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  • आखिरी राखी जो बंधी नहीं

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    वो आखिरी राखी जो कभी बांधी नहीं गई

     

    रक्षाबंधन की सुबह पूरे घर में खुशी थी, लेकिन मीरा अपने कमरे में बैठी एक पुरानी लकड़ी की पेटी को बार-बार खोल और बंद कर रही थी।

     

    पेटी के अंदर एक राखी रखी थी।

     

    लाल और पीले धागे वाली।

     

    राखी नई नहीं थी।

     

    उसे खरीदे हुए पूरे बारह साल हो चुके थे।

     

    लेकिन आज तक वह किसी की कलाई पर नहीं बंधी थी।

     

    मीरा हर साल उसे निकालती।

     

    कुछ देर देखती।

     

    फिर वापस उसी पेटी में रख देती।

     

    उसकी माँ कई साल पहले कहती थीं,

     

    “बेटा, अब इस राखी को संभालकर रखने से क्या होगा?”

     

    मीरा धीरे से जवाब देती,

     

    “माँ, कुछ चीजें बांधने के लिए नहीं होतीं… बस याद रखने के लिए होती हैं।”

     

    लेकिन इस बार माँ नहीं थीं।

     

    मीरा घर में अकेली बैठी थी।

     

    उसकी उम्र अब तीस साल हो चुकी थी।

     

    आज भी रक्षाबंधन था।

     

    बाहर मोहल्ले की लड़कियां अपने भाइयों को राखी बांध रही थीं।

     

    कहीं हंसी थी।

     

    कहीं मिठाई बांटी जा रही थी।

     

    लेकिन मीरा की नजर सिर्फ उस पुरानी राखी पर थी।

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    “मीरा!”

     

    बाहर से पड़ोस की बूढ़ी शारदा दादी की आवाज आई।

     

    मीरा ने जल्दी से पेटी बंद की।

     

    “आ रही हूं दादी।”

     

    दरवाजा खोलते ही दादी ने कहा,

     

    “आज भी नहीं गई?”

     

    मीरा समझ गई कि दादी क्या पूछ रही हैं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    “कब तक खुद को सजा देती रहेगी?”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    “मैं खुद को सजा नहीं दे रही।”

     

    “फिर?”

     

    “बस… भूल नहीं पा रही।”

     

    दादी अंदर आ गईं।

     

    उन्होंने लकड़ी की पेटी को देखा।

     

    “फिर वही राखी?”

     

    मीरा ने सिर हिला दिया।

     

    दादी ने पूछा,

     

    “क्या आज भी तू सोचती है कि अगर उस दिन तू उसे राखी बांध देती, तो सब बदल जाता?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी आंखों के सामने बारह साल पुराना दृश्य घूमने लगा।

     

    तब वह अठारह साल की थी।

     

    उसका भाई विवान उससे तीन साल बड़ा था।

     

    दोनों बचपन से एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे।

     

    विवान बहुत शरारती था।

     

    और मीरा बहुत जल्दी नाराज हो जाती थी।

     

    विवान उसे छेड़ता,

     

    “तुझे गुस्सा करते हुए देखकर मजा आता है।”

     

    मीरा जवाब देती,

     

    “एक दिन सच में बात करना बंद कर दूंगी।”

     

    विवान हंस देता।

     

    “तू मेरे बिना रह नहीं सकती।”

     

    मीरा गुस्से में कहती,

     

    “बहुत गलतफहमी है आपको।”

     

    लेकिन सच यह था कि दोनों एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे।

     

    हर रक्षाबंधन पर मीरा सबसे पहले विवान की कलाई पर राखी बांधती।

     

    और विवान हर साल उसे चिढ़ाता,

     

    “इस बार क्या चाहिए? पहले ही बता दे, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

     

    मीरा हमेशा कहती,

     

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    विवान पूछता,

     

    “तो?”

     

    “बस कभी मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    विवान हंसते हुए कहता,

     

    “पगली, मैं कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    लेकिन एक साल रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले दोनों के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हो गया।

     

    विवान को एक दूसरे शहर में पढ़ाई के लिए जाना था।

     

    वह बहुत खुश था।

     

    लेकिन मीरा नाराज थी।

     

    “तुम हमेशा के लिए चले जाओगे।”

     

    विवान ने कहा,

     

    “पढ़ने जा रहा हूं, भाग नहीं रहा।”

     

    “लेकिन यहां से दूर।”

     

    “मीरा, जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता है।”

     

    मीरा ने गुस्से में कहा,

     

    “तो चले जाओ। मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    विवान चुप हो गया।

     

    “सच?”

     

    मीरा ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    “हां।”

     

    विवान ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    मीरा ने सुबह राखी खरीदी।

     

    लेकिन उसका गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था।

     

    विवान उसके कमरे के बाहर आया।

     

    “राखी नहीं बांधेगी?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    विवान कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “ठीक है।”

     

    मीरा ने सोचा था कि वह वापस आएगा।

     

    मनाएगा।

     

    मजाक करेगा।

     

    कहेगा कि वह गुस्सा छोड़ दे।

     

    लेकिन विवान चला गया।

     

    उस शाम उसे शहर के लिए निकलना था।

     

    मीरा ने खुद को रोक लिया।

     

    उसने सोचा,

     

    “जब जाना ही है तो मैं क्यों रोकूं?”

     

    विवान जाने से पहले माँ से मिला।

     

    पिता से मिला।

     

    फिर मीरा के कमरे के बाहर आकर रुका।

     

    “मीरा?”

     

    मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “मैं जा रहा हूं।”

     

    कमरे के अंदर बैठी मीरा की आंखें भर आईं।

     

    लेकिन उसने कहा,

     

    “जाओ।”

     

    कुछ सेकंड तक बाहर कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर उसके कदमों की आवाज दूर होती चली गई।

     

    मीरा ने दौड़कर दरवाजा खोला।

     

    लेकिन विवान जा चुका था।

     

    वह भागकर बाहर आई।

     

    गाड़ी सड़क के मोड़ से निकल रही थी।

     

    मीरा ने हाथ में राखी पकड़ रखी थी।

     

    लेकिन वह आवाज नहीं दे पाई।

     

    बस वहीं खड़ी रह गई।

     

    उसके बाद विवान कभी वापस नहीं आया।

     

    कुछ समय बाद परिवार को खबर मिली कि शहर में एक गंभीर घटना के बाद उससे संपर्क टूट गया था और वह लापता हो गया।

     

    कई साल तक तलाश चली।

     

    लेकिन कोई पता नहीं मिला।

     

    मीरा की जिंदगी वहीं रुक गई।

     

    उसे हमेशा लगता रहा—

     

    “अगर उस दिन मैंने उसे राखी बांध दी होती…”

     

    शारदा दादी ने उसकी आंखों के सामने हाथ हिलाया।

     

    “कहां खो गई?”

     

    मीरा वर्तमान में लौट आई।

     

    उसने राखी को हाथ में लिया।

     

    “दादी, मैंने आखिरी बार उसे बिना राखी के जाने दिया।”

     

    दादी ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन क्या तुझे लगता है कि उसने तुझे माफ नहीं किया होगा?”

     

    मीरा ने दुखी होकर कहा,

     

    “मैंने उसे बहुत बुरा कहा था।”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “भाई-बहन के रिश्ते में गुस्सा आखिरी बात नहीं होता।”

     

    मीरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी बाहर से किसी ने आवाज दी।

     

    “मीरा जी?”

     

    दरवाजे पर एक अधेड़ आदमी खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक छोटा बैग था।

     

    “आप मुझे नहीं जानतीं। मैं विवान का दोस्त था।”

     

    मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “विवान?”

     

    उस आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “आपको मेरे भाई के बारे में कुछ पता है?”

     

    आदमी ने बैग आगे कर दिया।

     

    “उसके पास कुछ चीजें थीं। बहुत सालों बाद ये सामान मेरे पास पहुंचा। मुझे आपका पता ढूंढने में समय लगा।”

     

    मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने बैग खोला।

     

    अंदर कुछ पुरानी किताबें थीं।

     

    एक पुरानी घड़ी।

     

    और एक छोटा डिब्बा।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    उसके अंदर…

     

    एक राखी थी।

     

    बहुत पुरानी।

     

    साथ में एक कागज रखा था।

     

    मीरा ने पढ़ा—

     

    “अगर मीरा कभी ये पढ़े तो उसे कहना कि मैं उससे नाराज नहीं था।

     

    उसने उस दिन राखी नहीं बांधी, लेकिन मैं जानता था कि वह मुझसे प्यार करती है।

     

    वह गुस्से में है, बस।

     

    अगर कभी वापस आया तो उससे जरूर राखी बंधवाऊंगा।

     

    और अगर नहीं आ पाया…

     

    तो उसे कहना कि मेरी कलाई पर राखी न सही, लेकिन मेरे दिल में हमेशा मेरी बहन का प्यार बंधा रहा।”

     

    मीरा के हाथ से कागज गिर गया।

     

    वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    दादी ने उसे संभाला।

     

    “देखा? उसने तुझे कभी छोड़ा ही नहीं था।”

     

    मीरा ने उस राखी को अपने हाथों में लिया।

     

    फिर अपनी पुरानी पेटी खोली।

     

    उसमें रखी राखी निकाली।

     

    दोनों राखियों को साथ रख दिया।

     

    एक राखी मीरा ने विवान के लिए खरीदी थी।

     

    एक विवान ने शायद उसके लिए संभालकर रखी थी।

     

    बारह साल बाद…

     

    दोनों राखियां एक साथ थीं।

     

    लेकिन कलाई अभी भी खाली थी।

     

    मीरा धीरे से बोली,

     

    “दादी, अब क्या करूं?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “जिस प्यार को तूने सालों से अधूरा समझा, उसे पूरा कर।”

     

    मीरा ने दोनों राखियां उठाईं।

     

    वह घर के उस कमरे में गई, जहां बचपन में विवान और वह खेलते थे।

     

    दीवार पर उसकी एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    मीरा ने तस्वीर के सामने बैठकर कहा,

     

    “भैया, उस दिन मैं बहुत गुस्से में थी।”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    “मैंने सोचा था आप मुझे मनाओगे।”

     

    उसने राखी तस्वीर के फ्रेम पर रख दी।

     

    “लेकिन मैं भूल गई कि हर बार किसी रिश्ते को दूसरा इंसान ही नहीं मनाता।”

     

    उसने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे भी आपको रोकना चाहिए था।”

     

    कुछ देर तक वह चुप रही।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराई।

     

    “लेकिन आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”

     

    उसने दोनों राखियों को तस्वीर के सामने रखा।

     

    “आज मैं आपको राखी नहीं बांध सकती… लेकिन आज से खुद को दोष देना छोड़ रही हूं।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “क्योंकि मुझे पता है… आप मुझसे नाराज नहीं थे।”

     

    मीरा ने तस्वीर को देखा।

     

    “और शायद… यही मेरी सबसे जरूरी राखी थी।”

     

    उस दिन शाम को शारदा दादी ने देखा कि मीरा घर के बाहर बैठी है।

     

    लेकिन इस बार उसकी गोद में लकड़ी की पेटी नहीं थी।

     

    मीरा ने दादी से कहा,

     

    “दादी, आज मैंने राखी बांधी।”

     

    दादी ने हैरानी से पूछा,

     

    “किसे?”

