरोधी अभियान की पोस्टर गर्ल बन गई थी। स्कूलों में, सभाओं में, मंचों पर वह अपनी कहानी सुनाती।
“मैं भी एक बालिका वधू थी,” वह कहती, “पर मैंने सपने चुने, बेड़ियां नहीं।
कुछ साल बाद फुलवा देवगढ़ वापस लौटी, पर अब वह वही मासूम लड़की नहीं थी। वह समाज सुधारक, प्रेरक वक्ता और बाल अधिकारों की संरक्षक बन चुकी थी।
उसके आते ही गांव में खलबली मच गई। कुछ लोग अब भी नाक भौं सिकोड़ते थे, पर ज़्यादातर ने अपनी सोच बदल ली थी।
नीला दीदी ने गर्व से कहा, “आज गांव की बच्चियां फुलवा की तस्वीर देखकर पढ़ाई का सपना देखती हैं।”
फुलवा ने एक स्कूल खोला — “बालिका शिक्षा केंद्र”, जहां वह गरीब और वंचित लड़कियों को मुफ्त पढ़ाती थी।
बंशीलाल, जो कभी बदलाव का विरोध करता था, अब चुपचाप अपनी पोती को स्कूल भेजते समय फुलवा की तस्वीर पर फूल चढ़ाता था।
एक दिन फुलवा को एक चिट्ठी मिली। वह मोहन की थी। उसने लिखा:
“फुलवा, जब हम बच्चे थे, तो हमें शादी के नाम पर बांध दिया गया था। पर आज, मैं एक शिक्षक हूं और हर बच्ची को यही सिखाता हूं कि वह अपनी ज़िंदगी खुद चुने। तुमने जो रास्ता दिखाया, वही मेरा भी रास्ता बन गया। धन्यवाद — तुम्हारा बचपन का दोस्त, मोहन।”
फुलवा की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें पोंछते हुए उसने आसमान की तरफ देखा — अब वहां सिर्फ बादल नहीं थे, सपनों के रंग भी थे।

बारिश की हल्की बूंदें पुराने बस स्टैंड की टूटी हुई छत पर लगातार गिर रही थीं। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे पूरे कस्बे को अपने आगोश में ले रहा था। सड़क किनारे लगी छोटी-छोटी दुकानों की पीली रोशनी भीगती हवा में किसी उम्मीद की तरह चमक रही थी। उन्हीं दुकानों के बीच एक छोटी-सी चाय की दुकान थी, जहाँ सत्रह साल की नैना अपने पिता के साथ काम करती थी।
नैना की दुनिया बहुत छोटी थी। सुबह दुकान खोलना, ग्राहकों को चाय देना, घर लौटकर माँ की मदद करना और रात को छत पर बैठकर आसमान को देखना। मगर उस छोटी-सी दुनिया के भीतर एक बहुत बड़ा सपना पल रहा था। वह सपना थाअपनी खुद की एक लाइब्रेरी खोलने का।
लोग अक्सर उस पर हँसते थे।
“चाय बेचने वाली लड़की लाइब्रेरी खोलेगी?”
“इतनी किताबें पढ़कर क्या कलेक्टर बनेगी?”
“लड़कियों के सपने घर की चौखट तक ही अच्छे लगते हैं।”
ऐसी बातें नैना रोज़ सुनती थी, मगर उसने कभी किसी को जवाब नहीं दिया। वह बस मुस्कुरा देती और रात में अपनी पुरानी कॉपी में कुछ लिखती रहती।
उस कॉपी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था
“छोटा सा ख़्वाब मेरा…”
नैना को किताबों से प्यार बचपन से था। जब वह दस साल की थी, तब उसकी माँ उसे मंदिर के पास लगने वाले पुराने किताबों के बाज़ार में ले जाती थीं। लोग वहाँ फटी हुई, पुरानी और धूल भरी किताबें बेचते थे। दूसरों के लिए वे बेकार थीं, मगर नैना के लिए वे किसी खजाने से कम नहीं थीं।
उसने पहली बार वहीं से एक कहानी की किताब खरीदी थी। किताब के कई पन्ने फटे हुए थे, लेकिन उस कहानी ने उसके भीतर एक नई दुनिया जगा दी थी। तब से उसे लगने लगा था कि किताबें इंसान को वहाँ तक ले जा सकती हैं, जहाँ वह अपने पैरों से कभी नहीं पहुँच सकता।
एक रात जब दुकान बंद हो चुकी थी, नैना चुपचाप छत पर बैठी आसमान देख रही थी। उसके पिता रामू चाचा उसके पास आए और बोले,
“क्या सोच रही है बिटिया?”
