भाग 5 — माखनचोर नंदलाल: जब कान्हा ने गोकुल में मचा दी धूम
गोकुल की गलियों में अब एक नया नाम बहुत तेजी से प्रसिद्ध हो रहा था।
वह नाम था—
माखनचोर कन्हैया।
लेकिन यह नाम किसी ने प्रेम से रखा था या शिकायत करते हुए, यह कहना कठिन था।
क्योंकि गोकुल की गोपियों के घरों में जब भी कोई माखन की मटकी खाली मिलती, तो सबसे पहले सबकी निगाहें नंद बाबा के घर की ओर उठतीं।
और वहाँ क्या मिलता?
एक नन्हा-सा बालक।
घुँघराले बाल।
माथे पर छोटी-सी लट।
आँखों में शरारत।
होंठों पर मुस्कान।
और चेहरे पर ऐसा भाव—
मानो उसने कुछ किया ही न हो।
वह थे हमारे नंदलाल।
श्रीकृष्ण।
—
माखन से कृष्ण का प्रेम
यशोदा मैया प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर घर के काम में लग जाती थीं।
गायों का दूध दुहा जाता।
दूध को उबाला जाता।
फिर उससे दही जमाया जाता।
और अगले दिन सुबह यशोदा मैया बड़े प्रेम से दही मथकर उसमें से सफेद-सफेद माखन निकालतीं।
माखन को देखकर कृष्ण की आँखें चमक उठतीं।
जब वे बहुत छोटे थे, तब बस दूर से माखन को देखते थे।
लेकिन अब तो घुटनों के बल चलना सीख चुके थे।
इसलिए माखन उनके लिए केवल देखने की वस्तु नहीं रह गया था।
वह उनके लिए अधिकार की वस्तु बन चुका था।
एक दिन यशोदा मैया माखन निकाल रही थीं।
कृष्ण पास में बैठे उन्हें ध्यान से देख रहे थे।
यशोदा ने पूछा—
“क्या देख रहे हो लाला?”
कृष्ण चुप।
यशोदा ने फिर पूछा—
“माखन चाहिए?”
कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।
यशोदा हँस पड़ीं।
“अच्छा! अभी देती हूँ।”
उन्होंने एक छोटी-सी कटोरी में माखन निकाला और कृष्ण को दे दिया।
कृष्ण ने दोनों हाथों से कटोरी पकड़ ली।
पहले थोड़ा-सा माखन खाया।
फिर मैया की ओर देखा।
फिर थोड़ा और खाया।
और फिर पूरी कटोरी खाली कर दी।
यशोदा हँसते हुए बोलीं—
“बस भी कर! इतना माखन खाएगा तो पेट दुखेगा।”
कृष्ण ने कटोरी आगे बढ़ा दी।
मानो कह रहे हों—
“मैया, अभी तो शुरुआत हुई है।”
—
कृष्ण को अपना माखन क्यों पसंद नहीं था?
गोकुल की एक विचित्र बात थी।
हर घर में माखन था।
कृष्ण को जब भी माखन चाहिए होता, यशोदा मैया उन्हें माखन दे देतीं।
फिर भी कृष्ण को दूसरे घरों का माखन अधिक प्रिय था।
एक दिन यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—
“लाला, मेरे घर का माखन अच्छा नहीं लगता क्या?”
कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।
यशोदा बोलीं—
“तो फिर पड़ोस की गोपी के घर क्यों जाते हो?”
कृष्ण मुस्कुराए।
यशोदा ने उनकी आँखों में देखा।
“अच्छा! अब समझी। तुम्हें माखन से ज्यादा चोरी करना पसंद है।”
कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।
—
पहली बड़ी चोरी
एक सुबह यशोदा मैया किसी काम से बाहर गई थीं।
कृष्ण ने देखा कि घर में माखन की मटकी ऊपर टँगी हुई है।
कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।
फिर अपने छोटे-छोटे हाथों की ओर देखा।
फिर आसपास देखा।
कोई दिखाई नहीं दिया।
उन्होंने सोचा—
“आज तो अवसर अच्छा है।”
लेकिन मटकी बहुत ऊँचाई पर थी।
कृष्ण अकेले उसे नहीं पहुँच सकते थे।
तभी उन्हें अपने ग्वाल-बाल मित्र दिखाई दिए।
कृष्ण ने उन्हें संकेत किया।
सब बच्चे पास आए।
एक बोला—
“क्या हुआ कन्हैया?”
