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नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

पढ़ने का समय : 12 मिनट

 

 

(भाग 6 — माखनचोर नंदलाल)

 

 

 

 

गोकुल की गलियों में उन दिनों एक ही नाम हर किसी की जुबान पर था—कान्हा।

 

जिस घर में उनका नाम लिया जाता, वहाँ जैसे अपने आप मुस्कान खिल उठती। कोई उन्हें नंदबाबा का लाड़ला कहता, कोई यशोदा मैया का नटखट लाल, तो कोई उन्हें गोकुल का सबसे बड़ा शरारती बालक बताता।

 

लेकिन गोकुल की गोपियों के लिए कान्हा की एक और पहचान बन चुकी थी—

 

माखनचोर!

 

हाँ, वही नन्हा-सा कृष्ण, जिसकी मुस्कान देखकर बड़े-बड़े क्रोधी भी अपना गुस्सा भूल जाते थे, अब गोकुल की गोपियों की मटकी से माखन चुराने लगा था।

 

और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि कृष्ण को केवल माखन खाने में ही आनंद नहीं आता था।

 

उन्हें आनंद आता था—

 

माखन चुराने में!

 

सुबह का समय था। गोकुल की गलियों में गायों की घंटियों की मधुर आवाज सुनाई दे रही थी। कहीं कोई गोपी आँगन में झाड़ू लगा रही थी, कहीं कोई दूध दुह रही थी और कहीं मटकी में दही मथने की आवाज सुनाई दे रही थी।

 

यशोदा मैया भी अपने आँगन में बैठी थीं। उनके सामने बड़ी-सी मटकी रखी थी और वे प्रेम से दही मथ रही थीं।

 

दही मथते हुए उनके मन में अपने कान्हा का ही ध्यान था।

 

वे धीरे-धीरे मुस्कुरातीं और फिर सोचने लगतीं—

 

“न जाने मेरा लाल इस समय कहाँ खेल रहा होगा?”

 

उन्हें क्या पता था कि उनका वही लाल उस समय कुछ ऐसी योजना बना रहा था, जिसके कारण थोड़ी ही देर में पूरे गोकुल में हँसी और शिकायतों की लहर दौड़ने वाली थी।

 

कान्हा की नई योजना

 

कृष्ण अपने कुछ सखा बालकों के साथ एक पेड़ के पीछे छिपे हुए थे।

 

उनके साथ थे—श्रीदामा, सुभल और कुछ अन्य ग्वाल-बाल।

 

कृष्ण ने धीरे से अपने साथियों की ओर देखा और आँखों ही आँखों में कुछ संकेत किया।

 

श्रीदामा ने पूछा,

 

“कान्हा, आज कहाँ चलना है?”

 

कृष्ण ने होंठों पर शरारती मुस्कान लाते हुए कहा,

 

“आज हम उस घर में चलेंगे जहाँ सबसे स्वादिष्ट माखन मिलता है।”

 

सुभल ने आश्चर्य से पूछा,

 

“लेकिन कान्हा, वहाँ तो माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी रहती है। हम पहुँचेंगे कैसे?”

 

कृष्ण हँस पड़े।

 

“जहाँ प्रेम हो, वहाँ रास्ता अपने आप बन जाता है।”

 

श्रीदामा बोला,

 

“और जहाँ माखन हो?”

 

कृष्ण ने तुरंत उत्तर दिया,

 

“वहाँ तो मैं स्वयं रास्ता बना देता हूँ!”

 

सभी बालक खिलखिलाकर हँस पड़े।

 

कृष्ण ने चारों ओर देखा। किसी को पता नहीं था कि वे कहाँ जा रहे हैं।

 

फिर वे दबे पाँव एक गोपी के घर की ओर बढ़ चले।

 

उस गोपी ने कई दिनों से अपनी मटकी का माखन कृष्ण से बचाकर रखा था।

 

वह रोज अपने घर की मटकी को ऊँचाई पर टाँग देती और सोचती—

 

“आज तो देखती हूँ, मेरा माखन कौन चुराता है!”