     

    मीरा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “उसे… जिससे मैंने कभी प्यार करना बंद ही नहीं किया।”

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    लेकिन इस बार उन आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था।

     

    एक अजीब-सी शांति भी थी।

     

    क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    कुछ राखियां कलाई पर नहीं बंधतीं।

     

    वे यादों में बंधती हैं।

     

    माफी में बंधती हैं।

     

    और उन रिश्तों में बंधती हैं…

     

    जिन्हें समय, दूरी और नाराज़गी भी खत्म नहीं कर पाती।

     

    उसकी राखी कभी विवान की कलाई तक नहीं पहुंची थी…

     

    लेकिन उसका प्यार हमेशा उसके भाई तक पहुंचता रहा।

  • मेरी बहन ने राखी नहीं खरीदी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    मेरी बहन ने राखी क्यों नहीं खरीदी?

    “माँ, इस साल दीदी ने मेरे लिए राखी खरीदी ही नहीं।”

     

    रोहन ने यह बात थोड़ी नाराज़गी और थोड़े दुख के साथ कही।

     

    माँ रसोई में खड़ी थीं। उन्होंने पलटकर अपने बेटे को देखा।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    रोहन ने मोबाइल एक तरफ रखते हुए कहा,

     

    “हर साल रक्षाबंधन से पहले वो मुझे फोन करके पूछती थी कि इस बार कौन-सी राखी पसंद है। इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।”

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    “शायद व्यस्त होगी।”

     

    रोहन ने तुरंत कहा,

     

    “दीदी कभी इतनी व्यस्त नहीं होती कि राखी भूल जाए।”

     

    उसकी आवाज में शिकायत थी।

     

    दरअसल, रोहन और उसकी बड़ी बहन काव्या का रिश्ता बहुत खास था।

     

    काव्या रोहन से सात साल बड़ी थी। बचपन से ही वह उसकी दूसरी माँ जैसी थी।

     

    जब रोहन छोटा था, काव्या ही उसे स्कूल के लिए तैयार करती।

     

    उसके जूते ढूंढती।

     

    होमवर्क करवाती।

     

    और जब वह रोता, तो माँ से पहले काव्या उसके पास पहुंचती।

     

    लेकिन पिछले दो सालों में काव्या की शादी हो गई थी।

     

    अब वह दूसरे शहर में रहती थी।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह सबसे पहले घर आती थी।

     

    रोहन हमेशा उसका इंतजार करता।

     

    लेकिन इस बार…

     

    रक्षाबंधन से तीन दिन पहले तक भी काव्या का कोई फोन नहीं आया था।

     

    रोहन ने खुद भी उसे फोन नहीं किया।

     

    उसने सोचा,

     

    “अगर दीदी को याद होगा, तो खुद फोन करेंगी।”

     

    लेकिन फोन नहीं आया।

     

    अगले दिन भी नहीं।

     

    रक्षाबंधन की सुबह रोहन देर तक सोता रहा।

     

    माँ ने कई बार आवाज लगाई।

     

    “रोहन, उठ जा बेटा।”

     

    “नहीं उठना।”

     

    “आज रक्षाबंधन है।”

     

    “तो?”

     

    माँ उसके पास बैठ गईं।

     

    “तू नाराज़ है?”

     

    रोहन ने करवट बदल ली।

     

    “नहीं।”

     

    माँ हल्का सा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे तो लग रहा है बहुत नाराज़ है।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “दीदी भूल गईं।”

     

    माँ ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।

     

    “हर बात के पीछे कोई वजह होती है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “इस बार उनकी कोई वजह नहीं सुननी।”

     

    माँ चुप हो गईं।

     

    दोपहर हो गई।

     

    रोहन बार-बार फोन देखने लगा।

     

    लेकिन कोई कॉल नहीं।

     

    शाम होने लगी।

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रोहन तेजी से उठा।

     

    उसे लगा काव्या होगी।

     

    लेकिन बाहर पड़ोस का एक बच्चा खड़ा था।

     

    उसने रोहन को एक छोटा-सा लिफाफा दिया।

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “किसने दिया?”

     

    बच्चा बोला,

     

    “एक दीदी ने।”

     

    रोहन ने तुरंत लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक छोटा-सा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “भैया, आज शाम 7 बजे पुराने पार्क में आ जाना। अकेले।”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “तुम्हारी बहन।”

     

    रोहन का गुस्सा अचानक कम होने लगा।

     

    लेकिन उसने सोचा,

     

    “अब याद आई राखी?”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “कहां जा रहा है?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “थोड़ी देर में आता हूं।”

     

    ठीक सात बजे वह पुराने पार्क पहुंच गया।

     

    पार्क में हल्का अंधेरा था।

     

    एक कोने में पीली रोशनी जल रही थी।

     

    वहां एक बेंच पर काव्या बैठी थी।

     

    रोहन को देखते ही वह खड़ी हो गई।

     

    उसके चेहरे पर थकान थी।

     

    रोहन उसके सामने जाकर रुक गया।

     

    “अब याद आई मैं?”

     

    काव्या मुस्कुराने की कोशिश करने लगी।

     

    “तुझे कभी भूली थी क्या?”

     

    “तो फोन क्यों नहीं किया?”

     

    “काम था।”

     

    रोहन नाराज़ हो गया।

     

    “बस? इतनी बड़ी वजह?”

     

    काव्या चुप रही।

     

    “और राखी?”

     

    रोहन ने पूछा।

     

    काव्या ने अपने बैग की तरफ देखा।

     

    “नहीं खरीदी।”

     

    रोहन का दिल टूट गया।

     

    “मतलब सच में भूल गईं?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    उसने बैग से एक छोटा-सा कपड़े का टुकड़ा निकाला।

     

    उस पर लाल धागे से कुछ बनाया गया था।

     

    रोहन ने ध्यान से देखा।

     

    वह राखी थी।

     

    बहुत साधारण।

     

    धागे से बनी हुई।

     

    बीच में छोटे-छोटे मोती लगे थे।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “ये आपने बनाई है?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आप तो हमेशा बाजार से सबसे सुंदर राखी लाती थीं।”

     

    काव्या की आंखें नम हो गईं।

     

    “इस बार बाजार जाने का समय नहीं मिला।”

     

    रोहन चुप हो गया।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने बैग से एक और चीज निकाली।

     

    एक छोटा-सा अस्पताल का बिल।

     

    रोहन ने उसे देखा।

     

    “ये किसका है?”

     

    काव्या ने कहा,

     

    “मेरा नहीं।”

     

    “फिर किसका?”

     

    “माँ का।”

     

    रोहन का चेहरा बदल गया।

     

    “माँ?”

     

    “कुछ दिनों पहले उनकी तबीयत खराब हुई थी। उन्होंने तुझसे छिपाया क्योंकि तेरी परीक्षाएं थीं।”

     

    रोहन स्तब्ध रह गया।

     

    “लेकिन आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    काव्या ने कहा,

     

    “क्योंकि तू परेशान हो जाता।”

     

    रोहन को अचानक याद आया।

     

    पिछले कई दिनों से माँ उससे कह रही थीं—

     

    “तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।”

     

    अब उसे सब समझ आने लगा।

     

    काव्या ने कहा,

     

    “मैं पिछले तीन दिनों से शहर में थी। माँ के इलाज और बाकी काम में लगी थी।”

     

    रोहन की आंखें भर आईं।

     

    “और आपने मुझे बताया भी नहीं।”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “बड़ी बहन होने की एक बीमारी होती है।”

     

    “क्या?”

     

    “छोटे भाई को परेशान नहीं होने देती।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन मैं अब छोटा नहीं हूं, दीदी।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मेरे लिए हमेशा रहेगा।”

     

    रोहन चुप हो गया।

     

    काव्या ने राखी उठाई।

     

    “बांध दूं?”

     

    रोहन ने तुरंत अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    काव्या के हाथ कांप रहे थे।

     

    राखी बांधते हुए उसने कहा,

     

    “मुझे लगा था इस बार शायद तू मुझसे नाराज़ रहेगा।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “था।”

     

    “अब?”

     

    “अब भी हूं।”

     

    काव्या उसे देखने लगी।

     

    रोहन ने पहली बार मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “क्योंकि आपने मुझे इतना बड़ा समझा ही नहीं कि सच बता सकें।”

     

    काव्या की आंखों में आंसू के साथ मुस्कान आ गई।

     

    “तो माफ कर दे।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “एक शर्त पर।”

     

    “क्या?”

     

    “अगली बार कुछ भी हो, मुझसे छिपाना नहीं।”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “वादा?”

     

    काव्या ने अपनी उंगली आगे की।

     

    “वादा।”

     

    रोहन ने अचानक पूछा,

     

    “दीदी, आपने मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं खरीदा?”

     

    काव्या ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “इस बार नहीं।”

     

    रोहन ने बनावटी दुख दिखाया।

     

    “वाह! राखी भी हाथ से बनी और गिफ्ट भी नहीं।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “बहुत बुरे भाई हो तुम।”

     

    “और आप बहुत बुरी बहन हैं।”

     

    दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।

     

    फिर अचानक रोहन ने अपनी बहन को गले लगा लिया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए दीदी।”

     

    काव्या ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “सच?”

     

    “हां।”

     

    रोहन ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छुआ।

     

    “बस अगली बार मुझे भूलना मत।”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “तू मेरे लिए सांस लेने जैसा है। कोई अपनी सांस भूल सकता है क्या?”

     

    रोहन की आंखें फिर भर आईं।

     

    कुछ देर बाद दोनों घर लौट आए।

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    रोहन ने उन्हें देखते ही कहा,

     

    “माँ, आप दोनों ने मुझे बच्चा समझ रखा है क्या?”

     

    माँ और काव्या एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “तुझे पता चल गया?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    फिर वह माँ के पास गया।

     

    “अगली बार मुझसे कुछ छिपाया तो मैं सच में नाराज़ हो जाऊंगा।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब नहीं छिपाएंगे।”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “पक्का?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “पक्का।”

     

    उस रात रोहन अपने कमरे में बैठा अपनी कलाई की तरफ देख रहा था।

     

    वह राखी बहुत साधारण थी।

     

    न उसमें सोने की चमक थी।

     

    न महंगे पत्थर।

     

    न बाजार जैसी सजावट।

     

    लेकिन रोहन को लगा कि उसने जिंदगी की सबसे कीमती राखी पहनी है।

     

    क्योंकि उस राखी को खरीदने के लिए बहन के पास समय नहीं था…

     

    लेकिन भाई के लिए अपने हाथों से बनाने का प्यार जरूर था।

     

    अगले दिन काव्या वापस अपने घर जाने लगी।

     

    रोहन ने दरवाजे पर उसे रोक लिया।

     

    “दीदी!”

     

    “हां?”

     

    उसने कहा,

     

    “अगले साल मुझे कौन-सी राखी बांधोगी?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “तुझे कौन-सी चाहिए?”

     

    रोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखते हुए कहा,

     

    “ऐसी ही।”

     

    “इतनी साधारण?”

     

    रोहन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “फिर कैसी?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “जिसे बनाने में बाजार के पैसे नहीं, मेरी बहन का दिल लगा हो।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    बस मुस्कुराई और अपने भाई के सिर पर हाथ रख दिया।

     

    और उस दिन रोहन को समझ आया—

     

    हर राखी की कीमत उसके धागे से नहीं होती।

     

    कुछ राखियां इसलिए सबसे कीमती होती हैं…

     

    क्योंकि उन्हें बांधने वाला इंसान हमें बिना बताए भी हमारी फिक्र करता रहता है।

  • बहन ने राखी तो बाँधी… लेकिन भाई की कलाई हमेशा के लिए खाली रह गई”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रक्षाबंधन की सुबह थी।

     

    पूरे शहर में खुशियों का माहौल था। कहीं बहनें अपने भाइयों के लिए राखियाँ खरीद रही थीं, तो कहीं भाई अपनी बहनों के लिए मिठाई और उपहार लेकर घर लौट रहे थे।

     

    लेकिन शहर के एक छोटे-से मोहल्ले में 24 साल की नंदिनी खिड़की के पास बैठी थी।

     

    उसके हाथ में एक राखी थी।

     

    वही राखी, जो उसने पिछले साल अपने भाई आकाश के लिए खरीदी थी।

     

    आकाश अब इस दुनिया में नहीं था।

     

    नंदिनी की आँखें राखी पर टिकी थीं और होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान थी।

     

    “तू होता ना आकाश… तो आज फिर मुझे चिढ़ाता कि इतनी महंगी राखी क्यों लाई?”

     

    आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    चार साल पहले तक नंदिनी और आकाश का रिश्ता बिल्कुल सामान्य भाई-बहन जैसा था।

     

    दोनों हर छोटी बात पर लड़ते थे।

     

    आकाश नंदिनी की चॉकलेट खा जाता था।

     

    नंदिनी उसकी किताबें छुपा देती थी।

     

    आकाश कहता—

     

    “तुम्हारी शादी हो जाएगी ना, तब देखना… तुम्हें तुम्हारा भाई याद आएगा।”

     

    नंदिनी हँसकर कहती—

     

    “पहले खुद कमाना सीख ले, फिर मेरी रक्षा करना।”

     

    आकाश मुस्कुरा देता।

     

    “पैसे नहीं होंगे तो क्या हुआ… जान तो है ना।”

     

    नंदिनी तब हँस देती थी।

     

    उसे क्या पता था कि एक दिन यही शब्द उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन जाएंगे।

     

    आकाश पढ़ाई में बहुत अच्छा था।

     

    उसका सपना था कि वह सरकारी नौकरी करेगा और अपनी माँ और बहन को एक अच्छा घर देगा।

     

    पिता पहले ही गुजर चुके थे।

     

    घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे आकाश के कंधों पर आ गई थी।

     

    दिन में पढ़ाई और रात में एक छोटी-सी दुकान पर काम।

     

    कई बार नंदिनी कहती—

     

    “भैया, इतनी मेहनत मत किया करो। थोड़ा आराम भी कर लिया करो।”

     

    आकाश हँसकर जवाब देता—

     

    “आराम गरीबों के लिए नहीं होता पगली… पहले जिंदगी बदलेंगे, फिर आराम करेंगे।”

     

    रक्षाबंधन का दिन आया।

     

    नंदिनी ने आकाश के लिए राखी बाँधी।

     

    आकाश ने जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    “ये तेरे लिए।”

     

    नंदिनी ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक छोटी-सी चाँदी की अंगूठी थी।

     

    नंदिनी की आँखें चमक उठीं।

     

    “इतने पैसे कहाँ से आए?”

     

    आकाश ने मजाक में कहा—

     

    “चोरी की है।”

     

    “सच बताओ।”

     

    आकाश कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “दो महीने से रोज दो घंटे ज्यादा काम कर रहा था।”

     

    नंदिनी ने अंगूठी वापस करने की कोशिश की।

     

    “मुझे नहीं चाहिए।”

     

    आकाश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बहन को दिया हुआ तोहफा वापस नहीं लेते।”

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “और हाँ… एक वादा कर।”

     

    “क्या?”

     

    “तू अपनी पढ़ाई कभी मत छोड़ना।”

     

    नंदिनी ने हँसते हुए कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    आकाश बोला—

     

    “नहीं। राखी की कसम खा।”

     

    नंदिनी ने उसकी कलाई पकड़कर कहा—

     

    “राखी की कसम… मैं पढ़ाई नहीं छोड़ूँगी।”

     

    अगले कुछ महीने सब ठीक चला।

     

    फिर एक रात आकाश दुकान से घर लौट रहा था।

     

    बारिश बहुत तेज थी।

     

    सड़क पर एक तेज रफ्तार ट्रक आया।

     

    एक पल…

     

    बस एक पल…

     

    और आकाश की जिंदगी खत्म हो गई।

     

    घर का दरवाजा खुला।

     

    लोगों की भीड़ थी।

     

    माँ चीख रही थीं।

     

    नंदिनी पत्थर बनकर खड़ी थी।

     

    उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

     

    उसने आकाश का हाथ पकड़ा।

     

    कलाई पर पिछले रक्षाबंधन की राखी अभी भी बंधी हुई थी।

     

    नंदिनी फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “भैया उठो ना…”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    “तुमने कहा था ना… तुम मेरी रक्षा करोगे…”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

     

    उस दिन के बाद नंदिनी की जिंदगी बदल गई।

     

    उसने पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

     

    उसे लगा अब जीने का कोई मतलब नहीं।

     

    लेकिन एक रात उसे आकाश की अलमारी से एक डायरी मिली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मैं कभी तेरे साथ नहीं रहूँ, तो रोना मत। बस इतना याद रखना कि तेरे सपने अब मेरी जिम्मेदारी हैं।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    नीचे एक और लाइन लिखी थी—

     

    “जिस दिन तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी, उस दिन समझूँगा कि मैंने अपनी बहन की रक्षा कर दी।”

     

    नंदिनी ने डायरी सीने से लगा ली।

     

    अगले दिन से उसने फिर पढ़ाई शुरू कर दी।

     

    लोग बातें करते रहे।

     

    “लड़की है, कितना पढ़ेगी?”

     

    “अब घर संभालना चाहिए।”

     

    “भाई भी नहीं है… कौन सहारा देगा?”

     

    नंदिनी हर बात सुनती।

     

    और चुपचाप पढ़ती रहती।

     

    दिन में कॉलेज।

     

    शाम को बच्चों को ट्यूशन।

     

    रात में पढ़ाई।

     

    कई बार भूखी सोई।

     

    कई बार फीस भरने के पैसे नहीं थे।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    तीन साल बाद उसका सरकारी नौकरी में चयन हो गया।

     

    जिस दिन नियुक्ति पत्र उसके हाथ में आया, वह सीधे आकाश की तस्वीर के सामने गई।

     

    उसने तस्वीर के पास एक राखी रखी।

     

    और बोली—

     

    “भैया… आज मैंने अपना वादा पूरा कर दिया।”

     

    उसकी माँ पीछे खड़ी रो रही थीं।

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “अब मुझे किसी की दया नहीं चाहिए माँ। भैया ने सिखाया था कि जिंदगी चाहे कितनी भी दर्द दे… इंसान को अपने सपनों से रिश्ता नहीं तोड़ना चाहिए।”

     

    रक्षाबंधन फिर आया।

     

    इस बार नंदिनी ने अपनी कलाई पर खुद राखी बाँधी।

     

    लोगों ने पूछा—

     

    “अपने हाथ पर राखी क्यों?”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि अब मुझे अपने सपनों की रक्षा खुद करनी है।”

     

    उस दिन उसे समझ आया—

     

    राखी सिर्फ भाई की कलाई पर बंधा धागा नहीं होती।

     

    वह एक वादा होती है।

     

    और कभी-कभी…

     

    वह वादा किसी इंसान के चले जाने के बाद भी जिंदा रहता है।

     

    सीख:

    जिसे हम खो देते हैं, वह हमेशा हमारे साथ नहीं रहता… लेकिन उसकी कही हुई अच्छी बातें हमारे अंदर हमेशा जिंदा रह सकती हैं। जिंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, अपने सपनों को मरने मत देना। क्योंकि आपकी सफलता ही कभी-कभी आपके अपनों के अधूरे सपनों को पूरा करती है।

  • जीवनभर का भाई

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    जिसे राखी बांधी, वही जीवनभर का भाई बन गया

    “दीदी, आप हर साल इस पेड़ के नीचे राखी लेकर क्यों बैठती हैं?”

     

    बारह साल के छोटे से लड़के ने सृष्टि से पूछा।

     

    सृष्टि ने सामने सड़क की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

     

    “क्योंकि शायद किसी दिन मेरा भाई यहीं से गुजरे।”

     

    लड़का हैरान होकर बोला,

     

    “लेकिन आपने तो कहा था कि आपका कोई भाई नहीं है।”

     

    सृष्टि ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखा।

     

    “हां… मेरा कोई भाई नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    सृष्टि कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “हर भाई जन्म से नहीं मिलता।”

     

    यह बात कहकर वह फिर सड़क की तरफ देखने लगी।

     

    सृष्टि की उम्र चौबीस साल थी। वह एक छोटे से स्कूल में पढ़ाती थी। घर में उसकी माँ थीं और दोनों का जीवन साधारण था।

     

    बचपन से सृष्टि का कोई भाई नहीं था।

     

    रक्षाबंधन के दिन जब उसकी सहेलियां अपने भाइयों के लिए राखियां खरीदतीं, तो वह चुपचाप उनके साथ बाजार चली जाती।

     

    एक बार उसकी माँ ने पूछा था,

     

    “तुझे बुरा लगता है कि तेरा भाई नहीं है?”

     

    सृष्टि ने मुस्कुराकर कहा था,

     

    “नहीं माँ।”

     

    लेकिन उसके कमरे में एक खाली डिब्बा था।

     

    उस डिब्बे में वह हर साल एक राखी रखती थी।

     

    उसका कहना था—

     

    “किसी दिन कोई भाई जरूर मिलेगा।”

     

    माँ उसकी बात सुनकर हंस देती थीं।

     

    लेकिन सृष्टि सच में ऐसा मानती थी।

     

    उस साल रक्षाबंधन से एक दिन पहले स्कूल से लौटते समय उसने सड़क किनारे एक युवक को बैठा देखा।

     

    उसके कपड़े साधारण थे।

     

    चेहरे पर थकान थी।

     

    वह अपने हाथ में एक पुरानी तस्वीर पकड़े हुए था।

     

    सृष्टि आगे बढ़ गई।

     

    फिर अचानक उसके कदम रुक गए।

     

    उस युवक की आंखों में आंसू थे।

     

    सृष्टि वापस उसके पास गई।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    युवक ने जल्दी से तस्वीर छिपा ली।

     

    “हां।”

     

    “आपको देखकर नहीं लग रहा।”

     

    युवक ने हल्की-सी हंसी के साथ कहा,

     

    “कभी-कभी ठीक दिखने के लिए बस हां बोलना पड़ता है।”

     

    सृष्टि चुप हो गई।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “कुछ मदद चाहिए?”

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    युवक ने सिर हिला दिया।

     

    सृष्टि जाने लगी।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर गिरे कागज पर पड़ी।

     

    वह एक अस्पताल की पर्ची थी।

     

    उसने उसे उठाकर युवक को देते हुए कहा,

     

    “आपका कागज गिर गया।”

     

    युवक ने पर्ची ली।

     

    फिर बोला,

     

    “धन्यवाद।”

     

    सृष्टि ने पूछा,

     

    “घर कहां है आपका?”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “अब कोई घर नहीं है।”

     

    सृष्टि को उसकी बात अजीब लगी।

     

    लेकिन उसने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    अगली सुबह रक्षाबंधन था।

     

    सृष्टि हमेशा की तरह तैयार हुई।

     

    उसने अपने डिब्बे से एक राखी निकाली।

     

    फिर वही पेड़।

     

    वही सड़क।

     

    लेकिन इस बार वहां वही युवक बैठा था।

     

    सृष्टि उसके पास गई।

     

    “आप फिर यहां?”

     

    वह बोला,

     

    “शायद यहां बैठने से कुछ पुरानी बातें याद आती हैं।”

     

    सृष्टि उसके पास बैठ गई।

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “आपका नाम?”

     

    “अमन।”

     

    “मैं सृष्टि।”

     

    अमन ने उसकी थाली की तरफ देखा।

     

    “आज तो राखी है।”

     

    “हां।”

     

    “भाई कहां है?”

     

    सृष्टि मुस्कुराई।

     

    “पता नहीं।”

     

    अमन ने हैरानी से पूछा,

     

    “मतलब?”

     

    सृष्टि ने कहा,

     

    “मैं हर साल एक राखी खरीदती हूं।”

     

    “किसके लिए?”

     

    “जिसे अभी तक नहीं मिली।”

     

    अमन कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर अपनी कलाई पर गई।

     

    “तो आज भी किसी का इंतजार कर रही हो?”

     

    सृष्टि ने कहा,

     

    “शायद।”

     

    अमन ने धीरे से कहा,

     

    “अगर तुम्हें बुरा न लगे… तो क्या मैं एक बात पूछ सकता हूं?”

     

    “पूछिए।”

     

    “अगर कोई भाई खून से नहीं जुड़ा हो, तो क्या उसे राखी बांधी जा सकती है?”

     

    सृष्टि ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

     

    “क्यों नहीं?”

     

    अमन ने धीरे से अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    सृष्टि के हाथ रुक गए।

     

    “आप सच में?”

     

    अमन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आज मेरे पास कोई नहीं है। शायद तुम्हारे पास भी नहीं।”

     

    उसकी आवाज धीमी हो गई।

     

    “तो क्यों न आज हम दोनों इस खालीपन को एक रिश्ता बना दें?”

     

    सृष्टि की आंखें भर आईं।

     

    उसने कहा,

     

    “लेकिन भाई बनने के बाद निभाना भी पड़ेगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं निभाऊंगा।”

     

    सृष्टि ने उसके माथे पर तिलक लगाया।

     

    फिर धीरे से उसकी कलाई पर राखी बांध दी।

     

    “आज से आप मेरे भाई।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और आज से तू मेरी बहन।”

     

    सृष्टि मुस्कुराई।

     

    लेकिन राखी बांधने के बाद उसकी नजर अमन के हाथ में रखी तस्वीर पर गई।

     

    तस्वीर जमीन पर गिर गई थी।

     

    सृष्टि ने उसे उठाया।

     

    तस्वीर में एक महिला और एक छोटा बच्चा था।

     

    उसने पूछा,

     

    “ये कौन हैं?”

     

    अमन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मेरी माँ और मैं।”

     

    “कहां हैं वो?”

     

    अमन की आंखें भर आईं।

     

    “माँ अब नहीं हैं।”

     

    सृष्टि धीरे से बोली,

     

    “मुझे माफ कीजिए।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    कुछ देर बाद उसने कहा,

     

    “मैं पिछले कई दिनों से अस्पताल के चक्कर लगा रहा था।”

     

    सृष्टि ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने बताया कि उसकी माँ की पुरानी चीजों में एक पत्र मिला था, जिसमें लिखा था कि अमन की एक छोटी बहन थी, जो बचपन में परिवार की मुश्किल परिस्थितियों के कारण रिश्तेदारों के पास चली गई थी।

     

    अमन सालों से उसे ढूंढ रहा था।

     

    लेकिन उसे कोई सुराग नहीं मिला।

     

    सृष्टि चुप हो गई।

     

    अमन ने कहा,

     

    “आज सोच रहा था कि शायद मैं कभी अपनी बहन को ढूंढ ही नहीं पाऊंगा।”

     

    सृष्टि ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो आपने उसे ढूंढना छोड़ दिया?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर रो क्यों रहे थे?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि कभी-कभी उम्मीद भी थक जाती है।”

     

    सृष्टि ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “तो आज से उम्मीद अकेली नहीं है।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मतलब अब आपकी बहन आपको ढूंढने में मदद करेगी।”

     

    अमन की आंखों में पहली बार चमक आई।

     

    “सच?”

     

    “भाई से वादा किया है।”

     

    उस दिन से दोनों ने मिलकर अमन की बहन को ढूंढना शुरू किया।

     

    कई पुराने पते।

     

    पुराने रिश्तेदार।

     

    पुराने कागज।

     

    कई जगह निराशा मिली।

     

    लेकिन सृष्टि हर बार कहती,

     

    “भैया, अभी हार नहीं मानेंगे।”

     

    अमन मुस्कुराता।

     

    “तू मुझे सच में भाई मानने लगी है?”

     

    सृष्टि कहती,

     

    “राखी बांध दी है, अब वापस नहीं ले सकती।”

     

    समय बीत गया।

     

    एक दिन दोनों को आखिरकार एक पता मिला।

     

    वे वहां पहुंचे।

     

    दरवाजा खुला।

     

    सामने लगभग बीस साल की एक लड़की खड़ी थी।

     

    अमन के हाथ कांपने लगे।

     

    उसके पास बचपन की एक तस्वीर थी।

     

    लड़की ने तस्वीर देखी।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “अमन भैया?”

     

    अमन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने बहन को गले लगा लिया।

     

    सृष्टि कुछ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी आंखों से भी आंसू निकल रहे थे।

     

    अमन की बहन ने पूछा,

     

    “ये कौन हैं?”

     

    अमन ने सृष्टि की तरफ देखा।

     

    फिर कहा,

     

    “ये?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “ये मेरी बहन है।”

     

    सृष्टि हंस पड़ी।

     

    “एक नहीं, दो-दो बहनें?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “शायद भगवान को लगा मैं बहुत अकेला हो गया था।”

     

    उस रक्षाबंधन के कुछ महीने बाद फिर राखी आई।

     

    इस बार सृष्टि के हाथ में राखी थी।

     

    लेकिन वह पेड़ के नीचे अकेली नहीं बैठी थी।

     

    उसके सामने अमन और उसकी असली बहन दोनों बैठे थे।

     

    सृष्टि ने अमन की कलाई पर राखी बांधी।

     

    अमन ने कहा,

     

    “याद है तूने कहा था किसी दिन कोई भाई जरूर मिलेगा?”

     

    सृष्टि मुस्कुराई।

     

    “हां।”

     

    “मिला?”

     

    सृष्टि ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

     

    “मिल गया।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “लेकिन मैं तेरा असली भाई नहीं हूं।”

     

    सृष्टि ने धीरे से जवाब दिया,

     

    “कुछ रिश्तों को असली साबित करने के लिए खून की जरूरत नहीं होती।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    सृष्टि ने कहा,

     

    “जरूरत होती है बस निभाने की।”

     

    उस दिन उस पेड़ के नीचे सृष्टि का पुराना राखियों वाला डिब्बा भी रखा था।

     

    लेकिन अब उसमें कोई नई राखी नहीं रखी गई।

     

    क्योंकि जिस भाई का वह सालों से इंतजार कर रही थी…

     

    वह आखिरकार उसे मिल गया था।

     

    और वह रिश्ता खून से नहीं, एक राखी के धागे और निभाने के वादे से बना था।

  • राखी जो भाई के बंधी नहीं

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “माँ, इस बार मैं आर्यन भैया को राखी नहीं बांधूंगी।”

     

    सुबह-सुबह नैना की यह बात सुनकर माँ के हाथ रुक गए।

     

    रसोई में कुछ पल के लिए बिल्कुल शांति छा गई।

     

    माँ ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या कहा तूने?”

     

    नैना ने अपनी नजरें झुका लीं।

     

    “मैंने कहा, इस बार मैं उन्हें राखी नहीं बांधूंगी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    नैना की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “क्योंकि शायद अब उन्हें मेरी जरूरत ही नहीं है।”

     

    माँ कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    “ऐसा क्या हो गया?”

     

    नैना ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह अपना बैग उठाकर कमरे में चली गई।

     

    बिस्तर पर बैठते ही उसकी नजर सामने रखी राखी पर गई।

     

    उसने वह राखी कई दिन पहले खरीदी थी।

     

    बहुत सोच-समझकर।

     

    आर्यन को हमेशा साधारण चीजें पसंद थीं, इसलिए उसने एक सुंदर लेकिन सादी राखी चुनी थी।

     

    लेकिन अब वह राखी मेज पर पड़ी थी।

     

    अनछुई।

     

    नैना और आर्यन के बीच कभी ऐसा रिश्ता नहीं था कि दोनों एक-दूसरे से बातें छिपाएं।

     

    आर्यन उससे पांच साल बड़ा था।

     

    बचपन में दोनों बहुत लड़ते थे।

     

    नैना उसकी किताबें छिपा देती।

     

    आर्यन उसकी चॉकलेट खा जाता।

     

    नैना शिकायत करती,

     

    “माँ! भैया ने मेरी चॉकलेट खा ली।”

     

    आर्यन तुरंत कहता,

     

    “इसने मेरी किताब फाड़ी है।”

     

    फिर माँ दोनों को डांटतीं और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर हंस रहे होते।

     

    लेकिन पिछले एक साल से सब बदल गया था।

     

    आर्यन की नौकरी लग गई थी।

     

    वह घर से दूर नहीं रहता था, लेकिन उसका समय बदल गया था।

     

    सुबह जल्दी निकलता।

     

    रात को देर से आता।

     

    घर आकर भी अक्सर फोन और काम में व्यस्त रहता।

     

    नैना को धीरे-धीरे लगने लगा कि उसका भाई बदल गया है।

     

    पहले वह उसकी हर बात सुनता था।

     

    अब वह अक्सर कहता,

     

    “नैना, बाद में बात करना।”

     

    पहले वह उसे बाजार ले जाता था।

     

    अब कहता,

     

    “तू माँ के साथ चली जाना।”

     

    पहले रक्षाबंधन से एक हफ्ता पहले ही वह पूछना शुरू कर देता था—

     

    “इस बार क्या चाहिए?”

     

    लेकिन इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।

     

    नैना को सबसे ज्यादा दुख उस दिन हुआ जब उसने भाई को किसी से फोन पर बात करते सुना।

     

    “हां, इस बार रक्षाबंधन पर मैं शायद घर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    नैना दरवाजे के बाहर खड़ी थी।

     

    उसका दिल जैसे बैठ गया।

     

    उसने कमरे में जाकर खुद को बंद कर लिया।

     

    आर्यन ने शायद उसे जाते हुए नहीं देखा।

     

    उस दिन से नैना ने उससे बात करना कम कर दिया।

     

    आर्यन ने भी ज्यादा नहीं पूछा।

     

    और यही बात नैना को सबसे ज्यादा चुभती थी।

     

    “उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    रक्षाबंधन की सुबह आर्यन जल्दी तैयार होकर घर से निकलने लगा।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “इतनी सुबह कहां जा रहा है?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “थोड़ा जरूरी काम है।”

     

    नैना कमरे से बाहर आई।

     

    उसने भाई की तरफ देखा तक नहीं।

     

    आर्यन कुछ पल उसके सामने खड़ा रहा।

     

    “नैना…”

     

    “हां?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    वह चला गया।

     

    नैना के गुस्से की आखिरी दीवार भी टूट गई।

     

    उसने मन ही मन कहा,

     

    “आज के दिन भी इन्हें मेरी परवाह नहीं है।”

     

    पूरा दिन बीत गया।

     

    दोपहर हुई।

     

    शाम होने लगी।

     

    आर्यन घर नहीं आया।

     

    माँ बार-बार फोन कर रही थीं।

     

    लेकिन उसका फोन बंद था।

     

    नैना के अंदर गुस्सा था, लेकिन अब उसके साथ चिंता भी जुड़ गई थी।

     

    वह खुद से कह रही थी,

     

    “आएं या ना आएं, मुझे क्या फर्क पड़ता है।”

     

    लेकिन हर कुछ मिनट बाद दरवाजे की तरफ देखने लगती।

     

    शाम को माँ ने कहा,

     

    “तू राखी की थाली तैयार कर ले।”

     

    नैना ने कहा,

     

    “मैंने कहा ना माँ, मुझे नहीं बांधनी।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “गुस्सा रिश्तों से बड़ा नहीं होता बेटा।”

     

    नैना ने पहली बार तेज आवाज में कहा,

     

    “लेकिन रिश्ते भी तो दोनों तरफ से निभाए जाते हैं!”

