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टैग: #कृष्ण लीला#दोस्ती

  • वो वादा जो सुदामा भूल गया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

     

    अध्याय 12 — वो वादा जो सुदामा भूल गए थे

     

    “अब समय आ गया है, सुदामा।”

     

    द्वारका में कृष्ण खिड़की के पास खड़े थे।

     

    उधर सुदामा अपने घर में उसी छोटी-सी पोटली को सीने से लगाए बैठे थे।

     

    रात काफी हो चुकी थी, लेकिन उनकी आँखों में नींद नहीं थी।

     

    बार-बार उनके मन में कृष्ण की बातें घूम रही थीं।

     

    “एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी जिंदगी बहुत बदल जाएगी…”

     

    सुदामा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “लेकिन उसके बाद कृष्ण ने क्या कहा था?”

     

    वह जितना याद करने की कोशिश करते, उतना ही सब धुंधला होता जाता।

     

    उन्होंने करवट बदली।

     

    फिर उठकर बैठ गए।

     

    सामने वही पुरानी चीज रखी थी, जो कृष्ण ने भेजी थी।

     

    सुदामा ने उसे हाथ में लिया।

     

    “तुम्हारे अंदर ऐसा क्या छिपा है, जो मुझे इतने सालों बाद भी परेशान कर रहा है?”

     

    उन्हें खुद पर थोड़ी हँसी भी आई।

     

    “मैं भी ना… कृष्ण से मिलकर आया और अब उसके भेजे हुए सामान का रहस्य सुलझाने बैठ गया।”

     

    लेकिन अगले ही पल उनकी आँखें नम हो गईं।

     

    “कृष्ण ने इसे इतने साल संभालकर रखा…”

     

    उन्होंने उस चीज को हथेली में बंद कर लिया।

     

    “क्या उसे सच में मेरी इतनी याद आती रही होगी?”

     

    तभी पीछे से उनकी पत्नी की आवाज आई,

     

    “आप अभी तक सोए नहीं?”

     

    सुदामा ने पलटकर देखा।

     

    “नींद नहीं आ रही।”

     

    “क्यों?”

     

    “कृष्ण की वजह से।”

     

    पत्नी उनके पास आकर बैठ गईं।

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने पोटली उनकी तरफ बढ़ा दी।

     

    “ये देखो।”

     

    पत्नी ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “इसमें ऐसा क्या है?”

     

    “यही तो समझ नहीं आ रहा।”

     

    सुदामा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मुझे लगता है कृष्ण मुझे किसी पुरानी बात की याद दिलाना चाहता है।”

     

    “कौन-सी बात?”

     

    “एक वादा।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “आपने कृष्ण से कोई वादा किया था?”

     

    सुदामा ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “शायद।”

     

    “शायद?”

     

    “मुझे याद नहीं।”

     

    उनकी आवाज में परेशानी साफ थी।

     

    “यही बात मुझे अंदर से परेशान कर रही है। मैं कृष्ण के साथ बिताया एक-एक दिन याद कर सकता हूँ। हमें कब डाँट पड़ी, कब हम साथ हँसे, कब हमने चोरी से खाना खाया… सब याद है।”

     

    वह रुके।

     

    “लेकिन उस दिन की आखिरी बात याद नहीं।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “शायद सुबह तक याद आ जाए।”

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “काश।”

     

    अगली सुबह सूरज निकलते ही सुदामा उठ गए।

     

    उन्होंने सबसे पहले वह पोटली उठाई।

     

    वह उसे लेकर घर के बाहर उसी पुराने पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए, जो उनके पुराने घर के आँगन में भी था।

     

    उन्होंने आँखें बंद कीं।

     

    “चलो सुदामा… याद करो।”

     

    उन्होंने खुद से कहा।

     

    “गुरुकुल का आखिरी दिन।”

     

    धीरे-धीरे उन्हें सब दिखाई देने लगा।

     

    कृष्ण सामने खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में उदासी।

     

    सुदामा ने उस याद को पकड़ने की कोशिश की।

     

    कृष्ण कुछ कह रहे थे।

     

    “सुदामा…”

     

    सुदामा ने मन ही मन जवाब दिया,

     

    “हाँ कृष्ण?”

     

    फिर आवाज धुंधली हो गई।

     

    सुदामा ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    “नहीं… आगे क्या कहा था?”

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    इस बार उन्हें कृष्ण की आवाज थोड़ी साफ सुनाई दी।

     

    “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बिल्कुल अकेले हो…”

     

    सुदामा की आँखें खुल गईं।

     

    “हाँ!”

     

    उन्हें कुछ याद आया था।

     

    वह उत्साह में खड़े हो गए।

     

    “कृष्ण ने यही कहा था!”

     

    लेकिन आगे?

     

    वह फिर बैठ गए।

     

    “उसके बाद क्या कहा था?”

     

    उन्होंने आँखें बंद कीं।

     

    अचानक एक और याद सामने आई।

     

    कृष्ण उनका हाथ पकड़े हुए थे।

     

    “तुम चाहे जहाँ चले जाना…”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें…”

     

    आवाज फिर गायब हो गई।

     

    “क्या?”

     

    सुदामा बेचैन हो गए।

     

    “कृष्ण ने क्या कहा था?”

     

    उसी समय उनकी पत्नी बाहर आईं।

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    “मुझे थोड़ा याद आया है।”

     

    “क्या?”

     

    “कृष्ण ने कहा था कि अगर मुझे कभी लगे कि मैं अकेला हूँ, तो…”

     

    वह रुक गए।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “याद नहीं आ रहा।”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “इतने सालों से मेरे मन में ये बात थी और मुझे पता ही नहीं था।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “आपने उस दिन कृष्ण से क्या कहा था, वो याद है?”

     

    सुदामा ने सोचते हुए कहा,

     

    “मैंने उससे पूछा था… अगर हमारी जिंदगी बदल गई तो क्या हमारी दोस्ती भी बदल जाएगी?”

     

    “और कृष्ण ने?”

     

    सुदामा की आँखों में मुस्कान आ गई।

     

    “उसने कहा था—नहीं।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने कहा,

     

    “लेकिन शायद उसके बाद मैंने उससे कुछ और कहा था।”

     

    “क्या?”

