(भाग 14 — गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला)
वृंदावन में शरद ऋतु का सुहावना समय था। आकाश निर्मल था। यमुना की लहरें चाँदनी में चमकती थीं और गोवर्धन पर्वत के आसपास हरी-हरी घास की चादर बिछी हुई थी।
गायों के झुंड उस घास को चरते हुए दूर तक फैल जाते और उनके गले में बँधी घंटियों की मधुर ध्वनि पूरे वन में गूँजती। वृंदावन का जीवन प्रकृति के साथ बहुत गहराई से जुड़ा था। गायें थीं, दूध था, दही था, माखन था। वन था, पर्वत था, यमुना थी। और इन सबके बीच नंदलाल थे, जिनकी मुस्कान से पूरा वृंदावन जैसे जीवित हो उठता था। उसी समय नंद बाबा के घर में एक विशेष तैयारी शुरू हो गई। आँगन में स्त्रियाँ तरह-तरह के पकवान बनाने लगीं। कहीं खीर बन रही थी। कहीं पूरियाँ तली जा रही थीं। कहीं दही मथा जा रहा था। कहीं माखन निकाला जा रहा था। बड़े-बड़े पात्रों में दूध रखा गया था। वृंदावन के लोग उत्साह से एक-दूसरे के घर जा रहे थे। कृष्ण ने यह सब देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने नंद बाबा के पास जाकर पूछा, “बाबा, आज हमारे घर में इतनी सारी तैयारियाँ क्यों हो रही हैं?” नंद बाबा ने कहा, “लाला, आज हम देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे हैं।”
कृष्ण ने भोलेपन से पूछा, “इंद्र की पूजा क्यों?” नंद बाबा बोले, “बेटा, इंद्र देव वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से वर्षा होती है। वर्षा से खेतों में अन्न उगता है, घास उगती है और हमारी गायों को भोजन मिलता है। इसलिए हम हर वर्ष उनकी पूजा करते हैं।” कृष्ण कुछ क्षण सोचते रहे। फिर उन्होंने पूछा, “लेकिन बाबा, हमारी गायें कहाँ चरती हैं?” “गोवर्धन पर्वत के पास।”
“उन्हें घास कौन देता है?” “गोवर्धन।” “उन्हें जल कहाँ मिलता है?” “गोवर्धन के आसपास की धाराओं और यमुना से।” कृष्ण फिर बोले, “तो फिर बाबा, हमें गोवर्धन पर्वत का धन्यवाद नहीं करना चाहिए?”
नंद बाबा चुप हो गए। कृष्ण ने आगे कहा, “हमारा जीवन गायों से है। गायों का जीवन घास और जल से है। गोवर्धन हमें घास देता है, वन देता है, जल देता है और हमारी गायों को आश्रय देता है। फिर हम उस गोवर्धन की पूजा क्यों न करें?” वृंदावन के कुछ बड़े-बुजुर्ग भी वहाँ आ गए। किसी ने कहा, “कन्हैया की बात में तो तर्क है।” किसी ने कहा, “लेकिन इंद्र की पूजा तो हमारे पूर्वजों से चली आ रही है।” कृष्ण मुस्कुराए।
“बाबा, मेरा कहना है कि हम प्रकृति और अपने कर्म का सम्मान करें। हम गोवर्धन की पूजा करें, गायों की सेवा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। यही हमारे जीवन का आधार है।”
