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टैग: दोस्ती रोमांच

  • दोस्ती….

    दोस्ती….

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

     

    “तू सच में जा रही है?”

     

    नैना ने सामने खड़ी रिया को देखते हुए पूछा।

     

    रिया ने मुस्कुराकर अपना बैग कंधे पर डाला। “हाँ यार… जाना तो पड़ेगा।”

     

    “लेकिन तूने कहा था कि तू कहीं नहीं जाएगी।”

     

    “कहा था… पर जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से थोड़ी होता है।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। दोनों कुछ देर चुपचाप एक-दूसरे को देखती रहीं।

     

    पिछले आठ सालों से दोनों साथ थीं। स्कूल में एक ही बेंच पर बैठना, कॉलेज में साथ जाना, एक-दूसरे के घर बिना बताए जब दिल चाहे पहुँच जाना… सब कुछ जैसे रोज़ की बात थी।

     

    लेकिन आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि शायद उनकी दोस्ती में दूरी आने वाली है। रिया के पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया था। पूरा परिवार अगले हफ्ते दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने वाला था।

     

    “तू मुझे भूल तो नहीं जाएगी?” नैना ने अचानक पूछा।

     

    रिया हँस पड़ी। “पागल है क्या? दोस्ती कोई जगह बदलने से खत्म होती है?”

     

    “पता नहीं… लोग बदल जाते हैं।”

     

    रिया ने नैना का हाथ पकड़ लिया। “लोग बदल सकते हैं, लेकिन हमारी दोस्ती नहीं बदलेगी।”

     

    नैना ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें भर आईं। “पक्का?”

     

    “एकदम पक्का।”

     

    दोनों ने हाथ मिलाया। “बेस्ट फ्रेंड्स?”

     

    “forever।”

     

     

    अगले हफ्ते रिया चली गई, लेकिन रिया के जाने के बाद नैना का मन बिल्कुल नहीं लगा। पहले हर शाम रिया का फोन आ जाता था।

    “चल बाहर चलते हैं।”

     

    “चाय पीने चल।”

     

    “आज गोलगप्पे खाने हैं।”

     

    “चल मेरे घर, मम्मी ने पकौड़े बनाए हैं।”

     

    अब शाम को फोन नहीं आता था। नैना कई बार अपना फोन उठाकर रिया को कॉल करने का सोचती, फिर खुद ही रख देती। उसे लगता, शायद रिया नए शहर में व्यस्त होगी। एक दिन उसने रिया को फोन किया।

     

    “हेलो?” दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई। “नैना!”

     

    आवाज़ सुनते ही नैना के चेहरे पर मुस्कान आ गई। “कैसी है?”

     

    “ठीक हूँ। तू बता?”

     

    “मैं भी ठीक हूँ।”

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    नैना चौंक गई। “तुझे कैसे पता?”

     

    “तेरी आवाज़ से।”

     

    नैना हँस दी। “तू अभी भी मुझे पहचान लेती है?”

     

    “पागल, तू मेरी दोस्त है। तेरी आवाज़ भी पहचानूँगी और तेरी चुप्पी भी।”

     

    कुछ देर दोनों बातें करती रहीं। उस दिन नैना को समझ आया कि दोस्ती सिर्फ साथ बैठने का नाम नहीं है। दोस्ती वो है जहाँ दूर रहकर भी सामने वाले की आवाज़ से पता चल जाए कि उसके दिल में क्या चल रहा है।

     

     

    समय बीतता गया ,दोनों की पढ़ाई खत्म हुई। रिया ने नौकरी शुरू कर दी और नैना ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। अब दोनों की बातें पहले से कम हो गई थीं। कभी दो दिन बाद फोन होता, कभी हफ्ते भर बाद। लेकिन जब भी बात होती, ऐसा लगता जैसे कल ही तो मिले थे।

     

    एक रात नैना का फोन बजा। रिया का कॉल था। 

    “हेलो?”

     

    दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    “रिया?” 

     

    फिर धीमी आवाज़ सुनाई दी। “नैना… मुझे तुझसे बात करनी है।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरी नौकरी चली गई।”

     

    नैना कुछ सेकंड चुप रही। “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तो नौकरी चली गई। तू थोड़ी चली गई है।”

     

    रिया चुप रही।

     

    नैना ने कहा, “तू परेशान मत हो। दूसरी नौकरी मिल जाएगी।”

     

    “लेकिन यहाँ किराया, घर का खर्च… सब है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।” परेशान सी रिया ने कहा। 

     

    नैना, “तू मेरे पास आ जा।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    “हाँ। कुछ दिन मेरे साथ रह। नौकरी ढूँढ। जब तक काम नहीं मिलता, हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।”

     

    रिया की आवाज़ भर्रा गई। “तू सच बोल रही है?”

     

    “नहीं, मज़ाक कर रही हूँ। इतनी रात को तुझे बुलाकर चाय पिलाऊँगी।” नैना ने कहा। 

     

    दोनों हँस पड़ीं। लेकिन नैना जानती थी कि रिया सच में बहुत परेशान है। अगले ही दिन उसने अपने स्कूल की प्रिंसिपल से बात की। स्कूल में एक खाली पोस्ट थी।

     

    नैना ने रिया का रिज़्यूमे दिया। कुछ दिनों बाद रिया को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

    और फिर… उसे नौकरी मिल गई। रिया ने सबसे पहले नैना को फोन किया। “नैना!”

     

    नैना, “क्या हुआ?”

     

    रिया, “मेरी नौकरी लग गई!”

     

    नैना खुशी से चिल्ला पड़ी। “सच?”

     

    रिया, “हाँ!”

     

    नैना, “मैंने कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    रिया, “लेकिन ये तेरी वजह से हुआ है।”

     

    नैना, “नहीं। तेरी मेहनत की वजह से हुआ है।”

     

    रिया, “फिर भी… अगर तू नहीं होती ना, तो शायद मैं हार जाती।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। बस मुस्कुरा दी।

     

     

    करीब दो साल बाद नैना की शादी तय हो गई।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। घर में हर तरफ खुशी का माहौल था। लेकिन नैना के मन में एक चिंता थी। “रिया आ पाएगी ना?”

     

    उसने माँ से पूछा। उन्होंने कहा, “क्यों नहीं आएगी?”

     

    नैना उदास होते हुए बोली, “उसकी नौकरी है।”

     

    उसकी मां बोली, “तू उसे बुला लेना।”

     

    “बुलाऊँगी नहीं… लेकर आऊँगी।”

     

    शादी से तीन दिन पहले रिया सच में दिल्ली पहुँच गई। हाथ में बड़ा सा बैग और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान। नैना उसे देखते ही दौड़कर उससे गले लग गई। “तू आ गई!”

     

    “हाँ मैडम, तेरी शादी है। कैसे नहीं आती?”

     

    “मुझे लगा था तू नहीं आ पाएगी।”

     

    “पागल है? तेरी शादी है। मेरी छुट्टी नहीं मिली तो नौकरी छोड़ देती।”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा। “ऐसा मत बोलना।”

     

    रिया हँसते हुए बोली, “चल अब रोना बंद कर। बहुत काम पड़ा है।”

     

    और फिर दोनों उसी तरह शादी की तैयारियों में लग गईं जैसे पिछले कई सालों की दूरी के बीच कुछ हुआ ही न हो।

     

    मेहंदी की रात दोनों छत पर बैठी थीं। नैना ने धीरे से पूछा,

    “रिया?”

     

    रिया, “हम्म?”

     

    नैना, “तुझे कभी लगा कि हमारी दोस्ती खत्म हो जाएगी?”

     

    रिया ने कुछ पल सोचा। “शुरू में लगा था।”

     

    नैना उसकी तरफ देखते हुए बोली, “फिर?”

     

    “फिर समझ आया कि सच्ची दोस्ती में रोज़ बात करना जरूरी नहीं होता।”

     

    नैना उसकी तरफ देखने लगी।

     

    रिया बोली, “कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें दूरी आ सकती है, लेकिन दिलों के बीच दूरी नहीं आती।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तू बहुत अच्छी बातें करने लगी है।”

     

    “हाँ, क्योंकि अब मैं बड़ी हो गई हूँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    दोनों हँस पड़ीं।

     

     

    शादी के बाद नैना अपनी नई जिंदगी में व्यस्त हो गई।

     

    रिया भी अपनी नौकरी में। लेकिन उनकी दोस्ती वैसी ही रही, कभी फोन पर लड़ाई, कभी बिना वजह हँसी, कभी एक-दूसरे से शिकायत और कभी बस चुपचाप फोन पर बने रहना।

     

    एक दिन नैना बहुत परेशान थी। उसने रिया को फोन नहीं किया। लेकिन कुछ देर बाद रिया का फोन आ गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर झूठ क्यों बोल रही है?”

     

    नैना चुप रही।

     

    रिया ने कहा, “देख, अगर बात नहीं करनी तो मत कर। लेकिन अकेले मत रहना, मैं फोन पर हूँ।”

     

    नैना की आँखों से आँसू निकल आए। उसे उस पल समझ आया कि जिंदगी में कितने भी लोग क्यों न आएँ, कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जो सिर्फ दोस्त नहीं रहते।

     

    वे परिवार बन जाते हैं। उनके साथ खून का रिश्ता नहीं होता, फिर भी वे अपने लगते हैं। उनसे रोज़ मिलना जरूरी नहीं होता हर दिन बात करना जरूरी नहीं होता।

     

    बस इतना पता होना काफी होता है कि अगर दुनिया तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए, तो एक इंसान ऐसा है जो तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा।

     

    नैना ने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “रिया?”

     

    “हाँ?”

     

    “थैंक यू।”

     

    “किसलिए?”

     

    “मेरी दोस्त होने के लिए।”

     

    रिया कुछ सेकंड चुप रही, फिर बोली, “पागल… दोस्ती में थैंक यू नहीं बोलते।”

     

    नैना हँस पड़ी। “तो क्या बोलते हैं?”

     

    “बस इतना कहते हैं…”

     

    “क्या?”

     

    “चल, चाय पीने चलते हैं।”

     

    नैना खिलखिलाकर हँस दी।

     

    दो शहरों में रहने वाली दो सहेलियाँ फिर से फोन पर चाय पीने का प्लान बनाने लगीं। क्योंकि कुछ दोस्तियाँ दूरी से नहीं टूटतीं।

     

    बल्कि दूरी उन्हें और मजबूत कर देती है। क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं… साथ निभाने का नाम है।

  • गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    Rohan और Ananya का रिश्ता ठीक वैसा ही था जैसे गरम चाय में थोड़ी सी अदरक—तीखा भी, स्वादिष्ट भी।

     

    रविवार की सुबह थी। Rohan अभी भी बिस्तर पर लेटा था। Ananya रसोई से चिल्लाई, “ओय सोने वाले राजा! उठो वरना परांठे खुद उठकर चल जाएँगे!”

     

    Rohan ने आँखें मलते हुए जवाब दिया, “तुम्हारे परांठे इतने भारी होते हैं ना… उठ ही नहीं पाते।”

     

    “क्या कहा तुमने?” Ananya चम्मच लेकर कमरे में घुस आई।

     

    Rohan मुस्कुराते हुए बोला, “मैंने कहा… तुम्हारे परांठे इतने स्वादिष्ट होते हैं कि लोग उठाकर ले जाते हैं।”

     

    Ananya ने चम्मच हवा में लहराया, “झूठ बोलना भी सीख लो थोड़ा। कल रात को कहा था ना कि मेरा बनाया खाना दुनिया का सबसे बेस्ट है… आज भारी कह रहे हो?”

     

    “कल रात मैं भूखा था। भूखा आदमी कुछ भी बोल देता है,” Rohan ने तकिया से मुँह छुपा लिया।

     

    Ananya ने तकिया छीन लिया। “अच्छा! तो अब सच्चाई बताओ—मेरा खाना कैसा है?”

     

    Rohan ने नाटकीय अंदाज में कहा, “इतना अच्छा कि मैं रोज-रोज मारने के बाद भी जिंदा हूँ।”

     

    दोनों हँस पड़े। लेकिन हँसी ज्यादा देर नहीं टिकी।

     

    थोड़ी देर बाद Ananya ने कहा, “आज शाम को मेरे कॉलेज वाले दोस्त आ रहे हैं। तुम भी रहना।”

     

    Rohan का चेहरा लटक गया। “फिर से? पिछले हफ्ते भी आए थे। और वो तेरा एक्स… नहीं आएगा ना?”

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “कितनी बार कहा है—वो सिर्फ दोस्त है अब। और तुम हर बार क्यों जलते हो?”

     

    “जलता नहीं… सिर्फ परेशान होता हूँ। वो तुम्हें ‘अनु’ कहकर बुलाता है। अनु! मेरा हक है वो।”

     

    “ओहो! अब नाम पर भी कब्जा?” Ananya हँसी। “तुम ना… बहुत छोटे हो जाते हो कभी-कभी।”

     

    Rohan उठकर खड़ा हो गया। “छोटे? मैंने तुम्हारे लिए वो महँगा परफ्यूम लिया, तुम्हारे पसंदीदा शो के लिए रात-रात भर जगा… और तुम मुझे छोटा कह रही हो?”

     

    Ananya पास आकर बोली, “हाँ बोल रही हूँ। क्योंकि जब तुम जलते हो तो बहुत क्यूट लगते हो।”

     

    Rohan ने नाटक करते हुए मुँह फुला लिया। “मैं क्यूट नहीं, मैं हैंडसम हूँ।”

     

    “हैंडसम हो… लेकिन जब नाराज होते हो तो बच्चों जैसे लगते हो,” Ananya ने उसकी गाल Pinch की।

     

    Rohan ने उसका हाथ पकड़ लिया। “एक काम करो। आज शाम को तुम मेरे दोस्तों के साथ आओ। फिर देखना मैं कितना जलता हूँ।”

     

    Ananya हँस पड़ी। “नहीं जाना। तुम्हारे दोस्त सिर्फ क्रिकेट और ऑफीस की बात करते हैं। बोर हो जाऊँगी।”

     

    “और तुम्हारे दोस्त सिर्फ पुरानी यादें और ‘याद है ना जब…’ करते हैं। मैं बोर हो जाता हूँ।”

     

    दोनों आमने-सामने खड़े थे। एक पल को लगता था जैसे लड़ाई होने वाली है। लेकिन दोनों की आँखों में हँसी थी।

     

    Ananya ने अचानक कहा, “ठीक है। आज न तो मेरे दोस्त, न तुम्हारे। आज सिर्फ हम दोनों। फिल्म? या लॉन्ग ड्राइव?”

     

    Rohan ने सोचा। “लॉन्ग ड्राइव। लेकिन कंडीशन है—तू गाड़ी नहीं चलाएगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पिछली बार तूने इतना जोर से ब्रेक मारा था कि मेरा दिल मुँह में आ गया था।”

     

    Ananya ने हाथ कमर पर रखे। “क्योंकि तुमने अचानक कहा था ‘आई लव यू’। झटका तो लगेगा ना!”

     

    Rohan शांत पड़ गया। फिर धीरे से बोला, “तो अब झटका नहीं लगता क्या?”

     

    Ananya ने उसकी ओर देखा। गुस्सा, नोक-झोंक, जलन… सब एक पल में गायब। वह पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लगता है… हर रोज। लेकिन अब मैं आदी हो गई हूँ।”

     

    Rohan मुस्कुराया। “तो फिर आज की नोक-झोंक का फैसला क्या?”

     

    Ananya ने उसकी तरफ एक परांठा थमाते हुए कहा, “फैसला यह कि तू पहले यह खा। वरना मैं नाराज हो जाऊँगी।”

     

    Rohan ने बड़ा सा निवाला लिया और बोला, “नाराज मत होना। तुम्हारी नाराजगी भी मीठी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो खट्टी पड़ जाती है।”

     

    Ananya हँसते हुए बोली, “और तुम्हारी जलन भी प्यारी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो मैं तुम्हें चुप कराने के लिए किस कर देती हूँ।”

     

    Rohan ने तुरंत मुँह बंद कर लिया।  

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “क्या हुआ?”

     

    “चुप हूँ। किस का इंतजार है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    यही उनकी कहानी थी।  

    नोक-झोंक में भी प्यार,  

    जलन में भी अपनापन,  

    और हर खट्टी बात के बाद एक मीठी मुस्कान।

     

    क्योंकि असली प्यार वही होता है  

    जहाँ लड़ाई भी हँसी में खत्म हो जाए,  

    और नाराजगी भी गले मिलने का बहाना बन जाए।

  • मोहन और झूमर की अनोखी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों से घिरे एक सुंदर से गाँव में मोहन नाम का एक छोटा-सा लड़का रहता था। मोहन बहुत ही चंचल, दयालु और हँसमुख था। पूरे गाँव में उसकी शरारतों और मददगार स्वभाव की चर्चा होती थी। वह हर किसी से प्यार से बात करता और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता।

    लेकिन मोहन के मन में एक छोटी-सी इच्छा हमेशा रहती थी। वह चाहता था कि उसका कोई ऐसा दोस्त हो, जो हर समय उसके साथ रहे। गाँव के बच्चे स्कूल चले जाते थे और कई बार अपने कामों में व्यस्त हो जाते थे। ऐसे में मोहन अकेला महसूस करता।

    एक दिन सुबह-सुबह वह खेतों की ओर घूमने निकला। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही थीं।

    अचानक उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे किसी हलचल पर पड़ी।

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

    उसने देखा कि एक छोटा-सा हिरण काँपता हुआ खड़ा था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

    मोहन ने धीरे से कहा,

    “डरो मत… मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    हिरण कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके पास आ गया।

    मोहन ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

    “आज से तुम मेरे दोस्त हो। मैं तुम्हारा नाम झूमर रखता हूँ, क्योंकि तुम चलते नहीं, झूमते हुए दौड़ते हो।”

    जैसे ही उसने यह कहा, हिरण खुशी से उछल पड़ा।

    उस दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।

    अब हर सुबह मोहन जंगल जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता।

    दोनों मिलकर पेड़ों के बीच दौड़ लगाते।

    कभी नदी किनारे बैठते।

    कभी तितलियों के पीछे भागते।

    कभी पेड़ों से गिरे मीठे फलों का स्वाद लेते।

    जब भी मोहन उदास होता, झूमर उसके पास आकर अपना सिर उसके कंधे से सटा देता।

    मोहन मुस्कुरा उठता।

    धीरे-धीरे पूरे गाँव को दोनों की दोस्ती के बारे में पता चल गया।

    लोग कहते,

    “ऐसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है।”

    कुछ ही दिनों बाद गाँव में साल का सबसे बड़ा मेला लगने वाला था।

    गाँव के बच्चे कई दिनों से उसकी तैयारी कर रहे थे।

    मोहन ने झूमर से कहा,

    “चलो, इस बार तुम्हें भी मेला दिखाता हूँ।”

    झूमर खुशी से उछल पड़ा।

    मेले वाले दिन पूरा गाँव रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था।

    चारों ओर मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।

    बच्चे झूलों पर झूल रहे थे।

    कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई कठपुतली का खेल दिखा रहा था।

    मोहन और झूमर भी मेले में घूमने लगे।

    दोनों ने गुड़ की रेवड़ी खाई।

    रंग-बिरंगे गुब्बारे देखे।

    झूलों को देखकर झूमर खुशी से उछलने लगा।

    तभी अचानक मेले में अफरा-तफरी मच गई।

    एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा।

    उसकी नज़र जैसे ही झूमर पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।

    वह धीरे-धीरे झूमर की ओर बढ़ने लगा।

    मोहन ने यह देख लिया।

    वह तुरंत झूमर के सामने खड़ा हो गया।

    “रुक जाओ!”

    शिकारी हँसते हुए बोला,

    “हटो बच्चे, यह हिरण अब मेरा है।”

    मोहन ने साहस से कहा,

    “यह कोई सामान नहीं है। यह मेरा दोस्त है।”

    लेकिन शिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

    उसने जाल निकाल लिया।

    झूमर डरकर पीछे हटने लगा।

    मोहन जल्दी से सोचने लगा कि क्या किया जाए।

    तभी उसकी नज़र पास में बँधी एक बकरी पर पड़ी।

    उसके दिमाग में एक योजना आई।

    उसने झूमर से धीरे से कहा,

    “तुम अभी जंगल की तरफ भागो। मैं सब संभाल लूँगा।”

    झूमर तुरंत दौड़ पड़ा।

    उधर मोहन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,

    “अरे… बकरी भाग रही है!”

    शिकारी का ध्यान बकरी की ओर चला गया।

    वह उसी के पीछे दौड़ पड़ा।

    इसी बीच मोहन ने गाँव के चौकीदार और पुलिस को सूचना दे दी।

    कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच गई।

    उन्होंने शिकारी को पकड़ लिया।

    शिकारी भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह बच नहीं पाया।

    गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली।

    झूमर धीरे-धीरे जंगल से वापस आया।

    जैसे ही उसने मोहन को सुरक्षित देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और अपना सिर उसके सीने से लगा दिया।

    मोहन ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

    गाँव के मुखिया ने दोनों की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की।

    उन्होंने कहा,

    “आज मोहन ने साबित कर दिया कि सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने दोस्त की रक्षा के लिए हर मुश्किल का सामना करे।”

    उस दिन मेले में सभी बच्चों ने मोहन के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने जंगल के जानवरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया।

    उन्होंने जंगल के बाहर चेतावनी वाले बोर्ड लगाए।

    वन विभाग की मदद से जानवरों की सुरक्षा के लिए गश्त भी बढ़ाई गई।

    मोहन भी इस अभियान का हिस्सा बन गया।

    अब वह गाँव के बच्चों को जानवरों से प्यार करना और उनकी रक्षा करना सिखाने लगा।

    झूमर भी अक्सर दूर खड़ा होकर उसे देखता और जैसे मुस्कुराता हुआ दिखाई देता।

    समय बीतता गया, लेकिन दोनों की दोस्ती पहले से भी ज़्यादा गहरी होती गई।

    हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मोहन जंगल पहुँच जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता मिलता।

    दोनों फिर उसी तरह दौड़ते, खेलते और हँसते।

    उनकी दोस्ती पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गई।

    लोग अपने बच्चों से कहते,

    “अगर दोस्ती निभानी है, तो मोहन और झूमर जैसी निभाओ।”

    मोहन ने समझ लिया था कि दोस्ती केवल साथ खेलने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है।

    झूमर ने भी अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती।

    इंसान और जानवर भी सच्चे दोस्त बन सकते हैं, अगर उनके दिल में प्यार और अपनापन हो।

    उस दिन से गाँव के लोग हर साल मेले के दिन “मित्रता दिवस” मनाने लगे, ताकि सभी बच्चों को सच्ची दोस्ती का महत्व याद रहे।

    और जब भी कोई बच्चा जंगल की ओर जाता, उसे अक्सर एक प्यारा-सा हिरण और उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन साथ-साथ खेलते हुए दिखाई देते हैं।

     

  • नन्हा चाँद चमकीला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    बहुत समय पहले की बात है। नीले, अनंत आकाश में एक छोटा-सा, प्यारा-सा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। वह बाकी चाँदों से थोड़ा अलग था। जहाँ दूसरे चाँद अपनी रोशनी फैलाकर शांत रहते थे, वहीं चमकीला बहुत चंचल और जिज्ञासु था। उसे नई-नई बातें जानना, नए दोस्त बनाना और दूर-दूर तक झाँकना बहुत पसंद था।

     

    हर रात वह अपने सबसे अच्छे दोस्तों—छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों और मुलायम सफेद बादलों—के साथ खेलता था। कभी वे लुका-छिपी खेलते, कभी तारों की गिनती करते, तो कभी नीचे धरती पर रहने वाले लोगों को देखकर उनके बारे में बातें करते।

     

    एक रात चमकीला धरती की ओर देख रहा था। उसने देखा कि एक गाँव में बहुत सारे बच्चे चाँदनी रात में खेल रहे थे। कोई कबड्डी खेल रहा था, कोई रस्सी कूद रहा था, तो कोई दादी से कहानी सुन रहा था। बच्चों की हँसी पूरे वातावरण में गूँज रही थी।

     

    चमकीला उन्हें बड़े ध्यान से देखता रहा। उसके मन में एक इच्छा जागी।

     

    “काश… मैं भी उनके साथ खेल पाता!”

     

    उस रात वह यही सोचते-सोचते सो गया।

     

    सपने में उसने देखा कि वह धरती पर उतर गया है। बच्चे उसे देखकर खुशी से चिल्ला रहे हैं।

     

    “देखो… चाँद हमारे पास आ गया!”

     

    सभी बच्चे उसका हाथ पकड़कर उसे अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। कोई उसे पतंग उड़ाना सिखाता है, कोई पेड़ पर लगे झूले पर बैठाता है, तो कोई उसे आम खिलाता है।

     

    सपना इतना सुंदर था कि सुबह होने तक भी चमकीला उसी के बारे में सोचता रहा।

     

    अगली रात उसने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “तारों… बादलों… मुझे तुम सबसे एक ज़रूरी बात कहनी है।”

     

    सब उसके पास आ गए।

     

    एक तारे ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या बात है? आज तुम बहुत गंभीर लग रहे हो।”

     

    चमकीला बोला, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं बच्चों से मिलना चाहता हूँ। उनके साथ खेलना चाहता हूँ।”

     

    सभी तारे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक छोटा तारा बोला, “लेकिन तुम तो चाँद हो। अगर तुम धरती पर चले गए, तो रात का क्या होगा?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “मैं थोड़ी देर के लिए जाऊँगा और सूरज निकलने से पहले वापस आ जाऊँगा।”

     

    तभी एक बड़ा-सा सफेद बादल आगे आया।

     

    “अगर तुम्हारी इच्छा सच्ची है, तो मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”

     

    चमकीला खुशी से उछल पड़ा।

     

    “सच? तुम मेरी मदद करोगे?”

     

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “सूरज निकलने से पहले तुम्हें वापस लौटना होगा।”

     

    चमकीला तुरंत मान गया।

     

    उस रात जैसे ही पूरा आकाश शांत हुआ, बादल ने अपने नरम-नरम पंख फैलाए और चमकीला को प्यार से अपने ऊपर बैठा लिया।

     

    धीरे-धीरे दोनों धरती की ओर उतरने लगे।

     

    रास्ते में उन्होंने उड़ते हुए पक्षियों को देखा। दूर-दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दिए। चमकती नदियाँ चाँदी की तरह बह रही थीं। खेतों में हवा लहरें बना रही थी।

     

    चमकीला पहली बार धरती को इतने करीब से देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।

     

    कुछ ही देर में वे एक छोटे-से गाँव के पास उतर गए।

     

    गाँव के बच्चे अभी भी खेल रहे थे।

     

    जैसे ही उन्होंने चमकीला को देखा, वे हैरान रह गए।

     

    एक बच्चा बोला, “अरे… ये तो चाँद है!”

     

    दूसरा बोला, “क्या सचमुच चाँद हमारे गाँव आया है?”

     

    सभी बच्चे उसके चारों ओर इकट्ठा हो गए।

     

    चमकीला मुस्कुराकर बोला,

     

    “हाँ… मैं तुम्हारा दोस्त बनने आया हूँ। क्या तुम मेरे साथ खेलोगे?”

     

    “हाँ…!”

     

    सभी बच्चे एक साथ चिल्लाए।

     

    फिर शुरू हुआ खेलों का मजेदार सिलसिला।

     

    किसी ने उसे पकड़म-पकड़ाई खिलाई।

     

    किसी ने आँख-मिचौली सिखाई।

     

    किसी ने उसे मिट्टी से खिलौने बनाना सिखाया।

     

    एक छोटी-सी बच्ची अपना रंग-बिरंगा गुब्बारा लेकर आई और बोली,

     

    “ये तुम्हारे लिए।”

     

    चमकीला ने पहली बार कोई उपहार पाया था।

     

    उसने गुब्बारे को बहुत प्यार से पकड़ लिया।

     

    थोड़ी देर बाद बच्चों ने उसे आम का मीठा रस चखाया।

     

    “वाह!” चमकीला बोला।

     

    “इतना स्वादिष्ट फल मैंने कभी नहीं खाया।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    फिर वे नदी किनारे गए।

     

    चमकीला ने पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं तो पानी में और भी सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद गाँव की दादी माँ वहाँ आईं।

     

    उन्होंने चमकीला को देखकर हाथ जोड़ लिए।

     

    “बेटा, तुम सचमुच चाँद हो?”

     

    चमकीला ने विनम्रता से सिर हिलाया।

     

    दादी माँ बोलीं,

     

    “आज हमारे गाँव का सौभाग्य है कि तुम हमारे बीच आए।”

     

    उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ और रोटी खिलाई।

     

    चमकीला ने भी पहली बार गुड़ का स्वाद चखा।

     

    उसे वह बहुत मीठा लगा।

     

    समय कैसे बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    तभी बादल धीरे से उसके पास आया।

     

    “चमकीला…”

     

    “हाँ?”

     

    “देखो… पूरब की ओर हल्की रोशनी फैलने लगी है। सूरज निकलने वाला है।”

     

    चमकीला का चेहरा उदास हो गया।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    बच्चों ने भी आसमान की ओर देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि अब विदा का समय आ गया है।

     

    एक छोटा बच्चा रोते हुए बोला,

     

    “मत जाओ ना…”

     

    एक बच्ची ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या तुम फिर कभी आओगे?”

     

    चमकीला ने प्यार से सबकी ओर देखा।

     

    “मैं हर रात तुमसे मिलने आऊँगा। भले ही धरती पर न उतर सकूँ, लेकिन आसमान से तुम्हें देखूँगा। जब भी तुम मुस्कुराओगे, मैं और ज़्यादा चमकूँगा।”

     

    बच्चों की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने हाथ हिलाकर उसे विदा किया।

     

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने मुलायम पंखों पर बैठाया और धीरे-धीरे आसमान की ओर उड़ चला।

     

    कुछ ही देर में चमकीला फिर अपने स्थान पर पहुँच गया।

     

    तारे खुशी से उसके चारों ओर आ गए।

     

    “बताओ… धरती कैसी लगी?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “धरती बहुत सुंदर है। लेकिन सबसे सुंदर वहाँ रहने वाले बच्चों के दिल हैं। उनके पास महल नहीं थे, फिर भी वे खुश थे। उनके खिलौने महँगे नहीं थे, फिर भी वे सबसे अमीर थे… क्योंकि उनके पास प्यार था, दोस्ती थी और सच्ची मुस्कान थी।”

     

    तारे उसकी बातें सुनकर मुस्कुराने लगे।

     

    उस दिन के बाद चमकीला हर रात पहले से ज़्यादा चमकने लगा।

     

    धरती के बच्चे भी हर रात सोने से पहले खिड़की से आसमान की ओर देखते।

     

    उन्हें लगता जैसे चमकीला उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा हो।

     

    और सच भी यही था।

     

    जब भी कोई बच्चा उदास होता, चमकीला अपनी रोशनी थोड़ी और बढ़ा देता, ताकि उसे लगे कि उसका दोस्त हमेशा उसके साथ है।

     

    धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह बात फैल गई कि चाँद बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त है। हर बच्चा रात को उसे देखकर मुस्कुराता और अपने सपने उससे साझा करता।

     

    चमकीला भी मन ही मन हर बच्चे की खुशी की दुआ करता।

     

    “शिक्षा”

     

    हमें हमेशा बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। सच्ची दोस्ती, प्यार और खुशियाँ किसी जगह की मोहताज नहीं होतीं। जब हमारा दिल साफ़ होता है, तो पूरी दुनिया हमारे लिए अपने दरवाज़े खोल देती है।

  • आखिरी मुलाकात का वादा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    वर्ष 1998 की एक ठंडी दिसंबर की शाम थी। लखनऊ के पुराने मोहल्ले में, नीम के पेड़ के नीचे बैठे दो दोस्त चुपचाप आसमान देख रहे थे। एक था अरुण, बाईस साल का, पतला-दुबला, आँखों में सपनों की चमक। दूसरा था विकास, उसी उम्र का, थोड़ा मोटा, लेकिन दिल का इतना बड़ा कि दुनिया समा जाए। दोनों बचपन से साथ थे—स्कूल, कॉलेज, गली के खेल, बारिश में भीगना, सब कुछ साझा।

     

    उस शाम विकास ने कहा, “अरुण, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। नौकरी मिल गई है। पता नहीं कब लौटूँ।”

     

    अरुण की आँखें गीली हो गईं। उसने कहा, “फिर हम कभी नहीं मिलेंगे?”

     

    विकास ने उसकी कंधे पर हाथ रखा, “मिलेंगे। वादा है। चाहे कितने भी साल बीत जाएँ, एक दिन हम यहीं, इसी नीम के नीचे मिलेंगे। आखिरी मुलाकात का वादा। अगर मैं नहीं आया, तो तू आ जाना। और अगर तू नहीं आया, तो मैं।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और मुस्कुरा दिए। उस वादे को उन्होंने बहुत हल्के में लिया था, जैसे बच्चे कोई खेल खेल रहे हों। लेकिन समय ने उसे भारी बना दिया।

     

    विकास दिल्ली चला गया। अरुण लखनऊ में ही रह गया। पहले तो पत्र आते रहे, फिर फोन के जमाने में कभी-कभार बात होती। फिर दोनों की शादी हो गई। विकास की एक बेटी हुई, अरुण का एक बेटा। जिंदगी ने दोनों को अपने कामों में उलझा लिया। साल बीतते गए। 2005, 2010, 2015… वादे की बात धीरे-धीरे यादों के कोने में सिमटती चली गई।

     

    फिर 2020 आया। कोरोना की लहर। दुनिया थम गई। अरुण ने विकास को फोन किया। आवाज कमजोर थी।

     

    “यार, याद है हमारा वादा?” अरुण ने पूछा।

     

    विकास हँसा, “कौन सा? नीम वाले?”

     

    “हाँ। अब कब मिलेंगे?”

     

    “जल्दी। जैसे ही ये सब खत्म हो।”

     

    लेकिन खत्म होने में समय लगा। फिर विकास का ट्रांसफर बेंगलुरु हो गया। अरुण की माँ बीमार पड़ गईं। दोनों फिर बिछड़ गए।

     

    वर्ष 2024। अरुण अब अड़तालीस का हो चुका था। बाल सफेद होने लगे थे। उसकी पत्नी रेखा ने एक दिन कहा, “तुम हमेशा विकास की बात करते हो। मिल क्यों नहीं लेते?”

     

    अरुण चुप रहा। वह जानता था कि विकास की जिंदगी बदल चुकी है। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था कैंसर से। बेटी अमेरिका में पढ़ रही थी। विकास अकेला रह गया था।

     

    एक दिन अरुण को विकास का मैसेज आया—  

    “अरुण, याद है हमारा वादा? नीम के नीचे। इस साल 15 दिसंबर को। आखिरी मुलाकात। मैं आऊँगा।”

     

    अरुण का दिल जोर से धड़का। उसने तुरंत जवाब दिया—  

    “मैं भी आऊँगा। वादा निभाऊँगा।”

     

    15 दिसंबर की सुबह अरुण ने ट्रेन पकड़ी। लखनऊ स्टेशन पर भीड़ थी, लेकिन उसका मन शांत था। उसने वही पुरानी गली याद की, जहाँ दोनों बच्चे दौड़ते थे। नीम का पेड़ अब भी वहाँ था—बड़ा, घना, जैसे समय को चुनौती दे रहा हो।

     

    शाम के पाँच बजे अरुण नीम के नीचे पहुँचा। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। उसने बेंच पर बैठकर इंतजार किया।

     

    छह बजे हो गए। सात। अरुण की साँसें तेज हो गईं। क्या विकास नहीं आएगा? क्या वादा टूट जाएगा?

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—  

    “देर हो गई यार।”

     

    अरुण मुड़ा। विकास खड़ा था। बाल पूरी तरह सफेद, चेहरा दुबला, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर गले मिल गए। सालों का सन्नाटा टूट गया।

     

    “कितना बदल गया तू,” अरुण ने कहा।

     

    “तू भी,” विकास मुस्कुराया। “लेकिन नीम वही है।”

     

    दोनों बेंच पर बैठ गए। बातें होने लगीं—पुराने दिनों की, स्कूल के मजाक की, कॉलेज की रातों की, पहली नौकरी की। फिर धीरे-धीरे बातें मौन में बदल गईं। दोनों चुपचाप आसमान देख रहे थे, जैसे 1998 में देखा था।

     

    विकास ने कहा, “अरुण, मुझे कुछ बताना है।”

     

    “क्या?”

     

    “मुझे कैंसर है। अंतिम स्टेज। डॉक्टर कहते हैं, तीन-चार महीने।”

     

    अरुण की दुनिया थम गई। उसने विकास की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर शांति।

     

    “इसलिए तू आया?” अरुण की आवाज काँप गई।

     

    “हाँ। वादा निभाना था। आखिरी मुलाकात का। मैं नहीं चाहता था कि तू अकेला बैठे और इंतजार करे।”

     

    अरुण रो पड़ा। उसने विकास का हाथ पकड़ लिया। “तू मुझे क्यों नहीं बताया पहले?”

     

    “क्या फर्क पड़ता? जिंदगी तो वैसे भी चल रही थी। लेकिन ये वादा… ये अधूरा नहीं रहना चाहिए था।”

     

    रात गहराने लगी। दोनों ने पुरानी बातें दोहराईं। विकास ने अपनी बेटी की तस्वीर दिखाई। अरुण ने अपने बेटे की। दोनों ने हँसी, रोए, चुप रहे।

     

    विकास ने कहा, “अगर मैं चला गया, तो तू हर साल 15 दिसंबर को यहाँ आना। नीम के नीचे बैठना। और याद करना कि एक बार हमने वादा किया था।”

     

    अरुण ने सिर हिलाया। “मैं आऊँगा। हमेशा।”

     

    रात के ग्यारह बजे विकास उठा। “अब जाना होगा। ट्रेन है।”

     

    अरुण उसके साथ स्टेशन तक गया। प्लेटफॉर्म पर दोनों फिर गले मिले।

     

    “अलविदा नहीं,” विकास ने कहा। “बस… अगली मुलाकात तक।”

     

    “अगली मुलाकात तक,” अरुण ने दोहराया।

     

    ट्रेन चल दी। अरुण प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा जब तक ट्रेन की रोशनी गायब नहीं हो गई।

     

    तीन महीने बाद, मार्च 2025 में, अरुण को फोन आया। विकास की बेटी की आवाज थी। “पापा चले गए… पिछले हफ्ते।”

     

    अरुण चुप रहा। आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने फोन रखा और सीधे उस गली में पहुँच गया। नीम के नीचे बैठ गया। ठंडी हवा चल रही थी। पत्तियाँ हिल रही थीं।

     

    उसने फुसफुसाया, “वादा निभ गया यार। तू आया। मैं भी आया।”

     

    उस दिन के बाद अरुण हर साल 15 दिसंबर को वहाँ आता। कभी अकेला, कभी पत्नी के साथ, कभी बेटे के साथ। वह बैठता, पुरानी बातें याद करता, और मुस्कुराता।

     

    एक साल, 2028 में, जब अरुण वहाँ बैठा था, तो एक युवती आई। विकास की बेटी। उसने कहा, “पापा ने कहा था कि अगर मैं कभी लखनऊ आऊँ, तो नीम के नीचे जरूर बैठूँ। और अंकल से मिलूँ।”

     

    दोनों ने बात की। अरुण ने उसे बचपन की कहानियाँ सुनाईं। युवती ने कहा, “पापा हमेशा कहते थे कि जिंदगी के सबसे बड़े वादे छोटे लगते हैं, लेकिन वही सबसे भारी होते हैं।”

     

    अरुण ने सिर हिलाया। “सही कहा उन्होंने।”

     

    समय बीतता गया। अरुण बूढ़ा होता गया। उसके बाल और सफेद हो गए। शरीर कमजोर। लेकिन 15 दिसंबर का दिन वह कभी नहीं चूकता था।

     

    वर्ष 2035। अरुण अब उनसठ का था। स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। डॉक्टर ने कहा था कि दिल कमजोर है। उस साल 15 दिसंबर को वह फिर नीम के नीचे पहुँचा। अकेला। बेंच पर बैठ गया। आँखें बंद कीं।

     

    हवा में जैसे कोई आवाज आई—  

    “देर हो गई यार।”

     

    अरुण की आँखें खुल गईं। सामने कोई नहीं था। लेकिन उसे लगा जैसे विकास वहीं बैठा हो।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं यार। इस बार मैं समय पर आ गया हूँ।”

     

    फिर वह लेट गया बेंच पर। आँखें बंद कीं। साँसें धीमी पड़ती गईं। नीम की पत्तियाँ हिलती रहीं। ठंडी हवा चलती रही।

     

    अगली सुबह जब लोग आए, तो अरुण वहीं सोया मिला। चेहरे पर शांति थी, जैसे कोई पुराना वादा पूरा करके सुस्ता रहा हो।

     

    लोगों ने कहा, “शायद दिल का दौरा पड़ा।”

     

    लेकिन अरुण की पत्नी ने समझ लिया। उसने नीम के पेड़ को छुआ और फुसफुसाई, “वादा निभ गया। दोनों की आखिरी मुलाकात… हमेशा के लिए।”

     

    उसके बाद भी हर साल 15 दिसंबर को लोग देखते कि नीम के नीचे कोई न कोई बैठता—कभी अरुण का बेटा, कभी विकास की बेटी, कभी उनके बच्चे। कोई कहता, “ये पेड़ वादा याद रखता है।”

     

    और सच में, जब भी ठंडी हवा चलती और पत्तियाँ हिलतीं, लगता जैसे दो पुराने दोस्त अभी भी वहीं बैठे हों—हँस रहे हों, बात कर रहे हों, और एक अधूरा वादा बार-बार पूरा कर रहे हों।

     

    क्योंकि कुछ वादे समय से बड़े होते हैं।  

    कुछ मुलाकातें मौत से आगे भी चलती रहती हैं।  

    और कुछ नीम के पेड़… हमेशा खड़े रहते हैं, गवाह बनकर।

     

  • दीवार के पार की आवाज़

    दीवार के पार की आवाज़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कमरा छोटा था। दीवारें पतली। दिल्ली के उस पुराने मकान में किराए के कमरे एक-दूसरे से सटे हुए थे। अमन पिछले छह महीने से यहाँ रह रहा था। ऑफिस से थककर लौटता, रोशनी जलाता, खाना बनाता और फिर चुपचाप बिस्तर पर लेट जाता। शहर की आवाजें खिड़की से आती रहतीं हॉर्न, कुत्तों का भौंकना, कभी-कभी दूर कोई गाना। लेकिन सबसे ज्यादा साफ सुनाई देती थी दीवार के पार की आवाज़।

     

    पहली बार उसने उस आवाज़ को रात के बारह बजे सुना। कोई धीरे-धीरे गुनगुना रहा था। स्वर महिलाओं का था मधुर, थोड़ा उदास। अमन ने कान दीवार पर लगाए। गाना अधूरा था, जैसे याद आ-आकर रुक रहा हो। अगली रात फिर वही आवाज़। इस बार कोई किताब के पन्ने पलटने की आहट भी थी।

     

    अमन अकेला था। माता-पिता छोटे शहर में थे। दोस्त व्यस्त। प्रेमिका पिछले साल छोड़ गई थी। दीवार के पार की आवाज़ धीरे-धीरे उसकी रातों का हिस्सा बन गई। कभी हल्की खांसी, कभी पानी के गिलास रखने की आवाज़, कभी देर रात तक टाइपिंग की टिक-टिक। अमन ने अनुमान लगाया पड़ोस में कोई लड़की रहती है। शायद उसकी उम्र भी करीब-करीब वही।

     

    एक रात अमन ने हिम्मत की। दीवार के पास जाकर धीरे से कहा, “आप रात को गाना गाती हैं न?”  

     

    चुप्पी पसरी रही। फिर धीमी आवाज़ आई, “आपने सुन लिया?”  

     

    अमन मुस्कुराया। “सुनाई देता है। आवाज़ अच्छी है।”  

     

    “मैं सो नहीं पाती,” लड़की ने कहा। “गाना गा लेती हूँ तो नींद आ जाती है।”  

     

    “मेरा नाम अमन है।”  

     

    “मेरा… मीरा।”  

     

    उस रात बात थोड़ी देर चली। मीरा ने बताया कि वह फ्रीलांस राइटर है। दिन में सोती है, रात में लिखती है। अमन ने अपना ऑफिस वाला जीवन बताया कोडिंग, मीटिंग्स, और घर लौटकर खालीपन। दीवार के आर-पार दो आवाजें मिल गईं।

     

    अगले दिनों बातचीत बढ़ती गई। कभी मीरा कोई कविता सुनाती, कभी अमन अपनी ऑफिस की मजेदार घटनाएँ बताता। दोनों ने एक-दूसरे का चेहरा नहीं देखा था। दरवाजे अलग थे, गलियाँ अलग। बस एक पतली दीवार। कभी-कभी अमन दीवार पर हाथ रख देता और महसूस करता कि उस पार भी कोई हाथ रखे बैठा है।

     

    एक रात मीरा की आवाज़ भारी थी। “आज लिख नहीं पा रही। यादें बहुत आ रही हैं।”  

     

    अमन ने पूछा, “क्या हुआ?”  

     

    मीरा चुप रही। फिर बोली, “दो साल पहले मेरी बहन चली गई। बीमारी से। घर में मैं अकेली रह गई। माँ-बाप भी नहीं रहे। अब सिर्फ शब्द बचते हैं… और दीवारें।”  

     

    अमन ने कुछ नहीं कहा। बस सुना। फिर धीरे से बोला, “मैं भी अकेला हूँ। लेकिन आपकी आवाज़ सुनकर लगता है कोई है।”  

     

    मीरा हल्के से हँसी। “आपकी आवाज़ भी वैसी ही लगती है जैसे कोई पुराना दोस्त।”  

     

    बातचीत गहरी होती गई। दोनों ने अपने डर बताए। अमन ने बताया कि वह रिश्तों से डरता है, क्योंकि हर बार लोग चले जाते हैं। मीरा ने कहा कि वह लोगों से मिलने से कतराती है, क्योंकि चेहरे अक्सर झूठ बोलते हैं। आवाजें ज्यादा सच्ची होती हैं।

     

    एक शाम अमन ने सुझाव दिया, “कल हम दोनों एक ही समय पर छत पर चलें? दूर से ही सही, एक-दूसरे को देख लें।”  

     

    मीरा ने मना कर दिया। “नहीं। अभी नहीं। दीवार के पार रहना सुरक्षित लगता है। अगर हमने एक-दूसरे को देख लिया… तो शायद यह जादू टूट जाए।”  

     

    अमन समझ गया। कुछ रिश्ते आवाजों में ही खिलते हैं। चेहरों की जरूरत नहीं पड़ती।

     

    बारिश का मौसम आया। रातें लंबी हो गईं। दोनों घंटों बात करते। कभी चुप बैठते। अमन दीवार के पास तकिया लगाकर लेट जाता। मीरा भी वैसा ही करती होगी। एक रात अमन ने कहा, “अगर दीवार न होती तो…”  

     

    मीरा ने जवाब काट दिया, “तो शायद हम कभी बात ही न करते। दीवार ने हमें जोड़ा है।”  

     

    फिर एक दिन सब बदल गया। अमन ऑफिस से जल्दी लौटा। घर में अजीब सी चुप्पी थी। दीवार के पार कोई आवाज़ नहीं। रात भर उसने सुना कुछ नहीं। अगली रात भी वैसा ही। अमन बेचैन हो गया। उसने दीवार पर हाथ रखकर बुलाया, “मीरा? आप वहाँ हो?”  

     

    कोई जवाब नहीं आया।  

     

    तीसरी रात अमन ने पड़ोस के मकान मालिक से पूछा। मालिक ने बताया, “वहाँ वाली लड़की? दो दिन पहले चली गई। कमरा खाली कर दिया। कहाँ गई, पता नहीं।”  

     

    अमन का दिल बैठ गया। दीवार अब सिर्फ दीवार रह गई थी। कोई गुनगुनाहट नहीं, कोई पन्ने पलटने की आवाज़ नहीं। कमरा पहले से ज्यादा खाली लगने लगा।  

     

    अमन ने कई दिन तक रात में दीवार के पास बैठकर इंतजार किया। कभी-कभी खुद ही बोल पड़ता, “मीरा, तुम सुन रही हो?” लेकिन जवाब में सिर्फ अपनी ही आवाज़ की गूँज आती।  

     

    एक रात उसे दीवार के पार हल्की सी खड़खड़ाहट सुनाई दी। दिल जोर से धड़का। उसने कान लगाए। कोई धीरे से बोल रहा था लेकिन आवाज़ मीरा की नहीं थी। नया किराएदार था। अजनबी।  

     

    अमन ने कमरा बदलने का फैसला किया। पैकिंग करते समय दीवार के पास खड़ा रहा। आँखें भर आईं। उसने धीरे से कहा, “शुक्रिया मीरा। तुमने मेरी रातें आसान बना दीं।”  

     

    नए घर में अमन ने जानबूझकर पतली दीवार वाला कमरा लिया। शायद कोई नई आवाज़ मिले। लेकिन कई हफ्ते बीत गए। कोई गुनगुनाहट नहीं आई।  

     

    फिर एक दिन ऑफिस से लौटते हुए बारिश हो रही थी। बस स्टॉप पर खड़े-खड़े उसने सुना कोई धीरे से गुनगुना रहा है। वही पुराना स्वर। अमन ने मुड़कर देखा। एक लड़की छतरी के नीचे खड़ी थी। बाल गीले, चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखें परिचित।  

     

    अमन का गला सूख गया। “मीरा?”  

     

    लड़की ने उसकी ओर देखा। कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से मुस्कुराई। “अमन… दीवार के पार वाले?”  

     

    दोनों हँस पड़े। बारिश तेज हो रही थी। मीरा ने कहा, “मैं शहर छोड़कर चली गई थी। लेकिन वापस आ गई। लगा… आवाजें पीछे छूट गई हैं।”  

     

    अमन ने पूछा, “अब दीवार के पार नहीं… आमने-सामने?”  

     

    मीरा ने सिर हिलाया। “अब दीवार की जरूरत नहीं। लेकिन आवाज़… आवाज़ तो रहेगी।”  

     

    वे साथ चलने लगे। बारिश में भीगते हुए। अब कोई दीवार नहीं थी। सिर्फ दो आवाजें थीं जो कभी दीवार के पार से शुरू हुई थीं और अब एक-दूसरे के बिल्कुल पास थीं।  

     

    रात को अमन के नए कमरे में दोनों बैठे। खिड़की खुली थी। शहर की आवाजें आ रही थीं। मीरा ने धीरे से वही पुराना गाना गुनगुनाया। अमन ने आँखें बंद कर लीं। लगा जैसे दीवार फिर से मौजूद है लेकिन इस बार दीवार उनके बीच नहीं, बल्कि दुनिया और उन दोनों के बीच है। सुरक्षित। गर्म।  

     

    मीरा ने अमन का हाथ थाम लिया। “कभी-कभी आवाजें चेहरों से ज्यादा सच होती हैं। लेकिन कुछ आवाजें… चेहरे मांग लेती हैं।”  

     

    अमन ने जवाब दिया, “और कुछ चेहरे आवाजें मांग लेते हैं।”  

     

    बाहर बारिश रुक गई थी। कमरे में दो दिलों की धड़कनें साफ सुनाई दे रही

    थीं। दीवार के पार की आवाज़ अब दीवार के इस पार आ चुकी थी और कभी जाने वाली नहीं थी।

  • सपनों का शहर

    सपनों का शहर

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सपनों का शहर

     

    गाँव की धूल भरी गलियों में जब सूरज ढलता था तो आकाश में एक अलग सी चमक आ जाती थी। उसी चमक को देखकर अरुण के मन में सवाल उठते थे क्या शहर में भी सूरज ऐसे ही डूबता होगा? क्या वहाँ के सपने भी गाँव के सपनों जैसे टूटते होंगे या फिर पूरे हो जाते होंगे?

     

    अरुण बाईस साल का था। पिता खेतों में काम करते थे, माँ घर का काम और बहन की शादी की चिन्ता। घर में दो कमरे थे, एक आँगन, और एक पुराना रेडियो जो शाम को फिल्मी गाने बजाता था। अरुण उन गानों को सुनते हुए सोचता था कि मुम्बई में सब कुछ सम्भव है। वहाँ लोग सपने बेचते हैं, सपने खरीदते हैं, और कभी-कभी सपनों के साथ खुद को भी बेच देते हैं।

     

    एक दिन उसने तय कर लिया। सुबह चार बजे उठकर सामान बाँधा दो कमीजें, एक पैंट, माँ का दिया हुआ जनेऊ, और पिता का पुराना घड़ी। माँ रोई, पिता चुप रहे। बहन ने कहा, “भैया, लौटना मत भूलना।” अरुण मुस्कुराया, लेकिन दिल में कुछ और था। वह लौटना नहीं चाहता था। वह शहर में अपना नाम लिखना चाहता था।

     

    ट्रेन में बीस घंटे लगे। मुम्बई पहुँचा तो स्टेशन पर भीड़ ने उसे निगल लिया। लोग दौड़ रहे थे, चीख रहे थे, धक्का दे रहे थे। अरुण ने पूछा, “भाई साहब, दादर कैसे जाऊँ?” एक आदमी ने बिना रुके कहा, “लोकल पकड़।” लोकल क्या होती है, यह उसने पहली बार देखा। लोग खिड़कियों से लटक रहे थे, दरवाजों पर चिपके हुए थे। अरुण किसी तरह घुस गया। हवा में पसीने की गन्ध, तेल की गन्ध, और सपनों की एक अजीब सी गन्ध थी।

     

    दादर पहुँचा। वहाँ एक चाय की दुकान पर बैठकर उसने सोचा। पैसे कम थे। रात कहाँ बिताए? एक बुजुर्ग व्यक्ति ने देखा और पूछा, “नया है?” अरुण ने सिर हिलाया। बुजुर्ग ने कहा, “चल, मेरे साथ। नाम है रामलाल। मैं भी कभी गाँव से आया था।” रामलाल ने उसे एक छोटी सी झुग्गी में जगह दी। झुग्गी में चार लोग रहते थे। रात को छत से पानी टपकता था, लेकिन अरुण को लगा जैसे उसने महल पा लिया हो।

     

    सुबह रामलाल ने कहा, “काम ढूँढ। यहाँ कोई मुफ्त में नहीं खिलाता।” अरुण सड़कों पर निकला। होटलों में पूछा, दुकानों में पूछा, कारखानों के बाहर खड़ा रहा। कहीं “अनुभव चाहिए”, कहीं “अंग्रेजी आनी चाहिए”, कहीं “सिफारिश चाहिए”। तीन दिन बाद एक छोटे से ढाबे में बर्तन धोने का काम मिला। मालिक ने कहा, “दो सौ रोज। खाना मुफ्त।” अरुण ने हाँ कर दी।

     

    ढाबे में दिन भर बर्तन धोता, रात को झुग्गी लौटता। शरीर थक जाता, लेकिन मन नहीं थकता था। वह सोचता था एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूँगा। एक दिन मेरा नाम अखबार में छपेगा। एक दिन माँ को मैं बड़ा घर दिखाऊँगा।

     

    एक शाम ढाबे में एक लड़की आई। नाम था मेघा। वह कॉलेज की छात्रा थी, पास वाले इलाके में रहती थी। वह रोज चाय पीने आती थी। अरुण जब बर्तन धो रहा होता तो वह मुस्कुराती। एक दिन उसने पूछा, “तुम कहाँ से हो?” अरुण ने गाँव का नाम बताया। मेघा ने कहा, “सपनों का शहर में स्वागत है। लेकिन याद रखना, यहाँ सपने सस्ते नहीं मिलते।”

     

    मेघा से बातें होने लगीं। वह किताबें पढ़ती थी, फिल्में देखती थी, और शहर की सच्चाइयाँ जानती थी। अरुण को उसने सिखाया कि अंग्रेजी के कुछ शब्द कैसे बोलें, कि रिज्यूम क्या होता है, कि इंटरव्यू में कैसे बैठना चाहिए। अरुण रात को झुग्गी में बैठा-बैठा उन शब्दों को दोहराता। रामलाल हँसता, “अरे, तू फिल्म स्टार बनने वाला है क्या?”

     

    तीन महीने बाद अरुण ने ढाबा छोड़ दिया। एक छोटे से ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली। वेतन तीन हजार। कमरा किराए पर लिया एक छोटा सा कमरा, जहाँ खिड़की से ट्रेन की आवाज आती थी। मेघा कभी-कभी मिलने आती। दोनों समुद्र किनारे बैठते, लहरों को देखते, और सपनों की बात करते।

     

    अरुण ने कहा, “मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ।” मेघा चुप रही। फिर बोली, “बहुत लोग चाहते हैं। बहुत कम पहुँचते हैं।” अरुण ने जिद की, “मैं पहुँचूँगा।”

     

    उसने एक छोटे से थिएटर ग्रुप में दाखिला लिया। शाम को रिहर्सल, दिन को ऑफिस। थकान शरीर को तोड़ती, लेकिन आँखों में चमक रहती। एक दिन डायरेक्टर ने कहा, “तुम्हारे में कुछ है। लेकिन शहर में सिर्फ ‘कुछ’ काफी नहीं। कनेक्शन चाहिए, पैसा चाहिए, और किस्मत चाहिए।”

     

    अरुण ने कनेक्शन ढूँढे। एक असिस्टेंट डायरेक्टर से मिला, जिसने कहा, “पैसे दो, मैं तुम्हें एक छोटे रोल में डाल दूँगा।” अरुण के पास पैसे नहीं थे। उसने ऑफिस की नौकरी के साथ रात को टैक्सी चलायी। महीने भर में पैसे जमा किए और रोल खरीदा। फिल्म में उसका एक सीन था एक भीड़ में खड़ा आदमी जो सिर्फ मुस्कुराता है। फिल्म रिलीज हुई। किसी ने अरुण का नाम नहीं पूछा।

     

    मेघा ने कहा, “तुमने देखा? शहर ऐसे ही खाता है।” अरुण ने जवाब दिया, “मैं अभी नहीं हारा।”

     

    फिर एक और मौका आया। एक टीवी सीरियल में छोटा रोल। फिर एक विज्ञापन। फिर एक और फिल्म में बैकग्राउंड डांसर। पैसे आने लगे, लेकिन सम्मान नहीं। लोग पूछते, “तुम कौन हो?” अरुण जवाब देता, “मैं सपनों का शहर का एक सपना हूँ।”

     

    एक दिन रामलाल बीमार पड़ गया। अस्पताल में जगह नहीं मिली। अरुण ने सारे पैसे लगा दिए। रामलाल बच गया, लेकिन अरुण फिर से खाली हो गया। कमरा छोड़ा, फिर झुग्गी में लौटा। मेघा आई और बोली, “चलो गाँव लौट चलो। यहाँ कुछ नहीं रखा।” अरुण ने मना कर दिया। “मैं लौटूँगा तब, जब मेरे पास कहने को कुछ होगा।”

     

    समय बीतता गया। अरुण ने लिखा। कहानियाँ लिखीं, स्क्रिप्ट लिखीं। एक छोटी सी कहानी एक पत्रिका में छपी। फिर एक और। फिर एक रेडियो नाटक। पैसे कम थे, लेकिन नाम धीरे-धीरे फैलने लगा।

     

    एक शाम समुद्र किनारे बैठे हुए मेघा ने कहा, “तुम बदल गए हो।” अरुण ने पूछा, “कैसे?” मेघा बोली, “पहले तुम्हारी आँखों में भूख थी। अब समझ है।” अरुण मुस्कुराया, “शहर ने सिखाया कि सपने सिर्फ देखने की चीज नहीं। उन्हें जीना पड़ता है। और जीने के लिए कभी-कभी सपने तोड़ने भी पड़ते हैं।”

     

    फिर एक दिन एक बड़े प्रोडक्शन हाउस से फोन आया। उनकी एक स्क्रिप्ट पसंद आई थी। मीटिंग हुई। अरुण ने अपनी कहानी सुनाई गाँव से शहर आने वाले एक लड़के की कहानी, जो सपनों के पीछे भागता है, गिरता है, उठता है, और अंत में समझता है कि सपना शहर नहीं, खुद के अंदर होता है। डायरेक्टर ने कहा, “यह फिल्म बनेगी। तुम लिखोगे।”

     

    फिल्म बनी। अरुण का नाम लेखक के रूप में आया। प्रीमियर पर माँ-पिता आए। माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, तुमने कर दिखाया।” पिता ने सिर्फ कन्धे पर हाथ रखा। बहन ने कहा, “अब घर आ जाओ।” अरुण ने जवाब दिया, “घर तो अब यहीं है। लेकिन मैं आऊँगा।”

