अध्याय 9 — कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया
सुदामा कृष्ण के सामने चुपचाप खड़े थे।
कृष्ण उनकी तरफ देख रहे थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी, जो सुदामा ने गुरुकुल के दिनों में न जाने कितनी बार देखी थी।
लेकिन आज सुदामा के चेहरे पर खुशी के साथ झिझक भी थी।
कृष्ण ने धीरे से कहा,
“सुदामा… इतने साल बाद मेरे पास आए हो और फिर भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”
सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।
“नहीं कृष्ण, ऐसी कोई बात नहीं है।”
कृष्ण हल्के से मुस्कुराए।
“तुम्हें मैं आज का कृष्ण लग रहा हूँ क्या?”
सुदामा ने उनकी तरफ देखा।
कृष्ण ने कहा,
“मैं वही हूँ जो गुरुकुल में तुम्हारे साथ बैठकर खाना खाता था। वही जो तुम्हारे हिस्से की रोटी भी चुपके से खा जाता था।”
सुदामा हँस पड़े।
“और फिर जब गुरुजी पूछते थे कि खाना किसने खाया, तो तुम बड़ी मासूम शक्ल बना लेते थे।”
कृष्ण भी हँस पड़े।
“अरे, तुम भी तो मेरा नाम नहीं लेते थे।”
कुछ पल के लिए दोनों पुराने दिनों में खो गए।
लेकिन फिर सुदामा की मुस्कान गायब हो गई।
कृष्ण ने यह देख लिया।
उन्होंने पास जाकर सुदामा का हाथ पकड़ लिया।
“सुदामा, मुझे सच बताओ। घर पर सब ठीक है?”
सुदामा कुछ नहीं बोले।
कृष्ण ने फिर पूछा,
“भाभी कैसी हैं?”
सुदामा ने धीरे से कहा,
“ठीक हैं।”
“बच्चे?”
“ठीक हैं।”
कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा।
“और तुम?”
यह सवाल सुनते ही सुदामा चुप हो गए।
काफी देर तक उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।
कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बस सुदामा के कंधे पर हाथ रख दिया।
सुदामा की आँखें भर आईं।
“कृष्ण…”
“हाँ, बोलो।”
“मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया था।”
कृष्ण मुस्कुराए।
“मुझे पता है।”
“मैं बस तुमसे मिलने आया था।”
“ये भी मुझे पता है।”
सुदामा ने हैरानी से पूछा,
“फिर तुम बार-बार पूछ क्यों रहे हो?”
कृष्ण ने हँसते हुए कहा,
“क्योंकि दोस्ती में कुछ बातें पूछनी नहीं पड़तीं, बस महसूस करनी पड़ती हैं।”
सुदामा ने सिर झुका लिया।
कृष्ण ने धीरे से कहा,
“तुम्हारे कपड़े बहुत कुछ बता रहे हैं सुदामा। तुम्हारा चेहरा भी। तुम्हारी आवाज भी।”
सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“मैंने बहुत कोशिश की कृष्ण।”
“किस बात की?”
“अपने परिवार को खुश रखने की।”
सुदामा कुछ देर रुके।
“मैंने बच्चों को पढ़ाया। जो मिला, उसमें घर चलाया। कभी किसी से शिकायत नहीं की। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि घर में खाने तक की परेशानी हो गई।”
कृष्ण चुपचाप सुनते रहे।
सुदामा बोले,
“मेरी पत्नी ने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। बच्चों ने भी कभी जिद नहीं की। लेकिन उनकी आँखों में सब दिखता था।”
कृष्ण की आँखें भी नम हो गईं।
“तो तुम इतने सालों तक अकेले यह सब सहते रहे?”
सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“तुम्हारी दोस्ती की याद थी ना।”
कृष्ण ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“और तुमने सोचा कि मुझे कुछ नहीं बताओगे?”
सुदामा ने कहा,
“तुम द्वारका के राजा हो कृष्ण। तुम्हारे पास कितने काम होंगे। मैं अपनी परेशानी लेकर तुम्हारे पास कैसे आता?”
कृष्ण ने तुरंत कहा,
“राजा?”
वह थोड़ा मुस्कुराए।
“मेरे लिए तुम अभी भी वही सुदामा हो जो मेरे साथ गुरुकुल में पेड़ के नीचे बैठता था।”
सुदामा की आँखों में आँसू थे।
कृष्ण ने कहा,
“तुमने मुझे अपना दोस्त समझकर आने में भी इतना समय लगा दिया।”
सुदामा कुछ नहीं बोल पाए।
तभी कृष्ण ने देखा कि सुदामा के पैर यात्रा की वजह से थके हुए थे।
कृष्ण ने कहा,
“पहले बैठो।”
“नहीं कृष्ण, मैं ठीक हूँ।”
“तुम्हारी ये ‘मैं ठीक हूँ’ वाली आदत अभी तक नहीं गई?”
सुदामा मुस्कुरा दिए।
कृष्ण ने अपने सेवकों से पानी मंगवाया और खुद सुदामा के पास बैठ गए।
सुदामा घबरा गए।
“कृष्ण, तुम ये क्या कर रहे हो?”
कृष्ण ने कहा,
“आज मुझे अपने दोस्त की सेवा करने दो।”
“लेकिन तुम राजा हो।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“और तुम मेरे दोस्त हो। आज मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात है।”
सुदामा की आँखें फिर भर आईं।
कृष्ण ने उनके थके हुए पैरों को पानी से धोया।
सुदामा बार-बार उन्हें रोकने की कोशिश करते रहे।
“कृष्ण, ऐसा मत करो।”
कृष्ण ने हँसते हुए कहा,
“जब मैं गुरुकुल में गलती करता था और तुम मेरा काम अपने ऊपर ले लेते थे, तब तो तुमने मुझे कभी रोका नहीं।”
सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।
कृष्ण ने कहा,
“आज मेरी बारी है।”
कुछ देर बाद दोनों साथ बैठ गए।
कृष्ण ने फिर वही छोटा-सा पोटली उठाई जो सुदामा अपने साथ लाए थे।
“वैसे एक बात बताओ।”
“क्या?”
“तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”
सुदामा झेंप गए।
“कुछ खास नहीं।”
कृष्ण ने पोटली खोल ली।
उसमें थोड़ा-सा चिवड़ा था।
कृष्ण के चेहरे पर ऐसी खुशी आई जैसे उन्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो।
उन्होंने थोड़ा चिवड़ा उठाया और खाने लगे।
“अरे वाह! यही तो चाहिए था।”
सुदामा ने कहा,
“कृष्ण, ये बहुत साधारण है।”
कृष्ण ने कहा,
“साधारण?”
उन्होंने मुस्कुराकर सुदामा की तरफ देखा।
“जिसमें दोस्त का प्यार हो, वह साधारण कैसे हो सकता है?”
सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।
कृष्ण ने उन्हें देखकर कहा,
“आज तुम मेरे पास खाली हाथ नहीं आए सुदामा। तुम अपने साथ हमारी दोस्ती की वही खुशबू लेकर आए हो, जो गुरुकुल में थी।”
सुदामा ने सिर उठाकर कृष्ण को देखा।
उन्हें लगा जैसे इतने सालों का सारा दुख धीरे-धीरे हल्का हो रहा हो।
लेकिन कृष्ण के मन में कुछ और था।
वह अपने दोस्त को बिना माँगे ही सब कुछ देना चाहते थे।
सुदामा ने कुछ नहीं माँगा।
उन्होंने अपने दुख की पूरी बात भी नहीं कही।
लेकिन कृष्ण सब समझ चुके थे।
रात काफी हो चुकी थी।
कृष्ण ने कहा,
“सुदामा, आज तुम यहीं आराम करो।”
सुदामा ने कहा,
“नहीं कृष्ण, सुबह मुझे वापस जाना है।”
कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे।
फिर बोले,
“ठीक है। लेकिन जाने से पहले मुझे एक वादा करना होगा।”
“कैसा वादा?”
“अब कभी अपने दोस्त से मिलने में इतनी देर मत करना।”
सुदामा मुस्कुरा दिए।
“वादा।”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
कभी गुरुकुल में साथ रहने वाले दो दोस्त आज अलग-अलग दुनिया में खड़े थे।
लेकिन उनके बीच की दोस्ती वैसी ही थी।
अगली सुबह सुदामा जब द्वारका से अपने घर लौटने के लिए निकले, तो उनके मन में एक ही सवाल था—
कृष्ण ने मुझे इतना प्यार तो दिया… लेकिन क्या मेरे घर की हालत भी बदलेगी?
उन्हें अभी नहीं पता था कि कृष्ण ने उनके लिए क्या सोच रखा था।
और जब सुदामा अपने गाँव के पास पहुँचे…
तो उन्हें दूर से कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर वह अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं कर पाए।
क्रमशः…
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