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😱शिनिगामी 😱 (मौत का संदेशवाहक)😱

पढ़ने का समय : 8 मिनट

 

 

मंदिर की दीवार पर लिखे शब्दों को देखकर हारुतो की साँस रुक गई।

 

“हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

 

उसके सामने खड़ा शिनिगामी बिल्कुल स्थिर था।

 

उसका चेहरा इंसान जैसा था, लेकिन उस चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

 

फिर भी हारुतो को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रहा है।

 

बहुत देर तक मंदिर में कोई आवाज़ नहीं हुई।

 

अचानक शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

 

उसकी उँगली सीधे हारुतो की तरफ थी।

 

“तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे जन्म दिया था।”

 

उसकी आवाज़ इंसान की आवाज़ नहीं थी।

 

ऐसा लग रहा था जैसे कई बूढ़े लोग एक साथ बोल रहे हों।

 

हारुतो पीछे हट गया।

 

“मैंने क्या किया है?”

 

शिनिगामी ने उत्तर दिया,

 

“तुमने कुछ नहीं किया।”

 

कुछ पल की खामोशी।

 

“लेकिन तुम्हारे खून ने बहुत कुछ किया है।”

 

हारुतो के पिता आगे आए।

 

“उसे छोड़ दो!”

 

शिनिगामी ने अपना सिर पिता की तरफ घुमाया।

 

“तुम पहले ही मर चुके हो।”

 

पिता ने कहा,

 

“लेकिन मैं उसका पिता हूँ।”

 

शिनिगामी हँसा।

 

“मृत लोग पिता नहीं होते।”

 

अचानक उसके हाथ में पकड़ी घंटी बज उठी।

 

टन…

 

पिता जमीन पर गिर पड़े।

 

हारुतो चीख पड़ा।

 

“पापा!”

 

उसने उन्हें उठाने की कोशिश की।

 

लेकिन उनके शरीर से धुआँ निकल रहा था।

 

पिता ने कमजोर आवाज़ में कहा,

 

“हारुतो… मंदिर के पीछे वाला दरवाज़ा…”

 

“क्या?”

 

“वहीं से सब शुरू हुआ था।”

 

शिनिगामी उनकी तरफ बढ़ रहा था।

 

पिता ने आखिरी बार कहा,

 

“अपनी दादी को ढूँढो।”

 

हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

 

“दादी तो—”

 

“वह अभी जिंदा है।”

 

अगले ही पल पिता का शरीर राख में बदल गया।

 

हारुतो चीख उठा।

 

लेकिन शिनिगामी ने उसकी तरफ देखा।

 

“अब केवल तुम बचे हो।”

 

हारुतो मंदिर के पीछे बने लकड़ी के दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

 

उसने दरवाज़ा खोला।

 

नीचे जाने वाली पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

 

वह तेजी से नीचे उतरने लगा।

 

सीढ़ियाँ इतनी लंबी थीं कि उसे लग रहा था जैसे वह जमीन के अंदर नहीं, बल्कि किसी दूसरी दुनिया में जा रहा हो।

 

दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

 

एक चित्र में गाँव के लोग एक काले कपड़े पहने आदमी के सामने खड़े थे।

 

दूसरे चित्र में वही आदमी एक घंटी पकड़े हुए था।

 

तीसरे चित्र में…

 

एक बच्चा था।

 

उस बच्चे के सामने वही शिनिगामी खड़ा था।

 

हारुतो रुक गया।

 

चित्र के नीचे पुराने जापानी अक्षरों में कुछ लिखा था।

 

वह उसे पूरी तरह पढ़ नहीं पा रहा था, लेकिन एक शब्द पहचान गया।

 

“कुरोमोरी।”

 

तभी पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

 

हारुतो ने पीछे देखा।

 

सीढ़ियों के ऊपर कोई खड़ा था।

 

उसकी दादी।

 

“हारुतो…”

 

हारुतो दौड़कर उनके पास गया।

 

“दादी!”

 

दादी ने उसे गले लगा लिया।

 

लेकिन उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

 

“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

 

हारुतो ने पूछा,

 

“सच क्या है?”

 

दादी कुछ देर चुप रहीं।

 

फिर बोलीं,

 

“आज तुम्हें सब जानना होगा।”

 

वे उसे एक विशाल भूमिगत कमरे में ले गईं।

 

कमरे के बीचों-बीच पत्थर की एक वेदी थी।

 

उसके ऊपर वही लोहे की घंटी रखी थी।

 

दादी ने कहा,

 

“सौ साल पहले तुम्हारे परदादा ने मौत से बात करने की कोशिश की थी।”

 

“क्यों?”