 

उसे विश्वास था कि इतनी ऊँचाई पर रखी मटकी तक कृष्ण नहीं पहुँच पाएँगे।

 

लेकिन वह कृष्ण को अभी अच्छी तरह पहचान नहीं पाई थी।

 

माखन की खोज

 

कृष्ण अपने सखाओं के साथ घर के भीतर पहुँचे।

 

सबसे पहले उन्होंने चारों ओर देखा।

 

एक कोने में दूध की मटकी थी।

 

दूसरे कोने में दही रखा था।

 

लेकिन कृष्ण की दृष्टि सीधे उस मटकी पर जाकर टिक गई, जिसमें सफेद, मुलायम और सुगंधित माखन भरा था।

 

कृष्ण की आँखें चमक उठीं।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“यही है!”

 

श्रीदामा ने ऊपर देखा।

 

मटकी सचमुच बहुत ऊँचाई पर टंगी थी।

 

वह बोला,

 

“कान्हा, अब?”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

 

“अब तुम सब मेरी सहायता करो।”

 

एक के ऊपर एक बालक खड़े होने लगे।

 

सबसे नीचे एक बालक।

 

उसके ऊपर दूसरा।

 

फिर तीसरा।

 

और सबसे ऊपर स्वयं कृष्ण।

 

कृष्ण ने अपना हाथ ऊपर बढ़ाया।

 

लेकिन मटकी अभी भी थोड़ी दूर थी।

 

उन्होंने अपनी एड़ी पर खड़े होकर हाथ और ऊपर किया।

 

फिर भी मटकी नहीं मिली।

 

सभी बालक हँसी रोककर कृष्ण को देख रहे थे।

 

कृष्ण ने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं, फिर हल्की-सी छलाँग लगाई।

 

उनकी उँगलियाँ मटकी तक पहुँच गईं।

 

मटकी हल्के से हिली।

 

सभी बालक घबरा गए।

 

“कान्हा! धीरे!”

 

लेकिन कृष्ण के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी।

 

उन्होंने मटकी को थोड़ा नीचे खींचा और जैसे ही वह उनके हाथ में आई, उनकी आँखों में आनंद भर गया।

 

माखन देखकर कृष्ण का चेहरा खिल उठा।

 

उन्होंने पहले थोड़ा-सा माखन स्वयं खाया।

 

फिर श्रीदामा को दिया।

 

फिर सुभल को।

 

और देखते ही देखते सभी बालक माखन खाने लगे।

 

लेकिन कृष्ण की शरारत यहीं समाप्त नहीं हुई।

 

उन्होंने कहा,

 

“अरे! अकेले हम ही क्यों खाएँ? हमारे बंदर मित्र कहाँ हैं?”

 

कृष्ण और उनके बंदर मित्र

 

कृष्ण को बंदरों से बहुत प्रेम था।

 

उन्होंने माखन का एक बड़ा हिस्सा लेकर आँगन में बैठे बंदरों को बुलाया।

 

“आओ! आओ! तुम्हारे लिए भी माखन है।”

 

बंदर उछलते-कूदते कृष्ण के पास आ गए।

 

कृष्ण उन्हें अपने हाथों से माखन खिलाने लगे।

 

एक बंदर ने उनके हाथ से माखन लिया।

 

दूसरा उनके कंधे पर चढ़ गया।

 

तीसरा उनके पास बैठकर माखन खाने लगा।

 

कृष्ण हँसते जा रहे थे।

 

उनके सखा भी हँस रहे थे।

 

कुछ ही देर में घर की स्थिति ऐसी हो गई कि कहीं माखन गिरा था, कहीं दही फैल गया था और कहीं बंदर मटकी के पास बैठकर मुँह चाट रहे थे।

 

तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई।

 

सब बालक चौंक गए।

 

“गोपी आ रही है!”

 

श्रीदामा ने कहा।

 

कृष्ण ने तुरंत इधर-उधर देखा।

 

“सब छिप जाओ!”

 

लेकिन छिपने की जगह कहाँ थी?

 

कोई अनाज के पीछे छिप गया।

 

कोई दरवाजे के पीछे।

 

कोई मटकी के पास।

 

और कृष्ण?