     

    फिल्म चली। लोग तारीफ करने लगे। अरुण अचानक जाना-माना नाम बन गया। इंटरव्यू में पूछा गया, “सपनों का शहर कैसा लगा?” अरुण ने कहा, “यह शहर सपनों को पूरा नहीं करता। यह सिर्फ आईना दिखाता है। जो खुद को देख पाता है, वही आगे बढ़ता है। बाकी लोग भीड़ में खो जाते हैं।”

     

    मेघा अब उसकी पत्नी थी। दोनों एक छोटे से फ्लैट में रहते थे। खिड़की से समुद्र दिखता था। रात को जब लहरें टकरातीं तो अरुण याद करता झुग्गी की रातें, बर्तन धोते हुए हाथ, रामलाल की खांसी, और वह पहला दिन जब ट्रेन से उतरा था।

     

    एक दिन रामलाल आया। बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो गया था। अरुण ने उसे गले लगाया। रामलाल बोला, “तूने कर लिया जो मैं नहीं कर पाया।” अरुण ने कहा, “आपके बिना मैं यहाँ नहीं टिक पाता।” रामलाल मुस्कुराया, “सपनों का शहर किसी को अकेला नहीं छोड़ता। या तो तोड़ देता है, या फिर नया बना देता है।”

     

    अरुण ने एक और कहानी लिखनी शुरू की। इस बार शीर्षक था “सपनों का शहर: एक और अध्याय”। लेकिन वह जानता था कि असली कहानी कभी खत्म नहीं होती। शहर चलता रहता है। लोग आते रहते हैं। सपने टूटते रहते हैं और नए सपने जन्म लेते रहते हैं।

     

    एक शाम अरुण समुद्र किनारे अकेला बैठा था। सूरज डूब रहा था। आकाश में वही चमक थी जो कभी गाँव में देखी थी। उसने सोचा क्या मैं पहुँच गया? क्या मेरा सपना पूरा हो गया?

     

    जवाब हवा में था। शहर की रोशनियाँ जल रही थीं। दूर कोई ट्रेन की सीटी बज रही थी। पास कोई गाना गा रहा था। अरुण उठा और चला। उसके कदम अब पहले जैसे नहीं थे। अब उनमें थकान कम, समझ ज्यादा थी।

     

    वापस फ्लैट पहुँचा तो मेघा ने पूछा, “क्या सोच रहे थे?” अरुण ने कहा, “सोच रहा था कि सपनों का शहर असल में कोई जगह नहीं है। यह एक यात्रा है। और यात्रा कभी खत्म नहीं होती। बस, रास्ते बदलते रहते हैं।”

     

    मेघा ने हाथ थाम लिया। दोनों खिड़की के पास खड़े रहे। बाहर शहर चमकीला था, शोरगुल भरा था, और अनगिनत सपनों से भरा हुआ था। कुछ सपने पूरे हो रहे थे, कुछ टूट रहे थे, कुछ नए जन्म ले रहे थे।

     

    अरुण ने धीरे से कहा, “मैं गाँव लौटूँगा एक दिन। लेकिन अभी नहीं। अभी मुझे और लिखना है। और कहानियाँ सुनानी हैं। क्योंकि इस शहर में हर किसी की एक कहानी है। और मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    रात गहरी हो गई। शहर सो नहीं रहा था। कभी सोता भी नहीं। सपनों का शहर जागता रहता है उन लोगों के लिए जो अभी आए हैं, उन लोगों के लिए जो हार चुके हैं, और उन लोगों के लिए जो अभी भी लड़ रहे हैं।

     

    अरुण बिस्तर पर लेटा। आँखें बंद कीं। नींद में उसे गाँव दिख रहा था खेत, आँगन, माँ का चेहरा, और वह पुराना रेडियो। फिर दृश्य बदला। मुम्बई का स्टेशन, भीड़, रामलाल, मेघा, समुद्र, फिल्म का सेट, और अंत में वह खुद एक लेखक, जो अपनी कहानी खुद लिख रहा था।

     

    सुबह जब उठा तो सूरज की पहली किरण खिड़की से आ रही थी। अरुण मुस्कुराया। उसने नोटबुक खोली और लिखा

     

    “सपनों का शहर में कोई अंत नहीं होता। सिर्फ नए शुरूआत होती हैं। और हर शुरूआत एक नई कहानी लेकर आती है।”

     

    कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन शहर में कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। अरुण की कहानी एक एपिसोड में पूरी हो गई गाँव से शहर, संघर्ष से सफलता, सपने से समझ तक। वह पहुँच गया जहाँ पहुँचना चाहता था। लेकिन असली जीत यह नहीं थी कि उसका नाम छापा। असली जीत यह थी कि उसने खुद को खोया नहीं। शहर ने उसे तोड़ा, फिर जोड़ा, और अंत में एक नया इंसान बना दिया।

     

    और यही सपनों का शहर का सच है। यह तुम्हें वह सब कुछ देता है जो तुम चाहते हो बशर्ते तुम देने के लिए तैयार हो। कभी-कभी सपने, कभी-कभी अपनी पुरानी पहचान, और कभी-कभी सिर्फ समय।

     

     

     

    अरुण अब समय के साथ चल रहा था। और शहर उसके साथ चल रहा था। दोनों एक-दूसरे को समझ चुके थे। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।

  • Online dosti

    Online dosti

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    हेल्लो दोस्तों…

     

    आज मैंने एक ऑनलाइन प्यार वाली कहानी पढ़ी। कहानी खत्म हुई तो पता नहीं क्यों, मुझे भी किसी की याद आ गई।

     

    प्यार क्या होता है, ये तो आज तक मुझे नहीं पता। शायद मैंने कभी किसी से प्यार किया भी नहीं। लेकिन हाँ… एक दोस्त ज़रूर ऐसा मिला, जिसकी याद आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आज मैं अपनी ही एक ऑनलाइन दोस्त की कहानी लिख रही हूँ।

     

    ये कहानी शुरू होती है लगभग तीन साल पहले… 21 – सावन 2023 से उस समय मैंने पहली बार कहानियाँ लिखना शुरू किया था। लिखने का बहुत शौक था, लेकिन लिखना उतना अच्छा नहीं आता था। शब्दों में ढेर सारी गलतियाँ होती थीं। कई बार तो खुद अपनी कहानी दोबारा पढ़ती, तो लगता कि पता नहीं लोग इसे पढ़ते भी कैसे होंगे।

     

    लगभग तीन महीने बाद मुझे एक इंस्टाग्राम ग्रुप में पता चला कि प्रतिलिपि जैसा भी एक ऐप है। उस समय लफ्ज़ो की कहानी ऐप नहीं आई थी और मैं पॉकेट नोबेल पर लिखना शुरू किया था। उसके बाद में प्रतिलिप पर लिखना शुरू किया।

     

    जो लोग मुझे शुरू से जानते होंगे, उन्हें ये तो पता होगा कि मेरी स्टोरी में गलती कितनी होती थी। लेकिन शायद किस्मत को यही मंज़ूर था कि मेरी वही गलतियाँ मुझे मेरी ज़िंदगी के सबसे खास ऑनलाइन दोस्त से मिलवा दें।

     

    एक दिन मैं प्रतिलिपि पर अपनी कहानी लिख रही थी। तभी अचानक मेरे inbox में एक मैसेज आया।

     

    मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उस समय कोई भी सीधे inbox में मैसेज नहीं करता था। मैंने मैसेज खोला।

     

    उसने सबसे पहले लिखा था,

    “sorry में आपको inbox में मैसेज कर रहा हु”

     

    मैं कुछ देर तक बस स्क्रीन को देखती रही। फिर मैंने जवाब दिया, “कोई बात नहीं” और inbox बंद करने लगी। तभी उसका दूसरा मैसेज आया।

     

    “आप की स्टोरी बहुत अलग है और अच्छी है पर कुछ जगह गलती है आप डालने से पहले चेक कर लीजिए गा। मैं ये बात कमेंट में भी बोल देता पर वह बोलता तो लोग आपकी स्टोरी को गलत कहने लगते पर आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है।”

     

    उसका मैसेज पढ़कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि उसने मेरी कमी बताई थी, लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ा था। उसने मेरी गलती सबके सामने नहीं, बल्कि अकेले में बताई थी।

     

    मैंने बस “थैंक यू” कहा और “सॉरी” भी बोलकर निकल गई।

    असल में उस समय मेरे घर में शादी होने वाली थी। पूरे घर में मेहमान थे। हर तरफ भागदौड़ थी। इसलिए मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।

     

    लेकिन उसके बाद एक चीज़ रोज़ होने लगी। जब भी मैं प्रतिलिपि खोलती, उसका एक मैसेज ज़रूर होता। “आज का एपिसोड अच्छा था” और मैं हर बार बस “thank you” बोल देती।

     

    एक दिन उसने कहा, “मेरी स्टोरी भी पढ़ना में राइटर नहीं हु बस कभी लिखने का मन होता है तो लिख लेतीहु”

     

    मैंने उसकी कहानी पढ़ी। फिर कभी मेरी कहानी की बातें होतीं… कभी उसकी कहानी की… और धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।

     

    मुझे पता चला कि वो गुजरात से था और मैं बिहार से। दो अलग-अलग राज्यों के दो बिल्कुल अनजान लोग… जिन्हें शायद कभी मिलना भी नहीं था।

     

    लेकिन दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। एक दिन उसने कहा,

    “लिपि पर ऑनलाइन का पता नहीं चलता है क्या आपका इंस्ट्राग्राम id है”

     

    मैंने बिना ज़्यादा सोचे अपना इंस्टाग्राम आईडी दे दिया। बस… शायद वहीं से हमारी असली दोस्ती शुरू हुई। अब हमारी सुबह गुड मॉर्निंग से होती और रात गुड नाइट पर खत्म होती।

     

    या यूँ कहूँ… खत्म ही नहीं होती थी। क्योंकि रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक बातें चलती रहती थीं। कभी कहानी…

    कभी सपने… कभी बचपन… कभी भविष्य… तो कभी बिल्कुल बेकार की बातें।

     

    लेकिन मज़े की बात ये थी कि हमें उन बेकार की बातों में भी बहुत मज़ा आता था। उसी दौरान मेरे घर में भाई की शादी थी।

     

