श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी
अध्याय 12 — वो वादा जो सुदामा भूल गए थे
“अब समय आ गया है, सुदामा।”
द्वारका में कृष्ण खिड़की के पास खड़े थे।
उधर सुदामा अपने घर में उसी छोटी-सी पोटली को सीने से लगाए बैठे थे।
रात काफी हो चुकी थी, लेकिन उनकी आँखों में नींद नहीं थी।
बार-बार उनके मन में कृष्ण की बातें घूम रही थीं।
“एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी जिंदगी बहुत बदल जाएगी…”
सुदामा ने आँखें बंद कर लीं।
“लेकिन उसके बाद कृष्ण ने क्या कहा था?”
वह जितना याद करने की कोशिश करते, उतना ही सब धुंधला होता जाता।
उन्होंने करवट बदली।
फिर उठकर बैठ गए।
सामने वही पुरानी चीज रखी थी, जो कृष्ण ने भेजी थी।
सुदामा ने उसे हाथ में लिया।
“तुम्हारे अंदर ऐसा क्या छिपा है, जो मुझे इतने सालों बाद भी परेशान कर रहा है?”
उन्हें खुद पर थोड़ी हँसी भी आई।
“मैं भी ना… कृष्ण से मिलकर आया और अब उसके भेजे हुए सामान का रहस्य सुलझाने बैठ गया।”
लेकिन अगले ही पल उनकी आँखें नम हो गईं।
“कृष्ण ने इसे इतने साल संभालकर रखा…”
उन्होंने उस चीज को हथेली में बंद कर लिया।
“क्या उसे सच में मेरी इतनी याद आती रही होगी?”
तभी पीछे से उनकी पत्नी की आवाज आई,
“आप अभी तक सोए नहीं?”
सुदामा ने पलटकर देखा।
“नींद नहीं आ रही।”
“क्यों?”
“कृष्ण की वजह से।”
पत्नी उनके पास आकर बैठ गईं।
“क्या हुआ?”
सुदामा ने पोटली उनकी तरफ बढ़ा दी।
“ये देखो।”
पत्नी ने उसे ध्यान से देखा।
“इसमें ऐसा क्या है?”
“यही तो समझ नहीं आ रहा।”
सुदामा कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले,
“मुझे लगता है कृष्ण मुझे किसी पुरानी बात की याद दिलाना चाहता है।”
“कौन-सी बात?”
“एक वादा।”
पत्नी ने पूछा,
“आपने कृष्ण से कोई वादा किया था?”
सुदामा ने धीरे से सिर हिलाया।
“शायद।”
“शायद?”
“मुझे याद नहीं।”
उनकी आवाज में परेशानी साफ थी।
“यही बात मुझे अंदर से परेशान कर रही है। मैं कृष्ण के साथ बिताया एक-एक दिन याद कर सकता हूँ। हमें कब डाँट पड़ी, कब हम साथ हँसे, कब हमने चोरी से खाना खाया… सब याद है।”
वह रुके।
“लेकिन उस दिन की आखिरी बात याद नहीं।”
पत्नी ने धीरे से कहा,
“शायद सुबह तक याद आ जाए।”
सुदामा मुस्कुराए।
“काश।”
अगली सुबह सूरज निकलते ही सुदामा उठ गए।
उन्होंने सबसे पहले वह पोटली उठाई।
वह उसे लेकर घर के बाहर उसी पुराने पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए, जो उनके पुराने घर के आँगन में भी था।
उन्होंने आँखें बंद कीं।
“चलो सुदामा… याद करो।”
उन्होंने खुद से कहा।
“गुरुकुल का आखिरी दिन।”
धीरे-धीरे उन्हें सब दिखाई देने लगा।
कृष्ण सामने खड़े थे।
उनके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में उदासी।
सुदामा ने उस याद को पकड़ने की कोशिश की।
कृष्ण कुछ कह रहे थे।
“सुदामा…”
सुदामा ने मन ही मन जवाब दिया,
“हाँ कृष्ण?”
फिर आवाज धुंधली हो गई।
सुदामा ने माथे पर हाथ रख लिया।
“नहीं… आगे क्या कहा था?”
उन्होंने फिर कोशिश की।
इस बार उन्हें कृष्ण की आवाज थोड़ी साफ सुनाई दी।
“अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बिल्कुल अकेले हो…”
सुदामा की आँखें खुल गईं।
“हाँ!”
उन्हें कुछ याद आया था।
वह उत्साह में खड़े हो गए।
“कृष्ण ने यही कहा था!”
लेकिन आगे?
वह फिर बैठ गए।
“उसके बाद क्या कहा था?”
उन्होंने आँखें बंद कीं।
अचानक एक और याद सामने आई।
कृष्ण उनका हाथ पकड़े हुए थे।
“तुम चाहे जहाँ चले जाना…”
सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं तुम्हें…”
आवाज फिर गायब हो गई।
“क्या?”
सुदामा बेचैन हो गए।
“कृष्ण ने क्या कहा था?”
उसी समय उनकी पत्नी बाहर आईं।
“क्या हुआ?”
सुदामा ने उनकी तरफ देखा।
“मुझे थोड़ा याद आया है।”
“क्या?”
“कृष्ण ने कहा था कि अगर मुझे कभी लगे कि मैं अकेला हूँ, तो…”
वह रुक गए।
पत्नी ने पूछा,
“तो?”