 

वे तो ऐसे खड़े हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।

 

गोपी अंदर आई।

 

उसने जैसे ही अपना घर देखा, उसकी आँखें फैल गईं।

 

माखन यहाँ-वहाँ बिखरा हुआ था।

 

मटकी आधी खाली थी।

 

बंदर मुँह पर माखन लगाए बैठे थे।

 

और बीच में कृष्ण खड़े थे।

 

गोपी ने दोनों हाथ कमर पर रखे और बोली,

 

“कान्हा!”

 

कृष्ण ने मासूम बनकर उसकी ओर देखा।

 

“जी?”

 

“यह सब किसने किया?”

 

कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से कहा,

 

“मुझे नहीं पता।”

 

गोपी ने माखन से सने उनके हाथों की ओर देखा।

 

फिर उनके होंठों पर लगे माखन को देखा।

 

फिर बोली,

 

“तुम्हें नहीं पता?”

 

कृष्ण ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”

 

कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

 

फिर बोले,

 

“शायद माखन स्वयं मेरे पास आ गया होगा।”

 

गोपी हँसी रोक नहीं पाई।

 

लेकिन फिर उसे अपनी मटकी याद आ गई।

 

वह बोली,

 

“अच्छा! तो माखन स्वयं मटकी से निकलकर तुम्हारे मुँह में भी चला गया?”

 

कृष्ण ने तुरंत कहा,

 

“हाँ, मैया!”

 

गोपी ने कहा,

 

“मैं तुम्हारी मैया नहीं हूँ!”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“तो फिर आप इतनी चिंता क्यों करती हैं?”

 

गोपी का क्रोध जैसे पल भर में पिघल गया।

 

लेकिन वह कृष्ण को यूँ ही जाने भी नहीं देना चाहती थी।

 

उसने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

 

“चलो, आज तुम्हारी शिकायत यशोदा मैया से करूँगी।”

 

कृष्ण ने तुरंत अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

 

“नहीं! मैया से मत कहना।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैया मुझे डाँटेंगी।”

 

गोपी बोली,

 

“आज तो डाँट पड़ेगी ही।”

 

कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसकी ओर देखा।

 

फिर धीरे से मुस्कुराए।

 

“अगर मैं आपको थोड़ा-सा माखन और दे दूँ तो?”

 

गोपी फिर हँस पड़ी।

 

“नहीं! आज मैं नहीं मानूँगी।”

 

लेकिन मन ही मन वह भी सोच रही थी—

 

“यह बालक है ही इतना प्यारा कि इससे नाराज़ कैसे रहा जाए?”

 

गोकुल में शिकायतों की कतार

 

यह तो केवल एक घर की बात थी।

 

गोकुल में कई गोपियों के घरों में यही हाल था।

 

कहीं मटकी खाली।

 

कहीं दही फर्श पर।

 

कहीं माखन बंदरों को खिला दिया गया।

 

और कहीं कृष्ण ने माखन खाकर मटकी के पास अपनी छोटी-सी हथेली के निशान छोड़ दिए।

 

धीरे-धीरे गोपियाँ एक-दूसरे के घर पहुँचने लगीं।

 

एक बोली,

 

“आज फिर मेरे घर से माखन गायब!”

 

दूसरी बोली,

 

“मेरे घर में तो मटकी इतनी ऊँचाई पर रखी थी, फिर भी कान्हा पहुँच गया!”

 

तीसरी बोली,

 

“मेरे घर में तो उसने पहले माखन खाया और फिर बंदरों को बाँट दिया।”

 

चौथी हँसते हुए बोली,

 

“मेरे घर में तो माखन चुराने के बाद वह मुझे ही समझाने लगा कि माखन उसे स्वयं बुला रहा था!”

 

सब गोपियाँ कृष्ण की शिकायत करने के लिए यशोदा मैया के पास जाने लगीं।

 

लेकिन उनके चेहरों पर गुस्से से अधिक प्रेम था।

 

यशोदा मैया के सामने शिकायत

 

यशोदा मैया उस समय अपने आँगन में बैठी थीं।

 

कृष्ण अभी वहाँ नहीं पहुँचे थे।

 

अचानक कई गोपियाँ एक साथ आ गईं।

 

यशोदा मैया ने पूछा,

 

“अरे बहनों! क्या हुआ?”

 

एक गोपी बोली,

 

“मैया! अपने लाल को समझाइए।”

 

यशोदा मैया ने चिंतित होकर पूछा,

 

“क्या किया मेरे कान्हा ने?”

