(भाग 15 — वृंदावन की मधुर बाल-लीलाओं का भावपूर्ण समापन)
वृंदावन में एक ऐसी सुबह हुई, जैसी पहले कभी नहीं हुई थी।
आकाश साफ था।
यमुना का जल शांत था।
कदंब के वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहचहा रहे थे।
गायें अपने बछड़ों के पास खड़ी थीं और उनके गले में बँधी घंटियाँ हवा के साथ धीरे-धीरे बज रही थीं।
वृंदावन की गलियाँ वही थीं।
नंद बाबा का भवन वही था।
यशोदा मैया का आँगन वही था।
गोवर्धन पर्वत भी उसी प्रकार खड़ा था।
लेकिन फिर भी…
सब कुछ जैसे बदल गया था।
क्योंकि उन गलियों में आज कृष्ण की शरारती हँसी पहले जैसी नहीं गूँज रही थी।
वही कन्हैया, जो कभी सुबह होते ही घर से बाहर भाग जाते थे, आज कुछ अधिक शांत दिखाई दे रहे थे।
यशोदा मैया उन्हें देखतीं तो उनका हृदय भर आता।
उन्हें याद आता—
जब कृष्ण बहुत छोटे थे, तब वह उनकी उँगली पकड़कर चलते थे।
कभी लड़खड़ाते हुए गिर जाते।
फिर उठकर मैया की ओर देखते और हँस देते।
मैया उन्हें गोद में उठा लेतीं।
“मेरा लाल!”
और कृष्ण उनकी गोद में सिर रखकर मुस्कुरा देते।
समय कितनी जल्दी बीत गया था।
कल तक जो बालक माखन की मटकी के लिए घर-घर घूमता था, वही अब बड़ा होने लगा था।
यशोदा मैया को अपनी हर पुरानी बात याद आने लगी।
कभी कृष्ण माखन चुराकर भागते थे।
कभी गोपियाँ शिकायत लेकर आती थीं।
“मैया! तुम्हारा कन्हैया हमारे घर का सारा माखन खा गया।”
यशोदा मैया कृष्ण को बुलातीं—
“कन्हैया!”
कृष्ण दूर खड़े होकर मासूम चेहरा बना लेते।
“मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”
मैया कहतीं,
“तो फिर माखन कहाँ गया?”
कृष्ण कहते,
“बिल्ली खा गई होगी।”
गोपियाँ हँसने लगतीं।
कृष्ण भी मुस्कुराते।
वही नटखटपन…
वही मुस्कान…
वही बड़ी-बड़ी आँखें…
सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।
फिर यशोदा मैया को वह दिन याद आया जब उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बाँधने का प्रयास किया था।
कितनी रस्सियाँ जोड़ ली थीं, फिर भी वह छोटी पड़ जाती थीं।
लेकिन जब कृष्ण ने स्वयं अपने भक्त के प्रेम को स्वीकार किया, तब वही अनंत भगवान एक छोटी-सी रस्सी से बँध गए।
यशोदा मैया की आँखों से आँसू निकल आए।
उन्होंने मन ही मन कहा—
“मेरे लाल, तुम कितने बड़े हो, यह मैं कभी समझ नहीं पाई। मेरे लिए तो तुम हमेशा मेरे बच्चे ही रहे।”
वह मुस्कुराईं।
“और शायद यही मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है।”
उधर कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ बैठे थे।
सुदामा, श्रीदामा और दूसरे सखा उन्हें घेरकर बैठे थे।
एक बालक बोला,
“कन्हैया, याद है जब हम सब जंगल में खो गए थे?”
दूसरा बोला,
“और याद है जब तुमने हमें इतना हँसाया था कि हमारे पेट में दर्द होने लगा था?”
तीसरा हँसते हुए बोला,
“और जब तुमने मेरा भोजन चुरा लिया था?”
कृष्ण हँस पड़े।
“मैंने कब चुराया था?”
सब एक साथ बोले,
“तुम हमेशा यही कहते हो!”
चारों ओर हँसी गूँज उठी।
लेकिन उस हँसी के भीतर एक हल्की-सी उदासी भी थी।
सब जानते थे कि बचपन हमेशा नहीं रहता।
दिन बदलते हैं।
ऋतुएँ बदलती हैं।
समय आगे बढ़ता है।
और बचपन की स्मृतियाँ धीरे-धीरे कहानी बन जाती हैं।
लेकिन कृष्ण की बाल-लीलाएँ साधारण स्मृतियाँ नहीं थीं।
वह तो वृंदावन के जीवन का प्राण बन चुकी थीं।
एक गाय कृष्ण को देखकर रंभाने लगी।
कृष्ण उसके पास गए।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा।
गाय ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
मानो वह कह रही हो—
“कन्हैया, हमें छोड़कर मत जाना।”
कृष्ण ने उसके माथे को सहलाया।
उनकी आँखों में भी प्रेम था।
वृंदावन की गायें कृष्ण से कितना प्रेम करती थीं, यह कोई शब्दों में नहीं बता सकता।
जब कृष्ण वन में जाते, गायें उनके पीछे चल पड़तीं।
जब कृष्ण बाँसुरी बजाते, तो वे चरना भूलकर उनकी ओर देखने लगतीं।
जब कृष्ण देर से लौटते, तो उनके आने तक जैसे पूरा वन प्रतीक्षा करता रहता।
यमुना भी कृष्ण से कम प्रेम नहीं करती थी।
उसके तट पर कृष्ण ने कितने ही दिन बिताए थे।
कभी सखाओं के साथ खेलते।
कभी पानी में उतर जाते।
कभी कदंब वृक्ष पर चढ़ते।
और कभी अपनी बाँसुरी बजाकर वातावरण को ऐसा मधुर बना देते कि पक्षी तक चुप हो जाते।
यमुना की लहरें आज भी उनके चरणों को याद करती थीं।
कालिय नाग का विष भी जिस यमुना को दूषित कर चुका था, उसी यमुना को कृष्ण ने अपने स्पर्श से फिर निर्मल किया था।
और फिर गोवर्धन…
वह पर्वत तो कृष्ण की बाल-लीला का साक्षी बन चुका था।
जब इंद्र के क्रोध से वृंदावन पर भयंकर वर्षा हुई थी, तब नंदलाल ने अपनी छोटी-सी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था।
उस दिन वृंदावनवासियों ने देखा था कि प्रेम के लिए ईश्वर किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
कृष्ण ने उन्हें केवल वर्षा से नहीं बचाया था।
उन्होंने उनके मन से भय भी निकाल दिया था।
यही कृष्ण थे।
जो संकट में रक्षा करते थे।
जो दुख में मुस्कान देते थे।
जो रोते हुए को हँसा देते थे।
जो अहंकार को झुका देते थे।
जो शत्रु को भी सुधारने का अवसर देते थे।
और जो अपने भक्तों के लिए स्वयं बालक बन जाते थे।
यशोदा मैया धीरे-धीरे बाहर आईं।
कृष्ण को देखकर कुछ पल उन्हें निहारती रहीं।
फिर उन्होंने पुकारा,
“कन्हैया!”
कृष्ण तुरंत उनकी ओर मुड़े।
“जी मैया?”
यशोदा ने कहा,
“इधर आओ।”
कृष्ण उनके पास गए।
मैया ने उनके सिर पर हाथ रखा।
कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।
उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया।
कृष्ण शांत रहे।
यशोदा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“लाला… तू चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, मेरे लिए हमेशा वही छोटा-सा कन्हैया रहेगा।”
कृष्ण ने धीरे से कहा,
“मैया, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”
यशोदा ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।
लेकिन समय अपनी गति से चलता रहा।
कृष्ण को वृंदावन से आगे जाना था।
उनकी लीला का अगला अध्याय उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।
लेकिन वृंदावन के लिए यह विदाई केवल किसी बालक की विदाई नहीं थी।
यह उनके हृदय के एक हिस्से की विदाई थी।
ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर खड़े थे।
श्रीदामा की आँखें नम थीं।
उन्होंने पूछा,
“कन्हैया, क्या तुम हमें भूल जाओगे?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“अपने सखा को कोई भूल सकता है क्या?”
एक अन्य बालक बोला,
“फिर हमारे साथ खेलने कौन आएगा?”
कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“जब भी तुम मुझे याद करोगे, मैं तुम्हारे पास रहूँगा।”
बालक ने पूछा,
“सच?”
कृष्ण बोले,
“बिल्कुल सच।”
उसने कृष्ण को गले लगा लिया।
वृंदावन के पेड़ जैसे मौन होकर यह दृश्य देख रहे थे।
हवा धीरे-धीरे चल रही थी।
यमुना की लहरें किनारे से टकरा रही थीं।
ऐसा लग रहा था मानो पूरा वृंदावन कृष्ण को रोकना चाहता हो।
लेकिन लीला को आगे बढ़ना था।
कृष्ण ने एक बार पीछे मुड़कर वृंदावन को देखा।
उनकी आँखों के सामने सब कुछ था—
नंद बाबा का घर।
यशोदा मैया का आँगन।
गोपियों की गलियाँ।
गायों के झुंड।
ग्वाल-बालों की हँसी।
यमुना का तट।
गोवर्धन पर्वत।
कदंब के वृक्ष।
माखन की मटकी।
और उनके बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ।
कृष्ण मुस्कुराए।
फिर उन्होंने अपनी बाँसुरी उठाई।
बाँसुरी के होंठों से लगते ही एक मधुर धुन निकली।
वह धुन इतनी करुण और मधुर थी कि जैसे पूरा वृंदावन कुछ क्षण के लिए स्थिर हो गया।
गायें रुक गईं।
पक्षी चुप हो गए।
हवा थम-सी गई।
यमुना की लहरें भी जैसे उस संगीत को सुनने लगीं।
यशोदा मैया ने आँखें बंद कर लीं।
उनके कानों में वही स्वर गूँज रहा था।
उनके हृदय में वही बालक बस रहा था।
नंद बाबा की आँखों में भी आँसू थे।
उन्होंने मन ही मन कहा—
“लाला, तू जहाँ भी रहे, सुखी रहे।”
कृष्ण की बाँसुरी की धुन धीरे-धीरे दूर होती गई।
लेकिन वह धुन वृंदावन से कभी गई नहीं।
क्योंकि कुछ ध्वनियाँ कानों से नहीं, हृदय से सुनी जाती हैं।
कृष्ण की बाल-लीलाएँ भी ऐसी ही थीं।
वे केवल एक समय की घटनाएँ नहीं थीं।
वे प्रेम की ऐसी कथाएँ थीं जो युगों-युगों तक मनुष्य के हृदय को छूती रहेंगी।
जब कोई माँ अपने बच्चे को प्यार से गले लगाएगी, उसमें यशोदा का वात्सल्य दिखाई देगा।
जब कोई मित्र अपने मित्र के लिए सब कुछ छोड़ देगा, उसमें कृष्ण और ग्वाल-बालों की मित्रता दिखाई देगी।
जब कोई प्रकृति का सम्मान करेगा, उसमें गोवर्धन पूजा का संदेश दिखाई देगा।
जब कोई अहंकार छोड़कर प्रेम को अपनाएगा, उसमें इंद्र की सीख दिखाई देगी।
जब कोई संकट में किसी की रक्षा करेगा, उसमें गोवर्धन धारण करने वाले कृष्ण की झलक दिखाई देगी।
और जब कोई अपने हृदय में भगवान को प्रेम से पुकारेगा…
तो शायद उसे भी वही बाँसुरी सुनाई देगी।
वह बाँसुरी जो कहती है—
“मैं तुम्हारे पास हूँ।”
वृंदावन की मिट्टी में कृष्ण के चरणों के निशान जैसे हमेशा के लिए अंकित हो गए।
कदंब के वृक्ष उनकी प्रतीक्षा करते रहे।
यमुना उनकी स्मृति सँजोए बहती रही।
गायें उनकी राह देखती रहीं।
ग्वाल-बाल उनकी बातें करते रहे।
और यशोदा मैया…
वह तो हर सुबह अपने आँगन में जैसे आज भी अपने कन्हैया को खोजती थीं।
कभी माखन की मटकी देखतीं तो मुस्कुरा देतीं।
कभी आँगन में किसी बच्चे की हँसी सुनतीं तो पलटकर देखतीं।
कभी किसी को “कन्हैया” पुकारते सुनतीं तो उनका हृदय धड़क उठता।
क्योंकि माँ का प्रेम समय से बँधा नहीं होता।
बच्चा दूर चला जाए, फिर भी माँ की गोद में उसकी जगह खाली नहीं होती।
कृष्ण भी वृंदावन से दूर गए होंगे…
लेकिन वृंदावन कभी कृष्ण से दूर नहीं हुआ।
कृष्ण के लिए वृंदावन केवल एक स्थान नहीं था।
वह प्रेम था।
वह माँ का आँचल था।
वह मित्रों की हँसी थी।
वह गायों की ममता थी।
वह यमुना की लहरें थीं।
वह गोवर्धन की छाया थी।
वह बालपन था।
और शायद इसी कारण आज भी जब कोई प्रेम से कृष्ण का नाम लेता है, तो उसके साथ “वृंदावन” का नाम अपने आप जुड़ जाता है।
राधे-कृष्ण।
दो नाम।
एक प्रेम।
एक अनंत कथा।
और इस कथा का सबसे सुंदर रहस्य यही है कि भगवान को पाने के लिए हमेशा बड़े-बड़े यज्ञ, तप या कठिन साधना ही आवश्यक नहीं।
कभी-कभी एक माँ का निष्कलंक प्रेम ही पर्याप्त होता है।
एक मित्र की सच्ची मित्रता ही पर्याप्त होती है।
एक भक्त की सरल पुकार ही पर्याप्त होती है।
कृष्ण ने अपने बचपन की लीलाओं से यही तो सिखाया—
ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग प्रेम है।
जहाँ प्रेम है, वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ करुणा है, वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ सच्ची मित्रता है, वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ किसी के आँसू पोंछने वाला हृदय है, वहाँ कृष्ण हैं।
और जहाँ कोई पूरे विश्वास से कहता है—
“हे नंदलाल, मेरे साथ रहना…”
वहाँ कृष्ण कभी दूर नहीं जाते।
वृंदावन की कथा समाप्त नहीं होती।
क्योंकि कृष्ण की कथा कभी समाप्त हो ही नहीं सकती।
उनकी बाल-लीलाएँ समाप्त हो सकती हैं, लेकिन उनका प्रेम नहीं।
उनका बचपन बीत सकता है, लेकिन उनकी मुस्कान नहीं।
उनकी बाँसुरी की धुन दूर जा सकती है, लेकिन उसकी गूँज भक्त के हृदय से कभी नहीं जाती।
आज भी जब भोर के समय वृंदावन की गलियों में हवा चलती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई धीरे से पुकार रहा हो—
“कन्हैया…”
और शायद उसी क्षण किसी को दूर से बाँसुरी की बहुत हल्की-सी धुन सुनाई देती है।
यमुना की लहरें जैसे कहती हैं—
“वह यहीं है।”
गोवर्धन जैसे कहता है—
“वह यहीं है।”
वृंदावन की धूल जैसे कहती है—
“वह यहीं है।”
और प्रेम से भरा हर हृदय कहता है—
“हाँ… मेरा नंदलाल आज भी यहीं है।”
यही थी हमारे नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाओं की यात्रा।
एक नन्हे बालक के रूप में गोकुल में आगमन से लेकर…
यशोदा मैया की गोद तक…
पूतना के उद्धार से लेकर…
शकटासुर और तृणावर्त के अंत तक…
माखन चोरी और मटकी फोड़ने की शरारतों से लेकर…
यशोदा मैया के प्रेम में बँधने तक…
यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार से लेकर…
ग्वाल-बालों के साथ हँसी-खेल तक…
माटी के छोटे-से कण में पूरा ब्रह्मांड दिखाने से लेकर…
ब्रह्मा जी के मोह को दूर करने तक…
कालिय नाग के विष को समाप्त करने से लेकर…
गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी-सी उँगली पर धारण करने तक…
हर लीला हमें एक ही बात सिखाती है—
कृष्ण को समझना कठिन है,
लेकिन कृष्ण को प्रेम करना बहुत सरल है।
इसलिए जब भी जीवन में कोई कठिनाई आए…
जब मन उदास हो…
जब रास्ता समझ न आए…
बस आँखें बंद करके अपने मन से कहना—
“हे नंदलाल, जैसे आपने वृंदावन की रक्षा की थी, वैसे ही मेरे हृदय की भी रक्षा करना।
मेरे भीतर का भय दूर करना।
मेरे भीतर का अहंकार मिटाना।
और मेरे हृदय में अपने प्रेम की थोड़ी-सी जगह बना लेना।”
शायद तब…
कहीं बहुत दूर से…
यमुना की लहरों के पार…
कदंब के वृक्षों के बीच…
गोवर्धन की छाया में…
आपको भी एक मधुर बाँसुरी सुनाई दे—
“मैं यहीं हूँ…”
और तब समझ लेना—
नंदलाल की बाल-लीलाएँ समाप्त नहीं हुईं।
वे आज भी उस हर हृदय में चल रही हैं,
जहाँ कृष्ण के लिए सच्चा प्रेम है।
जय श्रीकृष्ण।❤️❤️
जय नंदलाल।❤️❤️
🙏||राधे राधे||❤️❤️

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