    हर समय कोई ना कोई मेहमान घर में रहता था। मेरे हाथ में फोन देखकर कभी पापा डाँट देते कभी भैया कुछ बोल देते।

     

    मैं भी गुस्से में इंस्टाग्राम पर नोट डाल दिया, “मुझे कोई मैसेज नहीं करेगा में इंट्रा छोड़ कर जा रही हु” असल में वो मैसेज मैंने इंस्टाग्राम ग्रुप के लिए डाला था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने वो नोट पढ़ा वो परेशान हो गया। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से मैं इंस्टाग्राम छोड़ रही हूँ।

     

    उसने लगातार मैसेज करने शुरू कर दिए। कॉल भी किए।

    जब रात में पापा सो गए, तब मैंने मम्मी से फोन लिया।

    कम से कम कहानी तो लिखनी थी। मैंने जैसे ही इंस्टाग्राम खोला इतने सारे मैसेज इतनी सारी मिस्ड कॉल…

     

    कि आज भी गिन नहीं सकती। मैंने उसे पूरी बात बताई कि आखिर हुआ क्या था। तब जाकर वो शांत हुआ।

     

    उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी दोस्ती किसी के लिए इतनी मायने रखती है।

     

    फिर आया वो दिन जिस दिन मेरे भैया की हल्दी थी। और उसी दिन उसका जन्मदिन भी था। उसने मुझे पहले ही बता दिया था। लेकिन घर में इतने मेहमान इतनी भागदौड़ थी कि मैं भूल गई।

     

    रात के लगभग ग्यारह बजे जब मैं ऑनलाइन आई तब मुझे याद आया। मैंने तुरंत उसे “sorry” बोला। लेकिन मुझे पता था ग्यारह से बारह के बीच उसका डिनर करने का समय होता था।

     

    उसने मेरे सॉरी का कोई जवाब नहीं दिया। मैं परेशान हो गई।

    लगभग तीस मिनट तक लगातार “सॉरी” बोलती रही। साथ में एक अच्छा सा happy birthday wishes भी लिखा।

     

    और 11:30 बजे भेज दिया। लेकिन उसने 11:57 पर जाकर देखा। और आखिरकार मान गया। उस दिन मेरी जान में जान आई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।

     

    कभी स्टोरी की बातें कभी इधर-उधर की बातें तो कभी हम truth or dare खेलते। कभी घंटों हँसते तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ात और झगड़ा वो तो पूछो ही मत ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता था जब में झगड़ती नहीं थी।

     

    देखते ही देखते दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला।

    हाँ एक बार मैं उसका जन्मदिन भूल गई थी। वो बहुत नाराज़ हो गया था। लेकिन मज़ेदार की बात ये है कि तीन साल में उसे मेरा जन्मदिन एक बार भी याद नहीं रहा।

     

    दो बार तो मेरा इंस्टाग्राम नोट और स्टोरी देखकर उसे याद आया। जब मैं नाराज़ होती तो वो बस इतना बोल देता, “मुझे याद तो आया पर तुम तो भूल ही गई थी।”

     

    अब क्या ही जवाब दूँ मैं जनाब को। और इस साल उसने विश भी नहीं किया। शायद अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं।

    लगभग एक साल पहले मैं बीमार थी।

     

    और उसी समय उसकी नई जॉब भी शुरू हो गई। वो अपने काम में व्यस्त रहने लगा। हमारी बातें कम होने लगीं। पहले जहाँ हर छोटी बात शेयर होती थी…

     

    अब पूरे-पूरे दिन निकल जाते थे। धीरे-धीरे ये दूरी इतनी बढ़ गई कि जो दोस्त कभी बिना Good Morning के दिन शुरू नहीं करते थे और बिना रात के दो या तीन बजे Good Night बोले सोते नहीं थे…

     

    आज वही दोस्त सिर्फ एक-दूसरे की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा होता था रात के बारह बजे Good Night बोलते। फिर कोई नई बात याद आ जाती और फिर बातें शुरू हो जातीं।

     

    फिर दोबारा Good Night। फिर हँसी, फिर कोई नया किस्सा। और पता ही नहीं चलता था कि कब रात के तीन बज गए।

     

    लेकिन अब बस एक रील भेज देते हैं। सामने वाला देख ले तो ठीक न देखे तो भी ठीक। कभी किसी रील पर हँसने वाली इमोजी भेज दी…

     

    बस वहीं बात खत्म। जब वो अपनी नई नौकरी में बिज़ी हुआ तब उसने मुझसे सिर्फ इतना कहा था, “तुम्हे जब भी बात करने का मन हो बात कर लेना”

     

    आज तक मुझे समझ नहीं आया वो कहना क्या चाहता था?

    क्या उसे सच में मेरी दोस्ती चाहिए थी? या फिर वो सिर्फ औपचारिकता निभा रहा था? मैं तो दोस्त से बात करना चाहती थी।

     

    लेकिन क्या सिर्फ मैं ही बात करना चाहती थी? क्या उसका मन नहीं करता था मुझसे बात करने का? शायद इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।

     

    उस दिन के बाद मैंने खुद से मैसेज करना लगभग बंद कर दिया। कभी-कभी कर देती थी लेकिन अब नहीं। हाँ रील्स आज भी भेज देती हूँ।

     

    शायद इसलिए कि कहीं न कहीं दोस्ती अभी भी बाकी है।

    कुछ दिन पहले मैंने उसे एक रील भेजी। कई दिनों बाद उसका टेक्स्ट आया।

     

    इतने दिनों बाद उसका मैसेज देखकर मैं सच में बहुत खुश हो गई। इतनी खुश कि समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूँ।

     

    दिल बहुत कुछ लिखना चाहता था। पूछना चाहता था कि कैसे हो? इतने दिन कहाँ थे? याद आती है क्या हमारी पुरानी बातें?

     

    लेकिन उँगलियाँ कुछ भी नहीं लिख पाईं। और मैंने बस 🤣🤣 ये वाली इमोजी भेज दी।

     

    शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इमोजी वो बातें कह देते हैं, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।

     

    आज भी जब पुरानी चैट पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे वो दिन किसी और दुनिया के थे। जहाँ वक्त बहुत था बातें बहुत थीं हँसी बहुत थी और उम्मीदें भी एक दूसरे का ऑनलाइन आने का इंतजार बहुत थी 

     

    अब न शिकायत है न कोई गिला। बस एक खूबसूरत याद है।

    तो अब आप ही बताइए इसे ऑनलाइन प्यार कहेंगे या दोस्ती या फिर कुछ भी नहीं?

     

    मुझे आज भी नहीं पता। लेकिन मेरे लिए वो हमेशा मेरा एक बहुत अच्छा ऑनलाइन दोस्त रहेगा।

     

    कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती है। वो बस यादों में रह जाते हैं और जब भी याद आते हैं चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान छोड़ जाते हैं।

  • बच्चों की यात्रा

    बच्चों की यात्रा

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    बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक नन्हा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। चमकीला हमेशा आकाश में तारे के साथ खेलता और रात का नज़ारा देखने आता। लेकिन एक दिन, उसे एक सपना आया। उसने देखा कि वह धरती पर जाकर सारे बच्चों से मिलना चाहता है।

    चमकीला ने अपने दोस्तों, तारे और बादल से कहा, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं वहाँ के बच्चों के साथ खेलना चाहता हूँ।” तारे ने मुस्कुराते हुए कहा, “लेकिन चमकीला, तुम तो आकाश का चाँद हो। तुम धरती पर कैसे जा सकते हो?” 

    चमकीला ने कहा, “मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा। मुझे सिर्फ एक मौका चाहिए।” उसने बादल से पूछा, “क्या तुम मुझे नीचे लाने में मदद करोगे?” बादल ने कहा, “बिल्कुल, मैं तुम्हें नीचे ले चलूँगा। लेकिन तुम्हें जल्दी आना होगा, वरना सूरज उग जाएगा।”

    तो चमकीला और बादल ने मिलकर एक योजना बनाई। बादल ने चमकीला को अपने विशाल पंखों में समेटा और धीरे-धीरे नीचे की ओर उड़ने लगा। जैसे ही वे धरती के करीब पहुँचे, चमकीला बहुत उत्साहित था।

    जब वे धरती पर पहुँचे, तो चमकीला ने देखा कि बच्चे खेल रहे थे, हंस रहे थे और खुश थे। चमकीला ने तुरंत बच्चों के बीच में आने की इच्छा व्यक्त की। बच्चे उसकी चमकीली रोशनी और सुंदरता को देखकर हैरान रह गए। उन्होंने चाँद से कहा, “क्या आप सच में चाँद हैं?

    चमकीला ने कहा, “हाँ, मैं ही हूँ! मैं यहाँ खेलने आया हूँ। चलो, हम साथ में खेलते हैं!” बच्चे बहुत खुश हुए और उन्होंने चमकीला के साथ खेलना शुरू कर दिया। वे दौड़ने लगे, कूदने लगे और चाँद की रोशनी में तारे की तरह चमकने लगे

    चमकीला ने देखा कि बच्चे कितने खुश हैं। वह उनके साथ खेलते हुए समय को भूल गया। लेकिन जल्द ही सूरज की किरणें फैलने लगीं। चमकीला को जल्दी समझ में आया कि अब उसे वापस आकाश में जाना होगा।

    बच्चों ने उसे रोकने की कोशिश की, “नहीं, चमकीला! मत जाओ!” लेकिन चमकीला ने कहा, “मुझे जाना होगा, लेकिन मैं हमेशा तुम सबके साथ रहूँगा। जब भी तुम रात में मुझे देखोगे, तो याद रखना, मैं तुम्हारे दोस्त हूँ।

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने पंखों में समेटा और धीरे-धीरे उसे आसमान में ले जाने लगा। जब वह वापस चाँद पर पहुँचा, तो उसने अपने दोस्तों को बताया कि उसने धरती पर बच्चों के साथ कितना मजेदार समय बिताया

    उस रात, जब बच्चे सो रहे थे, उन्होंने चाँद को अपनी खिड़की से देखा और मुस्कुराने लगे। उन्हें पता था कि उन पर हमेशा चमकीला की नज़र है।

    सपने देखने और उन्हें पूरा करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। दोस्ती और खुशी हर जगह मिलती है, बस हमें उसे पहचानने का तरीका सीखना होता है।