नंद बाबा अपने पुत्र को देखते रहे। कृष्ण की बातें एक छोटे बालक की बातें थीं, लेकिन उनमें गहरा सत्य छिपा था। अंततः नंद बाबा ने कहा, “ठीक है लाला। इस बार हम गोवर्धन पूजा करेंगे।” और फिर पूरा वृंदावन गोवर्धन पूजा की तैयारी में लग गया। अनेक प्रकार के पकवान बनाए गए। दूध, दही, घी, माखन, मिठाइयाँ, फल और अनगिनत व्यंजन सजाए गए। गायों को स्नान कराया गया। उनके सींगों पर रंग लगाया गया। उनके गले में सुंदर मालाएँ पहनाई गईं। बच्चे खुशी से इधर-उधर दौड़ रहे थे। कृष्ण के चेहरे पर अद्भुत प्रसन्नता थी। वृंदावन के लोग गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने पर्वत की पूजा की। भोग अर्पित किया।
और कृष्ण ने सबको प्रेम से समझाया, “प्रकृति का सम्मान करो। गायों की सेवा करो। धरती को माँ मानो।” लेकिन दूसरी ओर देवराज इंद्र को जब यह पता चला कि वृंदावनवासियों ने उनकी पूजा नहीं की, तो उनका अहंकार भड़क उठा। उन्होंने क्रोध से कहा, “इन लोगों ने मेरी पूजा छोड़ दी?” इंद्र को लगा कि वृंदावनवासियों ने उनका अपमान किया है।
उनके भीतर क्रोध बढ़ता गया। उन्होंने आदेश दिया, “ऐसे बादलों को भेजो जो प्रलयंकारी वर्षा कर सकें।” आकाश में अचानक घने बादल छाने लगे। वृंदावन के लोगों को कुछ समझ नहीं आया। सुबह तक जो आकाश साफ था, वह देखते ही देखते काले बादलों से भर गया।
बिजलियाँ चमकने लगीं। बादल भयंकर गर्जना करने लगे। फिर वर्षा शुरू हुई। पहले बूंदें पड़ीं। फिर पानी तेज हुआ। और देखते ही देखते ऐसी मूसलाधार वर्षा होने लगी कि धरती जल में डूबने लगी। वृंदावन के रास्तों पर पानी भर गया। गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। बछड़े अपनी माताओं से चिपक गए। छोटे बच्चे रोने लगे। यशोदा मैया ने कृष्ण को अपने पास बुलाया। “कन्हैया! यह कैसी वर्षा है?” कृष्ण ने बाहर देखा। उनके चेहरे पर चिंता नहीं थी। वह शांत थे। नंद बाबा घबराकर बोले, “लोगों को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना होगा।”
लेकिन चारों ओर जल ही जल था। कहीं आश्रय नहीं। कहीं सुरक्षा नहीं। वर्षा और तेज होती जा रही थी। हवा इतनी तीव्र थी कि बड़े-बड़े वृक्ष झुकने लगे। गायें रंभाने लगीं। वृंदावनवासी कृष्ण के पास आने लगे। “कन्हैया! अब हमारी रक्षा कौन करेगा?” यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी बाँहों में भरना चाहा। लेकिन कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैया, चिंता मत करो।” “सबकी रक्षा होगी।” कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की ओर देखा।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, “जब पर्वत हमारी रक्षा करता है, तो आज पर्वत ही हमारी ढाल बनेगा।” और देखते ही देखते कृष्ण गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने अपना छोटा-सा बायाँ हाथ उठाया। और फिर… जिसे देखकर सभी की साँसें थम गईं— कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी-सी कनिष्ठिका उँगली पर उठा लिया! पूरा पर्वत उनके हाथ पर ऐसे टिक गया जैसे कोई हल्की-सी वस्तु हो। वृंदावनवासी स्तब्ध रह गए। किसी के मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था।
फिर कृष्ण ने पुकारा, “आओ!