     

    “शायद…”

     

    सुदामा की आँखें अचानक भर आईं।

     

    “मैंने कहा था कि अगर कभी मेरे बच्चे भूखे हों और मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ न हो…”

     

    उनकी आवाज काँपने लगी।

     

    “तो मैं कृष्ण को याद करूँगा।”

     

    पत्नी ने उनकी तरफ देखा।

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन मैंने कभी कृष्ण से मदद माँगने का सोचा ही नहीं था।”

     

    उन्होंने लंबी साँस ली।

     

    “मुझे लगता था कि दोस्ती में हिसाब नहीं होना चाहिए।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “और कृष्ण ने भी तो कोई हिसाब नहीं रखा।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “हाँ…”

     

    उसी समय दूर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    सुदामा ने पलटकर देखा।

     

    वही व्यक्ति था जो द्वारका से संदेश लेकर आया था।

     

    सुदामा खड़े हो गए।

     

    “तुम?”

     

    वह व्यक्ति उनके सामने आकर रुका।

     

    “मुझे आपसे एक बात कहनी है।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “कृष्ण का कोई और संदेश है?”

     

    उसने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “क्या कहा है उसने?”

     

    उस व्यक्ति ने कहा,

     

    “कृष्ण ने कहा है कि आपको उस पुराने वादे को याद करने के लिए अपने मन पर जोर डालने की जरूरत नहीं है।”

     

    सुदामा हैरान रह गए।

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने कहा है कि आपको बस गुरुकुल की उस आखिरी शाम को याद करना है।”

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “आखिरी शाम?”

     

    “हाँ।”

     

    “उस शाम ऐसा क्या हुआ था?”

     

    दूत ने कहा,

     

    “ये मुझे नहीं बताया गया।”

     

    सुदामा ने बेचैनी से पूछा,

     

    “तुम्हें कुछ और पता है?”

     

    दूत ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा,

     

    “बस इतना कहा गया है कि जो बात आपको याद करनी है, वह उसी जगह से जुड़ी है।”

     

    सुदामा ने तुरंत कहा,

     

    “कौन-सी जगह?”

     

    दूत ने जवाब दिया,

     

    “गुरुकुल।”

     

    सुदामा चुप हो गए।

     

    उनकी आँखों के सामने गुरुजी का आश्रम आ गया।

     

    वही पेड़।

     

    वही आँगन।

     

    वही रास्ता।

     

    और वही आखिरी शाम…

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे वहाँ जाना होगा।”

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा,

     

    “अभी?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    सुदामा ने पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि मेरा दोस्त मुझे कोई चीज वापस देकर नहीं गया है।”

     

    “तो?”

     

    सुदामा की आँखों में एक अजीब-सा भरोसा था।

     

    “वह मुझे मेरी ही भूली हुई याद वापस दिलाना चाहता है।”

     

    दूत मुस्कुराया।

     

    “शायद यही कृष्ण चाहते थे।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या कृष्ण ने कहा है कि मैं अकेला जाऊँ?”

     

    दूत कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “उन्होंने कहा है कि इस बार सुदामा अकेला नहीं जाएगा।”

     

    सुदामा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    दूत ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस इतना बोला,

     

    “आप गुरुकुल पहुँचेंगे तो समझ जाएँगे।”

     

    यह कहकर वह वहाँ से चला गया।

     

    सुदामा काफी देर तक उसे जाते हुए देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा।

     

    “लगता है कृष्ण ने इस बार भी कुछ छिपाकर रखा है।”

     

    पत्नी मुस्कुराईं।

     

    “तो पता कर आइए।”

     

    सुदामा ने पोटली संभालकर रखी।

     

    उनके चेहरे पर पहली बार डर नहीं था।

     

    बल्कि एक अजीब-सी खुशी थी।

     

    वह उस जगह वापस जाने वाले थे जहाँ से उनकी और कृष्ण की दोस्ती शुरू हुई थी।

     

    शायद वहीं उन्हें उस पुराने वादे का जवाब मिलने वाला था।

     

    लेकिन सुदामा नहीं जानते थे कि गुरुकुल में उनका इंतजार सिर्फ एक पुरानी याद नहीं कर रही थी।

     

    वहाँ…

     

    कृष्ण ने उनके लिए कुछ ऐसा छोड़ रखा था, जिसे देखकर सुदामा को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होने वाला था।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • पोटली में छिपा था राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अध्याय 11 — पोटली में छिपा था पुराना राज

    सुदामा के हाथ में वह छोटी-सी पोटली थी।

     

    उन्होंने उसे धीरे से खोला था।

     

    अंदर एक पुरानी-सी चीज रखी थी।

     

    उसे देखते ही सुदामा कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए।

     

    उनकी आँखों के सामने गुरुकुल के दिन घूमने लगे।

     

    वही मिट्टी का आँगन।

     

    वही पेड़।

     

    वही गुरुजी की आवाज।

     

    और उनके साथ बैठा कृष्ण।

     

    सुदामा ने उस चीज को हाथ में लेकर ध्यान से देखा।

     

    “ये तो…”

     

    उनकी आवाज वहीं रुक गई।

     

    उनकी पत्नी पास आकर बैठ गईं।

     

    “क्या है इसमें?”

     

    सुदामा ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह बस उस चीज को देखते रहे।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा,

     

    “ये कृष्ण के पास थी।”

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपको पूरा यकीन है?”

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “गुरुकुल में हम दोनों के पास ऐसी ही चीज थी।”

     

    “फिर ये कृष्ण ने आपको क्यों भेजी?”

     

    सुदामा के पास इसका जवाब नहीं था।

     

    उन्होंने पोटली में रखा छोटा-सा कागज उठाया।

     

    कागज बहुत साधारण था।

     

    उस पर बस कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।

     

    सुदामा ने पढ़ना शुरू किया।

     

    “मित्र, जो चीज तुम्हारे पास कभी थी, उसे मैंने इतने वर्षों से संभालकर रखा था। अब समय आ गया है कि वह तुम्हारे पास वापस आ जाए। लेकिन इसके साथ जुड़ी एक बात ऐसी है, जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।”

     

    सुदामा आगे पढ़ ही नहीं पाए।

     

    उनके हाथ काँपने लगे।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कागज उन्हें दे दिया।

     

    उन्होंने भी पढ़ा।

     

    दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “आखिर ऐसी कौन-सी बात है जो कृष्ण ने इतने साल छिपाकर रखी?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    फिर उन्होंने कागज पलटा।

     

    पीछे कुछ और लिखा था।

     

    “जब तुम गुरुकुल से गए थे, उस दिन तुमने मुझसे एक बात कही थी। शायद तुम्हें वह याद भी न हो। लेकिन मैंने उसे कभी नहीं भुलाया।”

     

    सुदामा अचानक उठकर खड़े हो गए।

     

    “मैंने क्या कहा था?”