नैना ने धीरे से कहा,
“बाबा, अगर हमारे पास बहुत सारे पैसे होते ना… तो मैं एक बड़ी-सी लाइब्रेरी खोलती।”
रामू चाचा हल्का-सा हँस पड़े।
“लाइब्रेरी क्यों?”
“ताकि कोई बच्चा सिर्फ पैसों की वजह से किताबों से दूर ना रहे।”
रामू चाचा कुछ पल तक उसे देखते रहे। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,
“सपने छोटे-बड़े नहीं होते नैना… बस उन्हें पूरा करने का हौसला बड़ा होना चाहिए।”
उस रात नैना देर तक सो नहीं पाई। उसे पहली बार लगा कि उसका सपना शायद सच भी हो सकता है।
दिन बीतते गए। नैना सुबह दुकान पर काम करती और रात को पढ़ाई। कस्बे के सरकारी स्कूल में वह हमेशा अच्छे नंबर लाती थी। उसके टीचर भी उसकी तारीफ़ करते थे। मगर बारहवीं के बाद आगे पढ़ाई करना आसान नहीं था। घर की हालत बहुत खराब थी। पिता की कमाई से मुश्किल से घर चलता था।
एक दिन माँ ने झिझकते हुए कहा,
“नैना… शर्मा जी अपने बेटे के लिए रिश्ता लेकर आए थे।”
नैना का दिल जैसे अचानक बैठ गया।
“माँ… मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।”
“हम भी नहीं चाहते बिटिया… मगर हालात…”
नैना ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“बस एक मौका दे दो माँ। मैं कुछ बनकर दिखाऊँगी।”
माँ की आँखें भर आईं। वह जानती थीं कि उनकी बेटी बाकी लड़कियों जैसी नहीं थी। उसके सपनों में चमक थी।
अगले दिन नैना स्कूल गई तो उसकी क्लास टीचर मीरा मैडम ने उसे स्टाफ रूम में बुलाया।
“तुम उदास क्यों हो?”
नैना पहले चुप रही, फिर उसने सब बता दिया। मीरा मैडम ध्यान से सुनती रहीं। फिर उन्होंने अपनी अलमारी से एक फॉर्म निकाला।
“ये शहर के कॉलेज की स्कॉलरशिप का फॉर्म है। अगर तुम पास हो गई, तो तुम्हारी पढ़ाई मुफ्त हो जाएगी।”
नैना की आँखों में चमक आ गई।
“सच मैडम?”
“हाँ। मगर मेहनत बहुत करनी पड़ेगी।”
उस दिन के बाद नैना ने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया। दिन में दुकान, रात में पढ़ाई। कई बार थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, मगर वह फिर भी किताबें खोलकर बैठ जाती।
परीक्षा का दिन आ गया। नैना ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पेपर लिखा। जब रिज़ल्ट आया, तो पूरे कस्बे में उसकी चर्चा होने लगी। उसने सिर्फ परीक्षा पास नहीं की थी, बल्कि पूरे जिले में पहला स्थान हासिल किया था।
रामू चाचा की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को सीने से लगाकर कहा,
“मुझे तुझ पर गर्व है।”
कुछ ही दिनों बाद नैना शहर चली गई। नया शहर, नई जगह, नए लोग। शुरुआत आसान नहीं थी। कॉलेज के कई छात्र उसका मज़ाक उड़ाते थे क्योंकि उसके पास महंगे कपड़े नहीं थे। वह हॉस्टल की सबसे साधारण लड़की थी।
मगर नैना के पास एक चीज़ थी, जो बहुत कम लोगों के पास होती है—अपने सपनों पर भरोसा।
कॉलेज की लाइब्रेरी उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं थी। घंटों वह किताबों के बीच बैठी रहती। कभी कहानी पढ़ती, कभी इतिहास, कभी विज्ञान। उसे हर किताब में एक नई दुनिया दिखाई देती थी।
धीरे-धीरे उसकी दोस्ती आरव नाम के एक लड़के से हुई। आरव अमीर परिवार से था, मगर दिल से बहुत अच्छा था। उसने पहली बार नैना से पूछा,
“तुम हमेशा लाइब्रेरी में ही क्यों रहती हो?”
नैना मुस्कुराई।
“क्योंकि मुझे लगता है, किताबें इंसानों से ज्यादा सच्ची होती हैं।”
आरव उसकी बात सुनकर हँस पड़ा, मगर उस दिन के बाद वह भी अक्सर लाइब्रेरी आने लगा।
एक दिन आरव ने पूछा,
“तुम्हारा सपना क्या है?”