 

“तुम्हारी परदादी मर रही थीं।”

 

हारुतो चुप रहा।

 

“उन्होंने एक पुरानी किताब में एक अनुष्ठान पढ़ा। उस अनुष्ठान के जरिए उन्होंने मृत्यु को रोकने की कोशिश की।”

 

“और शिनिगामी पैदा हुआ?”

 

दादी ने सिर हिलाया।

 

“नहीं। शिनिगामी पहले से था।”

 

उन्होंने घंटी की तरफ देखा।

 

“तुम्हारे परदादा ने उसे इंसानों की दुनिया में बुलाया।”

 

हारुतो ने पूछा,

 

“फिर?”

 

“शुरुआत में शिनिगामी ने सौदा किया।”

 

“कैसा सौदा?”

 

“वह एक इंसान की जान बचाएगा… बदले में हर पचास साल में उसी परिवार की एक आत्मा उसे देनी होगी।”

 

हारुतो के चेहरे पर डर उतर आया।

 

“और अगर परिवार ने मना किया?”

 

दादी ने कहा,

 

“तो वह पूरे गाँव की मौत चुनता।”

 

हारुतो ने चारों तरफ देखा।

 

“इसलिए गाँव के लोग उसे नहीं रोकते थे?”

 

“वे डरते थे।”

 

अचानक कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

 

हारुतो…

 

हारुतो…

 

हारुतो…

 

दादी ने जल्दी से वेदी के नीचे से एक पुरानी किताब निकाली।

 

“लेकिन तुम्हारे परदादा ने एक और गलती की थी।”

 

“क्या?”

 

दादी ने किताब खोली।

 

आखिरी पन्ने पर लिखा था—

 

“जिस दिन परिवार का अंतिम वंशज जन्म लेगा, उसी दिन शिनिगामी की शक्ति समाप्त की जा सकती है।”

 

हारुतो ने पूछा,

 

“अंतिम वंशज मैं हूँ?”

 

दादी ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“लेकिन कैसे?”

 

दादी ने घंटी की तरफ इशारा किया।

 

“इसे बजाना होगा।”

 

हारुतो ने घंटी उठाई।

 

“बस इतना?”

 

“नहीं।”

 

दादी की आँखों में डर था।

 

“घंटी तभी काम करेगी जब उसे शिनिगामी के सामने बजाया जाए।”

 

“और फिर?”

 

“जिस व्यक्ति ने घंटी बजाई… उसे अपनी सबसे प्यारी याद हमेशा के लिए खोनी होगी।”

 

हारुतो ने किताब नीचे रख दी।

 

“कौन-सी याद?”

 

दादी ने कुछ नहीं कहा।

 

तभी पीछे से आवाज़ आई।

 

“तुम्हारी माँ की।”

 

हारुतो पलट गया।

 

शिनिगामी कमरे के प्रवेश द्वार पर खड़ा था।

 

उसके पीछे अंधेरा फैलता जा रहा था।

 

दादी ने हारुतो को अपने पीछे कर लिया।

 

“भागो!”

 

लेकिन शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

 

दादी हवा में उठ गईं।

 

हारुतो चीख पड़ा।

 

“दादी!”

 

शिनिगामी ने कहा,

 

“तुम्हारे परिवार ने मुझे जन्म दिया।”

 

फिर उसने दादी को जमीन पर फेंक दिया।

 

“अब तुम्हारे परिवार का अंत होगा।”

 

हारुतो ने घंटी उठाई।

 

शिनिगामी उसकी तरफ बढ़ने लगा।

 

हर कदम के साथ जमीन काँप रही थी।

 

हारुतो पीछे हटता गया।

 

उसके दिमाग में माँ की यादें घूमने लगीं।

 

माँ का चेहरा।

 

माँ की हँसी।

 

बचपन में उसका हाथ पकड़कर चलना।

 

बारिश में उसके लिए छाता लेकर आना।

 

और आखिरी दिन…

 

जब माँ ने मरने से पहले उससे कहा था—

 

“डरना मत।”

 

हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

 

शिनिगामी उसके सामने आ चुका था।

 

“घंटी बजाओ।”

 

हारुतो ने उसे देखा।

 

“अगर मैं बजाऊँगा तो?”

 

“तुम अपनी माँ को हमेशा के लिए भूल जाओगे।”

 

हारुतो काँपने लगा।

 

“और अगर नहीं बजाया?”

 

शिनिगामी मुस्कुराया।

 

“तो तुम्हारी दादी मरेंगी।”

 

हारुतो ने दादी की तरफ देखा।

 

वह जमीन पर पड़ी थीं।

 

बहुत कमजोर।

 

लेकिन उन्होंने आँखें खोलकर कहा,

 

“बजा दो।”

 

“दादी…”

 

“तुम्हारी माँ ने भी यही चाहा होता।”

 

हारुतो ने आँखें बंद कर लीं।

 

उसने घंटी उठाई।

 

और पूरी ताकत से बजा दी।

 

टन————————!