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    वह पुराने दिनों को याद करने लगे।

     

    गुरुकुल से विदाई का दिन…

     

    कृष्ण और सुदामा रास्ते के उस मोड़ पर खड़े थे जहाँ से दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे।

     

    सुदामा ने तब कृष्ण से क्या कहा था?

     

    बहुत सोचने के बाद उन्हें कुछ याद आया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “मैंने कहा था…”

     

    वह रुक गए।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैंने कृष्ण से कहा था कि अगर कभी मेरी जिंदगी में ऐसा समय आए जब मैं अपने परिवार के लिए कुछ न कर पाऊँ… तो मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे कम से कम इतना जरूर जानें कि उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी।”

     

    पत्नी चुप रह गईं।

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन मुझे नहीं लगता कि कृष्ण को वह बात याद होगी।”

     

    तभी पीछे से उनके बेटे की आवाज आई,

     

    “पिताजी, कृष्ण कौन हैं?”

     

    सुदामा ने पलटकर बेटे को देखा।

     

    उन्होंने उसे अपने पास बुलाया।

     

    “कृष्ण मेरे बहुत पुराने दोस्त हैं।”

     

    बेटे ने पूछा,

     

    “क्या वो वही हैं जिन्होंने हमारा घर दिया?”

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    “तो क्या वो बहुत अच्छे हैं?”

     

    सुदामा ने बिना सोचे कहा,

     

    “बहुत अच्छे।”

     

    बेटे ने फिर पूछा,

     

    “क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?”

     

    सुदामा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “जरूर। कभी मौका मिला तो तुम्हें उनसे जरूर मिलवाऊँगा।”

     

    उसी समय बाहर से आवाज आई।

     

    “सुदामा जी!”

     

    सुदामा बाहर आए।

     

    वही आदमी खड़ा था जो पोटली लेकर आया था।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    उसने कहा,

     

    “मैं द्वारका से आया हूँ।”

     

    “लेकिन कृष्ण ने तुम्हें यहाँ क्यों भेजा?”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “मुझे सिर्फ संदेश देने के लिए भेजा गया है।”

     

    “कौन-सा संदेश?”

     

    उसने कहा,

     

    “कृष्ण ने कहा है कि अगर सुदामा पोटली खोल लें, तो उन्हें कहना कि वह उसमें रखी चीज को ध्यान से देखें।”

     

    सुदामा ने वह चीज फिर हाथ में ली।

     

    “इसमें ऐसा क्या है?”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हें कुछ भी नहीं बताया गया?”

     

    “नहीं।”

     

    सुदामा ने ध्यान से उस वस्तु को देखा।

     

    वह बहुत पुरानी थी।

     

    किनारे थोड़े घिस चुके थे।

     

    लेकिन उस पर एक निशान बना हुआ था।

     

    सुदामा ने निशान देखते ही उसे पहचान लिया।

     

    “ये निशान…”

     

    उनके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    आदमी ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने तुरंत अंदर जाकर अपनी पुरानी संदूकची खोली।

     

    उसमें उनके पास कुछ पुराने कपड़े और गुरुकुल की याद से जुड़ी छोटी-मोटी चीजें थीं।

     

    उन्होंने उसमें से एक कपड़े में लिपटी चीज निकाली।

     

    दोनों चीजों को पास रखकर देखा।

     

    निशान बिल्कुल एक जैसा था।

     

    सुदामा की साँस जैसे रुक गई।

     

    “ये दोनों एक ही चीज का हिस्सा हैं।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “तो कृष्ण ने आपको इसका दूसरा हिस्सा भेजा है?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    अब रहस्य और गहरा हो चुका था।

     

    कृष्ण ने वह चीज इतने साल संभालकर क्यों रखी?

     

    और उसके दूसरे हिस्से को सुदामा के पास क्यों भेजा?

     

    सुदामा ने तुरंत कागज उठाया और दोबारा पढ़ा।

     

    इस बार नीचे एक और छोटी पंक्ति दिखाई दी, जो पहले उनकी नजर से छूट गई थी।

     

    उन्होंने पढ़ा—

     

    “जब समय सही होगा, तुम्हें समझ आएगा कि हमारी दोस्ती सिर्फ गुरुकुल की याद नहीं थी। उस दिन हमने एक वादा किया था… और वह वादा अभी पूरा होना बाकी है।”

     

    सुदामा कुछ देर तक उस कागज को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण ने इतने साल बाद ये बात क्यों याद दिलाई?”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या आपको वह वादा याद है?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    सुदामा ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “शायद कृष्ण चाहता है कि मैं खुद याद करूँ।”

     

    उसी रात सुदामा सो नहीं पाए।

     

    वह बार-बार उस पुरानी चीज को देखते रहे।

     

    उन्हें गुरुकुल का हर छोटा-बड़ा पल याद आने लगा।

     

    लेकिन वह वादा…

     

    उन्हें कुछ भी याद नहीं आ रहा था।

     

    आखिर आधी रात को उन्हें एक धुंधली-सी बात याद आई।

     

    गुरुकुल के आखिरी दिन कृष्ण ने उनसे कहा था—

     

    “सुदामा, एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी जिंदगी बहुत बदल जाएगी।”

     

    सुदामा ने तब हँसकर कहा था,

     

    “तो क्या तुम मुझे भूल जाओगे?”

     

    कृष्ण ने जवाब दिया था,

     

    “अगर मैं तुम्हें भूल गया, तो मैं कृष्ण कैसे रहूँगा?”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    लेकिन उसके बाद क्या हुआ था?

     

    उन्हें याद नहीं था।

     

    अचानक उन्हें लगा कि शायद उस दिन की कोई बात उनके मन से जानबूझकर छूट गई है।

     

    और अब कृष्ण ने वही पुराना राज फिर से उनके सामने रख दिया था।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “कृष्ण… आखिर तुमने उस दिन मुझसे ऐसा क्या वादा किया था?”