सब लोग गोवर्धन के नीचे आ जाओ।” नंद बाबा बोले, “लाला… यह तुमने क्या कर दिया?” कृष्ण हँसकर बोले, “बाबा, आप सब चिंता मत कीजिए।” लोग धीरे-धीरे पर्वत के नीचे आने लगे। गायें आईं। बछड़े आए।
बच्चे आए। वृद्ध आए। स्त्रियाँ आईं। पूरा वृंदावन गोवर्धन पर्वत के नीचे आ गया। कृष्ण एक हाथ से पर्वत उठाए खड़े थे। उनका दूसरा हाथ कमर पर था। चेहरे पर वही मधुर मुस्कान। यशोदा मैया बार-बार उन्हें देख रही थीं। उनके मन में चिंता थी— “मेरा छोटा-सा लाल इतनी देर तक पर्वत कैसे उठाए रखेगा?” उन्होंने धीरे से कहा, “कन्हैया, थक तो नहीं गए?” कृष्ण हँसे। “नहीं मैया।” बलराम जी मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “मैया, कन्हैया को कुछ नहीं होगा।” वृंदावन के लोग आश्चर्य से कृष्ण को देखते रहे। किसी ने कहा, “यह तो स्वयं भगवान हैं।”
किसी ने कहा, “हमारा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं।” किसी ने हाथ जोड़ लिए। कोई कृष्ण की जय-जयकार करने लगा। सात दिन तक वर्षा होती रही। सात दिन तक कृष्ण गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे। न उन्हें भूख लगी। न प्यास। न थकान। ग्वाल-बालों को तो यह भी चिंता होने लगी कि कहीं कृष्ण का हाथ दुख न जाए। एक बालक बोला, “कन्हैया, हम भी पर्वत को सहारा देते हैं।” उसने अपनी छोटी-सी लकड़ी उठाई और पर्वत की ओर कर दी। दूसरे बालकों ने भी ऐसा ही किया।
कृष्ण हँस पड़े। “हाँ-हाँ, तुम सब भी सहारा दो।” अब सभी बच्चे अपनी-अपनी लकड़ियों से गोवर्धन को सहारा देने लगे। वृंदावन के लोग इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगे। कृष्ण ने किसी को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अकेले सबकी रक्षा कर रहे हैं। वह सबको अपने साथ जोड़ रहे थे। उधर देवराज इंद्र का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा। उन्होंने देखा कि उनकी सारी शक्ति भी कृष्ण के सामने व्यर्थ हो गई। वर्षा रुक नहीं रही थी, लेकिन वृंदावन सुरक्षित था। इंद्र को समझ आने लगा कि जिसे वह एक साधारण बालक समझ रहे थे, वह कोई सामान्य शक्ति नहीं है।
उनका अहंकार टूटने लगा। उन्होंने बादलों को वर्षा रोकने का आदेश दिया। धीरे-धीरे आकाश साफ होने लगा। बादल हटने लगे। सूर्य की किरणें धरती पर उतर आईं। यमुना फिर चमकने लगी। पक्षियों ने फिर से उड़ना शुरू किया। वृंदावनवासियों ने बाहर देखा। वर्षा समाप्त हो चुकी थी। कृष्ण ने धीरे से गोवर्धन पर्वत को उसी स्थान पर रख दिया। सभी लोग बाहर आए। गायें आनंद से रंभाने लगीं।
ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर इकट्ठे हो गए। यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया। “मेरा लाल!” नंद बाबा की आँखें भी भर आईं। उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रखा। “लाला, तुमने आज पूरे वृंदावन की रक्षा कर दी।” कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “बाबा, मैंने कुछ नहीं किया। गोवर्धन ने सबकी रक्षा की।” लेकिन सब जानते थे कि गोवर्धन को उठाने वाला कौन था। कुछ ही समय बाद देवराज इंद्र स्वयं कृष्ण के सामने आए। उनका सिर झुका हुआ था। उनके भीतर का अहंकार समाप्त हो चुका था। उन्होंने कृष्ण से कहा, “प्रभु, मुझे क्षमा कीजिए।