     

    माँ चुप हो गईं।

     

    नैना की आंखें भर आईं।

     

    “मैं हमेशा उनके लिए इंतजार करती रही। लेकिन अब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    नैना का दिल जोर से धड़का।

     

    वह तेजी से दरवाजे तक गई।

     

    सामने आर्यन नहीं था।

     

    एक डिलीवरी वाला खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था।

     

    “नैना जी?”

     

    “हां।”

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    नैना ने हैरानी से पैकेट लिया।

     

    ऊपर भेजने वाले का नाम लिखा था—

     

    आर्यन।

     

    उसने जल्दी से पैकेट खोला।

     

    अंदर एक सुंदर-सा लकड़ी का फ्रेम था।

     

    उसमें उसकी बचपन से लेकर कॉलेज तक की तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर में वह स्कूल की ड्रेस में थी।

     

    दूसरी में भाई के कंधे पर बैठी थी।

     

    तीसरी में दोनों लड़ रहे थे।

     

    और आखिरी तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन, जिसके बिना मेरा घर घर नहीं लगता।”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    पैकेट में एक छोटा-सा कार्ड भी था।

     

    उसने पढ़ा—

     

    “नैना,

     

    मुझे पता है पिछले कुछ महीनों से मैं बदल गया हूं।

     

    लेकिन ऐसा नहीं कि तू मेरे लिए कम जरूरी हो गई है।

     

    मैं बस एक ऐसी चीज में व्यस्त था, जिसे तुझे बताना नहीं चाहता था जब तक पूरा न कर लूं।

     

    आज सुबह मैं उसी काम से गया हूं।

     

    अगर मैं देर से आऊं तो नाराज मत होना।

     

    तेरा—

     

    आर्यन भैया।”

     

    नैना ने कार्ड सीने से लगा लिया।

     

    “माँ… ये क्या है?”

     

    माँ ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मुझे भी नहीं पता।”

     

    रात होने लगी।

     

    नैना अब पहले से ज्यादा परेशान थी।

     

    तभी बाहर किसी गाड़ी की आवाज आई।

     

    दरवाजा खुला।

     

    आर्यन अंदर आया।

     

    उसके कपड़े धूल से भरे थे और चेहरा थका हुआ था।

     

    नैना ने गुस्से में पूछा,

     

    “कहां थे आप?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तेरे लिए।”

     

    “मतलब?”

     

    उसने नैना के हाथ में एक चाबी रख दी।

     

    नैना ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये किसकी है?”

     

    आर्यन उसे बाहर ले गया।

     

    घर के सामने एक छोटी-सी स्कूटी खड़ी थी।

     

    नैना की आंखें फैल गईं।

     

    “भैया…!”

     

    वह महीनों से कॉलेज आने-जाने के लिए स्कूटी लेना चाहती थी।

     

    लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं थी कि माँ तुरंत खरीद सकें।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैं पिछले कई महीनों से इसके लिए पैसे बचा रहा था।”

     

    नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “लेकिन आपने मुझसे बातें करना क्यों कम कर दीं?”

     

    आर्यन कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि अगर मैं तुझसे बात करता तो तू पूछती कि मैं इतना काम क्यों कर रहा हूं।”

     

    “तो आप बता देते।”

     

    “फिर सरप्राइज कैसे रहता?”

     

    नैना रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “आपको पता है मैंने क्या सोचा?”

     

    “क्या?”

     

    “कि अब आपको मेरी जरूरत नहीं।”

     

    आर्यन का चेहरा बदल गया।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “पगली… बहन की जरूरत कभी खत्म होती है क्या?”

     

    नैना ने पूछा,

     

    “तो आप इतने दूर क्यों हो गए थे?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “दूर नहीं हुआ था। बस कुछ दिनों के लिए चुप हो गया था।”

     

    उसने अपनी कलाई आगे की।

     

    “लेकिन लगता है मेरी चुप्पी की सजा मिल गई।”

     

    नैना ने उसकी कलाई देखी।

     

    “क्या?”

     

    “इस बार राखी नहीं बांधेगी ना?”

     

    नैना कुछ पल चुप रही।

     

    फिर वह अंदर दौड़ी।

     

    मेज पर रखी राखी उठाई।

     

    जब वह वापस आई तो उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मैं जानता था तू राखी खरीदेगी।”

     

    नैना ने कहा,

     

    “और मैं जानती थी आप आओगे।”

     

    “सच?”

     

    “नहीं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    नैना ने भाई के माथे पर तिलक लगाया।

     

    राखी बांधते समय उसने कहा,

     

    “भैया, अगली बार अगर कोई सरप्राइज देना हो ना… तो इतना दूर मत हो जाना।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “और तू अगली बार बिना पूरी बात जाने फैसला मत कर लेना।”

     

    “पक्का नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं आपकी बहन हूं।”

     

    आर्यन हंस पड़ा।

     

    “ये तो कभी नहीं बदलेगा।”

     

    राखी बंधने के बाद नैना ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “भैया, आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं राखी इसलिए नहीं बांधती कि आप मुझे महंगे गिफ्ट दो।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तो?”

     

    नैना ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “मैं राखी इसलिए बांधती हूं क्योंकि मुझे पता है कि चाहे हम कितना भी लड़ें… दुनिया कितनी भी बदल जाए… मेरे लिए एक इंसान हमेशा मेरा रहेगा।”

     

    आर्यन की आंखें भर आईं।

     

    “और वो कौन?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मेरा परेशान करने वाला, बातूनी और कभी-कभी बहुत ज्यादा चुप रहने वाला भाई।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “और तू मेरी सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी ताकत।”

     

    उस रात नैना ने अपनी डायरी में लिखा—

     

    “आज मैंने समझा कि कभी-कभी रिश्तों में दूरी प्यार खत्म होने से नहीं आती। कभी-कभी हम बिना पूछे अपने मन में जवाब बना लेते हैं। और एक छोटी-सी राखी हमें याद दिलाती है कि कुछ रिश्तों को समझने के लिए गुस्से से ज्यादा बातचीत जरूरी होती है।”

     

    और इस बार…

     

    वह राखी, जो नैना ने सुबह भाई को नहीं बांधने का फैसला किया था…

     

    रात तक उसकी कलाई पर सबसे मजबूती से बंधी हुई थी।

  • अधूरी राखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “मैडम, ये राखी आप किसके लिए खरीद रही हैं?”

     

    दुकानदार के सवाल पर सोनम कुछ पल चुप रही।

     

    उसकी नजर सामने सजी रंग-बिरंगी राखियों पर थी। हर राखी चमक रही थी, लेकिन उसकी आंखें एक बहुत साधारण-सी लाल धागे वाली राखी पर टिक गईं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “उस भाई के लिए… जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।”

     

    दुकानदार हैरानी से उसे देखने लगा।

     

    सोनम ने राखी खरीदी और अपने बैग में रख ली।

     

    वह हर साल ऐसा करती थी।

     

    लेकिन इस बार उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    सोनम को बचपन से यही बताया गया था कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। उसका कोई भाई या बहन नहीं था।

     

    लेकिन जब वह लगभग दस साल की थी, तब उसने घर के पुराने संदूक में एक तस्वीर देखी थी।

     

    तस्वीर में उसकी माँ दो छोटे बच्चों के साथ बैठी थीं।

     

    एक बच्ची सोनम थी।

     

    दूसरा बच्चा एक लड़का था।

     

    सोनम ने माँ से पूछा था,

     

    “ये कौन है?”

     

    माँ ने तस्वीर उसके हाथ से ले ली और बस इतना कहा,

     

    “पुरानी बात है, इसे भूल जाओ।”

     

    लेकिन सोनम भूल नहीं पाई।

     

    हर साल रक्षाबंधन पर उसे उस अनजान लड़के की याद आती।

     

    वह सोचती—

     

    क्या सच में मेरा कोई भाई था?

     

    इस बार माँ की तबीयत काफी कमजोर थी।

     

    एक शाम सोनम उनके पास बैठी थी।

     

    उसने हिम्मत करके पूछा,

     

    “माँ, मुझे एक बात पूछनी है।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछ।”

     

    “उस पुरानी तस्वीर में जो लड़का था… वो कौन था?”

     

    माँ के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “तूने उसे अभी तक नहीं भुलाया?”

     

    “मैं कैसे भूलूं माँ? मुझे तो पता ही नहीं कि वो कौन था।”

     

    माँ काफी देर चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने अपने तकिए के नीचे से एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    “शायद अब तुझे सच जान लेना चाहिए।”

     

    सोनम के हाथ कांपने लगे।

     

    लिफाफे के अंदर एक पत्र था।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “मेरी बहन सोनम के नाम।”

     

    सोनम की सांस जैसे रुक गई।

     

    उसने माँ की तरफ देखा।

     

    “माँ… मेरा भाई था?”

     

    माँ की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “हां।”

     

    “कहां है वो?”

     

    माँ ने नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    सोनम ने पत्र खोला।

     

    पत्र कई साल पुराना था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “सोनम,

     

    जब तू ये पत्र पढ़ेगी, शायद मैं तुझे बहुत याद आऊंगा।

     

    मुझे नहीं पता तब मैं कहां होऊंगा।

     

    लेकिन अगर कभी तू मुझे ढूंढे, तो एक बात याद रखना।

     

    तेरा भाई तुझसे नाराज होकर नहीं गया था।

     

    मैंने सिर्फ इतना सोचा था कि तू हमेशा खुश रहे।

     

    अगर कभी रक्षाबंधन आए और मैं तेरे पास न हूं, तो मेरे लिए एक राखी जरूर रखना।

     

    क्योंकि मुझे विश्वास है कि एक दिन तू मुझे ढूंढ ही लेगी।

     

    तेरा भाई,

     

    अर्जुन।”

     

    सोनम की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “माँ, भैया कहां गए थे?”

     

    माँ ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “तेरे पापा के जाने के बाद घर की हालत बहुत खराब हो गई थी। अर्जुन तुझसे चार साल बड़ा था। उसे समझ आ गया था कि घर में पैसे नहीं हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “एक दिन उसने कहा कि वह काम करने शहर जाएगा।”

     

    सोनम की आंखें फैल गईं।

     

    “इतनी छोटी उम्र में?”

     

    माँ रो पड़ीं।

     

    “मैंने उसे रोका था। बहुत रोका था। लेकिन वह नहीं माना।”

     

    “उसने आपको क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि वह चाहता था कि तू रोए नहीं।”

     

    सोनम ने पत्र को सीने से लगा लिया।

     

    “फिर उसका कोई पता नहीं चला?”

     

    माँ ने सिर हिला दिया।

     

    “शुरू में पत्र आते थे। फिर बंद हो गए।”

     

    उस रात सोनम सो नहीं पाई।

     

    वह बार-बार उस पत्र को पढ़ती रही।

     

    सुबह होते ही उसने भाई को ढूंढने का फैसला कर लिया।

     

    पत्र के साथ एक पुराना पता लिखा था।

     

    वह उसी शहर पहुंच गई।

     

    वहां एक पुरानी फैक्ट्री थी।

     

    सोनम ने आसपास के लोगों से पूछा,

     

    “क्या यहां कभी अर्जुन नाम का कोई लड़का काम करता था?”

     

    एक बूढ़े चौकीदार ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “अर्जुन?”

     

    “हां।”

     

    “उसकी छोटी बहन सोनम?”

     

    सोनम की आंखें भर आईं।

     

    “आप जानते हैं उन्हें?”

     

    चौकीदार ने धीरे से कहा,

     

    “वह तुझे बहुत याद करता था।”

     

    सोनम की धड़कन तेज हो गई।

     

    “वो कहां हैं?”

     

    बूढ़े आदमी ने एक छोटे से कमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “पहले वहां रहता था।”

     

    सोनम दौड़कर उस कमरे तक पहुंची।

     

    कमरा अब खाली था।

     

    दीवार पर पुराने निशान थे।

     

    एक कोने में लकड़ी का टूटा हुआ बक्सा पड़ा था।

     

    चौकीदार ने कहा,

     

    “जाने से पहले उसने ये सामान यहीं छोड़ दिया था।”

     

    सोनम ने बक्सा खोला।

     

    अंदर दर्जनों राखियां थीं।

     

    हर साल की एक।

     

    कुछ नई थीं।

     

    कुछ बहुत पुरानी।

     

    सोनम एकदम बैठ गई।

     

    हर राखी के साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    पहली पर्ची—

     

    “सोनम शायद इस साल पहली बार स्कूल गई होगी।”

     

    दूसरी—

     

    “आज उसकी उम्र दस साल होगी। पता नहीं उसे चॉकलेट पसंद है या अब बदल गई होगी।”

     

    तीसरी—

     

    “आज रक्षाबंधन है। काश, मेरी कलाई पर उसकी राखी होती।”

     

    सोनम रोने लगी।

     

    वह राखियां अपनी हथेली में पकड़कर बोली,

     

    “भैया… आप मुझे भूल नहीं पाए थे।”

     

    बूढ़े चौकीदार ने कहा,

     

    “वो हर साल एक राखी खरीदता था।”

     

    सोनम ने पूछा,

     

    “कहां गए वो?”

     

    चौकीदार कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “कुछ साल पहले उसकी तबीयत खराब रहने लगी थी। फिर उसने यहां काम छोड़ दिया।”

     

    “कहां गया?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    सोनम की उम्मीद फिर टूटने लगी।

     

    तभी बूढ़े आदमी ने कहा,

     

    “लेकिन जाते समय उसने कहा था कि अगर कभी उसकी बहन आए, तो उसे एक जगह जरूर बताना।”

     

    उसने एक छोटा-सा कागज सोनम को दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पुराने नदी किनारे वाला मंदिर।”

     

    सोनम उसी समय वहां पहुंची।

     

    मंदिर के पास एक छोटी-सी दुकान थी।

     

    दुकान पर एक आदमी बैठा था।

     

    सोनम ने पूछा,

     

    “क्या आप अर्जुन को जानते हैं?”

     

    उस आदमी ने उसे गौर से देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “तुम सोनम हो?”

     

    सोनम हैरान रह गई।

     

    “आपको मेरा नाम कैसे पता?”

     

    उस आदमी ने पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    “वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

     

    सोनम के कदम रुक गए।

     

    उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे अपनी सांसें सुनाई दे रही थीं।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे गई।

     

    एक पेड़ के नीचे एक आदमी बैठा था।

     

    बालों में हल्की सफेदी।

     

    चेहरे पर थकान।

     

    लेकिन आंखों में वही अपनापन।

     

    सोनम ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “अर्जुन भैया?”

     

    वह आदमी धीरे से उठा।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “सोनम?”

     

    बस इतना सुनते ही सोनम दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    “भैया!”

     

    अर्जुन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    दोनों रो रहे थे।

     

    “आप चले क्यों गए थे?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “ताकि तू रह सके।”

     

    “लेकिन मुझे भाई चाहिए था!”

     

    “मुझे पता था।”

     

    “तो वापस क्यों नहीं आए?”

     

    अर्जुन की आंखें झुक गईं।

     

    “जब वापस आने की हिम्मत जुटाई… तब लगा शायद तू मुझे पहचान भी नहीं पाएगी।”

     

    सोनम ने उसका चेहरा पकड़ लिया।

     

    “भैया को बहन कैसे नहीं पहचानेगी?”

     

    कुछ देर बाद सोनम ने अपने बैग से राखी निकाली।

     

    वही साधारण लाल धागे वाली राखी।

     

    उसने कहा,

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    अर्जुन ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    सोनम राखी बांधते हुए रो रही थी।

     

    “इतने सालों की सारी राखियां आज पूरी हो गईं।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर साल की राखी नहीं बांधी जा सकती।”

     

    सोनम ने उसके पास रखे बक्से को देखा।

     

    फिर एक राखी उठाई और अपनी कलाई पर बांध ली।

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये क्या कर रही है?”

     

    सोनम ने कहा,

     

    “जो राखियां आपकी कलाई तक नहीं पहुंच सकीं, वो आज हमारे रिश्ते तक पहुंच गईं।”

     

    अर्जुन रो पड़ा।

     

    सोनम ने कहा,

     

    “आज से कोई राखी अधूरी नहीं रहेगी।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वादा?”

     

    सोनम ने कहा,

     

    “वादा।”

     

    उस दिन एक बहन को अपना अनजान भाई मिला।

     

    और एक भाई को…

     

    वह राखी, जिसका वह वर्षों से इंतजार कर रहा था।

     

    कभी-कभी एक राखी सिर्फ त्योहार नहीं होती।

     

    कभी वह सालों से बिछड़े दो लोगों के बीच बचा हुआ आखिरी धागा होती है…

     

    जिसे पकड़कर वे एक-दूसरे तक वापस पहुंच जाते हैं।

  • भाई ने बहन से किया वो वादा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाई ने बहन से किया वो वादा

     

    “अगर मैं कभी बहुत दूर चला गया ना, तो क्या तू मुझे भूल जाएगी?”

     

    रिया ने अपने भाई कबीर की तरफ हैरानी से देखा।

     

    “आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?”

     

    कबीर ने मुस्कुराते हुए बात बदल दी।

     

    “बस ऐसे ही पूछ लिया।”

     

    रिया ने उसकी बांह पर हल्का-सा हाथ मारा।

     

    “आप कहीं नहीं जाने वाले। और अगर गए भी ना, तो मैं आपको ढूंढकर वापस ले आऊंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “बहुत बहादुर हो गई है मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया ने गर्व से कहा,

     

    “आपकी बहन हूं।”

     

    दोनों हंस रहे थे, लेकिन रिया नहीं जानती थी कि उसके भाई के मन में पिछले कई दिनों से एक बात चल रही थी।

     

    एक ऐसी बात…

     

    जिसके बारे में वह उसे बताना चाहता भी था और नहीं भी।

     

    कबीर और रिया के पिता की कई साल पहले मौत हो गई थी। माँ ने दोनों बच्चों को अकेले पाला।

     

    कबीर उम्र में रिया से आठ साल बड़ा था।

     

    इसलिए वह हमेशा भाई से ज्यादा पिता जैसा रहा।

     

    रिया को स्कूल छोड़ना, उसकी फीस भरना, उसके जन्मदिन पर केक लाना—कबीर हर जिम्मेदारी अपनी समझता था।

     

    लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर की आर्थिक हालत खराब हो गई थी।

     

    माँ की नौकरी छूट गई थी।

     

    रिया कॉलेज में पढ़ रही थी।

     

    कबीर की छोटी नौकरी से घर का खर्च मुश्किल से चलता था।

     

    एक शाम रिया ने देखा कि कबीर देर रात तक किसी से फोन पर बात कर रहा था।

     

    “हां, मैं तैयार हूं।”

     

    रिया ने पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    कबीर ने जल्दी से फोन रखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “भैया, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो।”

     

    “तू हर बात जानना जरूरी समझती है क्या?”

     

    रिया नाराज हो गई।

     

    “पहले तो आप मुझे सब बताते थे।”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके सिर पर हाथ रखकर बोला,

     

    “कभी-कभी कुछ बातें समय आने पर बतानी पड़ती हैं।”

     

    “कौन-सी बात?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “जब बताऊंगा तो नाराज मत होना।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “पहले बताओ तो सही।”

     

    लेकिन कबीर ने बात बदल दी।

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    रिया सुबह जल्दी उठी।

     

    उसने इस बार अपने भाई के लिए खुद एक राखी बनाई थी।

     

    सफेद और नीले धागे की राखी।

     

    कबीर को नीला रंग बहुत पसंद था।

     

    राखी के बीच में उसने एक छोटा-सा शब्द लिखा था—

     

    “वादा”

     

    कबीर ने राखी देखकर पूछा,

     

    “इस पर वादा क्यों लिखा है?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि इस बार मुझे आपसे एक वादा लेना है।”

     

    “क्या?”

     

    “आप पहले राखी बंधवाओ।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    रिया ने पूजा की थाली सजाई।

     

    माँ पास बैठी थीं।

     

    उसने कबीर के माथे पर तिलक लगाया।

     

    मिठाई खिलाई।

     

    फिर राखी उसकी कलाई पर बांधते हुए बोली,

     

    “अब मेरा वादा।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या मांगोगी?”

     

    रिया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “मुझसे कभी कुछ मत छिपाना।”

     

    कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “ये वादा शायद मैं नहीं कर सकता।”

     

    रिया के हाथ रुक गए।

     

    “क्यों?”

     

    माँ ने चिंतित होकर कबीर की तरफ देखा।

     

    कबीर ने गहरी सांस ली।

     

    “क्योंकि एक बात है, जो मैं कई दिनों से तुम दोनों से छिपा रहा हूं।”

     

    रिया की धड़कन तेज हो गई।

     

    “क्या बात?”

     

    कबीर ने जेब से एक कागज निकाला।

     

    “मुझे दूसरे शहर में नौकरी मिली है।”

     

    रिया ने राहत की सांस ली।

     

    “बस इतनी-सी बात?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “लेकिन ये नौकरी बहुत दूर है।”

     

    “तो?”

     

    “मुझे कम से कम तीन साल वहीं रहना होगा।”

     

    रिया का चेहरा बदल गया।

     

    “तीन साल?”

     

    “हां।”

     

    “और आप मुझे छोड़कर चले जाएंगे?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “छोड़कर नहीं जा रहा, रिया। हमारे लिए जा रहा हूं।”

     

    “मुझे नहीं चाहिए ऐसी नौकरी!”

     

    “रिया…”

     

    “नहीं चाहिए पैसे, अगर उसके बदले आप नहीं होंगे।”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आपने पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था तू रोएगी।”

     

    “तो क्या हुआ? आपको लगता है मुझे रोने का भी हक नहीं?”