 

दूसरी गोपी बोली,

 

“क्या नहीं किया, यह पूछिए!”

 

तीसरी बोली,

 

“हमारे घरों का माखन चुरा-चुराकर खाता है।”

 

चौथी बोली,

 

“और अकेला नहीं खाता।”

 

यशोदा मैया ने आश्चर्य से पूछा,

 

“तो?”

 

“बंदरों को भी खिलाता है!”

 

यशोदा मैया ने कृष्ण की ओर से सफाई देते हुए कहा,

 

“अरे, वह तो अभी छोटा है। शायद भूख लगती होगी।”

 

गोपियाँ बोलीं,

 

“भूख लगती है तो हमारे घर आकर माँग ले। हम माखन दे देंगे।”

 

एक गोपी ने कहा,

 

“लेकिन नहीं! वह चोरी करके ही खाएगा।”

 

दूसरी हँसते हुए बोली,

 

“और जब हम पकड़ लें तो ऐसी मुस्कान देगा कि हमारा सारा गुस्सा गायब हो जाएगा।”

 

यशोदा मैया भी हँसने लगीं।

 

उन्होंने कहा,

 

“अच्छा, आज मैं उसे खूब समझाऊँगी।”

 

तभी पीछे से एक मधुर आवाज आई—

 

“मैया!”

 

सभी गोपियाँ एक साथ पीछे मुड़ीं।

 

कृष्ण वहाँ खड़े थे।

 

उनके चेहरे पर भोली-सी मुस्कान थी।

 

यशोदा मैया ने पूछा,

 

“कान्हा, इधर आओ।”

 

कृष्ण धीरे-धीरे मैया के पास आए।

 

यशोदा मैया ने पूछा,

 

“तुमने इन सबके घरों से माखन चुराया?”

 

कृष्ण ने तुरंत सिर हिलाया।

 

“नहीं!”

 

गोपियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।

 

यशोदा मैया ने पूछा,

 

“तो फिर माखन किसने चुराया?”

 

कृष्ण ने थोड़ा सोचा।

 

फिर बोले,

 

“मैया, मुझे लगता है कि… बंदरों ने चुराया होगा।”

 

गोपियाँ हँस पड़ीं।

 

यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

 

“अच्छा! तो बंदर माखन खाते हैं और तुम्हारे मुँह पर लगा देते हैं?”

 

कृष्ण मुस्कुराने लगे।

 

मैया ने उनके गाल पर हाथ फेरा।

 

उनकी आँखों में ममता थी।

 

वे अपने लाल को डाँटना चाहती थीं, लेकिन उसकी भोली मुस्कान देखकर उनका हृदय पिघल गया।

 

फिर भी उन्होंने प्रेम से कहा,

 

“कान्हा, दूसरों के घर से माखन नहीं चुराना चाहिए।”

 

कृष्ण ने मासूमियत से पूछा,

 

“लेकिन मैया, अगर वे मुझे माखन दे दें तो?”

 

“तो खा लेना।”

 

“और अगर न दें?”

 

यशोदा मैया कुछ क्षण चुप रहीं।

 

कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

 

फिर धीरे से मुस्कुराए।

 

मैया समझ गईं कि उनका कान्हा अपनी शरारत छोड़ने वाला नहीं है।

 

माखन से भी मीठा प्रेम

 

उस दिन के बाद गोकुल की गोपियाँ अपनी मटकी और भी ऊँचाई पर रखने लगीं।

 

लेकिन कृष्ण के लिए ऊँचाई कोई बाधा नहीं थी।

 

कभी वे सखाओं की सहायता लेते।

 

कभी किसी छोटी चौकी को खिसकाकर उसके ऊपर चढ़ जाते।

 

कभी रस्सी पकड़ लेते।

 

और कभी तो ऐसा लगता जैसे मटकी स्वयं झुककर कृष्ण के हाथों में आ गई हो।

 

लेकिन कृष्ण केवल माखन नहीं चुराते थे।

 

वे तो गोकुलवासियों के हृदय चुराते थे।

 

जिस घर में वे जाते, वहाँ हँसी छोड़ आते।

 

जिसके घर से माखन लेते, उसे प्रेम दे जाते।

 

और जिन गोपियों को लगता कि कृष्ण ने उनके घर की मटकी खाली कर दी, वे कुछ ही देर बाद यही सोचतीं—

 

“काश! हमारा कान्हा फिर आए।”

 

क्योंकि सच तो यह था कि उन्हें माखन के जाने का दुख नहीं था।

 

उन्हें तो कृष्ण के चले जाने का दुख था।

 

गोकुल की गलियों में अब एक नई चर्चा थी—

 

“कान्हा कब आएगा?”

