यह कहानी उस समय की है जब मिथिला भूमि पर धर्म, नीति और न्याय का दीप जलाने वाले राजा जनक का शासन था। वह केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक ऋषि, एक तत्वज्ञानी और एक संवेदनशील पिता भी थे। यह कथा उस महान क्षण की है जब उन्होंने न केवल एक पुत्री को अपनाया, बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की गरिमा को भी एक नई ऊँचाई दी
मिथिला राज्य में लम्बे समय से अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा नहीं हो रही थी, फसलें सूख रही थीं और प्रजा में निराशा फैल गई थी। राजा जनक, जो तप और ज्ञान में भी रुचि रखते थे, चिंतित थे कि यह अकाल क्यों पड़ा है। ज्योतिषियों और ऋषियों से परामर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि को हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार करनी होगी, जिससे देवताओं को संतोष मिले और वर्षा हो।
राजा जनक स्वयं हल लेकर खेत में उतरे। जब वह हल चला रहे थे, तभी भूमि की कोख से एक सुंदर, तेजस्वी कन्या बाहर आई। कन्या की त्वचा कमल के फूल-सी कोमल थी, आँखें चंद्रमा-सी शीतल और स्वर वीणा के समान मधुर। यह कोई सामान्य बालिका नहीं थी।
जनक ठिठक गए। कुछ क्षण के लिए समय थम-सा गया। उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठाया और जैसे ही उस कन्या ने उन्हें अपनी नन्ही बाहों से छुआ, जनक के हृदय में एक अलौकिक प्रेम जाग उठा। यह कन्या उन्हें केवल एक बालिका नहीं लगी, बल्कि देवी स्वरूप प्रतीत हुई।
ऋषियों ने घोषणा की — “यह कन्या स्वयं धरती की पुत्री है। इसका नाम सीता होगा, क्योंकि यह हल (सीत) की नोक से प्रकट हुई है।”
राजा जनक ने सीता को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यद्यपि वह गोद ली हुई कन्या थी, किंतु जनक और रानी सुनयना ने उसमें अपनी आत्मा बसा दी। मिथिला में उस समय भी समाज की रूढ़ियों ने जड़ें जमा रखी थीं — कोई कन्या गोद ली जाए और राजकुमारी बनकर महल में रहे, यह सबके लिए अस्वाभाविक था।
लेकिन जनक ने समाज की परवाह नहीं की। उन्होंने घोषणा की, “सीता केवल मेरी पुत्री नहीं, बल्कि मिथिला की भविष्य है। जो उसे छोटा समझेगा, वह मेरे न्याय और प्रेम को नहीं समझा।”
सीता को उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। वह स्वयं विद्वान थे और विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम जैसे ऋषियों के सान्निध्य में सीता की परवरिश कराई। सीता धीरे-धीरे केवल सुंदर नहीं, बल्कि तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ भी बन गईं।
राजा जनक का यह विचार क्रांतिकारी था — जहाँ उस युग में स्त्रियों को केवल गृहकार्य और विवाह तक सीमित किया जाता था, जनक ने सीता को स्वतंत्रता, विचार और शिक्षा का अधिकार दिया।
समय बीता। सीता युवा हुईं। अब राजसभा में यह विषय उठा कि उनके लिए योग्य वर की खोज की जाए। अनेक राजाओं और राजकुमारों के नाम आए, किंतु जनक का मानना था कि केवल कुल, वैभव और शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और धर्म से ही कोई व्यक्ति सीता के योग्य हो सकता है।
एक दिन जनक ने घोषणा की, “जो शिवधनुष को उठा सकेगा, वही सीता का पति होगा।” यह घोषणा पूरे आर्यावर्त में गूँज उठी। जनक जानते थे कि जो वास्तव में शक्तिशाली होगा, वही इस दिव्य धनुष को उठा सकेगा।
कई राजा आए, धनुष देख कर लौट गए। कोई उसका भार नहीं सह पाया। तब अयोध्या से राम आए, विश्वामित्र के साथ। जब राम ने धनुष उठाया और तोड़ा, जनक की आँखों में अश्रु भर आए — यह खुशी के आँसू थे।
उन्होंने सीता का हाथ राम के हाथ में देते हुए कहा, “आज मुझे विश्वास हुआ कि यह कन्या जिसे मैंने भूमि से पाया था, उस पुरुष को मिल गई है जो धर्म और मर्यादा का प्रतीक है।”
शादी के बाद जब सीता अयोध्या चली गईं, तो जनक प्रसन्न भी थे और व्यथित भी। वह जानते थे कि राजपरिवारों में केवल प्रेम नहीं, राजनीति भी चलती है। एक पिता होने के नाते वह चिंतित रहते थे कि सीता पर कोई अन्याय न हो
जब उन्हें यह समाचार मिला कि राम को वनवास हुआ है और सीता भी उनके साथ वन गई हैं, जनक का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सीता को संदेश भेजा कि वह चाहे तो मिथिला लौट सकती है, किंतु सीता ने मना कर दिया।
उसने उत्तर भिजवाया — “पिताजी, आपने मुझे आत्मबल और धर्म का पाठ पढ़ाया है। यदि आज मैं उस पर न चलूँ, तो यह शिक्षा व्यर्थ होगी।”
जनक को गर्व हुआ, किंतु मन व्यथित रहा।
पाँचवाँ भाग: अग्नि परीक्षा और जनक का हस्तक्षेप
जब लंका विजय के बाद राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, तो जनक तक यह समाचार पहुँचा। उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अयोध्या में दूत भेजा और स्पष्ट कहा — “यदि सीता पर कोई लांछन है, तो वह मुझ पर है। क्योंकि वह केवल मेरी पुत्री ही नहीं, मेरी मर्यादा भी है। एक पिता को चुनौती मत दो, क्योंकि जब धर्म अधर्म के हाथों अपमानित होता है, तब वह जनक जैसे राजा को भी युद्ध के लिए विवश कर सकता है।”
राम ने जनक के संदेश को समझा। उन्होंने सीता को पुनः सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। जनक ने स्पष्ट किया, “राजा बनना आसान है, किंतु नारी के सम्मान की रक्षा करना कठिन है। और जो इसे न निभा पाए, वह राजा कहलाने योग्य नहीं।
जब सीता ने अंत में धरती में समा जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अंतिम बार जनक को स्वप्न में देखा। जनक ने मुस्कराते हुए कहा — “बेटी, तुम वापस अपनी माँ की गोद में जा रही हो। मैंने तुम्हें जिस धरती से पाया, उसी में समा जाना तुम्हारी महिमा है। तुम जनक की पुत्री थीं, अब तुम जननी बनकर समस्त स्त्री जाति के लिए प्रेरणा बन गई हो।”
राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे। वह एक विचार थे — नारी के सम्मान का, शिक्षा का, स्वतंत्रता का और पिता के रूप में सच्चे प्रेम का। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ‘मसीहा’ वही होता है जो बिना समाज की परवाह किए, सत्य और न्याय का साथ दे।
सीता ने धरती को अपनी माँ कहा, लेकिन जनक ने उसे एक नया जीवन, पहचान और सम्मान दिया। उन्होंने यह साबित किया कि किसी स्त्री का मसीहा वही होता है जो उसे उसके अस्तित्व और आत्मबल के साथ स्वीकार करे।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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