“तू सच में जा रही है?”
नैना ने सामने खड़ी रिया को देखते हुए पूछा।
रिया ने मुस्कुराकर अपना बैग कंधे पर डाला। “हाँ यार… जाना तो पड़ेगा।”
“लेकिन तूने कहा था कि तू कहीं नहीं जाएगी।”
“कहा था… पर जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से थोड़ी होता है।”
नैना कुछ नहीं बोली। दोनों कुछ देर चुपचाप एक-दूसरे को देखती रहीं।
पिछले आठ सालों से दोनों साथ थीं। स्कूल में एक ही बेंच पर बैठना, कॉलेज में साथ जाना, एक-दूसरे के घर बिना बताए जब दिल चाहे पहुँच जाना… सब कुछ जैसे रोज़ की बात थी।
लेकिन आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि शायद उनकी दोस्ती में दूरी आने वाली है। रिया के पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया था। पूरा परिवार अगले हफ्ते दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने वाला था।
“तू मुझे भूल तो नहीं जाएगी?” नैना ने अचानक पूछा।
रिया हँस पड़ी। “पागल है क्या? दोस्ती कोई जगह बदलने से खत्म होती है?”
“पता नहीं… लोग बदल जाते हैं।”
रिया ने नैना का हाथ पकड़ लिया। “लोग बदल सकते हैं, लेकिन हमारी दोस्ती नहीं बदलेगी।”
नैना ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें भर आईं। “पक्का?”
“एकदम पक्का।”
दोनों ने हाथ मिलाया। “बेस्ट फ्रेंड्स?”
“forever।”
—
अगले हफ्ते रिया चली गई, लेकिन रिया के जाने के बाद नैना का मन बिल्कुल नहीं लगा। पहले हर शाम रिया का फोन आ जाता था।
“चल बाहर चलते हैं।”
“चाय पीने चल।”
“आज गोलगप्पे खाने हैं।”
“चल मेरे घर, मम्मी ने पकौड़े बनाए हैं।”
अब शाम को फोन नहीं आता था। नैना कई बार अपना फोन उठाकर रिया को कॉल करने का सोचती, फिर खुद ही रख देती। उसे लगता, शायद रिया नए शहर में व्यस्त होगी। एक दिन उसने रिया को फोन किया।
“हेलो?” दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई। “नैना!”
आवाज़ सुनते ही नैना के चेहरे पर मुस्कान आ गई। “कैसी है?”
“ठीक हूँ। तू बता?”
“मैं भी ठीक हूँ।”
“झूठ बोल रही है।”
नैना चौंक गई। “तुझे कैसे पता?”
“तेरी आवाज़ से।”
नैना हँस दी। “तू अभी भी मुझे पहचान लेती है?”
“पागल, तू मेरी दोस्त है। तेरी आवाज़ भी पहचानूँगी और तेरी चुप्पी भी।”
कुछ देर दोनों बातें करती रहीं। उस दिन नैना को समझ आया कि दोस्ती सिर्फ साथ बैठने का नाम नहीं है। दोस्ती वो है जहाँ दूर रहकर भी सामने वाले की आवाज़ से पता चल जाए कि उसके दिल में क्या चल रहा है।
—
समय बीतता गया ,दोनों की पढ़ाई खत्म हुई। रिया ने नौकरी शुरू कर दी और नैना ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। अब दोनों की बातें पहले से कम हो गई थीं। कभी दो दिन बाद फोन होता, कभी हफ्ते भर बाद। लेकिन जब भी बात होती, ऐसा लगता जैसे कल ही तो मिले थे।
एक रात नैना का फोन बजा। रिया का कॉल था।
“हेलो?”
दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई।
“रिया?”
फिर धीमी आवाज़ सुनाई दी। “नैना… मुझे तुझसे बात करनी है।”
“क्या हुआ?”
“मेरी नौकरी चली गई।”
नैना कुछ सेकंड चुप रही। “तो?”
“तो क्या?”
“तो नौकरी चली गई। तू थोड़ी चली गई है।”
रिया चुप रही।
नैना ने कहा, “तू परेशान मत हो। दूसरी नौकरी मिल जाएगी।”
“लेकिन यहाँ किराया, घर का खर्च… सब है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।” परेशान सी रिया ने कहा।
नैना, “तू मेरे पास आ जा।”
रिया, “क्या?”
“हाँ। कुछ दिन मेरे साथ रह। नौकरी ढूँढ। जब तक काम नहीं मिलता, हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।”
रिया की आवाज़ भर्रा गई। “तू सच बोल रही है?”
“नहीं, मज़ाक कर रही हूँ। इतनी रात को तुझे बुलाकर चाय पिलाऊँगी।” नैना ने कहा।
दोनों हँस पड़ीं। लेकिन नैना जानती थी कि रिया सच में बहुत परेशान है। अगले ही दिन उसने अपने स्कूल की प्रिंसिपल से बात की। स्कूल में एक खाली पोस्ट थी।
नैना ने रिया का रिज़्यूमे दिया। कुछ दिनों बाद रिया को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।
और फिर… उसे नौकरी मिल गई। रिया ने सबसे पहले नैना को फोन किया। “नैना!”
नैना, “क्या हुआ?”
रिया, “मेरी नौकरी लग गई!”
नैना खुशी से चिल्ला पड़ी। “सच?”
रिया, “हाँ!”
नैना, “मैंने कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा।”
रिया, “लेकिन ये तेरी वजह से हुआ है।”
नैना, “नहीं। तेरी मेहनत की वजह से हुआ है।”
रिया, “फिर भी… अगर तू नहीं होती ना, तो शायद मैं हार जाती।”
नैना कुछ नहीं बोली। बस मुस्कुरा दी।
—
करीब दो साल बाद नैना की शादी तय हो गई।
शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। घर में हर तरफ खुशी का माहौल था। लेकिन नैना के मन में एक चिंता थी। “रिया आ पाएगी ना?”
उसने माँ से पूछा। उन्होंने कहा, “क्यों नहीं आएगी?”
नैना उदास होते हुए बोली, “उसकी नौकरी है।”
उसकी मां बोली, “तू उसे बुला लेना।”
“बुलाऊँगी नहीं… लेकर आऊँगी।”
शादी से तीन दिन पहले रिया सच में दिल्ली पहुँच गई। हाथ में बड़ा सा बैग और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान। नैना उसे देखते ही दौड़कर उससे गले लग गई। “तू आ गई!”
“हाँ मैडम, तेरी शादी है। कैसे नहीं आती?”
“मुझे लगा था तू नहीं आ पाएगी।”
“पागल है? तेरी शादी है। मेरी छुट्टी नहीं मिली तो नौकरी छोड़ देती।”
नैना ने उसकी तरफ देखा। “ऐसा मत बोलना।”
रिया हँसते हुए बोली, “चल अब रोना बंद कर। बहुत काम पड़ा है।”
और फिर दोनों उसी तरह शादी की तैयारियों में लग गईं जैसे पिछले कई सालों की दूरी के बीच कुछ हुआ ही न हो।
मेहंदी की रात दोनों छत पर बैठी थीं। नैना ने धीरे से पूछा,
“रिया?”
रिया, “हम्म?”
नैना, “तुझे कभी लगा कि हमारी दोस्ती खत्म हो जाएगी?”
रिया ने कुछ पल सोचा। “शुरू में लगा था।”
नैना उसकी तरफ देखते हुए बोली, “फिर?”
“फिर समझ आया कि सच्ची दोस्ती में रोज़ बात करना जरूरी नहीं होता।”
नैना उसकी तरफ देखने लगी।
रिया बोली, “कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें दूरी आ सकती है, लेकिन दिलों के बीच दूरी नहीं आती।”
नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तू बहुत अच्छी बातें करने लगी है।”
“हाँ, क्योंकि अब मैं बड़ी हो गई हूँ।”
“अच्छा?”
“हाँ।”
दोनों हँस पड़ीं।
—
शादी के बाद नैना अपनी नई जिंदगी में व्यस्त हो गई।
रिया भी अपनी नौकरी में। लेकिन उनकी दोस्ती वैसी ही रही, कभी फोन पर लड़ाई, कभी बिना वजह हँसी, कभी एक-दूसरे से शिकायत और कभी बस चुपचाप फोन पर बने रहना।
एक दिन नैना बहुत परेशान थी। उसने रिया को फोन नहीं किया। लेकिन कुछ देर बाद रिया का फोन आ गया।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“फिर झूठ क्यों बोल रही है?”
नैना चुप रही।
रिया ने कहा, “देख, अगर बात नहीं करनी तो मत कर। लेकिन अकेले मत रहना, मैं फोन पर हूँ।”
नैना की आँखों से आँसू निकल आए। उसे उस पल समझ आया कि जिंदगी में कितने भी लोग क्यों न आएँ, कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जो सिर्फ दोस्त नहीं रहते।
वे परिवार बन जाते हैं। उनके साथ खून का रिश्ता नहीं होता, फिर भी वे अपने लगते हैं। उनसे रोज़ मिलना जरूरी नहीं होता हर दिन बात करना जरूरी नहीं होता।
बस इतना पता होना काफी होता है कि अगर दुनिया तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए, तो एक इंसान ऐसा है जो तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा।
नैना ने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “रिया?”
“हाँ?”
“थैंक यू।”
“किसलिए?”
“मेरी दोस्त होने के लिए।”
रिया कुछ सेकंड चुप रही, फिर बोली, “पागल… दोस्ती में थैंक यू नहीं बोलते।”
नैना हँस पड़ी। “तो क्या बोलते हैं?”
“बस इतना कहते हैं…”
“क्या?”
“चल, चाय पीने चलते हैं।”
नैना खिलखिलाकर हँस दी।
दो शहरों में रहने वाली दो सहेलियाँ फिर से फोन पर चाय पीने का प्लान बनाने लगीं। क्योंकि कुछ दोस्तियाँ दूरी से नहीं टूटतीं।
बल्कि दूरी उन्हें और मजबूत कर देती है। क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं… साथ निभाने का नाम है।

मेरा नाम नेहा गोयल है।
और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।
मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।
वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।


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