     

    दूर द्वारका में कृष्ण खिड़की के पास खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “अब समय आ गया है, सुदामा।”

     

    “अब तुम्हें खुद याद करना होगा…”

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 3 गुरु माता की आज्ञा

    पढ़ने का समय : 10 मिनट
    • अध्याय 3 — गुरु माता की आज्ञा और मित्रता की परीक्षा

     

    जंगल में बिताई उस रात के बाद कृष्ण और सुदामा की मित्रता पहले से भी अधिक गहरी हो गई थी।

     

    अब आश्रम के दूसरे शिष्य भी अक्सर उनकी दोस्ती की चर्चा करते थे। सभी जानते थे कि दोनों का स्वभाव अलग है, जीवन अलग है और सोचने का तरीका भी अलग है, लेकिन फिर भी दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।

     

    सुदामा शांत था और कृष्ण चंचल।

     

    सुदामा किसी काम को शुरू करने से पहले कई बार सोचता था, जबकि कृष्ण मुस्कुराते हुए सबसे कठिन काम भी कर देते थे।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—वे एक-दूसरे के लिए सच्चे मन से समर्पित थे।

     

    उस सुबह आश्रम में रोज की तरह काम चल रहा था। कुछ शिष्य नदी से जल भरकर ला रहे थे। कुछ पेड़ों के नीचे बैठकर पाठ याद कर रहे थे। कृष्ण और सुदामा आश्रम के आँगन की सफाई कर रहे थे।

     

    कृष्ण झाड़ू चलाते हुए धीरे-धीरे कोई धुन गुनगुना रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, तुम कोई काम बिना गाना गाए नहीं कर सकते क्या?”

     

    कृष्ण ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “कर सकता हूँ।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल कृष्ण ने कहा, “लेकिन फिर काम इतना मजेदार नहीं रहेगा।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हारे लिए हर काम खेल ही है।”

     

    “और तुम्हारे लिए हर काम परीक्षा है।”

     

    “क्योंकि मैं जिम्मेदारी समझता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “और मैं खुशी समझता हूँ।”

     

    सुदामा ने झाड़ू एक तरफ रखते हुए कहा, “जिम्मेदारी और खुशी दोनों साथ हो सकती हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो तुम भी धीरे-धीरे मेरी तरह समझदार हो रहे हो।”

     

    “तुम्हारी तरह?”

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “कृष्ण, तुम कभी-कभी खुद को बहुत महान समझते हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी नहीं, सुदामा। हमेशा।”

     

    दोनों जोर से हँस पड़े।

     

    उसी समय गुरु माता वहाँ आईं।

     

    दोनों तुरंत शांत हो गए और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम दोनों से एक काम है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “बताइए माता।”

     

    गुरु माता ने एक कपड़े की छोटी पोटली उनकी ओर बढ़ाई।

     

    “इसमें कुछ भोजन है। जंगल के उस पार रहने वाले एक वृद्ध साधु कई दिनों से अस्वस्थ हैं। मैंने उनके लिए यह भोजन तैयार किया है। तुम दोनों यह उनके पास पहुँचा आओ।”

     

    सुदामा ने पोटली हाथ में ली।

     

    “हम अभी चले जाते हैं, माता।”

     

    गुरु माता ने कहा, “ध्यान रखना, जंगल का रास्ता लंबा है। इस बार देर मत करना।”

     

    कृष्ण ने सुदामा की ओर देखकर आँख दबाई।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “माता, मैं ध्यान रखूँगा।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मतलब तुम मुझ पर ध्यान रखोगे।”

     

    दोनों ने गुरु माता का आशीर्वाद लिया और यात्रा पर निकल पड़े।

     

    सुबह का समय था।

     

    रास्ते में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा के हाथ में भोजन की पोटली थी और कृष्ण एक पतली लकड़ी हाथ में घुमाते हुए चल रहे थे।

     

    कुछ दूरी चलने के बाद कृष्ण ने पूछा, “सुदामा, तुम्हें पता है इस पोटली में क्या है?”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो खोलकर देख लेते हैं।”

     

    सुदामा ने तुरंत पोटली को पीछे कर लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह हमारे लिए नहीं है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं सिर्फ देखने की बात कर रहा हूँ।”

     

    “तुम्हें मैं जानता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “क्या जानता हो?”

     

    “पहले तुम कहोगे सिर्फ देख लेते हैं, फिर कहोगे सिर्फ थोड़ा सा चख लेते हैं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तुम मुझे गलत समझते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह समझता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    जंगल में प्रवेश करते ही रास्ता थोड़ा कठिन हो गया।

     

    कुछ जगह पेड़ गिरे हुए थे। कहीं-कहीं घनी झाड़ियाँ थीं।

     

    लेकिन दोनों एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने कहा, “थोड़ी देर आराम कर लें?”

     

    सुदामा ने कहा, “हमारे पास समय कम है।”

     

    “थोड़ा सा आराम करने से समय नहीं रुक जाएगा।”

     

    “और चलते रहने से समय बढ़ भी नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे साथ बहस करना बहुत कठिन है।”

     

    “तो मत किया करो।”

     

    “लेकिन तुम्हारे बिना किससे करूँ?”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने पास रख दिया।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर देखा।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कृष्ण!”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारी आँखें सब बता रही हैं।”

     

    “मेरी आँखें क्या कह रही हैं?”

     

    “कि तुम्हें भूख लगी है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “थोड़ी सी।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी पोटली निकाली।

     

    उसमें कुछ सूखे दाने थे, जो वह सुबह अपने साथ लेकर आया था।

     

    उसने उन्हें कृष्ण की ओर बढ़ाया।

     

    “लो।”

     

    कृष्ण ने पूछा, “और तुम?”

     

    “हम दोनों बाँटकर खाएँगे।”

     

    कृष्ण ने कुछ दाने लिए और बाकी सुदामा की ओर बढ़ा दिए।

     

    “तुम भी।”

     

    सुदामा ने कहा, “मैंने तुमसे कहा था, ये कम हैं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जो चीज मित्र के साथ बाँटी जाए, वह कम नहीं लगती।”

     

    सुदामा को उनकी पुरानी बात याद आ गई।

     

    उसने कहा, “तुम यह बात पहले भी कह चुके हो।”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा, “अच्छी बातें दोहराने में क्या बुराई है?”

     

    कुछ देर बाद दोनों फिर चल पड़े।

     

    दोपहर होते-होते मौसम बदलने लगा।

     

    आसमान में बादल आ गए।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “इस बार हम रास्ता नहीं भूलेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “इस बार भूलना ही मत।”

     

    लेकिन कुछ ही समय बाद तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    सुदामा ने भोजन की पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “हमें जल्दी चलना चाहिए।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ।”

     

    दोनों तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।

     

    तभी रास्ते में एक बूढ़े व्यक्ति दिखाई दिए।

     

    वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    उनके कपड़े गीले हो चुके थे और वह बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    सुदामा तुरंत उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    वृद्ध ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं कई घंटों से यहाँ बैठा हूँ। मेरे पैर में चोट लग गई है।”

     

    कृष्ण ने उनके पैर की ओर देखा।

     

    “आप अकेले हैं?”