 

कोई माखन छिपाता था ताकि कृष्ण उसे ढूँढ़ें।

 

कोई जान-बूझकर मटकी नीचे रख देता था।

 

और कोई तो अपने घर के बाहर तक माखन की कटोरी रख देता था।

 

कृष्ण सब समझते थे।

 

वे मुस्कुराते हुए कहते,

 

“तुम लोग मुझे चोर बनाना चाहती हो?”

 

गोपियाँ कहतीं,

 

“हाँ कान्हा! क्योंकि तुम्हारे हाथों से हमारा माखन जाए तो हमें कोई शिकायत नहीं।”

 

कृष्ण हँस पड़ते।

 

एक दिन कुछ अलग हुआ…

 

लेकिन एक दिन कृष्ण की शरारत कुछ अधिक बढ़ गई।

 

उस दिन यशोदा मैया ने सोचा कि आज वे अपने कान्हा को स्वयं माखन खिलाएँगी।

 

उन्होंने बड़े प्रेम से माखन निकाला।

 

एक छोटी कटोरी में रखा।

 

और कृष्ण को पुकारा—

 

“कान्हा! आओ बेटा, आज मैया तुम्हें अपने हाथों से माखन खिलाएगी।”

 

कृष्ण दौड़ते हुए आए।

 

मैया ने उन्हें अपने पास बैठाया।

 

माखन का पहला निवाला उनके मुँह में रखा।

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

मैया ने दूसरा निवाला खिलाया।

 

तभी बाहर से उनके सखाओं की आवाज आई—

 

“कान्हा! चलो!”

 

कृष्ण ने तुरंत मैया की ओर देखा।

 

मैया ने कहा,

 

“पहले माखन खा लो।”

 

कृष्ण ने पूछा,

 

“फिर खेलने जाने दोगी?”

 

“हाँ।”

 

कृष्ण ने जल्दी-जल्दी माखन खाना शुरू किया।

 

लेकिन उनके मन में एक और शरारत जन्म ले चुकी थी।

 

उन्होंने मैया की ओर देखा…

 

फिर मटकी की ओर…

 

फिर आँगन में रखी दूसरी मटकी की ओर।

 

उनकी आँखों में चमक थी।

 

मैया ने उस चमक को देख लिया।

 

“कान्हा… तुम कुछ सोच रहे हो न?”

 

कृष्ण ने तुरंत मासूम चेहरा बना लिया।

 

“नहीं मैया।”

 

“सच?”

 

“बिल्कुल सच।”

 

यशोदा मैया मुस्कुराईं।

 

उन्हें क्या पता था कि अगले ही पल उनका नन्हा कान्हा ऐसी शरारत करने वाला है, जिसके कारण केवल गोकुल की गोपियाँ ही नहीं, स्वयं यशोदा मैया भी परेशान हो उठेंगी।

 

और इस बार बात केवल माखन चुराने तक नहीं रहने वाली थी…

 

क्योंकि कृष्ण की नजर अब एक ऐसी मटकी पर थी, जिसे यशोदा मैया ने स्वयं बहुत सँभालकर रखा था।

 

कृष्ण धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़े।

 

उनके कदम छोटे थे…

 

लेकिन शरारत बहुत बड़ी।

 

आखिर उस मटकी में ऐसा क्या था?

 

और क्या कृष्ण इस बार भी अपनी शरारत में सफल हो पाएँगे?

 

जानिए अगली कड़ी में—

 

भाग 7 — मटकी फोड़ने की शरारत

 

जहाँ कान्हा की एक छोटी-सी शरारत पूरे गोकुल में हँसी का कारण बन जाएगी और यशोदा मैया को पहली बार अपने नटखट लाल को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ना पड़ेगा…|

 

BE CONTINUE….✍️✍️

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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