 

आवाज़ पूरे भूमिगत कमरे में गूँज उठी।

 

शिनिगामी पीछे हट गया।

 

उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

 

उसका चेहरा फटने लगा।

 

और पहली बार…

 

उसके चेहरे पर आँखें दिखाई दीं।

 

सैकड़ों आँखें।

 

हर आँख में किसी मरे हुए इंसान का चेहरा था।

 

शिनिगामी चीखने लगा।

 

“नहीं!!!”

 

हारुतो ने दूसरी बार घंटी बजाई।

 

टन————————!

 

पूरा मंदिर काँपने लगा।

 

ऊपर गाँव के घरों की खिड़कियाँ टूटने लगीं।

 

जंगल के पेड़ एक साथ झुक गए।

 

और फिर तीसरी बार…

 

हारुतो ने घंटी बजाई।

 

टन————————!

 

अचानक सब कुछ शांत हो गया।

 

शिनिगामी गायब था।

 

कमरे में सिर्फ हारुतो और उसकी दादी थे।

 

दादी धीरे-धीरे उठीं।

 

“खत्म हो गया।”

 

हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

 

“सच में?”

 

दादी मुस्कुराईं।

 

“हाँ।”

 

हारुतो ने राहत की साँस ली।

 

लेकिन अगले ही पल उसने पूछा,

 

“दादी… मेरी माँ कौन थी?”

 

दादी का चेहरा बदल गया।

 

“क्या?”

 

हारुतो ने फिर पूछा,

 

“मेरी माँ कौन थी?”

 

दादी की आँखों में आँसू आ गए।

 

हारुतो अपनी माँ को पूरी तरह भूल चुका था।

 

उसके चेहरे की कोई तस्वीर उसे याद नहीं थी।

 

उसकी आवाज़…

 

उसकी हँसी…

 

कुछ भी नहीं।

 

वह रोने लगा।

 

दादी ने उसे गले लगा लिया।

 

“तुम्हारी माँ बहुत अच्छी औरत थी।”

 

हारुतो ने पूछा,

 

“क्या वह मुझसे प्यार करती थी?”

 

दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“बहुत ज्यादा।”

 

सुबह होने लगी।

 

कुरोमोरी के ऊपर पहली बार कई वर्षों बाद साफ सूरज निकला।

 

जंगल की धुंध गायब हो गई।

 

गाँव के लोग अपने घरों से बाहर आने लगे।

 

सब कुछ सामान्य लग रहा था।

 

लेकिन उसी शाम…

 

हारुतो अपने घर में अकेला बैठा था।

 

उसने पुराने सामान की एक पेटी खोली।

 

अंदर उसकी माँ की एक तस्वीर थी।

 

उसने तस्वीर उठाई।

 

वह तस्वीर में मौजूद औरत को देख रहा था।

 

लेकिन उसके दिल में कोई पहचान नहीं थी।

 

बस एक अजीब-सी खाली जगह थी।

 

तभी…

 

तस्वीर के पीछे कुछ गिरा।

 

एक छोटी लोहे की घंटी।

 

हारुतो ने उसे उठाया।

 

उस पर खून से एक शब्द लिखा था—

 

“समाप्त नहीं।”

 

हारुतो के हाथ से घंटी गिर गई।

 

उसी समय बाहर जंगल से…

 

टन…

 

एक घंटी बजी।

 

हारुतो खिड़की की तरफ मुड़ा।

 

जंगल के बीच एक काली आकृति खड़ी थी।

 

लेकिन इस बार वह शिनिगामी नहीं था।

 

वह उसकी माँ थी।

 

वह दूर से उसे देख रही थी।

 

और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी।

 

हारुतो ने धीरे से खिड़की खोली।

 

हवा के साथ उसकी माँ की आवाज़ आई—

 

“बेटा… तुमने मुझे याद तो नहीं रखा… लेकिन मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।”

 

हारुतो की आँखों से आँसू बहने लगे।

 

और जंगल के भीतर वह आकृति धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई।

 

उस रात के बाद कुरोमोरी में कभी शिनिगामी की घंटी नहीं बजी।

 

लेकिन गाँव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

 

अगर किसी रात जापान के किसी सुनसान जंगल में आपको आधी रात को घंटी की आवाज़ सुनाई दे…

 

तो पीछे मुड़कर मत देखना।

 

क्योंकि हो सकता है…

 

मौत आपको बुला नहीं रही हो।

 

हो सकता है…

 

वह सिर्फ यह देख रही हो कि आपको अब भी कौन याद है।

 

समाप्त।

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