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गुरुकुल की ओर लौटते

पढ़ने का समय : 5 मिनट

अध्याय 13 — गुरुकुल की ओर लौटते कदम

सुबह होते ही सुदामा ने गुरुकुल जाने की तैयारी शुरू कर दी।

 

कई साल बीत चुके थे।

 

जिस रास्ते पर कभी दो बच्चे नंगे पैर दौड़ा करते थे, उसी रास्ते पर अब सुदामा एक बूढ़े यात्री की तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

 

उनके हाथ में वही छोटी-सी पोटली थी।

 

वह बार-बार उसे देखते।

 

उन्हें अब भी समझ नहीं आ रहा था कि कृष्ण ने आखिर इसमें ऐसा क्या रखा है, जो उन्हें उनके अतीत तक ले जा रहा है।

 

उनकी पत्नी ने रास्ते के लिए थोड़ा भोजन बाँधा।

 

“इसे रख लीजिए।”

 

सुदामा ने पोटली के पास वह भोजन रखा।

 

फिर पत्नी की तरफ देखकर बोले,

 

“पता नहीं कितने दिन बाद वापस आऊँगा।”

 

पत्नी मुस्कुराईं।

 

“आप कृष्ण के दोस्त हैं। जहाँ कृष्ण की याद बुला रही है, वहाँ जाने में देर कैसी?”

 

सुदामा भी मुस्कुरा दिए।

 

“तुम्हें लगता है कृष्ण ने सच में कुछ सोचकर ये सब किया है?”

 

“मुझे तो हमेशा से लगता है कि कृष्ण जो करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई वजह जरूर होती है।”

 

सुदामा ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हाँ… यही तो बात है।”

 

कुछ देर बाद वह चल पड़े।

 

रास्ता लंबा था।

 

चलते-चलते उन्हें गुरुकुल के दिन याद आने लगे।

 

कृष्ण और वह साथ बैठकर पढ़ते थे।

 

कभी गुरुजी की डाँट खाते।

 

कभी जंगल से लकड़ियाँ लेने जाते।

 

कभी भूख लगने पर एक-दूसरे से अपना थोड़ा-सा भोजन बाँट लेते।

 

एक याद आते ही सुदामा हँस पड़े।

 

“कृष्ण कितना शरारती था…”

 

फिर अचानक उनकी हँसी रुक गई।

 

उन्हें वही आखिरी शाम याद आई।

 

कृष्ण का चेहरा।

 

उसकी आँखों की उदासी।

 

और वह अधूरा वादा।

 

सुदामा ने खुद से कहा,

 

“आज मुझे सब याद करना ही होगा।”

 

शाम होते-होते वह उस जंगल के पास पहुँच गए जहाँ कभी गुरुकुल हुआ करता था।

 

लेकिन वहाँ पहुँचते ही उनके कदम रुक गए।

 

सामने वही पुराना रास्ता था।

 

पेड़ अब बहुत बड़े हो चुके थे।

 

आश्रम की दीवारें कुछ टूट गई थीं।

 

लेकिन जगह वही थी।

 

सुदामा धीरे-धीरे अंदर गए।

 

आँगन में कदम रखते ही उनके शरीर में जैसे एक सिहरन दौड़ गई।

 

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

 

अचानक उन्हें कृष्ण की आवाज सुनाई दी।

 

“सुदामा, जल्दी करो!”

 

वह मुस्कुरा दिए।

 

“तुम हमेशा मुझे ही जल्दी करने को कहते थे।”

 

फिर उनकी आँखें नम हो गईं।

 

उन्होंने चारों ओर देखा।

 

“कृष्ण…”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

सुदामा ने पोटली निकाली।

 

“अब बताओ दोस्त… मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”

 

उसी समय पीछे से किसी की आवाज आई,

 

“क्योंकि कुछ बातें जगह बदलने से नहीं बदलतीं।”

 

सुदामा तुरंत पलटे।

 

सामने एक वृद्ध व्यक्ति खड़ा था।

 

सुदामा ने उसे ध्यान से देखा।

 

पहचानने की कोशिश की।

 

वृद्ध मुस्कुराया।

 

“पहचाना नहीं?”

 

सुदामा ने सिर हिलाया।

 

वह व्यक्ति आगे आया।

 

“मैं उसी गुरुकुल का एक पुराना सेवक हूँ।”

 

सुदामा की आँखें फैल गईं।

 

“तुम…?”

 

“हाँ।”

 

वृद्ध ने कहा,

 

“मैंने तुम्हें और कृष्ण को बचपन से देखा है।”

 

सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।

 

फिर उन्होंने पूछा,

 

“क्या कृष्ण ने तुम्हें मेरे बारे में बताया था?”

 

वृद्ध मुस्कुराया।

 

“बहुत पहले।”

 

“क्या?”

 

“उन्होंने कहा था कि एक दिन सुदामा यहाँ जरूर लौटेगा।”

 

सुदामा का दिल तेज धड़कने लगा।

 

“और उन्होंने ये भी कहा था कि उसे क्या बताना है?”

 

वृद्ध ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

सुदामा परेशान हो गए।

 

“तो फिर?”

 

वृद्ध ने आश्रम के पुराने कमरे की तरफ इशारा किया।

 

“उन्होंने तुम्हारे लिए वहाँ कुछ छोड़ा था।”

 

सुदामा कुछ पल वहीं खड़े रहे।

 

“क्या?”

 

वृद्ध ने कहा,

 

“यह तुम्हें खुद देखना होगा।”

 

सुदामा धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़े।

 

दरवाजे पर हाथ रखते ही उन्हें कृष्ण की वही पुरानी मुस्कान याद आ गई।

 

उन्होंने दरवाजा खोला।

 

कमरे में धूल जमी थी।

 

एक तरफ पुरानी लकड़ियाँ थीं।

 

दूसरी तरफ कुछ टूटे हुए सामान।

 

लेकिन कमरे के बीचोंबीच एक छोटी-सी लकड़ी की पेटी रखी थी।

 

सुदामा उसे देखते ही रुक गए।

 

पेटी पर एक छोटा-सा चिन्ह बना था।

 

वही चिन्ह…

 

जो कृष्ण अपनी किताबों पर बनाया करते थे।

 

सुदामा ने काँपते हाथों से पेटी उठाई।

 

वृद्ध ने कहा,

 

“इसे खोलने से पहले अपनी पोटली देखना।”

 

सुदामा चौंक गए।

 

उन्होंने पोटली खोली।

 

अंदर रखी पुरानी चीज को बाहर निकाला।

 

वह एक छोटी-सी लकड़ी की माला थी।

 

सुदामा उसे देखते ही स्तब्ध रह गए।

 

“ये…”

 

उनकी आँखों के सामने एक पुरानी तस्वीर जैसी याद उभरी।

 

कृष्ण वही माला उनके हाथ में दे रहे थे।

 

और कह रहे थे—

 

“इसे संभालकर रखना।”

 

सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

“मैं इसे भूल गया था…”

 

वृद्ध चुपचाप खड़ा रहा।

 

सुदामा ने पेटी की ओर देखा।

 

“क्या इसमें वही बात है?”

 

वृद्ध ने कहा,

 

“शायद।”

 

सुदामा ने पेटी खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन तभी…

 

बाहर मंदिर की घंटी जैसी आवाज सुनाई दी।

 

सुदामा ठिठक गए।

 

वृद्ध भी अचानक गंभीर हो गया।

 

“ये आवाज…”

 

सुदामा ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

वृद्ध ने धीमे स्वर में कहा,

 

“ये घंटी कई सालों से नहीं बजी।”

 

दोनों बाहर की तरफ देखने लगे।

 

और तभी सुदामा को लगा…

 

जैसे किसी ने बहुत दूर से उनका नाम पुकारा हो।

 

“सुदामा…”

 

वह आवाज बिल्कुल कृष्ण जैसी थी।

 

सुदामा की आँखें फैल गईं।

 

“कृष्ण?”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

लेकिन अब सुदामा के सामने सिर्फ एक सवाल था—

 

अगर कृष्ण यहाँ नहीं थे, तो फिर उनकी आवाज किसने पुकारी थी?

 

क्रमशः…

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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