     

    कबीर के चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दिया।

     

    “ऐसी बात नहीं है।”

     

    रिया ने राखी की तरफ देखा।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैंने सोचा था इस राखी पर आपसे वादा लूंगी कि हम हमेशा साथ रहेंगे।”

     

    कबीर ने उसकी बात काटी।

     

    “हम साथ रहेंगे।”

     

    “कैसे? आप दूसरे शहर में होंगे।”

     

    कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “दूरी से रिश्ते खत्म नहीं होते।”

     

    रिया चुप रही।

     

    कबीर ने उसके सामने बैठते हुए कहा,

     

    “याद है बचपन में तू डरती थी तो मैं क्या कहता था?”

     

    रिया ने धीरे से कहा,

     

    “आप कहते थे, मैं हूं ना।”

     

    “तो आज भी वही कह रहा हूं।”

     

    “लेकिन आप यहां नहीं होंगे।”

     

    कबीर ने उसके हाथ अपने हाथों में लिए।

     

    “रिया, मैं जहां भी रहूंगा, तेरे लिए हमेशा यहीं रहूंगा।”

     

    रिया रो पड़ी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अब मेरी बात सुन। मैं तुझसे एक वादा करना चाहता हूं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “मैं कितनी भी दूर चला जाऊं, तेरे किसी भी मुश्किल समय में तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया चुप रही।

     

    कबीर ने आगे कहा,

     

    “रात हो या दिन, तू एक फोन करेगी और मैं तेरे साथ खड़ा मिलूंगा।”

     

    “फोन पर?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “अगर जरूरत पड़ी तो सामने।”

     

    रिया की आंखें फिर भर आईं।

     

    “पक्का?”

     

    कबीर ने अपनी राखी वाली कलाई आगे की।

     

    “इस राखी की कसम।”

     

    कुछ दिनों बाद कबीर दूसरे शहर चला गया।

     

    शुरुआत में रिया को बहुत खालीपन महसूस हुआ।

     

    घर में हर चीज उसे भाई की याद दिलाती।

     

    उसकी पुरानी किताबें।

     

    उसका मग।

     

    उसकी कुर्सी।

     

    कभी-कभी वह भाई से नाराज होकर फोन नहीं उठाती।

     

    फिर कबीर मैसेज करता—

     

    “तू नाराज हो सकती है, लेकिन अकेली नहीं।”

     

    रिया मैसेज पढ़कर मुस्कुरा देती।

     

    समय बीतने लगा।

     

    रिया अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई।

     

    एक दिन कॉलेज में उसे एक जरूरी इंटरव्यू के लिए जाना था।

     

    वह बहुत घबराई हुई थी।

     

    उसने कबीर को फोन किया।

     

    “भैया, मुझे डर लग रहा है।”

     

    दूसरी तरफ से वही पुरानी आवाज आई,

     

    “मैं हूं ना।”

     

    रिया मुस्कुराई।

     

    “आप तो बहुत दूर हो।”

     

    “वीडियो कॉल कर।”

     

    पूरे रास्ते कबीर वीडियो कॉल पर उसके साथ रहा।

     

    इंटरव्यू से पहले उसने कहा,

     

    “अब जा। और याद रख, तू किसी से कम नहीं।”

     

    रिया ने इंटरव्यू दिया।

     

    कुछ दिनों बाद उसका चयन हो गया।

     

    रिया की सबसे पहली कॉल कबीर को थी।

     

    “भैया! मेरा चयन हो गया!”

     

    कबीर खुशी से चिल्लाया,

     

    “मुझे पता था।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    “क्योंकि तू मेरी बहन है।”

     

    कुछ महीनों बाद कबीर रक्षाबंधन पर घर लौटा।

     

    रिया ने दरवाजा खोला।

     

    दोनों कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रिया दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    “आप सच में आ गए।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “वादा किया था।”

     

    रिया ने इस बार एक नई राखी निकाली।

     

    उस पर भी वही शब्द लिखा था—

     

    “वादा”

     

    कबीर ने हाथ आगे कर दिया।

     

    रिया ने राखी बांधी।

     

    फिर पूछा,

     

    “भैया, पिछले साल वाला वादा याद है?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तू मुश्किल में हो और मैं तुझे अकेला छोड़ दूं—ऐसा कभी नहीं होगा।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “और मेरा भी एक वादा है।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मैं आपसे दूर होने से नहीं डरूंगी।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    रिया ने उसकी कलाई पर बंधी राखी की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब समझ गई हूं कि साथ रहने के लिए हमेशा पास होना जरूरी नहीं होता।”

     

    माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

     

    उनकी आंखों में खुशी थी।

     

    रिया ने भाई की कलाई को पकड़ते हुए कहा,

     

    “एक राखी पर लिखा छोटा-सा शब्द था—वादा।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “और?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “अब समझ गई हूं कि कुछ वादे सिर्फ बोले नहीं जाते… उन्हें हर दिन निभाया जाता है।”

     

    कबीर ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “हमेशा।”

     

    और उस दिन रिया को समझ आया कि भाई का प्यार सिर्फ घर की चार दीवारों तक सीमित नहीं होता।

     

    कभी-कभी वह हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी…

     

    बहन के सबसे करीब होता है।

     

    क्योंकि भाई ने बहन से जो सच्चा वादा किया हो, उसे दूरी नहीं तोड़ सकती।

  • “कलाई पर बंधी डोर”

    “कलाई पर बंधी डोर”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    रक्षाबंधन का दिन था। पूरे घर में सुबह से ही चहल-पहल थी। आँगन में रंगोली बनी थी, रसोई से मिठाइयों की खुशबू आ रही थी और माँ बार-बार दरवाज़े की ओर देख रही थीं।

     

    लेकिन इस बार घर में एक कमी थी—आरव नहीं था।

     

    आरव शहर से बहुत दूर नौकरी करता था। पिछले तीन सालों से वह रक्षाबंधन पर घर नहीं आ पाया था। हर साल उसकी छोटी बहन नंदिनी राखी की थाली सजाकर दरवाज़े पर बैठ जाती, लेकिन शाम होते-होते उसकी आँखों की चमक बुझ जाती।

     

    इस बार भी नंदिनी सुबह से तैयार थी। उसने अपनी पसंद की गुलाबी साड़ी पहनी थी और आरव के लिए बाजार से एक सुंदर-सी राखी खरीदी थी।

     

     

    माँ ने धीरे से पूछा, “बेटा, आरव ने कुछ बताया?”

    नंदिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की।

    “कहा है माँ… इस बार जरूर आएगा।”

    माँ ने उसके चेहरे को देखा। वह समझ रही थीं कि बेटी को भाई के आने से ज्यादा उसके वापस आने के वादे पर भरोसा था।

    दोपहर हो गई।

     

     

    फिर शाम होने लगी।

    नंदिनी बार-बार अपना फोन देखती। हर बार स्क्रीन खाली मिलती।

    उसने आरव को फोन लगाया।

    “भैया… कहाँ पहुँचे?”

    उधर से आरव की आवाज़ आई, “बस नंदू, थोड़ा काम फँस गया है। तुम चिंता मत करो। मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

     

     

    नंदिनी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली, “हर साल कोशिश ही करते हो भैया…”

    फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।

    आरव समझ गया कि उसकी बहन की आवाज़ में शिकायत से ज्यादा टूटे हुए इंतज़ार का दर्द था।

     

     

    “नंदू… इस बार मैं—”

     

     

    नंदिनी ने फोन काट दिया।

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

    वह अपने कमरे में गई और अलमारी खोली। अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था। उसने उसे बाहर निकाला। डिब्बे में बचपन की कई चीज़ें थीं—आरव की पुरानी घड़ी, एक टूटा हुआ खिलौना और एक छोटी-सी राखी।

     

     

    वह राखी देखकर नंदिनी को अपना बचपन याद आ गया।

    जब वह छोटी थी, तो स्कूल से लौटते समय कुछ लड़कों ने उसे परेशान किया था। वह रोते हुए घर आई थी। आरव ने उसकी आँखों में आँसू देखे तो बिना कुछ पूछे उसका हाथ पकड़ लिया था।

     

    “किसने परेशान किया?”

     

    नंदिनी ने डरते हुए नाम बताया।

     

    आरव उस समय खुद बहुत छोटा था, लेकिन उसने अपनी बहन से कहा था—

    “जब तक मैं हूँ, तुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं।”

     

    उस दिन नंदिनी ने पहली बार अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधी थी।

    राखी बाँधते हुए उसने पूछा था, “भैया, ये धागा सच में मेरी रक्षा करेगा?”

    आरव हँस पड़ा था।

     

    “नहीं पगली… ये धागा मुझे याद दिलाएगा कि मेरी एक बहन है, जिसकी खुशी मेरी जिम्मेदारी है।”

    नंदिनी मुस्कुराई थी।

    आज वही बच्ची बड़ी हो गई थी।

    और वह धागा अब भी उसकी मुट्ठी में था।

    रात के लगभग आठ बज गए थे।

    घर के बाहर एक कार आकर रुकी।

     

     

    माँ ने खिड़की से देखा।

    उनकी आँखों में अचानक चमक आ गई।

    “नंदिनी…”

    नंदिनी कमरे से बाहर आई।

    दरवाज़े पर आरव खड़ा था।

     

     

    थका हुआ, धूल से भरा हुआ, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।

    नंदिनी कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।

     

     

    फिर दौड़कर उसके पास गई और उसके सीने से लगकर रो पड़ी।

    “बहुत देर कर दी भैया…”

     

    आरव ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा,

     

    “माफ कर दे नंदू। इस बार देर हुई है… लेकिन आया तो हूँ।”

    नंदिनी ने आँसू पोंछे।

     

     

    “मुझे पता था आप आएँगे।”

    आरव मुस्कुराया।

    “इतना भरोसा?”

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा,

    “आप पर नहीं… उस धागे पर है जो हर साल आपकी कलाई पर बाँधती हूँ।”

    माँ की आँखें भी भर आईं।

    नंदिनी ने जल्दी से पूजा की थाली सजाई। उसमें रोली, अक्षत, मिठाई और वही राखी रखी थी जिसे उसने पूरे दिन संभालकर रखा था।

     

     

    वह आरव के सामने बैठी।

     

     

    आरव ने अपनी कलाई आगे कर दी।

    नंदिनी ने पहले तिलक लगाया, फिर आरती उतारी और धीरे-धीरे उसकी कलाई पर राखी बाँध दी।

    राखी बाँधते समय उसके हाथ काँप रहे थे।

     

     

    “भैया…”

    “हम्म?”

    “एक वादा करोगे?”

    “बोल।”

    “चाहे कितनी भी दूर चले जाना… लेकिन कभी मुझसे दूर मत होना।”

    आरव की आँखें नम हो गईं।

    उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला और नंदिनी की ओर बढ़ाया।

    “पहले तू अपना तोहफा खोल।”

     

     

    नंदिनी ने डिब्बा खोला।

    अंदर एक सुंदर-सी चाँदी की पायल थी।

    उसकी आँखों में खुशी आ गई।

    “मेरे लिए?”

    आरव ने सिर हिलाया।

    “हाँ। जब तू छोटी थी ना, तो तेरी पायल की आवाज़ पूरे घर में सुनाई देती थी। फिर पता ही नहीं चला कब तू बड़ी हो गई।”

    नंदिनी ने पायल हाथ में पकड़ ली।

     

     

    आरव ने कहा,

    “और एक बात…”

    “क्या?”

    “तू हर साल मुझे राखी बाँधती है और मेरी रक्षा की दुआ करती है। लेकिन सच बता, क्या तू जानती है कि मेरी सबसे बड़ी ताकत क्या है?”

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “तू।”

    नंदिनी फिर रो पड़ी।

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

    माँ थोड़ी दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

    उनके चेहरे पर संतोष था।

     

    उन्हें पता था कि राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती।

    यह बचपन की याद होती है।

    यह भाई की कलाई पर बहन का विश्वास होती है।

    यह बहन की आँखों में भाई के लिए दुआ होती है।

    और यह वह रिश्ता है, जिसमें दूरी चाहे कितनी भी हो जाए, दिल कभी दूर नहीं होते।

     

     

    कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ समय के साथ मजबूत होते हैं।

    लेकिन भाई-बहन का रिश्ता उन रिश्तों में से है, जिसे एक छोटी-सी राखी हर साल फिर से जीवित कर देती है।

     

    रात को नंदिनी अपने कमरे में गई। उसने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।

     

    बाहर आरव माँ से बातें कर रहा था।

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

    “कुछ धागे कलाई पर नहीं, दिल पर बंधते हैं… और उन्हें दुनिया की कोई दूरी कभी नहीं तोड़ सकती।”

     

    उस रात घर में सिर्फ एक भाई वापस नहीं आया था।

    एक बहन का इंतज़ार वापस आया था।

    और माँ के घर में फिर से वही पुरानी हँसी लौट आई थी। ❤️

  • आखिरी राखी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    सुमन और उसका भाई विजय बचपन में बहुत करीब थे। विजय अपनी बहन से चार साल बड़ा था और हमेशा उसकी रक्षा करता था। स्कूल जाते समय वह उसका बैग उठाता। बारिश में उसकी छतरी पकड़ता। और जब भी कोई उसे परेशान करता, विजय उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो जाता। लेकिन जिंदगी ने दोनों को अलग कर दिया। पिता की मृत्यु के बाद विजय को नौकरी की तलाश में शहर जाना पड़ा। सुमन गांव में मां के साथ रह गई। समय बीतता गया। विजय शहर में मेहनत करता रहा और सुमन की शादी हो गई। दोनों की मुलाकात कम होने लगी। लेकिन रक्षाबंधन पर सुमन हमेशा भाई को राखी भेजती थी। एक साल राखी के कुछ दिन पहले सुमन को विजय का फोन आया। “बहन, इस बार राखी पर शायद मैं घर न आ पाऊं।” सुमन ने कहा, “क्यों?” “ऑफिस का काम बहुत ज्यादा है।” सुमन चुप हो गई। फिर बोली, “ठीक है भैया।” उसने फोन रख दिया। लेकिन उसे पता नहीं था कि विजय उससे एक बड़ी बात छिपा रहा था। विजय कई महीनों से गंभीर आर्थिक परेशानी में था। कर्ज बढ़ता जा रहा था। वह चाहता था कि परिवार को उसकी परेशानी का पता न चले। रक्षाबंधन के दिन सुमन ने पूजा की और भाई की तस्वीर के सामने राखी रख दी। फिर दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुमन ने दरवाजा खोला। सामने विजय खड़ा था। वह हैरान रह गई। “भैया! आपने तो कहा था नहीं आएंगे।” विजय मुस्कुराया। “बहन की राखी के लिए भाई नहीं आएगा तो कौन आएगा?” सुमन ने उसकी कलाई पर राखी बांधी। फिर उसने भाई की आंखों में देखा। “आप परेशान हैं ना?” विजय चौंक गया। “नहीं तो।” “झूठ मत बोलिए।” विजय की आंखें भर आईं। उसने अपनी परेशानी बहन को बता दी। सुमन ने कहा— “आपने इतने साल मेरी मदद की। अब मेरी बारी है।” विजय बोला, “तुम क्या करोगी?” सुमन ने अपनी बचत उसके सामने रख दी। “जितना मेरे पास है, उतना ले लीजिए।” विजय ने पैसे लेने से मना कर दिया। “नहीं बहन।” सुमन बोली— “जब मैं छोटी थी और मुझे कोई परेशानी होती थी, तब आपने कभी नहीं पूछा कि मेरे पास पैसे हैं या नहीं। आपने बस मदद की थी। आज मैं भी वही कर रही हूं।” विजय ने बहन का हाथ पकड़ लिया। “लेकिन मैं ये कर्ज कैसे चुकाऊंगा?” सुमन मुस्कुराई। “पैसे वापस मत करना। बस एक वादा करना।” “क्या?” “कभी अपनी परेशानी अकेले मत सहना।” विजय ने सिर हिला दिया। उस दिन दोनों भाई-बहन देर तक बातें करते रहे। अगले कुछ महीनों में सुमन और विजय ने मिलकर विजय की आर्थिक समस्या का समाधान किया। विजय ने अतिरिक्त काम करना शुरू किया। कुछ समय बाद उसने अपना छोटा सा व्यवसाय शुरू कर लिया। व्यवसाय चल पड़ा। लेकिन उस रक्षाबंधन की बात दोनों कभी नहीं भूले। कई साल बाद सुमन की बेटी ने विजय से पूछा— “मामा, राखी का मतलब क्या होता है?” विजय ने अपनी कलाई की तरफ देखा। फिर बोला— “राखी का मतलब सिर्फ यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा।” “फिर?” “राखी का मतलब है कि जब जिंदगी में कोई अकेला पड़ जाए, तो दूसरा उसका हाथ पकड़ ले।” सुमन पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। विजय ने अपनी बहन की तरफ देखकर कहा— “मेरी बहन ने मुझे सिखाया कि कभी-कभी जिसे हम कमजोर समझकर उसकी रक्षा करते हैं, वही एक दिन हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।” सुमन की आंखें नम हो गईं। उसने कहा— “भैया, भाई-बहन में कौन बड़ा और कौन छोटा, ये मायने नहीं रखता। मायने रखता है कि मुश्किल वक्त में कौन किसके साथ खड़ा है।” दोनों मुस्कुराए। उनकी कलाई पर राखी का धागा था, लेकिन उस धागे से कहीं ज्यादा मजबूत उनका रिश्ता था। सीख: रिश्तों में हमेशा एक ही व्यक्ति देने वाला और दूसरा लेने वाला नहीं होता। कभी भाई बहन की ताकत बनता है, तो कभी बहन भाई की। सच्चा रिश्ता वही है जिसमें मुश्किल समय में बिना स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामा जाए।

  • राखी का सबसे अनमोल तोहफा

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    शहर के एक छोटे से घर में मीरा अपनी मां और बड़े भाई मोहन के साथ रहती थी। मोहन एक साधारण नौकरी करता था और अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करता था।

     

    हर साल रक्षाबंधन पर मीरा अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती और बदले में मोहन उसे कोई न कोई उपहार जरूर देता।

     

    कभी नई ड्रेस, कभी चूड़ियां, कभी उसकी पसंद की मिठाई।

     

    लेकिन इस साल हालात कुछ अलग थे।

     

    मोहन की नौकरी छूट गई थी।

     

    घर का किराया बाकी था और मां की दवाइयों का खर्च भी चल रहा था।

     

    मीरा यह सब जानती थी, लेकिन उसने भाई के सामने कभी अपनी परेशानी नहीं रखी।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले मीरा बाजार गई।

     

    उसकी नजर एक सुंदर राखी पर पड़ी।

     

    राखी बहुत महंगी नहीं थी, लेकिन उसमें एक छोटा सा चांदी जैसा चमकता हुआ फूल लगा था।

     

    मीरा ने अपनी जमा की हुई थोड़ी सी रकम से वह राखी खरीद ली।

     

    अगले दिन सुबह उसने घर सजाया।

     

    मोहन चुपचाप बैठा हुआ था।

     

    उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, आज तो मुस्कुराइए। आज राखी है।”

     

    मोहन ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “हां, मेरी बहन। लेकिन इस बार शायद मैं तुम्हें कोई तोहफा नहीं दे पाऊंगा।”

     

    मीरा ने तुरंत उसके मुंह पर हाथ रख दिया।

     

    “मुझे कोई तोहफा नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन हर साल तो…”

     

    “हर साल आप मुझे बाजार से चीजें लाकर देते थे। इस बार मुझे आपसे कुछ और चाहिए।”

     

    मोहन ने पूछा, “क्या?”

     

    मीरा ने राखी की थाली उसके सामने रखी।

     

    “आप मेरा हाथ पकड़कर एक वादा कीजिए।”

     

    मोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    मीरा बोली, “चाहे जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, आप कभी हार नहीं मानेंगे।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    मीरा की आंखों में आंसू थे।

     

    “आप मेरे भाई हैं। अगर आप टूट जाएंगे तो मैं किससे हिम्मत लेना सीखूंगी?”

     

    मोहन की आंखें भी भर आईं।

     

    मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    “मुझे बस इतना चाहिए कि आप कोशिश करते रहिए।”

     

    मोहन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मैं वादा करता हूं।”

     

    उस दिन के बाद मोहन ने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया।

     

    कई जगह से जवाब नहीं आया।

     

    कहीं उसे मना कर दिया गया।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    सुबह नौकरी की तलाश करता और शाम को छोटी-मोटी मजदूरी करके घर चलाता।

     

    एक दिन उसे एक कंपनी में काम मिल गया।

     

    वेतन पहले से कम था, लेकिन मोहन बहुत खुश था।

     

    धीरे-धीरे घर की स्थिति सुधरने लगी।

     

    कुछ महीने बाद मोहन ने अपनी पहली अच्छी तनख्वाह से मीरा के लिए एक सुंदर ड्रेस खरीदी।

     

    जब उसने ड्रेस मीरा को दी तो मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “भैया, इसकी क्या जरूरत थी?”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तुमने मुझे उस दिन जो दिया था, उसके सामने ये कुछ भी नहीं।”

     

    मीरा ने पूछा, “मैंने क्या दिया था?”

     

    मोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी दिखाई।

     

    “तुमने मुझे उम्मीद दी थी।”

     

    कई साल बाद मोहन की जिंदगी काफी बदल चुकी थी।

     

    वह मेहनत करके एक छोटे से व्यवसाय का मालिक बन गया।

     

    उसके पास अब पैसे की कमी नहीं थी।

     

    लेकिन हर रक्षाबंधन पर वह उसी पुराने तरीके से अपनी बहन के सामने बैठता।

     

    एक दिन मीरा ने मजाक में पूछा, “भैया, अब तो आप बहुत अमीर हो गए हैं। इस बार मेरा सबसे महंगा तोहफा क्या है?”

     

    मोहन हंसते हुए बोला, “तुम्हें जो चाहिए मांग लो।”

     

    मीरा कुछ देर सोचकर बोली—

     

    “मुझे वही चाहिए जो आपने पहली राखी पर दिया था।”

     

    मोहन हैरान हुआ।

     

    “क्या?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “आपका साथ।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन को गले लगा लिया।

     

    उसे समझ आ गया कि रिश्तों में सबसे महंगा तोहफा सोना, कपड़े या पैसे नहीं होते।

     

    सबसे अनमोल तोहफा होता है—मुश्किल समय में किसी का साथ।

     

    सीख:

    रिश्तों की कीमत उपहारों से नहीं, बल्कि मुश्किल समय में साथ खड़े रहने से होती है। कभी-कभी किसी के जीवन में उम्मीद के दो शब्द ही सबसे बड़ा तोहफा बन जाते हैं।