     

    वृद्ध ने सिर हिला दिया।

     

    सुदामा ने चिंता से कृष्ण की ओर देखा।

     

    “हमें साधु के पास भी पहुँचना है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “पहले इनकी सहायता करते हैं।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन गुरु माता ने भोजन समय पर पहुँचाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “और अगर किसी जरूरतमंद को हमारे सामने सहायता चाहिए, तो क्या हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाएँ?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसे कृष्ण की बात सही लगी।

     

    दोनों ने वृद्ध को सहारा देकर सुरक्षित जगह बैठाया।

     

    सुदामा ने अपनी पोटली से थोड़ा पानी उन्हें दिया।

     

    कृष्ण ने आसपास से कुछ पत्ते और लकड़ी लाकर उनके पैर को सहारा दिया।

     

    बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    अब दोनों को चिंता होने लगी कि भोजन की पोटली भीग न जाए।

     

    सुदामा ने उसे अपने कपड़े के अंदर सुरक्षित कर लिया।

     

    कुछ देर बाद वृद्ध ने कहा, “तुम दोनों कौन हो?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “दो मित्र।”

     

    वृद्ध ने पूछा, “और कहाँ जा रहे हो?”

     

    सुदामा ने बताया कि वे गुरु माता के कहने पर भोजन लेकर जा रहे हैं।

     

    वृद्ध ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों पहले अपने काम पर जा सकते थे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम ऐसा करते, तो हमारा काम अधूरा रहता।”

     

    वृद्ध की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा, “याद रखना, बेटा। दूसरों के लिए किया गया छोटा सा कार्य भी जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा बन सकता है।”

     

    कुछ समय बाद रास्ते से कुछ लोग गुजरे।

     

    कृष्ण और सुदामा ने उनसे वृद्ध की सहायता करने को कहा।

     

    अब दोनों फिर अपने रास्ते पर आगे बढ़े।

     

    लेकिन बारिश तेज हो चुकी थी।

     

    रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    सुदामा कई बार फिसलते-फिसलते बचा।

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “धीरे चलो।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने ही तो जल्दी चलने को कहा था।”

     

    “जल्दी का मतलब उड़ना नहीं होता।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    कठिन रास्ते के बाद आखिरकार दोनों उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वृद्ध साधु रहते थे।

     

    साधु एक छोटी सी कुटिया के बाहर बैठे थे।

     

    उन्हें देखकर सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

     

    “गुरु माता ने आपके लिए भोजन भेजा है।”

     

    साधु ने पोटली स्वीकार की।

     

    उन्होंने दोनों को ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों बहुत देर से आए हो।”

     

    सुदामा तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्षमा कीजिए, रास्ते में…”

     

    कृष्ण ने कहा, “रास्ते में एक वृद्ध व्यक्ति घायल मिले थे। हम उनकी सहायता करने के लिए रुक गए।”

     

    साधु कुछ देर शांत रहे।

     

    फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “तो तुम देर से नहीं आए, पुत्रों। तुम सही समय पर पहुँचे।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    साधु बोले, “जो व्यक्ति दूसरों की पीड़ा देखकर रुकना जानता है, वह जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीख चुका होता है।”

     

    सुदामा के मन में खुशी हुई।

     

    लेकिन अब एक नई चिंता थी।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    उन्हें वापस आश्रम पहुँचना था।

     

    दोनों जल्दी से वापस चल पड़े।

     

    रास्ते में सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर गुरु माता हमसे नाराज़ हुईं तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो हम सच बता देंगे।”

     

    “और अगर उन्होंने कहा कि हमें पहले अपना काम पूरा करना चाहिए था?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो हम उनसे सीखेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम हर बात को इतना आसान कैसे बना देते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि कठिन बातों को कठिन सोचते रहने से वे और कठिन हो जाती हैं।”

     

    दोनों चलते रहे।

     

    रात होने से पहले वे आश्रम पहुँच गए।

     

    गुरु माता उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    “माता…”

     

    गुरु माता ने पूछा, “तुम दोनों देर से क्यों आए?”

     

    सुदामा कुछ कहता, उससे पहले कृष्ण ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    गुरु माता ध्यान से सुनती रहीं।

     

    सुदामा सिर झुकाए खड़ा रहा।

     

    कुछ क्षणों तक वहाँ शांति रही।

     

    फिर गुरु माता ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम दोनों ने आज वही किया, जो एक सच्चे विद्यार्थी को करना चाहिए।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।

     

    उस रात दोनों आश्रम के बाहर बैठे थे।

     

    आसमान साफ हो चुका था।

     

    तारे चमक रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “आज अगर तुम न होते तो शायद मैं उस वृद्ध की सहायता किए बिना आगे बढ़ जाता।”

     

    कृष्ण ने कहा, “और अगर तुम न होते, तो शायद मैं उसे अकेले सहारा नहीं दे पाता।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हमेशा मुझे अपने बराबर क्यों समझते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मित्रता में बराबरी नहीं समझनी पड़ती, सुदामा। मित्र बस मित्र होता है।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “मैं हमेशा तुम्हारा मित्र रहूँगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जानता हूँ।”

     

    दोनों कुछ देर तक शांत बैठे रहे।

     

    उन्हें नहीं पता था कि समय धीरे-धीरे उन्हें उनके जीवन की अलग-अलग राहों की ओर ले जा रहा था।

     

    अभी उनके पास साथ बिताने के लिए कई दिन थे।

     

    कई बातें थीं।

     

    कई यादें थीं।

     

    लेकिन एक दिन ऐसा भी आने वाला था, जब गुरुकुल की शिक्षा पूरी होगी और दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना पड़ेगा।

     

    और उस दिन…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।

     

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 2 मित्रता की पहली परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 2 — गुरुकुल के दिन और मित्रता की पहली परीक्षा

     

    गुरुकुल में कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही थी।

     

    अब ऐसा शायद ही कोई दिन गुजरता, जब दोनों एक साथ न दिखाई दें। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना हो, नदी से जल भरकर लाना हो, आश्रम की सफाई करनी हो या गुरु सांदीपनि के सामने बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी हो—दोनों हर काम साथ करते थे।

     

    हालाँकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

     

    सुदामा शांत और गंभीर था। वह हर बात को सोच-समझकर करता था। उसे नियमों का पालन करना पसंद था। दूसरी ओर कृष्ण हर काम में मुस्कान ढूँढ लेते थे। उनके भीतर एक अलग ही चंचलता थी। लेकिन जब बात किसी अपने की आती, तो वही चंचल कृष्ण सबसे अधिक गंभीर हो जाते थे।

     

    एक सुबह सुदामा नदी से जल भरकर लौट रहा था। उसके हाथ में मिट्टी का घड़ा था। रास्ता थोड़ा फिसलन भरा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह संभलते-संभलते जमीन पर गिर गया।

     

    घड़ा उसके हाथ से छूटकर टूट गया।

     

    सुदामा कुछ क्षण वहीं बैठा रह गया।

     

    उसे घड़े के टूटने का दुख कम था, लेकिन उसे डर था कि अब उसे आश्रम लौटकर क्या कहना होगा।

     

    तभी पीछे से कृष्ण की आवाज आई।

     

    “सुदामा!”