नैना कुछ पल चुप रही, फिर बोली,
“मैं अपने कस्बे में एक ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ, जहाँ हर गरीब बच्चा मुफ्त में किताबें पढ़ सके।”
आरव उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया।
“इतना छोटा सपना?”
नैना मुस्कुराई।
“सपना छोटा है… मगर मेरे लिए पूरी दुनिया जैसा।”
कॉलेज के तीन साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। नैना ने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसे शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। उसकी पहली तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, मगर उसके लिए वह किसी खजाने से कम नहीं थी।
उसने सबसे पहले क्या खरीदा?
कोई महंगा फोन नहीं। कोई कपड़े नहीं।
उसने खरीदीं—बीस नई किताबें।
हर महीने वह अपनी तनख्वाह का थोड़ा हिस्सा बचाने लगी। धीरे-धीरे उसकी छोटी-सी बचत बढ़ने लगी। दूसरी तरफ, वह अपने कस्बे के बच्चों के लिए पुरानी किताबें इकट्ठा करने लगी। सोशल मीडिया पर उसने एक अभियान शुरू किया—
“एक किताब दान करें।”
शुरुआत में बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया। मगर धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। कोई पाँच किताबें भेजता, कोई दस। कुछ लोग बच्चों की कहानियाँ भेजते, कुछ स्कूल की किताबें।
दो साल बाद जब नैना अपने कस्बे लौटी, तो उसके साथ सिर्फ सामान नहीं था। उसके साथ सैकड़ों किताबें थीं।
कस्बे के पुराने पंचायत भवन का एक कमरा कई सालों से बंद पड़ा था। नैना ने प्रधान जी से बात की और वह कमरा साफ करवाया। पूरा कमरा धूल और जालों से भरा हुआ था। लोग उसे देखकर हँस रहे थे।
“यही बनेगी लाइब्रेरी?”
“दो दिन में बंद हो जाएगी।”
मगर नैना ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने खुद झाड़ू लगाई, दीवारों को रंगा, पुराने टेबल ठीक करवाए। उसके पिता और माँ भी उसके साथ काम करते रहे।
आरव भी शहर से आ गया। उसने किताबों की अलमारियाँ बनवाने में मदद की।
आख़िरकार वह दिन आ गया, जिसका नैना ने बरसों से सपना देखा था।
दरवाज़े के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगा था—
“छोटा सा ख़्वाब लाइब्रेरी”
उद्घाटन वाले दिन वहाँ बहुत कम लोग आए। मगर कुछ छोटे बच्चे बड़े उत्साह से अंदर गए। उनकी आँखों में चमक थी। वे पहली बार इतनी सारी किताबें देख रहे थे।
एक छोटी लड़की नैना के पास आई और बोली,
“दीदी… क्या मैं ये किताब घर ले जा सकती हूँ?”
नैना की आँखें भर आईं।
“हाँ… ये सारी किताबें तुम्हारी हैं।”
धीरे-धीरे वह लाइब्रेरी पूरे कस्बे की पहचान बन गई। बच्चे स्कूल के बाद वहाँ आने लगे। कुछ पढ़ाई करने आते, कुछ कहानियाँ पढ़ने। कई माता-पिता, जो पहले नैना का मज़ाक उड़ाते थे, अब अपने बच्चों को उसके पास भेजने लगे।
एक दिन वही शर्मा जी, जिन्होंने कभी नैना के लिए रिश्ता भेजा था, अपनी पोती का हाथ पकड़कर लाइब्रेरी आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटी… हमें माफ कर देना। हम तेरे सपने को समझ नहीं पाए थे।”
नैना ने विनम्रता से सिर झुका लिया।
उस रात वह फिर अपनी छत पर बैठी थी। आसमान में वही तारे चमक रहे थे, जिन्हें वह बचपन से देखती आई थी। मगर आज उसके चेहरे पर अलग सुकून था।
रामू चाचा उसके पास आए और बोले,
“तो बिटिया… तेरा छोटा सा ख़्वाब पूरा हो गया?”
नैना हल्का-सा मुस्कुराई।
“नहीं बाबा… अब तो बस शुरुआत हुई है।”
“मतलब?”
“अब मैं आसपास के गाँवों में भी ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ।”
रामू चाचा हँस पड़े।
“तेरे सपने भी ना… कभी खत्म ही नहीं होते।”
नैना ने आसमान की तरफ देखा।
“सपने खत्म हो जाएँ ना बाबा… तो इंसान जीना छोड़ देता है।”
कुछ महीनों बाद नैना की लाइब्रेरी की कहानी अखबारों में छपने लगी। शहर से लोग उसे बुलाने लगे। स्कूलों और कॉलेजों में उसे सम्मानित किया गया। मगर इन सबके बावजूद नैना वैसी ही रही—साधारण, शांत और मुस्कुराती हुई।
एक दिन एक पत्रकार ने उससे पूछा,
“आपने इतनी मुश्किलों के बाद भी हार क्यों नहीं मानी?”
नैना ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“क्योंकि मेरा सपना सिर्फ मेरा नहीं था। वह उन बच्चों की उम्मीद था, जो किताबें खरीद नहीं सकते थे।”
पत्रकार ने फिर पूछा,
“अगर आपको अपनी कहानी एक लाइन में बतानी हो, तो क्या कहेंगी?”
नैना कुछ पल सोचती रही। फिर उसने धीरे से कहा,
“मैं बस एक चाय बेचने वाली लड़की थी… जिसने किताबों में अपनी दुनिया ढूँढ ली।”
उसकी यह बात अगले दिन अखबार की हेडलाइन बन गई।
समय बीतता गया। नैना की लाइब्रेरी अब सिर्फ एक कमरा नहीं रही थी। वहाँ कंप्यूटर भी आ गए थे, पढ़ाई के लिए अलग हॉल भी बन गया था। गाँव के कई बच्चे, जो कभी स्कूल छोड़ने वाले थे, अब बड़े सपने देखने लगे थे।
एक शाम नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी किताबें सजा रही थी, तभी वही छोटी लड़की, जो पहली बार किताब लेने आई थी, उसके पास आई।
“दीदी…”
“हाँ?”
“मैं बड़ी होकर टीचर बनना चाहती हूँ।”
नैना मुस्कुराई।
“बहुत अच्छा सपना है।”
लड़की ने मासूमियत से पूछा,
“क्या मेरे सपने भी पूरे हो सकते हैं?”
नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,
“अगर सपना सच्चा हो… और मेहनत ईमानदार… तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती।”
बाहर बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू घुल गई थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती पीली रोशनी दूर सड़क तक फैल रही थी।
नैना ने अपनी पुरानी कॉपी निकाली। वही कॉपी, जिसके पहले पन्ने पर बरसों पहले उसने लिखा थ
“छोटा सा ख़्वाब मेरा…”
उसने मुस्कुराते हुए उसके नीचे एक नई लाइन लिखी—
“और अब यह सिर्फ मेरा नहीं रहा…”

नफ़रत करनी है तो इतनी करो,
कि मेरी साँसों की आख़िरी धड़कन भी तुम्हें चैन न दे।
मेरी चिता की लपटें जब आसमान छू लें,
तब तुम्हारे चूल्हे पर खीर मीठी उबलती रहे।
नफ़रत करनी है तो इतनी करो,
कि मेरी चिता की ज्वाला में भी तेरी आँखें न भरें।
जिस दिन धुआँ उठे मेरे अस्तित्व का,
तेरे आँगन में मिठास की खुशबू बिखरें।
मेरे जाने पर आँसू न बहाना,
बस अपने घर में मिठास का दीप जलाना।
मेरी राख़ हवा में उड़ जाए,
मेरे जाने का ग़म न हो तुझको,
बस तेरे चूल्हे पर खीर उबलती रहे।
मेरी राख़ हवा में घुल जाए,
और तेरी हँसी तेरे घर को सजाती रहे।
और तेरे आँगन में हँसी की गूँज समा जाए।
नफ़रत का रंग इतना गाढ़ा हो,
कि मेरी याद भी तेरे दिल को न छू पाए।
मैं जलकर राख़ हो जाऊँ,
पर तेरे घर में खुशियों की धुन बजती जाए।
मेरे नाम का ज़िक्र हो तो,
तेरे होंठों पर ताना और ठहाका ही आए।
मेरी मौत का दिन तेरे लिए उत्सव बने,
जहाँ मिठास का स्वाद हर कोने में समाए।
नफ़रत करनी है तो इतनी करो,
कि मेरी चिता की आग भी तेरे लिए रोशनी बने।
मैं बुझ जाऊँ इस दुनिया से,
नफ़रत का इज़हार इतना गहरा हो,
कि मेरी याद भी तेरे दिल को न छू पाए।
मैं बुझ जाऊँ आग में,
पर तेरी ज़िंदगी में मिठास ही मिठास रहे।