🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

पढ़ने का समय : 10 मिनट

 

 

(भाग 13 — कालिय नाग का दमन)

 

 

वृंदावन की धरती पर उस दिन सुबह कुछ उदास-सी थी।सूरज आकाश में चमक रहा था, पेड़ों पर पक्षी भी चहचहा रहे थे, गायें अपने बछड़ों के साथ वन की ओर जा रही थीं, फिर भी वातावरण में एक अनजाना भय पसरा हुआ था।

 

उस भय का कारण था—यमुना।

 

वही यमुना, जिसके किनारे बैठकर कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ हँसते-खेलते थे।

 

वही यमुना, जिसके जल में कभी वृंदावन के बच्चे खेला करते थे।

 

वही यमुना, जिसकी लहरें कृष्ण के चरणों को छूकर स्वयं को धन्य समझती थीं।

 

लेकिन अब यमुना का एक बड़ा भाग विष से भर चुका था।

 

उस स्थान के आसपास की हवा तक भारी हो गई थी।

 

कहा जाता था कि यमुना के उस हिस्से में एक विशाल नाग रहता है—कालिय।

 

उसके शरीर से निकलने वाला विष इतना भयंकर था कि जल में रहने वाले जीव मरने लगे थे। वृक्ष सूख गए थे। पक्षी उस स्थान के ऊपर से उड़ते तो विषैली वायु के कारण नीचे गिर पड़ते।

 

वृंदावन के लोग उस ओर जाने से भी डरते थे।

 

नंद बाबा ने कई बार ग्वाल-बालों को समझाया था,

 

“बच्चो, उस ओर मत जाना। यमुना के उस हिस्से के पास जाना सुरक्षित नहीं है।”

 

यशोदा मैया भी कृष्ण को बार-बार समझाती थीं,

 

“लाला, तुम अपने सखाओं के साथ वन में खेलो, लेकिन यमुना के उस विषैले स्थान के पास मत जाना।”

 

कृष्ण हर बार मुस्कुराकर कहते,

 

“हाँ मैया, मैं नहीं जाऊँगा।”

 

लेकिन कृष्ण की आँखों में एक ऐसी चमक होती, जिसे यशोदा मैया पढ़ नहीं पाती थीं।

 

उन्हें क्या पता था कि कृष्ण के मन में कुछ और ही चल रहा है।

 

एक दिन कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ वन में खेल रहे थे।

 

किसी के हाथ में गेंद थी, कोई बाँस की छोटी-सी छड़ी लेकर खेल रहा था और कोई पेड़ से गिरे फलों को इकट्ठा कर रहा था।

 

बलराम जी भी उनके साथ थे।

 

खेलते-खेलते उनकी गेंद उछलकर दूर चली गई।

 

एक ग्वाल-बाल बोला,

 

“कन्हैया! गेंद उधर चली गई।”

 

कृष्ण ने उस दिशा में देखा।

 

गेंद धीरे-धीरे लुढ़कती हुई उसी ओर चली गई जहाँ यमुना का विषैला क्षेत्र था।

 

कुछ बालक डरकर रुक गए।

 

“वहाँ मत जाना।”

 

दूसरा बोला,

 

“नंद बाबा ने मना किया है।”

 

कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

 

उनकी दृष्टि यमुना के उस काले पड़ चुके जल पर टिक गई।

 

लहरें शांत थीं।

 

लेकिन उस शांति के भीतर एक भयंकर विष छिपा था।

 

कृष्ण ने धीरे से कहा,

 

“यह यमुना तो सबकी माँ जैसी है। इसका जल इतना विषैला क्यों हो गया?”

 

एक ग्वाल-बाल बोला,

 

“कन्हैया, इसी में कालिय नाग रहता है। कहते हैं वह बहुत बड़ा और भयंकर है।”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“तो फिर उससे मिलना चाहिए।”

 

ग्वाल-बाल घबरा गए।

 

“नहीं कन्हैया!”

 

“तुम वहाँ नहीं जाओगे।”

 

“नंद बाबा हमें बहुत डाँटेंगे।”

 

बलराम जी कृष्ण को समझाने लगे,

 

“कन्हैया, अभी लौट चलो।”

 

कृष्ण ने दाऊ की ओर देखा।

 

उनकी आँखों में दृढ़ता थी।

 

“दाऊ, इस विष के कारण कितने जीव परेशान हैं। यमुना का जल सबके लिए है। यदि कोई इसे विषैला बना दे तो क्या हमें चुप रहना चाहिए?”

 

बलराम कृष्ण को देखते रहे।

 

वह जानते थे कि कृष्ण जो ठान लेते हैं, उसे कोई आसानी से रोक नहीं सकता।

 

कृष्ण आगे बढ़े।

 

यमुना के तट पर एक विशाल कदंब का वृक्ष था।

 

कृष्ण उस वृक्ष पर चढ़ गए।

 

ग्वाल-बाल नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

 

“कन्हैया! नीचे आ जाओ!”

 

लेकिन कृष्ण मुस्कुराते रहे।

 

उन्होंने ऊपर से यमुना के जल को देखा।

 

फिर अचानक—

 

उन्होंने कदंब के वृक्ष से यमुना में छलाँग लगा दी।

 

“छपाक!”

 

यमुना का जल चारों ओर उछल पड़ा।

 

ग्वाल-बाल भय से चिल्ला उठे।

 

“कृष्ण!”

 

“कन्हैया!”

 

“अरे! कृष्ण यमुना में कूद गए!”

 

यमुना का शांत जल अचानक भयंकर रूप से हिलने लगा।

 

लहरें उठने लगीं।

 

मानो यमुना के भीतर कोई विशाल शक्ति जाग गई हो।

 

जल के भीतर कालिय नाग ने कृष्ण की उपस्थिति अनुभव कर ली थी।

 

वह क्रोधित होकर बाहर आया।

 

उसका शरीर विशाल था।

 

उसके अनेक फन थे।

 

उसकी आँखों से क्रोध की ज्वाला निकल रही थी।

 

उसके फनों से विष की भयंकर लपटें उठ रही थीं।

 

जैसे ही उसने कृष्ण को देखा, वह फुफकारा।

 

यमुना का जल काँप उठा।

 

ग्वाल-बाल भयभीत होकर पीछे हट गए।

 

लेकिन कृष्ण शांत थे।

 

उन्होंने कालिय को देखकर कहा,

 

“कालिय! तुमने इस पवित्र यमुना को विषैला क्यों बना दिया?”

 

कालिय ने भयंकर फुफकार भरते हुए कृष्ण को अपनी पूँछ से घेर लिया।

 

उसने कृष्ण को अपने विशाल शरीर में जकड़ लिया।

 

ग्वाल-बालों ने यह दृश्य देखा तो उनके प्राण सूख गए।

 

एक बालक रोते हुए बोला,

 

“कन्हैया को नाग ने पकड़ लिया!”

 

दूसरा दौड़ते हुए बोला,

 

“चलो! नंद बाबा को बताते हैं!”

 

कुछ ही देर में यह समाचार पूरे वृंदावन में फैल गया।

 

“कृष्ण यमुना में चले गए!”

 

“कालिय नाग ने उन्हें पकड़ लिया!”

 

“कृष्ण संकट में हैं!”

 

यशोदा मैया ने जैसे ही यह सुना, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

वह दौड़ पड़ीं।

 

“मेरा कन्हैया!”

 

नंद बाबा भी उनके पीछे दौड़े।

 

वृंदावन के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बालक सब यमुना की ओर चल पड़े।

 

यशोदा रोते हुए कह रही थीं,

 

“मेरे लाल को कुछ नहीं होना चाहिए।”

 

उनकी आँखों के सामने वही दृश्य था—

 

कृष्ण कालिय नाग के विशाल शरीर में जकड़े हुए थे।

 

मैया का हृदय फटने लगा।

 

वह यमुना में उतरने लगीं।

 

“मैं अपने लाल को लेकर आऊँगी!”

 

नंद बाबा ने उन्हें रोक लिया।

 

“यशोदा! रुको!”

 

लेकिन एक माँ को कौन रोक सकता था?

 

उधर बलराम जी शांत खड़े थे।

 

उनके चेहरे पर चिंता नहीं थी।

 

वह जानते थे कि यह लीला क्या है।

 

उन्होंने नंद बाबा और यशोदा मैया से कहा,

 

“चिंता मत करो। कृष्ण को कुछ नहीं होगा।”

 

यशोदा ने आँसुओं से भरी आँखों से बलराम को देखा।

 

“दाऊ! तुम कैसे कह सकते हो?”

 

बलराम मुस्कुराए।

 

“क्योंकि कन्हैया को कोई हरा नहीं सकता।”

 

उधर कालिय ने कृष्ण को और कसकर जकड़ लिया।

 

वह सोच रहा था कि अब यह बालक बच नहीं सकता।

 

लेकिन अचानक कृष्ण का शरीर भारी होने लगा।

 

इतना भारी कि कालिय के लिए उन्हें पकड़े रखना कठिन हो गया।

 

कृष्ण ने अपना शरीर विस्तृत कर लिया।

 

कालिय का बंधन ढीला पड़ने लगा।

 

और अगले ही क्षण कृष्ण उसके फनों से निकलकर उसके ऊपर जा खड़े हुए।

 

कालिय क्रोध से भर उठा।

 

उसने एक के बाद एक अनेक फन उठाए।

 

कृष्ण ने उसके एक फन पर अपना पैर रखा।

 

फिर दूसरे पर।

 

फिर तीसरे पर।

 

और देखते ही देखते वह उसके सभी फनों पर नृत्य करने लगे।

 

कृष्ण के चरण जैसे ही कालिय के फनों पर पड़ते, उसका विष कम होने लगता।

 

कालिय जितना फन उठाता, कृष्ण उतनी ही सहजता से दूसरे फन पर पहुँच जाते।

 

यमुना की लहरें ताल देने लगीं।

 

देवताओं ने आकाश से यह दृश्य देखा तो आश्चर्यचकित हो उठे।

 

गंधर्वों के वाद्य बजने लगे।

 

देवताओं ने पुष्पों की वर्षा आरंभ कर दी।

 

वृंदावन के लोग यह अद्भुत दृश्य देखकर स्तब्ध थे।

 

जिस कालिय से पूरा क्षेत्र काँपता था, आज वही कृष्ण के चरणों के नीचे विवश पड़ा था।

 

कृष्ण के मुख पर मुस्कान थी।

 

उनका नृत्य ऐसा लग रहा था मानो स्वयं यमुना की लहरें उनके चरणों के साथ नृत्य कर रही हों।

 

कालिय के फन एक-एक करके झुकने लगे।

 

उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

 

अब उसके भीतर क्रोध नहीं, भय था।

 

वह समझ गया—

 

“यह कोई साधारण बालक नहीं है।”

 

उसकी पत्नियाँ, जिन्हें नाग-पत्नियाँ कहा जाता था, हाथ जोड़कर कृष्ण के सामने आईं।

 

उनकी आँखों में आँसू थे।

 

उन्होंने प्रार्थना की,

 

“प्रभु! हमारे पति से भूल हुई है। वह अपने विष और अहंकार में अंधा हो गया था। कृपा करके उसे क्षमा कर दीजिए।”

 

कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

 

फिर उन्होंने कालिय की ओर देखा।

 

“कालिय, तुम्हारा यहाँ रहना उचित नहीं है। तुम्हारे विष से यमुना और उसके आसपास का जीवन नष्ट हो रहा है।”

 

कालिय ने सिर झुका दिया।

 

कृष्ण बोले,

 

“तुम यहाँ से चले जाओ। समुद्र की ओर चले जाओ। वहाँ जाकर रहो।”

 

कालिय ने धीरे से अपना सिर झुका दिया।

 

अब उसके भीतर कोई विरोध नहीं था।

 

कृष्ण ने उसके फन से अपना चरण हटा लिया।

 

कालिय ने पहली बार राहत की साँस ली।

 

उसने हाथ जोड़कर कृष्ण को प्रणाम किया।

 

कृष्ण ने उसे आशीर्वाद दिया।

 

और कालिय अपनी पत्नियों तथा परिवार के साथ यमुना छोड़कर चला गया।

 

जैसे ही कालिय वहाँ से गया, यमुना का जल धीरे-धीरे निर्मल होने लगा।

 

विष का प्रभाव कम होने लगा।

 

जल में फिर से जीवन लौटने लगा।

 

पक्षी वापस आने लगे।

 

हवा में फिर से सुगंध भर गई।

 

वृक्षों पर हरियाली लौटने लगी।

 

और यमुना जैसे स्वयं मुस्कुराकर कृष्ण के चरणों को धन्यवाद देने लगी।

 

तट पर खड़ी यशोदा मैया अपने लाल को देखते ही दौड़ पड़ीं।

 

उन्होंने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया।

 

“कन्हैया!”

 

उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

 

“तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?”

 

कृष्ण ने मासूमियत से मैया की ओर देखा।

 

“मैया… मैंने तो यमुना को साफ किया।”

 

यशोदा मैया उन्हें सीने से लगाकर रोती रहीं।

 

“तुम मुझे एक दिन बहुत रुलाओगे।”

 

कृष्ण हँस पड़े।

 

नंद बाबा भी कृष्ण को देखकर प्रसन्न हो गए।

 

वृंदावन के सभी लोग जय-जयकार करने लगे।

 

“कृष्ण कन्हैया लाल की जय!”

 

“नंदलाल की जय!”

 

“यशोदा मैया के लाल की जय!”

 

चारों ओर आनंद छा गया।

 

लेकिन इस लीला का अर्थ केवल इतना नहीं था कि कृष्ण ने एक नाग का दमन किया।

 

कालिय केवल एक नाग नहीं था।

 

उसका विष अहंकार का प्रतीक था।

 

जिस प्रकार कालिय ने यमुना को अपने विष से भर दिया था, उसी प्रकार मनुष्य का अहंकार उसके हृदय को विषैला बना देता है।

 

लेकिन जब हृदय में कृष्ण के चरण पड़ते हैं, तब वह विष भी समाप्त होने लगता है।

 

कृष्ण ने कालिय को नष्ट नहीं किया।

 

उन्होंने उसके अहंकार को नष्ट किया।

 

उसे जीवन का एक नया अवसर दिया।

 

यही तो कृष्ण हैं—

 

दुष्टता का अंत करते हैं, लेकिन प्रायश्चित करने वाले को क्षमा भी देते हैं।

 

उस शाम वृंदावन में दीप जलाए गए।

 

यमुना का जल फिर से चमक रहा था।

 

कृष्ण अपने सखाओं के साथ बैठे थे।

 

एक ग्वाल-बाल बोला,

 

“कन्हैया, आज तो तुम सचमुच बहुत बड़े वीर निकले!”

 

कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

 

“अच्छा? तो कल कौन वीर बनेगा?”

 

सभी बच्चे हँस पड़े।

 

बलराम ने कृष्ण की ओर देखा और मुस्कुराए।

 

वृंदावन में फिर वही आनंद लौट आया था।

 

लेकिन कृष्ण की लीलाओं का प्रवाह अभी रुकने वाला नहीं था।

 

कुछ ही समय बाद वृंदावन के लोगों के जीवन में एक ऐसी घटना आने वाली थी, जिसे कोई भूल नहीं पाएगा।

 

हर वर्ष की तरह उस समय वृंदावन के लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी करने लगे थे।

 

बड़े-बड़े पकवान बनने लगे।

 

दूध, दही, घी और माखन के भोग सजाए जाने लगे।

 

सबको विश्वास था कि इंद्र प्रसन्न होंगे तो वर्षा होगी और उनकी गायों तथा खेतों को जीवन मिलेगा।

 

लेकिन नंदलाल ने इस पर एक प्रश्न उठाया—

 

“क्या हमें इंद्र की पूजा करनी चाहिए, या उस गोवर्धन पर्वत की, जो हमारी गायों को घास देता है, जल देता है और हमारी रक्षा करता है?”

 

कृष्ण के इस प्रश्न से पूरा वृंदावन सोच में पड़ गया।

 

किसी को नहीं पता था कि नंदलाल की यह छोटी-सी बात आगे चलकर देवराज इंद्र के अहंकार को चुनौती देगी।

 

फिर आकाश में घने बादल छा जाएँगे…

 

बिजलियाँ गरजेंगी…

 

वृंदावन पर भयंकर वर्षा टूट पड़ेगी…

 

और तब सबकी रक्षा के लिए नंदलाल अपने नन्हे हाथ की एक उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लेंगे।

 

लेकिन प्रश्न यह था—

 

क्या सचमुच एक छोटा-सा बालक पूरे पर्वत को अपनी उँगली पर उठा सकता है?

 

और यदि उठा सकता है…

 

तो सात दिनों तक वृंदावनवासियों की रक्षा कैसे करेगा नंदलाल?

 

यही जानने के लिए अगली लीला की प्रतीक्षा कीजिए—

 

भाग 14 — गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला

Avatar photo

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *