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टैग: प्यार#दोस्ती#दर्द#

  • राखी जो भाई के बंधी नहीं

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “माँ, इस बार मैं आर्यन भैया को राखी नहीं बांधूंगी।”

     

    सुबह-सुबह नैना की यह बात सुनकर माँ के हाथ रुक गए।

     

    रसोई में कुछ पल के लिए बिल्कुल शांति छा गई।

     

    माँ ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या कहा तूने?”

     

    नैना ने अपनी नजरें झुका लीं।

     

    “मैंने कहा, इस बार मैं उन्हें राखी नहीं बांधूंगी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    नैना की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “क्योंकि शायद अब उन्हें मेरी जरूरत ही नहीं है।”

     

    माँ कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    “ऐसा क्या हो गया?”

     

    नैना ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह अपना बैग उठाकर कमरे में चली गई।

     

    बिस्तर पर बैठते ही उसकी नजर सामने रखी राखी पर गई।

     

    उसने वह राखी कई दिन पहले खरीदी थी।

     

    बहुत सोच-समझकर।

     

    आर्यन को हमेशा साधारण चीजें पसंद थीं, इसलिए उसने एक सुंदर लेकिन सादी राखी चुनी थी।

     

    लेकिन अब वह राखी मेज पर पड़ी थी।

     

    अनछुई।

     

    नैना और आर्यन के बीच कभी ऐसा रिश्ता नहीं था कि दोनों एक-दूसरे से बातें छिपाएं।

     

    आर्यन उससे पांच साल बड़ा था।

     

    बचपन में दोनों बहुत लड़ते थे।

     

    नैना उसकी किताबें छिपा देती।

     

    आर्यन उसकी चॉकलेट खा जाता।

     

    नैना शिकायत करती,

     

    “माँ! भैया ने मेरी चॉकलेट खा ली।”

     

    आर्यन तुरंत कहता,

     

    “इसने मेरी किताब फाड़ी है।”

     

    फिर माँ दोनों को डांटतीं और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर हंस रहे होते।

     

    लेकिन पिछले एक साल से सब बदल गया था।

     

    आर्यन की नौकरी लग गई थी।

     

    वह घर से दूर नहीं रहता था, लेकिन उसका समय बदल गया था।

     

    सुबह जल्दी निकलता।

     

    रात को देर से आता।

     

    घर आकर भी अक्सर फोन और काम में व्यस्त रहता।

     

    नैना को धीरे-धीरे लगने लगा कि उसका भाई बदल गया है।

     

    पहले वह उसकी हर बात सुनता था।

     

    अब वह अक्सर कहता,

     

    “नैना, बाद में बात करना।”

     

    पहले वह उसे बाजार ले जाता था।

     

    अब कहता,

     

    “तू माँ के साथ चली जाना।”

     

    पहले रक्षाबंधन से एक हफ्ता पहले ही वह पूछना शुरू कर देता था—

     

    “इस बार क्या चाहिए?”

     

    लेकिन इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।

     

    नैना को सबसे ज्यादा दुख उस दिन हुआ जब उसने भाई को किसी से फोन पर बात करते सुना।

     

    “हां, इस बार रक्षाबंधन पर मैं शायद घर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    नैना दरवाजे के बाहर खड़ी थी।

     

    उसका दिल जैसे बैठ गया।

     

    उसने कमरे में जाकर खुद को बंद कर लिया।

     

    आर्यन ने शायद उसे जाते हुए नहीं देखा।

     

    उस दिन से नैना ने उससे बात करना कम कर दिया।

     

    आर्यन ने भी ज्यादा नहीं पूछा।

     

    और यही बात नैना को सबसे ज्यादा चुभती थी।

     

    “उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    रक्षाबंधन की सुबह आर्यन जल्दी तैयार होकर घर से निकलने लगा।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “इतनी सुबह कहां जा रहा है?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “थोड़ा जरूरी काम है।”

     

    नैना कमरे से बाहर आई।

     

    उसने भाई की तरफ देखा तक नहीं।

     

    आर्यन कुछ पल उसके सामने खड़ा रहा।

     

    “नैना…”

     

    “हां?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    वह चला गया।

     

    नैना के गुस्से की आखिरी दीवार भी टूट गई।

     

    उसने मन ही मन कहा,

     

    “आज के दिन भी इन्हें मेरी परवाह नहीं है।”

     

    पूरा दिन बीत गया।

     

    दोपहर हुई।

     

    शाम होने लगी।

     

    आर्यन घर नहीं आया।

     

    माँ बार-बार फोन कर रही थीं।

     

    लेकिन उसका फोन बंद था।

     

    नैना के अंदर गुस्सा था, लेकिन अब उसके साथ चिंता भी जुड़ गई थी।

     

    वह खुद से कह रही थी,

     

    “आएं या ना आएं, मुझे क्या फर्क पड़ता है।”

     

    लेकिन हर कुछ मिनट बाद दरवाजे की तरफ देखने लगती।

     

    शाम को माँ ने कहा,

     

    “तू राखी की थाली तैयार कर ले।”

     

    नैना ने कहा,

     

    “मैंने कहा ना माँ, मुझे नहीं बांधनी।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “गुस्सा रिश्तों से बड़ा नहीं होता बेटा।”

     

    नैना ने पहली बार तेज आवाज में कहा,

     

    “लेकिन रिश्ते भी तो दोनों तरफ से निभाए जाते हैं!”

     

    माँ चुप हो गईं।

     

    नैना की आंखें भर आईं।

     

    “मैं हमेशा उनके लिए इंतजार करती रही। लेकिन अब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    नैना का दिल जोर से धड़का।

     

    वह तेजी से दरवाजे तक गई।

     

    सामने आर्यन नहीं था।

     

    एक डिलीवरी वाला खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था।

     

    “नैना जी?”

     

    “हां।”

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    नैना ने हैरानी से पैकेट लिया।

     

    ऊपर भेजने वाले का नाम लिखा था—

     

    आर्यन।

     

    उसने जल्दी से पैकेट खोला।

     

    अंदर एक सुंदर-सा लकड़ी का फ्रेम था।

     

    उसमें उसकी बचपन से लेकर कॉलेज तक की तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर में वह स्कूल की ड्रेस में थी।

     

    दूसरी में भाई के कंधे पर बैठी थी।

     

    तीसरी में दोनों लड़ रहे थे।

     

    और आखिरी तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन, जिसके बिना मेरा घर घर नहीं लगता।”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    पैकेट में एक छोटा-सा कार्ड भी था।

     

    उसने पढ़ा—

     

    “नैना,

     

    मुझे पता है पिछले कुछ महीनों से मैं बदल गया हूं।

     

    लेकिन ऐसा नहीं कि तू मेरे लिए कम जरूरी हो गई है।

     

    मैं बस एक ऐसी चीज में व्यस्त था, जिसे तुझे बताना नहीं चाहता था जब तक पूरा न कर लूं।

     

    आज सुबह मैं उसी काम से गया हूं।

     

    अगर मैं देर से आऊं तो नाराज मत होना।

     

    तेरा—

     

    आर्यन भैया।”

     

    नैना ने कार्ड सीने से लगा लिया।

     

    “माँ… ये क्या है?”

     

    माँ ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मुझे भी नहीं पता।”

     

    रात होने लगी।

     

    नैना अब पहले से ज्यादा परेशान थी।

     

    तभी बाहर किसी गाड़ी की आवाज आई।

     

    दरवाजा खुला।

     

    आर्यन अंदर आया।

     

    उसके कपड़े धूल से भरे थे और चेहरा थका हुआ था।

     

    नैना ने गुस्से में पूछा,

     

    “कहां थे आप?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तेरे लिए।”

     

    “मतलब?”

     

    उसने नैना के हाथ में एक चाबी रख दी।

     

    नैना ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये किसकी है?”

     

    आर्यन उसे बाहर ले गया।

     

    घर के सामने एक छोटी-सी स्कूटी खड़ी थी।

     

    नैना की आंखें फैल गईं।

     

    “भैया…!”

     

    वह महीनों से कॉलेज आने-जाने के लिए स्कूटी लेना चाहती थी।

     

    लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं थी कि माँ तुरंत खरीद सकें।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैं पिछले कई महीनों से इसके लिए पैसे बचा रहा था।”

     

    नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “लेकिन आपने मुझसे बातें करना क्यों कम कर दीं?”

     

    आर्यन कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि अगर मैं तुझसे बात करता तो तू पूछती कि मैं इतना काम क्यों कर रहा हूं।”

     

    “तो आप बता देते।”

     

    “फिर सरप्राइज कैसे रहता?”

     

    नैना रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “आपको पता है मैंने क्या सोचा?”

     

    “क्या?”

     

    “कि अब आपको मेरी जरूरत नहीं।”

     

    आर्यन का चेहरा बदल गया।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “पगली… बहन की जरूरत कभी खत्म होती है क्या?”

     

    नैना ने पूछा,

     

    “तो आप इतने दूर क्यों हो गए थे?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “दूर नहीं हुआ था। बस कुछ दिनों के लिए चुप हो गया था।”

     

    उसने अपनी कलाई आगे की।

     

    “लेकिन लगता है मेरी चुप्पी की सजा मिल गई।”

     

    नैना ने उसकी कलाई देखी।

     

    “क्या?”

     

    “इस बार राखी नहीं बांधेगी ना?”

     

    नैना कुछ पल चुप रही।

     

    फिर वह अंदर दौड़ी।

     

    मेज पर रखी राखी उठाई।

     

    जब वह वापस आई तो उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मैं जानता था तू राखी खरीदेगी।”

     

    नैना ने कहा,

     

    “और मैं जानती थी आप आओगे।”

     

    “सच?”

     

    “नहीं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    नैना ने भाई के माथे पर तिलक लगाया।

     

    राखी बांधते समय उसने कहा,

     

    “भैया, अगली बार अगर कोई सरप्राइज देना हो ना… तो इतना दूर मत हो जाना।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “और तू अगली बार बिना पूरी बात जाने फैसला मत कर लेना।”

     

    “पक्का नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं आपकी बहन हूं।”

     

    आर्यन हंस पड़ा।

     

    “ये तो कभी नहीं बदलेगा।”

     

    राखी बंधने के बाद नैना ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “भैया, आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं राखी इसलिए नहीं बांधती कि आप मुझे महंगे गिफ्ट दो।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तो?”