सुदामा ने सिर हिलाया।
“याद नहीं आ रहा।”
उनकी आवाज टूट गई।
“इतने सालों से मेरे मन में ये बात थी और मुझे पता ही नहीं था।”
पत्नी ने कहा,
“आपने उस दिन कृष्ण से क्या कहा था, वो याद है?”
सुदामा ने सोचते हुए कहा,
“मैंने उससे पूछा था… अगर हमारी जिंदगी बदल गई तो क्या हमारी दोस्ती भी बदल जाएगी?”
“और कृष्ण ने?”
सुदामा की आँखों में मुस्कान आ गई।
“उसने कहा था—नहीं।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर सुदामा ने कहा,
“लेकिन शायद उसके बाद मैंने उससे कुछ और कहा था।”
“क्या?”
“शायद…”
सुदामा की आँखें अचानक भर आईं।
“मैंने कहा था कि अगर कभी मेरे बच्चे भूखे हों और मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ न हो…”
उनकी आवाज काँपने लगी।
“तो मैं कृष्ण को याद करूँगा।”
पत्नी ने उनकी तरफ देखा।
सुदामा ने सिर झुका लिया।
“लेकिन मैंने कभी कृष्ण से मदद माँगने का सोचा ही नहीं था।”
उन्होंने लंबी साँस ली।
“मुझे लगता था कि दोस्ती में हिसाब नहीं होना चाहिए।”
पत्नी ने कहा,
“और कृष्ण ने भी तो कोई हिसाब नहीं रखा।”
सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।
“हाँ…”
उसी समय दूर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।
सुदामा ने पलटकर देखा।
वही व्यक्ति था जो द्वारका से संदेश लेकर आया था।
सुदामा खड़े हो गए।
“तुम?”
वह व्यक्ति उनके सामने आकर रुका।
“मुझे आपसे एक बात कहनी है।”
सुदामा ने पूछा,
“कृष्ण का कोई और संदेश है?”
उसने सिर हिलाया।
“हाँ।”
सुदामा का दिल तेज धड़कने लगा।
“क्या कहा है उसने?”
उस व्यक्ति ने कहा,
“कृष्ण ने कहा है कि आपको उस पुराने वादे को याद करने के लिए अपने मन पर जोर डालने की जरूरत नहीं है।”
सुदामा हैरान रह गए।
“फिर?”
“उन्होंने कहा है कि आपको बस गुरुकुल की उस आखिरी शाम को याद करना है।”
सुदामा की आँखें फैल गईं।
“आखिरी शाम?”
“हाँ।”
“उस शाम ऐसा क्या हुआ था?”
दूत ने कहा,
“ये मुझे नहीं बताया गया।”
सुदामा ने बेचैनी से पूछा,
“तुम्हें कुछ और पता है?”
दूत ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा,
“बस इतना कहा गया है कि जो बात आपको याद करनी है, वह उसी जगह से जुड़ी है।”
सुदामा ने तुरंत कहा,
“कौन-सी जगह?”
दूत ने जवाब दिया,
“गुरुकुल।”
सुदामा चुप हो गए।
उनकी आँखों के सामने गुरुजी का आश्रम आ गया।
वही पेड़।
वही आँगन।
वही रास्ता।
और वही आखिरी शाम…
सुदामा ने धीरे से कहा,
“मुझे वहाँ जाना होगा।”
पत्नी ने हैरानी से पूछा,
“अभी?”
सुदामा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“लेकिन क्यों?”
सुदामा ने पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।
“क्योंकि मेरा दोस्त मुझे कोई चीज वापस देकर नहीं गया है।”
“तो?”
सुदामा की आँखों में एक अजीब-सा भरोसा था।
“वह मुझे मेरी ही भूली हुई याद वापस दिलाना चाहता है।”
दूत मुस्कुराया।
“शायद यही कृष्ण चाहते थे।”
सुदामा ने पूछा,
“क्या कृष्ण ने कहा है कि मैं अकेला जाऊँ?”
दूत कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
“नहीं।”
“तो?”
“उन्होंने कहा है कि इस बार सुदामा अकेला नहीं जाएगा।”
सुदामा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“मतलब?”
दूत ने कुछ नहीं कहा।
बस इतना बोला,
“आप गुरुकुल पहुँचेंगे तो समझ जाएँगे।”
यह कहकर वह वहाँ से चला गया।
सुदामा काफी देर तक उसे जाते हुए देखते रहे।
फिर उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा।
“लगता है कृष्ण ने इस बार भी कुछ छिपाकर रखा है।”
पत्नी मुस्कुराईं।
“तो पता कर आइए।”
सुदामा ने पोटली संभालकर रखी।
उनके चेहरे पर पहली बार डर नहीं था।
बल्कि एक अजीब-सी खुशी थी।
वह उस जगह वापस जाने वाले थे जहाँ से उनकी और कृष्ण की दोस्ती शुरू हुई थी।
शायद वहीं उन्हें उस पुराने वादे का जवाब मिलने वाला था।
लेकिन सुदामा नहीं जानते थे कि गुरुकुल में उनका इंतजार सिर्फ एक पुरानी याद नहीं कर रही थी।
वहाँ…
कृष्ण ने उनके लिए कुछ ऐसा छोड़ रखा था, जिसे देखकर सुदामा को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होने वाला था।
क्रमशः…
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