     

    सुदामा ने मुड़कर देखा। कृष्ण दौड़ते हुए उसके पास आ रहे थे।

     

    “तुम ठीक तो हो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ।”

     

    कृष्ण ने टूटे हुए घड़े की ओर देखा।

     

    “और यह?”

     

    “यह ठीक नहीं है,” सुदामा ने उदास होकर कहा।

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    सुदामा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं, मुझे तुम्हारा चेहरा देखकर हँसी आ रही है। तुम ऐसे परेशान हो जैसे पूरे आश्रम का जल समाप्त हो गया हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “गुरु माता ने मुझे घड़ा संभालकर लाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तो चलो, नया घड़ा लेते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    “अगर किसी ने पूछा कि पुराना घड़ा कैसे टूटा?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तो सच बता देना।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “कभी-कभी सच बोलना आसान नहीं होता।”

     

    कृष्ण का चेहरा शांत हो गया।

     

    उन्होंने कहा, “सुदामा, सच बोलने के बाद मिलने वाली डाँट कुछ समय के लिए होती है, लेकिन झूठ बोलने का बोझ मन पर बहुत समय तक रहता है।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    उसे लगा जैसे कृष्ण उससे उम्र में छोटे नहीं, बल्कि बहुत अधिक समझदार हों।

     

    दोनों वापस आश्रम आए और गुरु माता को सब बता दिया।

     

    गुरु माता ने पहले सुदामा को ध्यान से देखा, फिर कृष्ण को।

     

    “तुम दोनों ने सच बताया, इसलिए मैं नाराज़ नहीं हूँ। अगली बार सावधान रहना।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    आश्रम से बाहर आते ही कृष्ण ने कहा, “देखा? मैंने कहा था ना, सच बोलने से मन हल्का हो जाता है।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “लेकिन तुमने मुझे पहले ही डराना क्यों शुरू कर दिया था?”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “मैंने कब डराया?”

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे तुम सब कुछ पहले से जानते हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।

     

    “अगर मैं सब कुछ जानता होता, तो तुम्हारा घड़ा टूटने से पहले तुम्हें रोक देता।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उस दिन के बाद सुदामा ने महसूस किया कि कृष्ण केवल उसके मित्र नहीं थे। वह उसके जीवन में एक ऐसे साथी बनते जा रहे थे, जिनसे वह अपनी हर बात कह सकता था।

     

    लेकिन गुरुकुल का जीवन केवल हँसी और खेल का नाम नहीं था।

     

    वहाँ हर दिन कुछ नया सीखना पड़ता था।

     

    एक दिन गुरु सांदीपनि सभी शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे।

     

    उन्होंने कहा, “मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका धन, शक्ति या परिवार नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म होते हैं।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, अगर कोई व्यक्ति बहुत गरीब हो, तो क्या लोग उसे हमेशा छोटा समझेंगे?”

     

    सुदामा अचानक चुप हो गया।

     

    उसे लगा जैसे यह प्रश्न उसके अपने मन का हो।

     

    गुरु सांदीपनि ने उत्तर दिया, “गरीबी किसी मनुष्य को छोटा नहीं बनाती। छोटा मनुष्य तब बनता है, जब उसके विचार छोटे हो जाते हैं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    पाठ समाप्त होने के बाद कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम कुछ सोच रहे हो?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम जब भी दुखी होते हो, यही कहते हो।”

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “कृष्ण, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम दोनों बहुत अलग हैं?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किस बात में?”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हारा परिवार बड़ा है। लोग तुम्हें प्रेम करते हैं। और मैं…”

     

    वह रुक गया।

     

    कृष्ण ने कहा, “और तुम मेरे मित्र हो।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में कौन बड़ा और कौन छोटा होता है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोला।

     

    कृष्ण आगे बोले, “अगर तुम्हारे पास धन नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है। तुम्हारे पास एक सच्चा मन है, ज्ञान पाने की इच्छा है और अपने मित्र के लिए प्रेम है। क्या यह कम है?”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर सब आसान लगने लगता है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “तो फिर तुम रोज मुझसे बातें किया करो।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    कुछ दिन बाद गुरु माता ने कृष्ण और सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर चिंता थी।

     

    “आश्रम के लिए कुछ सूखी लकड़ियों की आवश्यकता है। जंगल से लकड़ियाँ लानी होंगी।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “हम दोनों जाएँगे।”

     

    सुदामा ने भी सिर हिला दिया।

     

    गुरु माता ने कहा, “जंगल थोड़ा दूर है। समय पर लौट आना।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “चिंता मत कीजिए, माता।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि जब भी कृष्ण कहते हैं कि चिंता मत कीजिए, तब कुछ न कुछ जरूर होने वाला होता है।

     

    दोनों सुबह-सुबह जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते भर कृष्ण बातें करते रहे।

     

    कभी किसी पक्षी की आवाज की नकल करते, कभी पेड़ पर लगे फलों को देखकर अनुमान लगाते कि कौन सा फल मीठा होगा।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, हम लकड़ियाँ लेने जा रहे हैं या घूमने?”

     

    कृष्ण ने कहा, “दोनों काम साथ-साथ हो सकते हैं।”

     

    “लेकिन गुरु माता ने कहा था कि जल्दी लौटना है।”

     

    “तो जल्दी लौटेंगे।”

     

    “तुम्हारे लिए जल्दी का मतलब क्या है?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जब तुम परेशान होने लगो।”

     

    सुदामा ने सिर पकड़ लिया।

     

    जंगल पहुँचने के बाद दोनों सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ ही समय में उनके पास काफी लकड़ियाँ हो गईं।

     

    सुदामा ने कहा, “अब चलें?”

     

    कृष्ण ने कहा, “बस थोड़ी और।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने यही बात आधा समय पहले भी कही थी।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी आसमान में अचानक काले बादल छा गए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, मुझे लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कुछ ही क्षणों में तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों ने लकड़ियों को एक साथ बाँधा और पेड़ों के बीच सुरक्षित जगह ढूँढने लगे।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कुछ समय बाद दोनों को एहसास हुआ कि वे आश्रम का रास्ता भूल चुके हैं।

     

    सुदामा घबरा गया।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने कहा, “कुछ नहीं होगा।”

     

    “लेकिन हमें रास्ता नहीं पता।”

     

    “तो रास्ता ढूँढेंगे।”

     

    “और अगर रात हो गई?”