कृष्ण ने मटकी की ओर उँगली की।
बच्चे समझ गए।
एक ने कहा—
“माखन?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
अब योजना बननी शुरू हुई।
सबसे पहले एक बालक नीचे बैठा।
उसके ऊपर दूसरा।
फिर उसके ऊपर तीसरा।
और सबसे ऊपर चढ़े—
कन्हैया।
कृष्ण धीरे-धीरे ऊपर पहुँचे।
उन्होंने मटकी पकड़ ली।
लेकिन मटकी बहुत कसकर बाँधी गई थी।
कृष्ण ने खींचा।
नहीं निकली।
उन्होंने फिर खींचा।
फिर भी नहीं निकली।
तब उन्होंने अपने मित्रों से कहा—
“और जोर लगाओ!”
सभी बच्चों ने एक साथ जोर लगाया।
मटकी हिली।
फिर हिली।
और अचानक—
धड़ाम!
मटकी नीचे गिर गई।
दही और माखन चारों ओर फैल गया।
कृष्ण ने तुरंत माखन उठाया।
एक मित्र के मुँह में लगाया।
फिर दूसरे के।
फिर स्वयं खाने लगे।
सभी बच्चे हँसने लगे।
—
गोपी ने देख लिया
लेकिन उन्हें पता नहीं था कि पास की खिड़की से एक गोपी यह सब देख रही थी।
वह चुपचाप खड़ी होकर सब देखती रही।
उसने सोचा—
“आज तो नंदलाल को रंगे हाथों पकड़ लिया।”
वह तुरंत यशोदा मैया के पास पहुँची।
“यशोदा!”
यशोदा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
गोपिका बोली—
“अपने लाला को समझाओ।”
यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—
“क्यों? क्या कर दिया उसने?”
गोपिका बोली—
“तुम्हारा लाल हमारे घर का माखन चुराने लगा है।”
यशोदा ने हँसकर कहा—
“अरे, मेरा कन्हैया ऐसा नहीं कर सकता।”
गोपी बोली—
“अच्छा? तो मेरे साथ चलो।”
यशोदा उनके साथ चल पड़ीं।
—
शिकायतों की शुरुआत
अब तो जैसे गोकुल की सभी गोपियों को एक अवसर मिल गया।
एक गोपी बोली—
“यशोदा, तुम्हारा कृष्ण मेरे घर से माखन चुरा ले जाता है।”
दूसरी बोली—
“मेरे घर में तो मटकी ही फोड़ दी।”
तीसरी बोली—
“मेरे घर का माखन खाकर बंदरों को भी खिला देता है।”
चौथी बोली—
“और मेरे घर में तो माखन खाकर ऊपर से मुस्कुराता है!”
यशोदा मैया सबकी बातें सुनती रहीं।
उन्होंने पूछा—
“सच कह रही हो?”
एक साथ कई गोपियाँ बोलीं—
“हाँ!”
तभी पीछे से किसी ने हँसकर कहा—
“यशोदा, तुम्हारा लाल बहुत बड़ा चोर है।”
यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।
कृष्ण चुपचाप खड़े थे।
उनके होंठों पर माखन लगा हुआ था।
यशोदा ने पूछा—
“कन्हैया! यह क्या है?”
कृष्ण ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।
—
कृष्ण की मासूम सफाई
यशोदा ने कृष्ण को अपनी ओर बुलाया।
“इधर आओ।”
कृष्ण धीरे-धीरे आगे आए।
यशोदा ने पूछा—
“तुमने माखन चुराया?”
कृष्ण ने सिर हिला दिया—
“नहीं।”
यशोदा ने कहा—
“तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”
कृष्ण चुप।
यशोदा ने फिर पूछा—
“बोलो।”
कृष्ण ने अपनी आँखें बड़ी कर लीं।
फिर धीरे से बोले—
“मैया… मुझे तो बंदर ने लगाया।”
गोपियाँ हँसते-हँसते दोहरी हो गईं।
यशोदा ने कहा—
“अच्छा! अब बंदर तुम्हारे मुँह पर माखन लगाने लगे?”
कृष्ण मुस्कुरा दिए।
यशोदा समझ गईं कि उनका लाल सच नहीं बोल रहा।
लेकिन उनका मन कठोर कैसे होता?
उन्होंने कृष्ण को गोद में उठा लिया।
गोपियाँ बोलीं—
“देखा! फिर बच गया।”
—
एक नई शरारत
लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?
अगले दिन उन्होंने एक नई योजना बनाई।
अब वह अकेले चोरी नहीं करते थे।
उन्होंने अपने मित्रों की पूरी टोली बना ली थी।
एक बालक दरवाजे पर पहरा देता।
दूसरा खिड़की के पास खड़ा रहता।
तीसरा मटकी तक पहुँचने की व्यवस्था करता।
और कृष्ण?
वे तो स्वयं सेनापति थे।
कृष्ण ने कहा—
“जब मैं संकेत करूँ, तब सब माखन खाना।”
सबने सिर हिलाया।
कृष्ण घर में घुसे।
मटकी देखी।
धीरे से उसे नीचे उतारा।
माखन निकाला।
पहले स्वयं खाया।
फिर सबको बाँट दिया।
फिर बोले—
“जो यहाँ आया है, उसे खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”
उन्होंने थोड़ा माखन बाहर बैठे बंदरों को भी दे दिया।
बंदर माखन खाते रहे।
बच्चे हँसते रहे।
कृष्ण भी हँसते रहे।
उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे गोकुल में कोई बड़ा उत्सव चल रहा हो।
—
गोपियों ने बनाई योजना
अब गोपियाँ भी कृष्ण की शरारतों से परेशान होने लगीं।
उन्होंने आपस में सलाह की।
एक बोली—
“अब माखन ऐसी जगह रखेंगे जहाँ कृष्ण पहुँच ही न सके।”
दूसरी बोली—
“मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँधेंगे।”
तीसरी बोली—
“घर के दरवाजे बंद रखेंगे।”
चौथी बोली—
“देखते हैं अब नंदलाल कैसे चोरी करते हैं।”
सब हँस पड़ीं।
लेकिन वे कृष्ण को अभी ठीक से जानती नहीं थीं।
कृष्ण ने जब यह योजना सुनी तो मुस्कुरा दिए।
उन्होंने कहा—
“माखन छिपाओगी?”
उनकी आँखों में शरारत चमक रही थी।
“तो हम भी देखेंगे।”
—
ऊँची मटकी और नंदलाल
अगले दिन गोपियों ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँध दी।
कृष्ण घर में आए।
उन्होंने ऊपर देखा।
मटकी बहुत दूर थी।
कृष्ण ने अपने हाथ कमर पर रखे।
कुछ क्षण सोचा।
फिर बाहर गए।
अपने मित्रों को बुलाया।
सबने मिलकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ना शुरू किया।
कृष्ण सबसे ऊपर पहुँचे।
उन्होंने मटकी को देखा।
मटकी भी जैसे उन्हें देखकर डर रही हो।
कृष्ण ने धीरे से हाथ बढ़ाया।
लेकिन तभी—
दरवाजे के बाहर से आवाज आई—
“अरे! कौन है वहाँ?”
सभी बच्चे घबरा गए।
कृष्ण ने फुसफुसाकर कहा—
“शांत!”
सब चुप हो गए।
गोपी अंदर आई।
उसने देखा कि बच्चे दीवार के पास खड़े हैं।
मटकी सुरक्षित थी।
वह मुस्कुराकर बाहर चली गई।
जैसे ही वह गई, कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।
फिर मित्रों की ओर।
और अचानक—
मटकी फूट गई।
माखन नीचे गिरा।
बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।
—
यशोदा मैया की चिंता
धीरे-धीरे कृष्ण की शरारतें इतनी बढ़ने लगीं कि यशोदा मैया को चिंता होने लगी।
वह एक दिन नंद बाबा से बोलीं—
“आप अपने लाल को कुछ समझाते क्यों नहीं?”
नंद बाबा हँसकर बोले—
“मैं क्या समझाऊँ? जब वह मुस्कुराता है तो मैं स्वयं सब भूल जाता हूँ।”
यशोदा बोलीं—
“लेकिन यह दूसरे घरों की मटकी फोड़ता है।”
नंद बाबा बोले—
“तो गोपियाँ शिकायत करने आती हैं?”
यशोदा बोलीं—
“हाँ।”
नंद बाबा हँस पड़े।
“और फिर?”
यशोदा मुस्कुराकर बोलीं—
“फिर मैं भी उसे देखकर कुछ कह नहीं पाती।”
दोनों हँस पड़े।
—
माखनचोर का अर्थ
धीरे-धीरे “माखनचोर” नाम कृष्ण के लिए प्रेम का नाम बन गया।
गोपियाँ शिकायत करतीं, लेकिन भीतर से चाहतीं कि कृष्ण उनके घर भी आएँ।
क्योंकि जिस घर में कृष्ण आते थे, वहाँ केवल माखन नहीं चोरी होता था।
वहाँ तो—
मन की उदासी भी चोरी हो जाती थी।
कृष्ण आते और घर हँसी से भर जाता।
बच्चे उनके पीछे दौड़ते।
गोपियाँ उन्हें पकड़ने का नाटक करतीं।
कृष्ण भागते।
कभी छिपते।
कभी माखन किसी के हाथ पर लगा देते।
और कभी स्वयं मुँह पर माखन लगाकर ऐसे खड़े हो जाते जैसे कोई अपराध ही न किया हो।
इसीलिए तो ब्रजवासी कहते—
“हमारा माखन जाए तो जाए, पर कन्हैया की मुस्कान न जाए।”
—
कृष्ण और बंदर
कृष्ण को बंदरों से भी बहुत प्रेम था।
जब वह माखन चुराते, तो उसका कुछ भाग बंदरों को अवश्य खिलाते।
एक दिन यशोदा मैया ने उन्हें ऐसा करते देख लिया।
उन्होंने कहा—
“लाला! यह क्या कर रहे हो?”
कृष्ण बोले—
“मैया, ये भी तो भूखे हैं।”
यशोदा मैया कुछ कह न सकीं।
उन्होंने देखा कि कृष्ण स्वयं कम खा रहे हैं और बंदरों को अधिक खिला रहे हैं।
उनका हृदय भर आया।
उन्होंने कृष्ण को गले लगा लिया।
“तू सच में बहुत दयालु है मेरे लाल।”
कृष्ण मुस्कुरा दिए।
—
माखन-चोरी की लीला का रहस्य
कृष्ण की माखन-चोरी केवल बाल-शरारत नहीं मानी जाती।
भक्ति की दृष्टि से “माखन” को मन की निर्मलता का प्रतीक माना जाता है।
जैसे दूध को मथकर माखन निकाला जाता है, वैसे ही प्रेम और भक्ति से मन को मथने पर उसके भीतर से निर्मल भाव निकलता है।
और कृष्ण उस निर्मल प्रेम को अपने पास खींच लेते हैं।
इसीलिए भक्त प्रेम से कहते हैं—
“कृष्ण चोर हैं, पर माखन के नहीं—वे भक्तों के हृदय चुराते हैं।”
वे किसी के घर की मटकी तोड़ते हैं तो किसी के भीतर का अहंकार भी तोड़ देते हैं।
वे माखन खाते हैं तो किसी के जीवन से चिंता भी खा जाते हैं।
और वे मुस्कुराते हैं तो भक्त का मन अपने आप उनके चरणों में लग जाता है।
—
एक दिन की बड़ी शिकायत
एक दिन गोकुल की सभी गोपियाँ एक साथ यशोदा मैया के घर पहुँचीं।
यशोदा ने पूछा—
“आज क्या हुआ?”
एक गोपी बोली—
“आज तो हद हो गई।”
दूसरी बोली—
“हाँ! तुम्हारे लाल ने हमारी सारी मटकी फोड़ दी।”
तीसरी बोली—
“और जाते-जाते खिड़की पर माखन से अपना नाम भी लिख गया।”
यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—
“क्या?”
सब हँसने लगीं।
तभी बाहर से कृष्ण की हँसी सुनाई दी।
यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।
कृष्ण दरवाजे पर खड़े थे।
उनके हाथ में माखन था।
और चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।
गोपियों ने एक साथ कहा—
“यही है अपराधी!”
कृष्ण भागे।
सभी गोपियाँ उनके पीछे दौड़ीं।
कृष्ण हँसते हुए आँगन में भागने लगे।
यशोदा मैया भी पीछे दौड़ीं।
“रुक जा कन्हैया!”
कृष्ण और तेज भागे।
गोपियाँ हँसती रहीं।
पूरा गोकुल हँसी से गूँज उठा।
और उस दिन सबको समझ में आ गया—
माखन की मटकी चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न रखो, नंदलाल तक पहुँचने से उसे कोई नहीं रोक सकता।
लेकिन किसी को क्या पता था कि कृष्ण की यह नटखट माखन-चोरी जल्द ही एक ऐसी घटना का रूप लेने वाली है, जिसमें यशोदा मैया अपने कन्हैया को पकड़ लेंगी।
उस दिन पहली बार गोकुल देखेगा कि—
जिस भगवान को पूरा संसार बाँध नहीं सकता, वही अपनी माँ के प्रेम से बँध जाएगा।
और यशोदा मैया के हाथ में होगी—
एक साधारण-सी रस्सी।
लेकिन उस रस्सी में संसार की सबसे बड़ी शक्ति होगी—
माँ का प्रेम।
क्रमशः…
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