मैंने अपने पद और शक्ति का अभिमान किया। मैं यह भूल गया कि संसार की सारी शक्तियाँ भी आपकी ही इच्छा से चलती हैं।” कृष्ण ने उन्हें क्षमा कर दिया। इंद्र ने कृष्ण को प्रणाम किया। और उस दिन से वृंदावन में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व हो गया। लोग समझ गए कि प्रकृति की रक्षा करना, गायों की सेवा करना और धरती के प्रति कृतज्ञ रहना भी ईश्वर की उपासना का ही एक रूप है। संध्या होने लगी।
आकाश में हल्की लालिमा छा गई। गोवर्धन पर्वत सूर्य की अंतिम किरणों में चमक रहा था। कृष्ण अपने ग्वाल-बालों के साथ बैठे थे। एक बालक बोला, “कन्हैया, तुमने तो सच में पहाड़ उठा लिया!” कृष्ण हँसते हुए बोले, “अच्छा? तुम लोग तो लकड़ी से उसे सहारा दे रहे थे।” सब हँस पड़े। यशोदा मैया दूर से अपने लाल को देख रही थीं। उनके लिए कृष्ण आज भी वही नन्हा बालक था, जो कभी माखन चुराता था, कभी मटकी फोड़ता था और कभी उनकी गोद में सिर रखकर सो जाता था। लेकिन वृंदावन जान चुका था कि नंदलाल की लीलाएँ साधारण नहीं थीं। उनकी हर शरारत के पीछे प्रेम था। हर संकट के पीछे कोई संदेश था। और हर लीला में भक्तों के लिए कोई गहरा रहस्य छिपा था।
समय बीतता गया। कृष्ण की बाल-लीलाएँ बढ़ती गईं। कभी वह ग्वाल-बालों के साथ वन में खेलते। कभी गायों के पीछे दौड़ते। कभी यमुना के तट पर बैठकर बाँसुरी बजाते। कभी माखन के लिए मैया से रूठते। कभी गोपियों को अपनी शरारतों से परेशान करते। वृंदावन का हर दिन कृष्ण के कारण उत्सव बन गया था। लेकिन बाल्यकाल का समय भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। वह नन्हा कन्हैया, जिसकी उँगली पकड़कर यशोदा मैया चलना सिखाती थीं, अब वृंदावन की सीमाओं से बाहर जाने वाली एक बड़ी लीला की ओर बढ़ रहा था।
ग्वाल-बालों की हँसी… यशोदा की पुकार… नंद बाबा का वात्सल्य… गायों की घंटियाँ… यमुना की लहरें… गोवर्धन की छाया… और कृष्ण की मधुर मुस्कान— इन सबमें एक ऐसी स्मृति बसने वाली थी, जिसे वृंदावन कभी भूल नहीं पाएगा। क्योंकि बाल-लीलाओं का यह सुंदर अध्याय अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। आने वाले समय में नंदलाल की बाल-छवि धीरे-धीरे किशोर कृष्ण के रूप में बदलने लगेगी।
लेकिन क्या वृंदावन उन्हें कभी भूल पाएगा? क्या यशोदा मैया उस नटखट बालक के बिना रह पाएँगी? क्या ग्वाल-बाल उस सखा की शरारतों को भूल पाएँगे? और क्या वृंदावन की गलियाँ कभी फिर वैसी ही रहेंगी, जब उनमें कृष्ण की पायल की रुनझुन सुनाई नहीं देगी? इन प्रश्नों के उत्तर हमारी इस श्रृंखला के अंतिम भाग में छिपे हैं। जहाँ हम फिर लौटेंगे उन्हीं गलियों में… जहाँ नंदलाल की हँसी गूँजती थी। उसी यमुना तट पर… जहाँ वह अपने सखाओं के साथ खेलते थे। उसी नंद भवन में… जहाँ यशोदा मैया उन्हें पुकारती थीं।
और उसी वृंदावन में… जहाँ हर कण आज भी जैसे यही कहता है— “कृष्ण केवल यहाँ रहे नहीं थे…
कृष्ण ने तो पूरे वृंदावन को अपने प्रेम में बसा लिया था।”
लेकिन अभी एक आखिरी कथा शेष है। एक ऐसा भावपूर्ण समापन, जिसमें न कोई राक्षस होगा, न कोई युद्ध… बस होगा नंदलाल का प्रेम।
माँ यशोदा का वात्सल्य… ग्वाल-बालों की मित्रता… गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम… गायों की ममता… यमुना की लहरों का स्नेह… और वृंदावन की मिट्टी में हमेशा के लिए बस जाने वाली कृष्ण की स्मृतियाँ।
अगले और अंतिम भाग में हम जानेंगे—
“वृंदावन की मधुर बाल-लीलाओं का भावपूर्ण समापन” और शायद उस अंतिम कथा के बाद जब आप आँखें बंद करेंगे… तो आपको भी कहीं दूर से एक मधुर बाँसुरी सुनाई दे…
“राधे… राधे…”
Be Continue….

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