     

    “तो सुबह होने तक इंतजार करेंगे।”

     

    “और अगर कोई जंगली जानवर आ गया?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम एक ही बार में इतनी सारी चिंताएँ कहाँ से ढूँढ लेते हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “क्योंकि तुम बिल्कुल चिंता नहीं करते।”

     

    कृष्ण कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले, “सुदामा, चिंता और सावधानी में अंतर होता है। सावधान रहना जरूरी है, लेकिन हर समय डरते रहना हमें कमजोर कर देता है।”

     

    बारिश लगातार हो रही थी।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा काँपने लगा।

     

    कृष्ण ने अपनी ओर का कपड़ा उसके कंधों पर रख दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, तुम्हें ठंड लगेगी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में हिसाब नहीं रखा जाता।”

     

    सुदामा कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली और उनके ऊपर की कुछ सूखी शाखाएँ टूटकर नीचे गिर गईं।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    अब जंगल और भी डरावना लगने लगा।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “कृष्ण, मुझे डर लग रहा है।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    धीरे-धीरे शाम होने लगी।

     

    आसमान अंधेरा हो गया।

     

    आश्रम में गुरु सांदीपनि और गुरु माता दोनों चिंतित थे।

     

    “दोनों अभी तक लौटे नहीं,” गुरु माता ने कहा।

     

    गुरु सांदीपनि ने कुछ शिष्यों को बुलाया।

     

    “तुम लोग उन्हें खोजने जाओ।”

     

    उधर जंगल में कृष्ण और सुदामा एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    सुदामा ने अपना सिर पेड़ से टिकाया।

     

    “अगर हम आज वापस नहीं पहुँचे तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हम पहुँचेंगे।”

     

    “तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ। तुम मेरे साथ हो।”

     

    सुदामा की आँखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ देर बाद उसने कहा, “और मैं इसलिए नहीं डर रहा क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो फिर हम दोनों ठीक हैं।”

     

    रात बीतती रही।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।

     

    सुबह होने के कुछ समय बाद आश्रम के शिष्यों की आवाज सुनाई दी।

     

    “कृष्ण! सुदामा!”

     

    सुदामा तुरंत खड़ा हो गया।

     

    “वे हमें ढूँढ रहे हैं!”

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि स्वयं वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने दोनों को देखा।

     

    “तुम दोनों ठीक हो?”

     

    कृष्ण और सुदामा ने एक साथ सिर हिलाया।

     

    गुरु सांदीपनि ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “तुम दोनों पूरी रात यहाँ रहे?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    गुरु ने पूछा, “डर नहीं लगा?”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    फिर मुस्कुराकर कहा, “लगा था… लेकिन मैं अकेला नहीं था।”

     

    कृष्ण ने भी सुदामा की ओर देखा।

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    उस दिन आश्रम लौटते समय सुदामा के मन में एक बात हमेशा के लिए बस गई।

     

    जीवन में कितनी भी कठिन राह क्यों न हो…

     

    अगर साथ में एक सच्चा मित्र हो, तो डर आधा हो जाता है।

     

    लेकिन सुदामा नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में उसकी और कृष्ण की मित्रता को एक और बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।

     

    एक ऐसी घटना…

     

    जिसे वर्षों बाद भी सुदामा भूल नहीं पाएगा।

     

    और शायद वही घटना उनके बीच की मित्रता को हमेशा के लिए अमर कर देगी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • श्री कृष्ण ओर सुदामा की मित्रता की कहानी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अध्याय 1 — दो मित्रों की पहली मुलाकात

    बहुत समय पहले की बात है। भारत की धरती पर अनेक छोटे-बड़े राज्य बसे हुए थे। उन्हीं दिनों दो ऐसे बालक थे, जिनकी जिंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। एक ओर थे द्वारका के भावी नायक, वसुदेव और देवकी के पुत्र श्री कृष्ण, जिनका बचपन गोकुल और वृंदावन की गलियों में बीता था। दूसरी ओर था एक साधारण ब्राह्मण बालक—सुदामा।

     

    सुदामा का जीवन बहुत साधारण था। उसके पास धन-दौलत नहीं थी, न ही सुंदर वस्त्र और न ही कोई बड़ा घर। लेकिन उसके पास एक बहुत बड़ी चीज थी—ज्ञान पाने की इच्छा और एक सच्चा, निर्मल हृदय।

     

    जब सुदामा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके माता-पिता ने सोचा कि उसे शिक्षा के लिए एक अच्छे गुरु के आश्रम में भेजना चाहिए। उस समय गुरुकुल में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती थी। वहाँ बच्चों को जीवन जीना, मेहनत करना, बड़ों का सम्मान करना और हर परिस्थिति में धैर्य रखना भी सिखाया जाता था।

     

    इसलिए एक दिन सुदामा अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर गुरु सांदीपनि के आश्रम की ओर चल पड़ा।

     

    उसके पास सामान के नाम पर बहुत कम चीजें थीं। एक छोटा सा कपड़े का थैला, पहनने के लिए साधारण वस्त्र और मन में ज्ञान पाने का सपना।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह आश्रम पहुँचा।

     

    आश्रम प्रकृति के बीच बसा हुआ था। वहाँ अनेक बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। कोई जल भर रहा था, कोई लकड़ियाँ ला रहा था और कोई गुरु के सामने बैठकर पाठ सीख रहा था।

     

    सुदामा ने आश्रम में प्रवेश किया और गुरु सांदीपनि के सामने जाकर हाथ जोड़ दिए।

     

    “गुरुदेव, मैं आपके पास शिक्षा प्राप्त करने आया हूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि ने उस दुबले-पतले बालक को ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हारा नाम क्या है, पुत्र?”

     

    “सुदामा।”

     

    “और तुम शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहते हो?”

     

    सुदामा ने बिना देर किए उत्तर दिया, “ताकि मैं ज्ञानवान बन सकूँ और जीवन में सही मार्ग पर चल सकूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    “ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं मिलता, सुदामा। ज्ञान पाने के लिए मन को भी सच्चा रखना पड़ता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं प्रयास करूँगा, गुरुदेव।”

     

    उसी दिन सुदामा को आश्रम में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    उस शाम वह अपने नए स्थान को समझने की कोशिश कर रहा था। बहुत से बालक आपस में पहले से मित्र थे। कोई खेल रहा था, कोई बातें कर रहा था। सुदामा थोड़ा संकोची स्वभाव का था। वह चुपचाप एक पेड़ के पास बैठ गया।

     

    तभी उसके पास एक बालक आया।

     

    उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी। उसकी आँखों में शरारत भी थी और एक अजीब सी अपनापन भी।

     

    उसने सुदामा के पास बैठते हुए पूछा, “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “नाम?”