     

    नैना ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “मैं राखी इसलिए बांधती हूं क्योंकि मुझे पता है कि चाहे हम कितना भी लड़ें… दुनिया कितनी भी बदल जाए… मेरे लिए एक इंसान हमेशा मेरा रहेगा।”

     

    आर्यन की आंखें भर आईं।

     

    “और वो कौन?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मेरा परेशान करने वाला, बातूनी और कभी-कभी बहुत ज्यादा चुप रहने वाला भाई।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “और तू मेरी सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी ताकत।”

     

    उस रात नैना ने अपनी डायरी में लिखा—

     

    “आज मैंने समझा कि कभी-कभी रिश्तों में दूरी प्यार खत्म होने से नहीं आती। कभी-कभी हम बिना पूछे अपने मन में जवाब बना लेते हैं। और एक छोटी-सी राखी हमें याद दिलाती है कि कुछ रिश्तों को समझने के लिए गुस्से से ज्यादा बातचीत जरूरी होती है।”

     

    और इस बार…

     

    वह राखी, जो नैना ने सुबह भाई को नहीं बांधने का फैसला किया था…

     

    रात तक उसकी कलाई पर सबसे मजबूती से बंधी हुई थी।

  • Dil sabhal ja jara part – 3

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    Part – 3 chhupa huaa raj 

     

    सुबह की पहली किरण हॉस्टल की खिड़की से अंदर आई और प्रिया की आंखों पर पड़ी। वो रात भर सो नहीं पाई थी। वो लिफाफा… वो चिट… “तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।” ये शब्द उसके दिमाग में चक्कर काट रहे थे। उसने चिट को कई बार पढ़ा, फिर उसे डायरी के बीच में छिपा दिया। हाथ कांप रहे थे। 

     

    रिया अभी भी सो रही थी। प्रिया चुपके से उठी, चेहरा धोया और तैयार हुई। आज कॉलेज का दूसरा दिन था। लेकिन उसका मन क्लास में नहीं, उस चिट में था। मां का नाम रानी? पहली बार उसे अपनी मां का नाम पता चला। लेकिन कैसे? कौन रख गया वो लिफाफा उसके बैग में? हॉस्टल में कोई अंदर आया था? या पार्टी के दौरान? 

     

    कैंटीन में नाश्ता करते हुए प्रिया ने रिया को बताया। रिया की आंखें चौड़ी हो गईं। “क्या? यार ये तो सीरियस है! कोई तुझे जानबूझकर डरा रहा है। पुलिस को बताएं?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया ने धीरे से कहा। “पहले खुद समझना चाहती हूं। अगर पुलिस में गई तो शायद आश्रम वाले को पता चल जाए। सुलेखा आंटी चिंता करेंगी।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन अकेले मत करना कुछ। मैं साथ हूं। आज शाम को लाइब्रेरी चलेंगे। शिमला के पुराने न्यूज पेपर्स देखेंगे। शायद कुछ मिल जाए ‘रानी’ नाम की औरत के बारे में।”

     

    प्रिया ने थैंक्स कहा। लेकिन अंदर से डर लग रहा था। 

     

    क्लास शुरू हुई। इंग्लिश लिटरेचर। प्रोफेसर शेकスピयर की ‘रोमियो एंड जूलियट’ पढ़ा रही थीं। प्रिया की सीट खिड़की के पास थी। वो बाहर देख रही थी – पहाड़, कोहरा। तभी उसे लगा कोई उसे देख रहा है। उसने पलटा। आरव दो बेंच पीछे बैठा मुस्कुरा रहा था। उसने एक नोट फेंका – “लंच टुगेदर?”

     

    प्रिया ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया। उसका दिल थोड़ा हल्का हुआ। आरव की मौजूदगी में उसे सुकून मिलता था। 

     

    लंच ब्रेक में रिया, आरव और उनका ग्रुप साथ बैठा। आरव ने प्रिया के लिए प्लेट में एक्स्ट्रा सैंडविच रखा। “खा ना, दुबली हो जाएगी वरना।”

     

    रिया हंस पड़ी। “आरव भाई, इतना केयर? कुछ तो गड़बड़ है।”

     

    आरव ने शरमाते हुए कहा, “बस दोस्ती। प्रिया नई है ना।”

     

    लेकिन प्रिया की नजर अवनी पर पड़ी। अवनी दूसरे टेबल से उन्हें घूर रही थी। उसकी आंखों में जलन साफ दिख रही थी। प्रिया ने नजरें झुका लीं। 

     

    लंच के बाद आरव ने प्रिया को साइड में लिया। “कल पार्टी में सॉरी। अवनी वैसी है – अमीर घर की बिगड़ी हुई। लेकिन तू मत लेना दिल पर। मैं हूं ना।”

     

    प्रिया ने पहली बार खुलकर बात की। “आरव, मुझे अच्छा लगता है जब तू बात करता है। घर जैसा फील होता है।”

     

    आरव की आंखें चमक उठीं। “सच? तो आज शाम कॉलेज के पीछे वाली हिल पर चलेंगी? सनसेट देखने। सिर्फ हम दोनों।”

     

    प्रिया हिचकिचाई। लेकिन फिर हां कह दिया। 

     

    दोपहर की क्लास के बाद प्रिया और रिया लाइब्रेरी गईं। पुरानी लाइब्रेरी थी – ऊंची अलमारियां, धूल भरी किताबें। लाइब्रेरियन अंकल ने कहा, “पुराने न्यूजपेपर्स माइक्रोफिल्म में हैं। कंप्यूटर पर देख लो।”

     

    दोनों कंप्यूटर पर बैठ गए। प्रिया ने सर्च किया – “शिमला एक्सीडेंट रानी”। कुछ पुराने आर्टिकल मिले। एक २० साल पुराना हेडलाइन – “शिमला के मशहूर ठाकुर फैमिली की बहू रानी ठाकुर की कार एक्सीडेंट में मौत। बच्ची लापता।”

     

    प्रिया का दिल बैठ गया। ठाकुर फैमिली? आरव का सरनेम भी ठाकुर था। क्या कनेक्शन?

     

    आर्टिकल में लिखा था – “रानी ठाकुर, ठाकुर होटल्स की मालकिन, देर रात कार एक्सीडेंट में मरीं। उनकी पांच साल की बेटी प्रिया कार में थी, लेकिन एक्सीडेंट के बाद लापता हो गई। पुलिस को शक है कि कोई अपहरण भी हो सकता है।”

     

    प्रिया की उंगलियां ठंडी पड़ गईं। प्रिया… पांच साल की… लापता। क्या वो वही प्रिया है? और ठाकुर फैमिली – आरव की फैमिली?

     

    रिया ने उसका हाथ थामा। “प्रिया… ये… तू ही तो है ना?”

     

    प्रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े। “रिया… अगर ये सच है तो मैं… मैं अमीर घर की हूं? फिर मुझे अनाथ आश्रम में क्यों छोड़ा गया?”

     

    रिया ने कहा, “शायद कोई साजिश। लेकिन आरव को पता है क्या?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। आज शाम उससे मिलने जा रही हूं। पूछूंगी?”

     

    “नहीं!” रिया ने डरते हुए कहा। “अगर फैमिली ने ही तुझे छोड़ा है तो खतरा हो सकता है। वो अनजान कॉल, वो चिट – सब कनेक्टेड लग रहा है।”

     

    प्रिया चुप हो गई। उसका दिमाग घूम रहा था। 

     

    शाम हुई। सनसेट का टाइम। प्रिया कॉलेज के पीछे वाली हिल पर पहुंची। आरव पहले से वहां था – हाथ में दो कॉफी कप। “हाय! ठंड है ना, कॉफी पी।”

     

    दोनों एक बड़े पत्थर पर बैठ गए। सूरज डूब रहा था – लाल-नारंगी रंग पहाड़ियों पर बिखर रहा था। आरव ने कहा, “प्रिया, मुझे तुझसे बात करके अच्छा लगता है। तू अलग है। बाकी लड़कियां सिर्फ शॉपिंग, पार्टी की बात करती हैं। तू… सपनों की बात करती है।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। फिर हिम्मत करके पूछा, “आरव… तेरी फैमिली में कोई रानी नाम की थी?”

     

    आरव अचानक चुप हो गया। उसका चेहरा बदल गया। “रानी? वो… मेरी मम्मी का नाम था। दो साल पहले नहीं… बीस साल पहले एक्सीडेंट में गुजर गईं। क्यों पूछ रही है?”

     

    प्रिया का दिल जोरों से धड़का। “बस ऐसे ही। सुना था कहीं।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “हां… मम्मी की मौत के बाद फैमिली बिखर गई। पापा ने दूसरी शादी कर ली। और एक छोटी बहन थी… प्रिया। वो भी एक्सीडेंट में लापता हो गई। कभी नहीं मिली।”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो उठ खड़ी हुई। “आरव… मैं… मुझे जाना है।”

     

    “क्या हुआ?” आरव ने उसका हाथ पकड़ा। “प्रिया, तू ठीक तो है?”

     

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और भागी। हॉस्टल की ओर। आंसू नहीं रुक रहे थे। अगर आरव की लापता बहन प्रिया है, तो वो खुद आरव की… बहन? नहीं, वो नहीं हो सकता। लेकिन नाम, उम्र, शिमला – सब मैच कर रहा था।

     

    हॉस्टल पहुंचते ही वो रिया के पास गई। सारी बात बताई। रिया हैरान। “यार ये तो बड़ा ट्विस्ट है! तू आरव की बहन हो सकती है?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया रोते हुए बोली। “अगर मैं उसकी बहन हूं तो मुझे क्यों छोड़ा गया? और वो पेंडेंट… वो फोटो… सब ठाकुर हवेली जैसा लगता है।”

     

    रिया ने कहा, “कल हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे। जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले।”

     

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। उसने पेंडेंट को छुआ। “मां… अगर तू रानी ठाकुर थी, तो मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    तभी उसका फोन बजा। वही अनजान नंबर। प्रिया ने रिसीव किया।

     

    “प्रिया… तू बहुत करीब पहुंच गई है। आरव से दूर रह। वो तेरा भाई है। लेकिन सच जानने की कोशिश मत करना। ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था। अगली बार तेरी बारी होगी।”

     

    फोन कट गया। प्रिया चीख पड़ी। रिया उठी। “क्या हुआ?”

     

    प्रिया रोते हुए बोली, “रिया… कोई मुझे मारना चाहता है।”

     

    बाहर बारिश शुरू हो गई थी। हवा जोरों से चल रही थी। प्रिया की जिंदगी में प्यार की शुरुआत हुई थी, लेकिन अब मौत का साया मंडरा रहा था। आरव भाई है? या कुछ और?

     और ठाकुर फैमिली का राज़ क्या है?

     

    अगली सुबह क्या होगा? प्रिया सच ढूंढेगी या भाग जाएगी?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part – 2 pahli mulakat 

    शिमला की ठंडी हवा बस की खिड़की से अंदर आ रही थी। प्रिया ने अपनी पतली शॉल कसकर लपेटी और फोन को जेब में डाल दिया। वो अनजान कॉल अभी भी उसके दिमाग में गूंज रही थी – “कॉलेज मत जाना… वरना…”। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। बस में ज्यादातर लोकल लोग थे – कुछ पर्यटक, कुछ स्टूडेंट्स। कोई उसे घूर नहीं रहा था, लेकिन प्रिया को लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।

    बस आखिरकार शिमला बस स्टैंड पर रुकी। प्रिया उतरी। बाहर ठंड थी, लेकिन धूप निकली हुई थी। पहाड़ियों पर बर्फ की चमक दूर से दिख रही थी। शहर व्यस्त था – रिक्शा, टैक्सी, दुकानें। प्रिया ने अपना छोटा बैग कंधे पर टिकाया और कॉलेज की ओर चल पड़ी। कॉलेज बस स्टैंड से करीब दो किलोमीटर दूर था। उसने पैदल ही जाना ठाना – पैसे बचाने थे।

    रास्ते में वो बार-बार फोटो वाली डायरी छूती रही। पेंडेंट गले में झूल रहा था। “शिमला… क्या यहीं कहीं मेरा अतीत छिपा है?” उसने मन ही मन सोचा। लेकिन वो अनजान कॉल उसे चैन नहीं लेने दे रहा था।

    कॉलेज गेट पर पहुंचते ही प्रिया रुक गई। बड़ा सा लोहे का गेट, ऊपर लिखा था – “Shimla Women’s College – Established 1950″। अंदर हरे-भरे लॉन, पुरानी ब्रिटिश स्टाइल की इमारतें, और लड़कियां हंसती-बोलती घूम रही थीं। ज्यादातर लड़कियां ब्रांडेड कपड़ों में थीं – जींस, जैकेट्स, महंगे बैग। प्रिया ने अपनी सादी नीली सलवार-कमीज देखी और अचानक खुद को बहुत छोटा महसूस किया।

    एडमिशन ऑफिस में लाइन लगी थी। प्रिया ने अपना लेटर दिखाया। स्टाफ की मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया शर्मा? स्कॉलरशिप वाली? वेलकम डियर। तुम्हारा हॉस्टल रूम 204 है। दूसरी मंजिल। सामान रखो और फिर प्रिंसिपल मैम से मिलना।”

    प्रिया ने थैंक यू कहा और हॉस्टल की ओर बढ़ी। हॉस्टल बिल्डिंग कॉलेज के पीछे थी – तीन मंजिला, पुरानी लेकिन साफ-सुथरी। सीढ़ियां चढ़ते वक्त उसके पैर भारी लग रहे थे। रूम 204 के दरवाजे पर उसने दस्तक दी।

    “आ जा!” अंदर से चुलबुली आवाज आई।

    प्रिया ने दरवाजा खोला। रूम छोटा लेकिन आरामदायक था – दो बेड, दो अलमारियां, एक टेबल, और खिड़की से पहाड़ दिख रहे थे। एक बेड पर एक लड़की बैठी थी – बालों में हाईलाइट्स, लिपस्टिक लगाए, मोबाइल पर स्क्रॉल कर रही। वो देखते ही उठी और बोली, “हाय! तू नई रूममेट है? मैं रिया मेहता। मुंबई से। और तू?”

    “प्रिया… प्रिया शर्मा।” प्रिया ने शर्माते हुए कहा और बैग नीचे रखा।

    रिया ने उसे ऊपर से नीचे देखा और फिर मुस्कुराई। “क्यूट लग रही है यार! सादगी का स्टाइल। चल, सामान रख और चाय पीते हैं। कैंटीन चलेंगी?”

    प्रिया ने हां कहा। रिया बहुत बातूनी थी। रास्ते में बताती गई – “ये कॉलेज टॉप है। अमीर लड़कियां ज्यादा हैं। लेकिन पार्टीज कमाल की होती हैं। तू क्या कोर्स कर रही है? बीए?”

    “हां… इंग्लिश ऑनर्स।” प्रिया ने धीरे से कहा।

    कैंटीन में पहुंचते ही प्रिया को लगा जैसे अलग दुनिया में आ गई हो। बड़ी-बड़ी टेबल्स, कॉफी मशीन, पिज्जा-बर्गर के मेन्यू। रिया ने दो चाय और समोसे ऑर्डर किए। बैठते हुए बोली, “बता ना, तू कहां से है? फैमिली? बॉयफ्रेंड?”

    प्रिया हिचकिचाई। फिर बोली, “हिमाचल के छोटे कस्बे से। अनाथ आश्रम में पली हूं। फैमिली… कोई नहीं।”

    रिया चुप हो गई। फिर प्रिया का हाथ थामा और बोली, “सॉरी यार। मैं बेवकूफ हूं। लेकिन तू स्ट्रॉन्ग है। यहां सबके पास्ट होते हैं। मैं भी… पापा-मम्मी अलग हो गए हैं। लेकिन हम फ्यूचर बनाएंगे ना?”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। पहली बार किसी ने उसे जज नहीं किया। दोनों चाय पीते रहे। रिया ने कॉलेज की गॉसिप बताई – कौन सी लड़की किससे डेट कर रही, कौन सी टीचर स्ट्रिक्ट है।

    फिर क्लास का टाइम हुआ। पहली क्लास इंग्लिश की थी। हॉल बड़ा था, करीब सौ लड़कियां। प्रोफेसर ने कहा, “न्यू सेशन, न्यू स्टूडेंट्स। सब अपना इंट्रोडक्शन दें।”

    प्रिया की बारी आई। वो उठी, आवाज कांपी – “मेरा नाम प्रिया शर्मा है। मैं हिमाचल से हूं। स्कॉलरशिप पर आई हूं।”

    सब शांत। कुछ लड़कियां फुसफुसाईं। तभी पीछे से एक लड़के की आवाज आई – “प्रिया? कूल नेम। मैं आरव ठाकुर। वेलकम टू कॉलेज।”

    प्रिया ने पलटा। हॉल के आखिरी बेंच पर एक लड़का बैठा था – लंबा, गोरा, हल्की दाढ़ी, ब्रांडेड जैकेट। मुस्कुरा रहा था। आंखें गर्म। प्रिया का दिल एक पल को धड़का। लेकिन वो जल्दी से बैठ गई।

    क्लास के बाद रिया ने कहा, “वो आरव है यार। कॉलेज का क्रश। अमीर फैमिली, शिमला के बड़े बिजनेसमैन का बेटा। लेकिन घमंडी नहीं। सबको हेल्प करता है।”

    प्रिया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में कुछ हलचल हुई।

    शाम को हॉस्टल में प्रिया ने अपना सामान व्यवस्थित किया। डायरी निकाली। फोटो देखी। तभी रिया बोली, “कल फ्रेशर्स पार्टी है। तुझे ड्रेस चाहिए। मेरी अलमारी से ले ले।”

    प्रिया ने मना किया, लेकिन रिया नहीं मानी। एक ब्लू कुर्ती दी – “ये पहनना। क्यूट लगेगी।”

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। वो अनजान कॉल सोच रही थी। उसने फोन चेक किया – नंबर सेव नहीं था। ब्लॉक कर दिया। लेकिन डर लगा।

    अगले दिन क्लास में आरव ने प्रिया के पास नोट्स रख दिए। “ये ले, अगर मिस हो गया हो तो।” प्रिया ने थैंक्स कहा। लंच में रिया ने जबरदस्ती उसे अपने ग्रुप में बिठाया। आरव भी था।

    आरव ने पूछा, “सेटल हो गई? कोई प्रॉब्लम हो तो बता। मैं सीनियर हूं।”

    प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “थैंक यू। सब ठीक है।”

    आरव ने अपनी स्टोरी शेयर की – “मेरा घर शिमला में ही है। पापा होटल बिजनेस करते हैं। लेकिन मम्मी… दो साल पहले गुजर गईं। तब से थोड़ा अकेला फील करता हूं।”

    प्रिया को लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया। दोनों की आंखें मिलीं। एक पल को दुनिया रुक सी गई।

    शाम को फ्रेशर्स पार्टी। हॉल सजा हुआ था – लाइट्स, म्यूजिक, डांस फ्लोर। प्रिया रिया की कुर्ती में थी। पहली बार मेकअप किया था। वो आईने में खुद को देखकर शर्मा गई।

    पार्टी में एंट्री करते ही रिया ने कहा, “वाह यार! बॉम्ब लग रही है।”

    डांस शुरू हुआ। प्रिया कोने में खड़ी थी। तभी आरव आया। सफेद शर्ट, ब्लैक जैकेट। हैंडसम। उसने हाथ बढ़ाया – “डांस करेगी?”

    प्रिया हिचकिचाई। “मुझे नहीं आता।”

    “कोई नहीं। मैं सिखाता हूं।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा। धीरे-धीरे डांस शुरू हुआ। संगीत रोमांटिक था। प्रिया का दिल तेज़ धड़क रहा था। पहली बार किसी लड़के ने इतना क्लोज फील किया।

    तभी एक लड़की आई – लंबे बाल, रेड ड्रेस। अवनी शर्मा। कॉलेज की क्वीन बी। वो आरव के पास आई और बोली, “आरव, डांस?” फिर प्रिया को घूरकर कहा, “स्कॉलरशिप वाली? यहां अमीरों का क्लब है बेबी। बाहर जाकर पढ़ाई कर।”

    सब हंस पड़े। प्रिया का चेहरा लाल हो गया। आंखें भर आईं। वो भागी। बाहर लॉन में अकेली बैठ गई। रोने लगी। “मैं यहां क्यों आई? सब मुझे जज करेंगे।”

    तभी आरव आया। “प्रिया… सॉरी। अवनी वैसी है। तू मत रो। तू स्पेशल है। तेरी आंखों में कुछ है… जो मुझे अच्छा लगता है।”

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “थैंक यू आरव। लेकिन मैं… मैं अनाथ हूं। मेरे पास कुछ नहीं।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “मेरे पास सब है, लेकिन खुशी नहीं। तू मुझे खुशी दे सकती है।”

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और रूम की ओर चली गई। दिल में तूफान था – प्यार की शुरुआत? या फिर खतरे की?

    रूम में पहुंचते ही उसने बैग खोला। अंदर एक लिफाफा था – जो पहले नहीं था। अंदर एक चिट – “प्रिया, तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।”

    प्रिया कांप गई। ये लिफाफा कैसे आया? कौन रख गया? और आरव… क्या वो जानता है कुछ?

    रात गहरा गई। बाहर हवा चल रही थी। प्रिया की नई जिंदगी शुरू हो चुकी थी – दोस्ती, प्यार, और छिपे राजों के साथ।

     

  • वफादार कुत्ता

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वफादार पालतू कुत्ता

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटे से गांव में अर्जुन अपनी पत्नी सीमा और दस साल के बेटे रोहन के साथ रहता था। उनका घर छोटा था, लेकिन परिवार बहुत खुश था। घर के बाहर एक बड़ा-सा आंगन था और आंगन के एक कोने में लकड़ी का छोटा-सा शेड बना था।

     

    एक दिन अर्जुन बाजार से लौट रहा था। रास्ते में उसे सड़क किनारे एक छोटा-सा घायल पिल्ला दिखाई दिया। पिल्ला लगातार कराह रहा था और डर के मारे एक पेड़ के पीछे छिपा था।

     

    अर्जुन ने उसे धीरे से उठाया।

     

    “अरे बेचारे… तुझे किसने इतना चोट पहुंचा दी?”

     

    पिल्ले ने डरते हुए अर्जुन की तरफ देखा।

     

    अर्जुन उसे घर ले आया।

     

    रोहन पिल्ले को देखते ही खुश हो गया।

     

    “पापा! ये हमारे साथ रहेगा?”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “अगर इसकी तबीयत ठीक हो गई तो क्यों नहीं?”

     

    सीमा ने उसके घाव साफ किए और उसे दूध दिया।

     

    कुछ ही दिनों में पिल्ला ठीक होने लगा। रोहन ने उसका नाम रखा—शेरू।

     

    शेरू बहुत समझदार था। वह पूरे दिन रोहन के आसपास रहता। रोहन स्कूल जाता तो दरवाजे तक छोड़ने जाता और जब तक वह लौटकर नहीं आता, दरवाजे के पास बैठा रहता।

     

    एक दिन रोहन स्कूल से लौटकर आया तो उसके हाथ में एक छोटा-सा बिस्कुट का पैकेट था।

     

    उसने शेरू को देखकर कहा, “देख, तेरे लिए क्या लाया हूं!”

     

    शेरू खुशी से पूंछ हिलाने लगा।

     

    रोहन ने उसे बिस्कुट दिया और बोला, “तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।”

     

    शेरू ने जैसे उसकी बात समझ ली। वह उसके पैरों के पास बैठ गया।

     

    समय बीतता गया और छोटा-सा पिल्ला बड़ा होकर मजबूत कुत्ता बन गया। उसका रंग भूरा था और गले में लाल पट्टा बंधा रहता था।

     

    अर्जुन ने घर की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी शेरू को दे दी।

     

    लेकिन शेरू सिर्फ घर की रखवाली नहीं करता था। वह परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखता था।

     

    सुबह अर्जुन खेत पर जाता तो शेरू कुछ दूर तक उसके साथ जाता।

     

    सीमा कुएं से पानी भरने जाती तो शेरू उसके पीछे चलता।

     

    और रोहन स्कूल जाता तो शेरू हमेशा गेट तक उसे छोड़ने जाता।

     

    एक दिन रोहन ने हंसते हुए कहा, “शेरू, तू मुझे स्कूल छोड़ने क्यों आता है? मैं बच्चा नहीं हूं।”

     

    शेरू ने उसकी तरफ देखा और पूंछ हिलाई।

     

    रोहन हंस पड़ा।

     

    “अच्छा बाबा, चल।”

     

    एक शाम अचानक गांव में तेज बारिश शुरू हो गई। बिजली चमक रही थी और हवा बहुत तेज चल रही थी।

     

    अर्जुन घर लौटने में देर कर रहा था।

     

    सीमा बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी।

     

    “पता नहीं आज इतनी देर क्यों हो गई।”

     

    शेरू भी बेचैन था।

     

    वह बार-बार दरवाजे तक जाता और बाहर देखने लगता।

     

    रात काफी हो गई, लेकिन अर्जुन नहीं आया।

     

    सीमा ने पड़ोसियों को खबर की।

     

    कुछ लोग टॉर्च लेकर अर्जुन को खोजने निकल पड़े।

     

    शेरू भी उनके साथ दौड़ पड़ा।

     

    करीब एक किलोमीटर दूर खेत के पास उन्हें अर्जुन की साइकिल मिली।

     

    लेकिन अर्जुन वहां नहीं था।

     

    शेरू जमीन सूंघते हुए आगे बढ़ने लगा।

     

    एक आदमी बोला, “लगता है कुत्ता किसी तरफ जा रहा है।”

     

    सब लोग उसके पीछे चल दिए।

     

    थोड़ी दूर जाकर शेरू एक गड्ढे के पास रुक गया और जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    नीचे अर्जुन गिरा हुआ था।

     

    वह घायल था और उठ नहीं पा रहा था।

     

    लोगों ने तुरंत उसे बाहर निकाला और अस्पताल ले गए।

     

    डॉक्टर ने कहा, “अगर थोड़ी और देर हो जाती तो मुश्किल हो सकती थी।”

     

    सीमा ने शेरू को गले लगा लिया।

     

    “तूने आज मेरे पति की जान बचा ली।”

     

    शेरू चुपचाप उसके पैरों के पास बैठ गया।

     

    उस दिन के बाद पूरे गांव में शेरू की चर्चा होने लगी।

     

    लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ महीनों बाद अर्जुन को काम के सिलसिले में शहर जाना पड़ा। सीमा और रोहन भी उसके साथ गए। घर की देखभाल के लिए शेरू को पड़ोसी चाचा के पास छोड़ दिया गया।

     

    रोहन जाते समय शेरू को गले लगाकर बोला, “हम जल्दी वापस आएंगे।”

     

    शेरू ने रोहन को जाते हुए बहुत देर तक देखा।

     

    तीन दिन बाद परिवार वापस लौट आया।

     

    गाड़ी घर के पास रुकी।

     

    दरवाजा खुलते ही शेरू दौड़ता हुआ आया।

     

    वह कभी अर्जुन के पास जाता, कभी सीमा के और फिर रोहन के पास जाकर उछलने लगा।

     

    रोहन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मुझे पता था तू हमें बहुत याद कर रहा होगा।”

     

    शेरू खुशी से पूंछ हिलाता रहा।

     

    कुछ दिन बाद एक रात घर में अजीब आवाज हुई।

     

    शेरू अचानक उठ गया।

     

    वह दरवाजे की तरफ देखने लगा।

     

    अर्जुन ने नींद में पूछा, “क्या हुआ?”

     

    शेरू धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और जोर से भौंकने लगा।

     

    अर्जुन उठकर बाहर आया।

     

    आंगन में सब कुछ शांत था।

     

    “कुछ नहीं है शेरू। सो जा।”

     

    लेकिन शेरू शांत नहीं हुआ।

     

    वह घर के पीछे की तरफ भागा।

     

    अर्जुन भी उसके पीछे गया।

     

    वहां दीवार के पास एक आदमी छिपा हुआ था। अर्जुन को देखते ही वह भागने लगा।

     

    शेरू उसके पीछे दौड़ा और जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    आवाज सुनकर पड़ोसी भी बाहर आ गए।

     

    वह आदमी पकड़ा गया।

     

    पता चला कि वह कई दिनों से गांव के घरों की रेकी कर रहा था।

     

    अर्जुन ने शेरू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “तू सच में हमारे घर का रखवाला है।”

     

    शेरू ने जैसे जवाब में उसकी हथेली चाट ली।

     

    समय बीतता गया।

     

    रोहन बड़ा होने लगा।

     

    अब वह स्कूल के बाद पढ़ाई करने बैठता तो शेरू उसके पास ही लेट जाता।

     

    परीक्षा के दिनों में रोहन देर रात तक पढ़ता।

     

    सीमा कहती, “रोहन, अब सो जाओ।”

     

    रोहन कहता, “बस थोड़ा और।”

     

    शेरू उसके पैरों के पास बैठा रहता।

     

    एक रात रोहन किताब पढ़ते-पढ़ते वहीं सो गया।

     

    सुबह सीमा ने देखा कि शेरू पूरी रात उसके पास बैठा रहा था।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तू भी ना… इसे अकेला नहीं छोड़ता।”

     

    शेरू ने आंखें झपकाईं।

     

    कुछ साल बाद शेरू बूढ़ा हो गया।

     

    अब वह पहले की तरह तेज नहीं दौड़ पाता था। ज्यादा समय आंगन में बैठकर बिताता।

     

    रोहन अब कॉलेज जाने लगा था।

     

    एक दिन वह शहर जाने के लिए बस में बैठ रहा था।

     

    शेरू गेट तक आया।

     

    रोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मैं जल्दी वापस आऊंगा दोस्त।”

     

    शेरू बस को तब तक देखता रहा, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई।

     

    उस दिन शाम को शेरू खाना भी नहीं खा रहा था।

     

    सीमा ने कहा, “रोहन को याद कर रहा है।”

     

    अर्जुन बोला, “वो जल्दी आएगा।”

     

    दो दिन बाद रोहन अचानक घर लौट आया।

     

    शेरू ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह अपनी पूरी ताकत से उठकर दरवाजे तक पहुंचा।

     

    रोहन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “शेरू!”

     

    दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।

     

    रोहन की आंखों में आंसू थे।

     

    “तूने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।”

     

    शेरू ने धीरे से अपना सिर उसकी गोद में रख दिया।

     

    कुछ महीने बाद शेरू बहुत कमजोर हो गया।

     

    एक शाम पूरा परिवार उसके पास बैठा था।

     

    रोहन उसका सिर सहला रहा था।

     

    “तूने हमारे लिए बहुत कुछ किया है शेरू।”

     

    अर्जुन ने कहा, “ये सिर्फ हमारा पालतू कुत्ता नहीं था… ये हमारे परिवार का हिस्सा था।”

     

    सीमा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेरू ने एक-एक करके तीनों की तरफ देखा।

     

    फिर उसने धीरे से अपनी पूंछ हिलाई।

     

    उस रात परिवार उसके पास ही बैठा रहा।

     

    अगली सुबह शेरू शांत था।

     

    उसने अपनी जिंदगी प्यार और वफादारी से जी थी।

     

    रोहन ने उसकी पुरानी लाल पट्टी हाथ में लेकर कहा—

     

    “लोग कहते हैं कुत्ता इंसान का सबसे वफादार दोस्त होता है… लेकिन मेरे लिए शेरू सिर्फ दोस्त नहीं था। वह मेरा परिवार था।”

     

    अर्जुन ने शेरू की याद में आंगन के उसी नीम के पेड़ के नीचे एक छोटा-सा पत्थर रखा।

    उस पर लिखा“शेरू — जिसने घर की रखवाली नहीं, हमारे दिलों की रखवाली की।”

     

    और आज भी जब रोहन गांव आता, वह उस जगह बैठकर कुछ देर शेरू को याद करता।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते बोलकर नहीं निभाए जाते।

     

    वे बस दिल से निभाए जाते हैं।

     

    और शेरू ने अपने पूरे जीवन में यही साबित किया था कि सच्ची वफादारी शब्दों की मोहताज नहीं होती।

  • दोस्ती….

    दोस्ती….

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

     

    “तू सच में जा रही है?”

     

    नैना ने सामने खड़ी रिया को देखते हुए पूछा।

     

    रिया ने मुस्कुराकर अपना बैग कंधे पर डाला। “हाँ यार… जाना तो पड़ेगा।”

     

    “लेकिन तूने कहा था कि तू कहीं नहीं जाएगी।”

     

    “कहा था… पर जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से थोड़ी होता है।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। दोनों कुछ देर चुपचाप एक-दूसरे को देखती रहीं।

     

    पिछले आठ सालों से दोनों साथ थीं। स्कूल में एक ही बेंच पर बैठना, कॉलेज में साथ जाना, एक-दूसरे के घर बिना बताए जब दिल चाहे पहुँच जाना… सब कुछ जैसे रोज़ की बात थी।

     

    लेकिन आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि शायद उनकी दोस्ती में दूरी आने वाली है। रिया के पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया था। पूरा परिवार अगले हफ्ते दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने वाला था।

     

    “तू मुझे भूल तो नहीं जाएगी?” नैना ने अचानक पूछा।

     

    रिया हँस पड़ी। “पागल है क्या? दोस्ती कोई जगह बदलने से खत्म होती है?”

     

    “पता नहीं… लोग बदल जाते हैं।”

     

    रिया ने नैना का हाथ पकड़ लिया। “लोग बदल सकते हैं, लेकिन हमारी दोस्ती नहीं बदलेगी।”

     

    नैना ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें भर आईं। “पक्का?”

     

    “एकदम पक्का।”

     

    दोनों ने हाथ मिलाया। “बेस्ट फ्रेंड्स?”

     

    “forever।”

     

     

    अगले हफ्ते रिया चली गई, लेकिन रिया के जाने के बाद नैना का मन बिल्कुल नहीं लगा। पहले हर शाम रिया का फोन आ जाता था।

    “चल बाहर चलते हैं।”

     

    “चाय पीने चल।”

     

    “आज गोलगप्पे खाने हैं।”

     

    “चल मेरे घर, मम्मी ने पकौड़े बनाए हैं।”

     

    अब शाम को फोन नहीं आता था। नैना कई बार अपना फोन उठाकर रिया को कॉल करने का सोचती, फिर खुद ही रख देती। उसे लगता, शायद रिया नए शहर में व्यस्त होगी। एक दिन उसने रिया को फोन किया।

     

    “हेलो?” दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई। “नैना!”

     

    आवाज़ सुनते ही नैना के चेहरे पर मुस्कान आ गई। “कैसी है?”

     

    “ठीक हूँ। तू बता?”

     

    “मैं भी ठीक हूँ।”

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    नैना चौंक गई। “तुझे कैसे पता?”

     

    “तेरी आवाज़ से।”

     

    नैना हँस दी। “तू अभी भी मुझे पहचान लेती है?”

     

    “पागल, तू मेरी दोस्त है। तेरी आवाज़ भी पहचानूँगी और तेरी चुप्पी भी।”

     

    कुछ देर दोनों बातें करती रहीं। उस दिन नैना को समझ आया कि दोस्ती सिर्फ साथ बैठने का नाम नहीं है। दोस्ती वो है जहाँ दूर रहकर भी सामने वाले की आवाज़ से पता चल जाए कि उसके दिल में क्या चल रहा है।

     

     

    समय बीतता गया ,दोनों की पढ़ाई खत्म हुई। रिया ने नौकरी शुरू कर दी और नैना ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। अब दोनों की बातें पहले से कम हो गई थीं। कभी दो दिन बाद फोन होता, कभी हफ्ते भर बाद। लेकिन जब भी बात होती, ऐसा लगता जैसे कल ही तो मिले थे।

     

    एक रात नैना का फोन बजा। रिया का कॉल था। 

    “हेलो?”

     

    दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    “रिया?” 

     

    फिर धीमी आवाज़ सुनाई दी। “नैना… मुझे तुझसे बात करनी है।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरी नौकरी चली गई।”

     

    नैना कुछ सेकंड चुप रही। “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तो नौकरी चली गई। तू थोड़ी चली गई है।”

     

    रिया चुप रही।

     

    नैना ने कहा, “तू परेशान मत हो। दूसरी नौकरी मिल जाएगी।”

     

    “लेकिन यहाँ किराया, घर का खर्च… सब है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।” परेशान सी रिया ने कहा। 

     

    नैना, “तू मेरे पास आ जा।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    “हाँ। कुछ दिन मेरे साथ रह। नौकरी ढूँढ। जब तक काम नहीं मिलता, हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।”

     

    रिया की आवाज़ भर्रा गई। “तू सच बोल रही है?”

     

    “नहीं, मज़ाक कर रही हूँ। इतनी रात को तुझे बुलाकर चाय पिलाऊँगी।” नैना ने कहा। 

     

    दोनों हँस पड़ीं। लेकिन नैना जानती थी कि रिया सच में बहुत परेशान है। अगले ही दिन उसने अपने स्कूल की प्रिंसिपल से बात की। स्कूल में एक खाली पोस्ट थी।

     

    नैना ने रिया का रिज़्यूमे दिया। कुछ दिनों बाद रिया को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

    और फिर… उसे नौकरी मिल गई। रिया ने सबसे पहले नैना को फोन किया। “नैना!”

     

    नैना, “क्या हुआ?”

     

    रिया, “मेरी नौकरी लग गई!”

     

    नैना खुशी से चिल्ला पड़ी। “सच?”

     

    रिया, “हाँ!”

     

    नैना, “मैंने कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    रिया, “लेकिन ये तेरी वजह से हुआ है।”

     

    नैना, “नहीं। तेरी मेहनत की वजह से हुआ है।”

     

    रिया, “फिर भी… अगर तू नहीं होती ना, तो शायद मैं हार जाती।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। बस मुस्कुरा दी।

     

     

    करीब दो साल बाद नैना की शादी तय हो गई।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। घर में हर तरफ खुशी का माहौल था। लेकिन नैना के मन में एक चिंता थी। “रिया आ पाएगी ना?”

     

    उसने माँ से पूछा। उन्होंने कहा, “क्यों नहीं आएगी?”

     

    नैना उदास होते हुए बोली, “उसकी नौकरी है।”

     

    उसकी मां बोली, “तू उसे बुला लेना।”

     

    “बुलाऊँगी नहीं… लेकर आऊँगी।”

     

    शादी से तीन दिन पहले रिया सच में दिल्ली पहुँच गई। हाथ में बड़ा सा बैग और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान। नैना उसे देखते ही दौड़कर उससे गले लग गई। “तू आ गई!”

     

    “हाँ मैडम, तेरी शादी है। कैसे नहीं आती?”

     

    “मुझे लगा था तू नहीं आ पाएगी।”

     

    “पागल है? तेरी शादी है। मेरी छुट्टी नहीं मिली तो नौकरी छोड़ देती।”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा। “ऐसा मत बोलना।”

     

    रिया हँसते हुए बोली, “चल अब रोना बंद कर। बहुत काम पड़ा है।”

     

    और फिर दोनों उसी तरह शादी की तैयारियों में लग गईं जैसे पिछले कई सालों की दूरी के बीच कुछ हुआ ही न हो।

     

    मेहंदी की रात दोनों छत पर बैठी थीं। नैना ने धीरे से पूछा,

    “रिया?”

     

    रिया, “हम्म?”

     

    नैना, “तुझे कभी लगा कि हमारी दोस्ती खत्म हो जाएगी?”

     

    रिया ने कुछ पल सोचा। “शुरू में लगा था।”

     

    नैना उसकी तरफ देखते हुए बोली, “फिर?”

     

    “फिर समझ आया कि सच्ची दोस्ती में रोज़ बात करना जरूरी नहीं होता।”

     

    नैना उसकी तरफ देखने लगी।

     

    रिया बोली, “कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें दूरी आ सकती है, लेकिन दिलों के बीच दूरी नहीं आती।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तू बहुत अच्छी बातें करने लगी है।”

     

    “हाँ, क्योंकि अब मैं बड़ी हो गई हूँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    दोनों हँस पड़ीं।

     

     

    शादी के बाद नैना अपनी नई जिंदगी में व्यस्त हो गई।

     

    रिया भी अपनी नौकरी में। लेकिन उनकी दोस्ती वैसी ही रही, कभी फोन पर लड़ाई, कभी बिना वजह हँसी, कभी एक-दूसरे से शिकायत और कभी बस चुपचाप फोन पर बने रहना।

     

    एक दिन नैना बहुत परेशान थी। उसने रिया को फोन नहीं किया। लेकिन कुछ देर बाद रिया का फोन आ गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर झूठ क्यों बोल रही है?”

     

    नैना चुप रही।

     

    रिया ने कहा, “देख, अगर बात नहीं करनी तो मत कर। लेकिन अकेले मत रहना, मैं फोन पर हूँ।”

     

    नैना की आँखों से आँसू निकल आए। उसे उस पल समझ आया कि जिंदगी में कितने भी लोग क्यों न आएँ, कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जो सिर्फ दोस्त नहीं रहते।

     

    वे परिवार बन जाते हैं। उनके साथ खून का रिश्ता नहीं होता, फिर भी वे अपने लगते हैं। उनसे रोज़ मिलना जरूरी नहीं होता हर दिन बात करना जरूरी नहीं होता।

     

    बस इतना पता होना काफी होता है कि अगर दुनिया तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए, तो एक इंसान ऐसा है जो तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा।

     

    नैना ने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “रिया?”

     

    “हाँ?”

     

    “थैंक यू।”

     

    “किसलिए?”

     

    “मेरी दोस्त होने के लिए।”

     

    रिया कुछ सेकंड चुप रही, फिर बोली, “पागल… दोस्ती में थैंक यू नहीं बोलते।”

     

    नैना हँस पड़ी। “तो क्या बोलते हैं?”

     

    “बस इतना कहते हैं…”

     

    “क्या?”

     

    “चल, चाय पीने चलते हैं।”

     

    नैना खिलखिलाकर हँस दी।

     

    दो शहरों में रहने वाली दो सहेलियाँ फिर से फोन पर चाय पीने का प्लान बनाने लगीं। क्योंकि कुछ दोस्तियाँ दूरी से नहीं टूटतीं।

     

    बल्कि दूरी उन्हें और मजबूत कर देती है। क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं… साथ निभाने का नाम है।

  • तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव रामपुर में तीन दोस्तों की जोड़ी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें नाम से कम और “तीन तिगाड़ा” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

    पहला था भोला। नाम की तरह ही भोला नहीं, बल्कि थोड़ा सनकी भी था। उसे हर काम अपने ही अजीब तरीके से करना पसंद था। कोई कहे दाएँ जाओ, तो वह कहे, “सब दाएँ जाते हैं, मैं बाएँ जाऊँगा।”

    दूसरा था गोलू। हर समय हँसता रहता। चाहे कैसी भी मुसीबत हो, उसके चेहरे पर मुस्कान कभी नहीं जाती थी। उसकी एक ही आदत थी—हर बात में मज़ाक करना।

    तीसरा था पप्पू। वह इतना नादान और बेपरवाह था कि लोग कहते, “इसका दिमाग छुट्टी पर रहता है।” कोई भी कुछ कह दे, वह बिना सोचे वही कर देता।

    तीनों का हाल ऐसा था कि जहाँ जाते, वहाँ कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर हो जाती।

    एक दिन तीनों ने सोचा कि अब गाँव में अपनी इज़्ज़त बनानी चाहिए।

    भोला बोला, “चलो आज किसी की मदद करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हाँ, लोग कहेंगे कि ये तीनों सुधर गए।”

    पप्पू बोला, “और अगर नहीं सुधरे तो?”

    दोनों ने उसे घूरकर देखा।

    सबसे पहले उन्हें एक बूढ़ी अम्मा मिलीं जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए जा रही थीं।

    तीनों दौड़ पड़े।

    “अम्मा, हम उठा देते हैं।”

    अम्मा खुश हो गईं।

    लेकिन जैसे ही भोला ने गट्ठर उठाया, उसने कहा, “इसे ऐसे नहीं, उल्टा पकड़ना चाहिए।”

    उसने गट्ठर उल्टा कर दिया।

    सारी लकड़ियाँ सड़क पर बिखर गईं।

    उधर गोलू इतनी ज़ोर से हँसा कि संतुलन बिगड़ गया और वह भी लकड़ियों पर गिर पड़ा।

    पप्पू उन्हें उठाने लगा, लेकिन उसने सूखी लकड़ियों की जगह पास रखे किसी के कपड़े उठा लिए।

    अम्मा सिर पकड़कर बैठ गईं।

    तीनों चुपचाप वहाँ से खिसक लिए।

    चलते-चलते उन्हें लगा कि खेती में मदद करनी चाहिए।

    एक किसान खेत में पानी लगा रहा था।

    भोला बोला, “चाचा, हम कर देते हैं।”

    किसान ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

    जैसे ही किसान घर गया, भोला ने नहर का रास्ता बदल दिया।

    बोला, “सीधा पानी जाएगा तो मज़ा क्या?”

    नतीजा…

    पूरा पानी खेत छोड़कर सड़क पर बहने लगा।

    गोलू हँस-हँसकर लोटपोट हो गया।

    पप्पू बोला, “लगता है सड़क पर धान उगेंगे।”

    इतने में किसान वापस आया।

    उसने देखा कि खेत सूखा है और सड़क नदी बनी हुई है।

    तीनों फिर भाग खड़े हुए।

    अब उन्होंने फैसला किया कि किसी की दुकान पर मदद करेंगे।

    हलवाई ने कहा, “इन लड्डुओं पर चाँदी का वर्क लगा दो।”

    भोला बोला, “वर्क से क्या होगा? चमक तो तेल से आएगी।”

    उसने लड्डुओं पर तेल लगा दिया।

    गोलू हँसते-हँसते चीनी का डिब्बा गिरा बैठा।

    पप्पू ने समझा कि सब खराब हो गया है।

    उसने पूरा बेसन पानी में डाल दिया।

    थोड़ी ही देर में लड्डुओं की जगह बेसन का हलवा बन गया।

    हलवाई चिल्लाया, “तुम तीनों दुकान से बाहर निकलो!”

    अब तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी।

    “जहाँ ये तीन पहुँच जाएँ, वहाँ भगवान ही मालिक है।”

    तीनों उदास होकर तालाब किनारे बैठ गए।

    गोलू पहली बार चुप था।

    तभी गाँव के सरपंच आए।

    उन्होंने कहा, “तुम लोग इतने परेशान क्यों हो?”

    भोला बोला, “हम अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन सब बिगड़ जाता है।”

    सरपंच मुस्कुराए।

    उन्होंने कहा, “अगर सच में मदद करनी है तो पहले सीखो, फिर काम करो।”

    तीनों को बात समझ आ गई।

    अगले दिन गाँव में सफाई अभियान रखा गया।

    इस बार उन्होंने बिना अपनी अक्ल लगाए वही किया जो लोगों ने बताया।

    भोला सिर्फ झाड़ू लगाता रहा।

    गोलू कूड़ा उठाता रहा और बीच-बीच में सबका मन भी हँसाकर हल्का करता रहा।

    पप्पू बस बोरी पकड़कर चलता रहा।

    पहली बार कोई गड़बड़ नहीं हुई।

    गाँव वाले खुश हो गए।

    लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

    काम खत्म होने के बाद पप्पू बोला, “अब कूड़ा कहाँ डालना है?”

    किसी ने कहा, “पीछे वाले गड्ढे में।”

    पप्पू बिना देखे बोरी उठाकर फेंक आया।

    कुछ देर बाद पता चला कि वह कूड़ा नहीं, सरपंच का नया खाद का बोरा था।

    असली कूड़ा वहीं पड़ा रह गया।

    पूरा गाँव पहले कुछ पल चुप रहा…

    फिर इतनी ज़ोर से हँसा कि तालाब तक आवाज़ पहुँच गई।

    सरपंच भी हँस पड़े।

    उन्होंने कहा, “लगता है तुम तीनों की किस्मत में थोड़ा-बहुत काम बिगाड़ना लिखा है।”

    भोला बोला, “हम कोशिश तो पूरी करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हमारा इरादा अच्छा होता है, बस नतीजा थोड़ा अलग निकल जाता है।”

    पप्पू मासूमियत से बोला, “अगली बार शायद सही हो जाए…”

    यह सुनकर फिर सब हँस पड़े।

    उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई काम बिगड़ जाता, लोग मुस्कुराकर बस एक ही बात कहते—

    “लगता है यहाँ तीन तिगाड़ा होकर गए हैं!”

    और तीनों दोस्त भी अब इस बात का बुरा नहीं मानते थे। वे हर गलती से कुछ नया सीखते, फिर अगले काम में जुट जाते। हालाँकि उनके साथ कोई न कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी फिर भी हो जाती थी, लेकिन उनकी सच्ची दोस्ती, साफ़ दिल और लोगों को हँसा देने वाली आदत ने पूरे गाँव का दिल जीत लिया था।

    सीख: अच्छा इरादा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से सीखकर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है। और सच्चे दोस्त हर मुसीबत को भी हँसी में बदल

  • टूटी दोस्ती

    टूटी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    टूटी दोस्ती

     

    विद्युत और वेदांत। दो नाम जो एक समय में एक ही साँस की तरह जुड़े हुए थे। छोटे से कस्बे की वह गली आज भी वैसी ही है, जहाँ दोनों ने बचपन के अनगिनत दिन बिताए थे। गली के कोने वाला नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है, हालाँकि उसकी छाया अब उतनी घनी नहीं रही। उस पेड़ के नीचे बैठकर दोनों ने कितनी कहानियाँ गढ़ी थीं, कितने सपने देखे थे, और कितने वादे किए थे कि हम हमेशा साथ रहेंगे।

     

    विद्युत का घर गली के शुरू में था और वेदांत का बिलकुल आखिर में। दोनों की उम्र में मुश्किल से छह महीने का अंतर था। कक्षा पहली से ही एक ही बेंच पर बैठना शुरू किया था। विद्युत थोड़ा शरारती था भागना, चढ़ना, लड़ना उसकी आदत थी। वेदांत शांत और सोचने वाला। जहाँ विद्युत दीवार फाँदकर स्कूल के बगीचे से आम तोड़ लाता, वहाँ वेदांत खड़ा रहकर पहरा देता और फिर दोनों मिलकर खाते। एक की जेब में यदि पाँच रुपये होते तो दोनों के हिस्से में आ जाते। एक के घर में यदि रोटी कम पड़ती तो दूसरा चुपचाप अपनी थाली से बाँट लेता।

     

    गर्मियों की दोपहरें नीम की छाया में बीततीं। दोनों पत्थरों से घर बनाते, कागज़ की नावें बनाकर नाले में छोड़ते, और शाम को क्रिकेट खेलते। विद्युत हमेशा बल्लेबाज बनना चाहता, वेदांत गेंदबाजी करता। हार-जीत का कोई अर्थ नहीं होता था। हारने वाला भी हँसता और जीतने वाला भी। रात को छत पर लेटकर तारे गिनते। विद्युत कहता, “वेदांत, जब बड़े होंगे तो एक साथ शहर जाएँगे। बड़ा मकान लेंगे, और हमेशा साथ रहेंगे।” वेदांत सिर हिलाता, “हाँ, हमेशा।” उस ‘हमेशा’ में कितना विश्वास था, आज याद करके भी दिल बैठ जाता है।

     

    स्कूल के दिनों में दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे लगते। विद्युत की माँ कहतीं, “वेदांत को बुला ला, वरना तू खाना नहीं खाएगा।” वेदांत के पिता कहते, “विद्युत के बिना तू चुप क्यों रहता है?” दोनों के परिवार भी एक-दूसरे से घुल-मिल गए थे। त्योहार एक साथ मनाए जाते, बीमार होने पर एक के घर का व्यक्ति दूसरे के घर पहुँच जाता।

     

    कक्षा आठवीं तक सब कुछ वैसा ही रहा। फिर धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। विद्युत का परिवार आर्थिक तंगी से गुज़र रहा था। उसके पिता की नौकरी चली गई। घर में तनाव बढ़ गया। विद्युत पहले जैसा खुश नहीं रहता था। वह बातें कम करने लगा। वेदांत पूछता, “क्या हुआ?” विद्युत टाल देता, “कुछ नहीं।” एक दिन विद्युत ने स्कूल की फीस नहीं भरी। मास्टर साहब ने कक्षा में नाम पुकारा। विद्युत का चेहरा लाल हो गया। वेदांत ने उस दिन अपनी जमा पूँजी से फीस भर दी। विद्युत ने कहा था, “मैं वापस कर दूँगा।” वेदांत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “दोस्तों में हिसाब नहीं होता।”

     

    लेकिन समय के साथ दूरी बढ़ने लगी। विद्युत को ट्यूशन के पैसे कमाने के लिए एक दुकान पर काम करना पड़ा। वह स्कूल के बाद सीधे दुकान चला जाता। वेदांत खेलने जाता, अकेला। पहले तो इंतज़ार करता, फिर आदत पड़ गई। विद्युत थककर घर लौटता, बात करने का मन नहीं होता। वेदांत नई दोस्ती बनाने लगा कक्षा के अन्य लड़कों से। विद्युत को यह अच्छा नहीं लगा। एक दिन उसने कह दिया, “तुम अब हमें भूल गए हो।” वेदांत ने जवाब दिया, “तुम खुद समय नहीं निकालते।” छोटी-सी बात थी, लेकिन दिल में चुभ गई।

     

    कक्षा दसवीं में बात और बिगड़ी। स्कूल में वार्षिक समारोह था। नाटक होना था। दोनों को मुख्य भूमिकाएँ मिलीं। रिहर्सल के दौरान विद्युत बार-बार लेट आता। एक दिन निर्देशक ने उसे डाँटा। वेदांत ने बीच में कहा, “सर, इनके घर की स्थिति ठीक नहीं है। थोड़ी छूट दे दीजिए।” विद्युत को यह बात नागवार गुज़री। शाम को उसने वेदांत से कहा, “मुझे दया की ज़रूरत नहीं। तुम सबके सामने मेरी बेइज़्ज़ती क्यों करते हो?” वेदांत हैरान रह गया। उसने समझाया, “मैंने मदद की थी।” लेकिन विद्युत ने सुनना ही नहीं चाहा। “तुम हमेशा खुद को बड़ा समझते हो। मुझे तुम्हारी सलाह की ज़रूरत नहीं।” उस दिन दोनों में पहली बार तीखी बहस हुई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे आवाज़ें ऊँची हो गईं। आसपास के लोग सुन रहे थे। विद्युत ने गुस्से में कहा, “दोस्ती खत्म।” वेदांत चुप रहा। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। एक ही कक्षा में बैठते, लेकिन नज़रें नहीं मिलाते। पहले जो बेंच साझा करते थे, अब अलग-अलग कोनों में बैठने लगे। दोस्त पूछते, “क्या हुआ तुम दोनों को?” दोनों जवाब देते, “कुछ नहीं।” लेकिन अंदर कुछ टूट चुका था।

     

    बारहवीं के बाद विद्युत ने पढ़ाई छोड़ दी। घर की ज़िम्मेदारी संभालनी थी। वह एक कारखाने में काम करने लगा। वेदांत कॉलेज चला गया शहर। जाने से पहले उसने एक बार विद्युत के घर का चक्कर लगाया। विद्युत बाहर खड़ा था। दोनों की नज़रें मिलीं। वेदांत ने मुँह खोला, कुछ कहना चाहा, लेकिन विद्युत ने मुँह फेर लिया। वेदांत चला गया। उस दिन नीम के पेड़ की पत्तियाँ ज़ोर-ज़ोर से हिल रही थीं, जैसे कोई पुरानी याद झड़ रही हो।

     

    साल बीतते गए। वेदांत ने शहर में अच्छी नौकरी कर ली। शादी हुई, बच्चे हुए। जीवन व्यवस्थित हो गया। लेकिन कभी-कभी रात में नींद नहीं आती तो बचपन याद आ जाता। विद्युत कहाँ होगा? क्या करता होगा? उसने कई बार कस्बे लौटने की सोची, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। अंदर एक डर था क्या विद्युत अब भी नाराज़ होगा? क्या वह मिलना भी चाहेगा?

     

    विद्युत कस्बे में ही रहा। मेहनत की, छोटे स्तर का व्यापार शुरू किया। शादी हुई, एक बेटा हुआ। जीवन चलता रहा, लेकिन अकेलापन उसका साथी बन गया। वह कभी-कभी नीम के पेड़ के नीचे बैठ जाता। पुरानी बातें याद आतीं कागज़ की नावें, आम के पेड़, छत पर तारे। दिल भारी हो जाता। एक बार उसने वेदांत का नंबर किसी से पूछा। नंबर मिल गया। फ़ोन उठaya, नंबर दबाया, लेकिन कॉल कट कर दी। हिम्मत नहीं हुई।

     

    बीस साल बाद एक दिन वेदांत को अपने पिता की बीमारी की खबर मिली। वह कस्बे लौटा। अस्पताल में पिता भर्ती थे। शाम को वह पुरानी गली में पहुँचा। नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था। उसके नीचे एक आदमी बैठा था बाल सफ़ेद, चेहरा थका हुआ। वेदांत ने पहचाना विद्युत। दिल ज़ोर से धड़का। वह पास गया।

     

    “विद्युत…” आवाज़ में कंपन था।

     

    विद्युत ने सिर उठाया। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। बीस साल का सन्नाटा उनके बीच खड़ा था। वेदांत बोला, “कैसे हो?”

     

    विद्युत ने हल्के से मुस्कुराया, “जी रहा हूँ। तुम?”

     

    “ठीक हूँ।”

     

    बातें रुक-रुक कर हुईं। पुरानी यादों का ज़िक्र किसी ने नहीं किया। जैसे दोनों जानते हों कि वह ज़ख़्म अभी भी कच्चा है। वेदांत ने कहा, “बाबा बीमार हैं। मैं कुछ दिन रुकूँगा।” विद्युत ने सिर हिलाया, “अगर कुछ ज़रूरत हो तो बताना।”

     

    अगले कुछ दिनों में दोनों कभी-कभी मिलते। चाय पीते, मौसम की बात करते, बच्चों की बात करते। लेकिन बचपन वाली वह आसानी नहीं थी। बातों में एक दीवार सी खड़ी रहती। एक शाम वेदांत ने हिम्मत जुटाई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे बोला, “उस दिन की बात… नाटक वाली… मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें छोटा नहीं समझा था। सिर्फ़ मदद करनी थी।”

     

    विद्युत देर तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मैं जानता था। लेकिन उस समय इतना गुस्सा था कि सुन नहीं पाया। घर की हालत, पैसे की तंगी… सब कुछ मिलकर गुस्सा बन गया था। तुम पर निकाल दिया। बाद में पछताया, लेकिन तुम चले गए थे।”

     

    वेदांत की आँखें भर आईं। “मैं भी हठी था। एक बार बात कर लेता।”

     

    दोनों चुप हो गए। हवा में नीम की खुशबू तैर रही थी। विद्युत बोला, “दोस्ती टूट गई थी उस दिन। अब उसे जोड़ा नहीं जा सकता। बहुत समय बीत गया।”

     

    वेदांत ने सिर हिलाया। “हाँ। कुछ चीज़ें वापस नहीं आतीं। बचपन वाली वह बेफिक्री, वह विश्वास… अब कहाँ?”

     

    वे बात करते रहे। पुरानी शरारतें याद कीं, हँसे भी। लेकिन हँसी में वह पुरानापन नहीं था। जैसे कोई पुरानी किताब खोलकर पढ़ रहे हों, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके हों।

     

    वेदांत के पिता ठीक हो गए। लौटने का समय आ गया। स्टेशन पर विद्युत पहुँचा। दोनों ने हाथ मिलाया। वेदांत बोला, “ख्याल रखना।” विद्युत ने जवाब दिया, “तुम भी।” ट्रेन चली। विद्युत देर तक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा।

     

    वापस गली में आकर वह नीम के पेड़ के नीचे बैठ गया। आँखें बंद कीं। यादों का सैलाब आ गया कागज़ की नावें बहती हुई, आम के पेड़ पर चढ़ना, छत पर लेटकर सपने देखना, और वह वादा “हमेशा साथ रहेंगे।” आँखें खुल गईं। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। विद्युत ने धीरे से कहा, “हमेशा… कितना आसान लगता था तब।”

     

    दूर शहर में वेदांत ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रहा था। मन में वही बात घूम रही थी। दोस्ती टूट गई थी। सालों बाद मिलना हुआ, बातें हुईं, माफ़ी भी माँगी गई। लेकिन जो टूट चुका था, वह जुड़ नहीं पाया। बस एक हल्की सी गर्माहट रह गई थी पुरानी राख में दबी हुई।

     

    बचपन की दोस्ती अनोखी होती है। उसमें कोई शर्त नहीं होती, कोई हिसाब नहीं होता। बस एक विश्वास होता है कि दूसरा हमेशा रहेगा। लेकिन जीवन के रास्ते कभी-कभी इतने अलग हो जाते हैं कि वह विश्वास टूट जाता है। और एक बार टूट जाए तो फिर चाहे कितनी भी कोशिश कर लो, वह पुराना रूप वापस नहीं आता। बस यादें रह जाती हैं मीठी भी, कड़वी भी। और एक सवाल काश उस दिन थोड़ा और समझदार होते।

     

     

     

    विद्युत और वेदांत की कहानी अब सिर्फ़ यादों में बची है। गली का नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है। कभी-कभी शाम को जब हवा चलती है तो लगता है जैसे दो बच्चे अभी भी उसकी छाया में बैठे हों हँस रहे हों, सपने देख रहे हों, और कह रहे हों, “हमेशा साथ रहेंगे।” लेकिन हकीकत में वे दोनों अब अलग-अलग दुनिया में हैं। दोस्ती टूट चुकी है। और कुछ टूटी हुई चीज़ें जीवन भर अधूरी ही रह जाती हैं।

  • शामिल

    शामिल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शामिल था वो किसी और के दिल में,

    फिर मेरे दिल में घर क्यों बनाने लगा?

    जब छोड़कर ही जाना था उसे,

    तो मेरे ख़्वाब क्यों सजाने लगा?

    जाते-जाते ऐसा अँधेरा कर गया,

    कि इस दिल में अब कोई रौशनी नहीं बची।

    घर तो आज भी उसी का है,

    मगर अफ़सोस…

    अब इस घर में मैं भी नहीं बचा।

  • अधूरी दास्तान

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    शहर की हल्की बारिश की बूँदें सड़कों पर गिर रही थीं। रिया अपने अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी थी, हाथ में चाय का कप, और मन में एक अजीब सी उदासी। वह उस दिन से सोच रही थी, जब उसने आर्यन को आखिरी बार देखा था। वह आर्यन ही था—उसका पहला प्यार, उसका पहला सपना।

    कॉलेज की यादें अचानक ताजा हो गईं। लाइब्रेरी में किताबों की खुशबू, कैफेटेरिया में हँसी का शोर, और बारिश की उन छुप-छुप कर की मुलाकातों में जो मुस्कानें थी, वे सब कुछ आज भी उसकी आँखों के सामने जीवित थीं। आर्यन हमेशा कहते, “रिया, अगर तुम्हारे ख्वाबों में कोई जगह हो, तो मैं वहीं रहना चाहता हूँ।” रिया की आँखों में चमक आ जाती थी, और उसे लगता था कि उसका पूरा जीवन उसी मुस्कान में समा गया है।

    लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, कॉलेज की दुनिया छोड़कर असली जीवन में कदम रखने का समय आया। आर्यन को विदेश में नौकरी मिली, और रिया को शहर में ही रहना पड़ा। पहले तो दोनों ने हर रोज़ फोन किए, पत्र लिखे, और मिलने की कोशिश की, लेकिन दूरी और जिम्मेदारियों ने उनके बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी।

    और फिर वह दिन आया। आर्यन ने संदेश भेजा, “मुझे लगता है हमें अपनी राहें अलग करनी चाहिए। मैं हमेशा तुम्हें याद रखूँगा।” रिया का दिल टूट गया। उसने सारी उम्मीदें, सारे सपने और शायद खुद पर विश्वास तक खो दिया।

    सालों बाद, रिया अब एक सफल आर्ट डायरेक्टर थी। लेकिन मन में वह अधूरापन अभी भी था। एक दिन, उसे अपने पुराने कॉलेज के दोस्त का निमंत्रण मिला। समारोह में पहुँचते ही उसकी नजरें एक व्यक्ति पर टिक गईं—आर्यन। समय की रेत पर शायद हर चीज बदल जाती है, लेकिन उसकी मुस्कान अब भी वैसी ही थी।

    आर्यन भी उसे देखकर चौंका। थोड़ी देर के लिए जैसे समय ठहर गया। दोनों के बीच वही पुरानी गर्माहट और नज़ाकत की आभा फिर से जाग उठी। लेकिन अब वह बातचीत में नहीं, सिर्फ नजरों की खामोशी में थी।

    समारोह के बाद, दोनों पार्क में टहलते हुए पुराने दिनों की बातें करने लगे। वह वही बातें कर रहे थे, जो कभी चुपचाप अपने दिल में महसूस करते रहे थे। अब उनके शब्दों में अनुभव और समझ थी।

    आर्यन ने कहा, “रिया, उस दिन मैं बहुत छोटा और डरपोक था। मैंने अपने डर और जिम्मेदारियों के बीच तुम्हें खो दिया।”

    रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “और मैं भी खुद को दोष देती रही, सोचती रही कि शायद मैं तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं थी।”

    बारिश की बूँदें फिर से गिरने लगीं। रिया ने महसूस किया कि पुराने दर्द में अब कोई कड़वाहट नहीं थी, सिर्फ स्मृतियों की मिठास थी।

    लेकिन इस बार भी कहानी पूरी नहीं हो रही थी। जीवन की जटिलताओं और जिम्मेदारियों ने उन्हें अलग करने का फैसला किया। आर्यन को विदेश लौटना था, और रिया अपने शहर में नई प्रोजेक्ट्स में व्यस्त थी।

    लेकिन इस बार, अलगाव में भी आशा थी। उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया, और इस बार बिना किसी खामोशी के, अपने दिल की भावनाओं को साझा किया। आर्यन ने कहा, “हमारे बीच की दूरी अब फिर से मायने नहीं रखती। जब भी तुम्हारी याद आएगी, मैं तुम्हारे पास महसूस करूंगा।”

    रिया ने हँसते हुए जवाब दिया, “और मैं जानती हूँ कि अब अधूरी दास्तान भी अपने तरीके से पूरी हो रही है। हमारी यादें, हमारी बातें, हमारे सपने—ये सब अब हमारे दिलों में हमेशा के लिए रहेंगे।”

    समारोह खत्म हुआ। रिया अपने अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी थी। बारिश धीमी हो गई थी। उसने अपने दिल में तय किया कि अधूरी दास्तान में भी खूबसूरती हो सकती है। वह अधूरी नहीं रही, क्योंकि उसने इसे अपने अनुभवों और यादों में पूरा कर लिया।

    अगली सुबह, रिया ने अपने फोन में एक संदेश देखा—आर्यन का।

    “रिया, जीवन हमें अलग रास्तों पर ले जा सकता है, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए हमेशा एक जगह है। शायद हम साथ नहीं हैं, लेकिन इस अधूरी दास्तान की मिठास हमेशा हमारे बीच रहेगी। कभी कहीं, कभी किसी रूप में, हम फिर मिलेंगे।”

    रिया ने मुस्कुराते हुए बाहर देखा। सूरज की किरणें अब बरसात की बूँदों पर चमक रही थीं। उसने महसूस किया कि अधूरी दास्तान में भी एक तरह की पूर्णता होती है। कभी-कभी प्रेम का मतलब केवल साथ रहना नहीं, बल्कि अपने दिलों में उसकी याद को संजोना भी होता है।

    वह बालकनी पर खड़ी, बारिश की बची बूँदों को देखते हुए सोच रही थी—शायद जीवन की हर अधूरी कहानी में भी उम्मीद और सुंदरता छिपी होती है। और इस अधूरी दास्तान ने उसे यही सिखाया कि कभी-कभी अधूरापन ही प्रेम की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।

    रिया ने धीरे से कहा, “शायद हमारी दास्तान अधूरी है, लेकिन यही अधूरापन इसे सबसे खास बनाता है।”

    और इस तरह, अधूरी दास्तान ने अपने अंतिम पन्ने पर एक नया अध्याय छोड़ दिया—एक अध्याय जो पूरी तरह प्रेम, यादों, और उम्मीद से भरा था।