     

    “सुदामा।”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    “मैं कृष्ण हूँ।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम भी आज ही आए हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “नहीं, लेकिन हर दिन नया ही लगता है।”

     

    सुदामा को उसका उत्तर समझ नहीं आया, लेकिन वह मुस्कुरा दिया।

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने सुदामा के कपड़ों की ओर देखा। वे साधारण और पुराने थे। सुदामा को लगा कि शायद अब यह बालक भी उसका मजाक उड़ाएगा, जैसे कई बच्चे कभी-कभी करते थे।

     

    लेकिन कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपने पास रखा फल निकालकर सुदामा की ओर बढ़ाया।

     

    “भूख लगी है?”

     

    सुदामा ने संकोच से कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अगर तुम्हें नहीं चाहिए तो मैं अकेले खा लूँगा। लेकिन फिर मुझे बहुत बुरा लगेगा।”

     

    सुदामा उनकी बात सुनकर हँस पड़ा।

     

    “तुम अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत चुप रहते हो,” कृष्ण ने तुरंत कहा।

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    शायद उसी छोटी सी हँसी के साथ एक ऐसी मित्रता की शुरुआत हुई, जो समय के साथ और गहरी होने वाली थी।

     

    अगले दिन से दोनों का साथ बढ़ने लगा।

     

    सुबह जल्दी उठना, नदी से जल लाना, आश्रम की सफाई करना, गुरु के पास बैठकर शिक्षा लेना—धीरे-धीरे दोनों हर काम साथ करने लगे।

     

    कृष्ण किसी भी काम को बोझ की तरह नहीं लेते थे।

     

    एक दिन गुरु माता ने सभी बालकों से कहा कि आश्रम के लिए जंगल से सूखी लकड़ियाँ लेकर आनी हैं।

     

    कई बालक अपने-अपने साथियों के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा से कहा, “चलो, हम भी चलते हैं।”

     

    सुदामा ने लकड़ियाँ बाँधने के लिए रस्सी उठाई और दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में कृष्ण कभी पेड़ों को देखते, कभी पक्षियों की आवाज सुनते और कभी कोई मजेदार बात कह देते।

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हर समय इतने खुश कैसे रहते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि दुख आने से पहले ही अगर हम दुखी हो जाएँ, तो खुशी कब मिलेगी?”

     

    सुदामा कुछ देर तक उस बात को सोचता रहा।

     

    जंगल पहुँचकर दोनों लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ समय बाद अचानक आसमान में बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने चिंतित होकर कहा, “कृष्ण, हमें जल्दी वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    सुदामा ने अपने छोटे से कपड़े के थैले को सीने से लगा लिया।

     

    कृष्ण ने पूछा, “उसमें क्या है?”

     

    सुदामा थोड़ा घबरा गया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने शरारत से कहा, “कुछ नहीं है तो इतनी मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है?”

     

    सुदामा चुप रहा।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अच्छा, ठीक है। मत बताओ।”

     

    कुछ देर बाद सुदामा ने धीरे से कहा, “मेरी माँ ने रास्ते के लिए थोड़े से चने दिए हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो हम दोनों मिलकर खाएँगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन ये बहुत कम हैं।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    सुदामा ने थैले से चने निकाले और दोनों ने उन्हें बाँटकर खा लिया।

     

    उस दिन पहली बार सुदामा ने महसूस किया कि उसके सामने बैठा यह मित्र दूसरे लोगों से अलग है।

     

    कृष्ण ने कभी उससे यह नहीं पूछा कि वह गरीब क्यों है।

     

    कभी उसके कपड़ों पर हँसे नहीं।

     

    कभी यह नहीं कहा कि उसके पास क्या नहीं है।

     

    वह बस उसके साथ रहते थे।

     

    बारिश कम हुई तो दोनों आश्रम लौट आए।

     

    लेकिन आश्रम पहुँचने पर पता चला कि गुरु माता चिंतित थीं।

     

    “तुम दोनों कहाँ रह गए थे?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “माता, जंगल में बारिश आ गई थी।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “गलती मेरी है। मैं रास्ते में बातें करता रहा और हमें देर हो गई।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि कृष्ण ऐसा क्यों कह रहे हैं।

     

    वह अपने मित्र को डाँट से बचाने की कोशिश कर रहे थे।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “नहीं, माता। गलती हम दोनों की है।”

     

    गुरु माता ने दोनों को देखा।

     

    फिर मुस्कुराते हुए कहा, “मित्रता में एक-दूसरे का साथ देना अच्छी बात है, लेकिन सच्चाई से दूर नहीं जाना चाहिए।”

     

    दोनों ने सिर झुका दिया।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण उसके पास ही लेटे हुए थे।

     

    सुदामा ने धीरे से पूछा, “कृष्ण?”

     

    “हूँ?”

     

    “अगर एक दिन हम दोनों अलग हो गए तो?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “सच्चे मित्र पास रहने से मित्र नहीं होते, सुदामा। अगर मन में प्रेम और विश्वास हो, तो दूरी भी मित्रता को अलग नहीं कर सकती।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मत भूलना।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैं भी नहीं भूलूँगा।”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में जीवन दोनों को कितनी दूर ले जाएगा।

     

    उसे यह भी नहीं पता था कि एक दिन यही कृष्ण एक महान राजा के रूप में पहचाने जाएँगे और वह स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताएगा।

     

    लेकिन उस समय…

     

    वे दोनों केवल दो बालक थे।

     

    एक साधारण ब्राह्मण पुत्र।

     

    और दूसरा उसका प्यारा मित्र कृष्ण।

     

    अगली सुबह सूर्य की किरणों के साथ दोनों फिर से आश्रम के कार्यों में लग गए।

     

    उन्हें नहीं पता था कि उनकी मित्रता की असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि दोनों को एक ऐसा कार्य सौंपने वाले थे, जो उनकी दोस्ती को और गहरा कर देगा।

     

    और उस दिन सुदामा को पहली बार समझ आएगा कि कृष्ण केवल एक अच्छे मित्र ही नहीं…

     

    बल्कि एक ऐसे साथी हैं, जो हर कठिन समय में उसका हाथ थामकर खड़े रहेंगे।

     

    क्रमशः…

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं