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टैग: #दोस्ती #विश्वास

  • अंतिम भाग

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

    अध्याय 15

    सुदामा कृष्ण के सामने खड़े थे।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर वर्षों पुरानी यादों की चमक।

     

    कृष्ण ने धीरे से पूछा,

     

    “अब याद आया, सुदामा?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ कृष्ण… सब याद आ गया।”

     

    उन्होंने अपनी पोटली खोली और उसमें से वह पुरानी लकड़ी की माला निकाल ली।

     

    “ये भी तुमने ही मुझे दी थी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुमने इसे इतने साल संभालकर रखा।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैंने संभालकर नहीं रखा था कृष्ण… शायद तुम्हारी याद ने इसे मेरे पास संभालकर रखा था।”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    पास खड़ा बच्चा उनकी बातें सुन रहा था।

     

    सुदामा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कृष्ण, अब मुझे समझ आ गया कि तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया।”

     

    कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    सुदामा बच्चे के पास जाकर बैठ गए।

     

    “तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है?”

     

    बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”

     

    बच्चे ने थोड़ी देर सोचा।

     

    “मैं… ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ जिससे किसी को मदद मिले।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कृष्ण की तरफ देखा।

     

    “तुमने इसे भी वही बात सिखाई है।”

     

    कृष्ण हँसे।

     

    “मैंने नहीं, समय ने सिखाई है।”

     

    सुदामा ने बच्चे का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर आज से तुम्हारी जिम्मेदारी मेरी।”

     

    बच्चे ने पूछा,

     

    “क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ?”

     

    सुदामा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “जहाँ अपना मन मिले, वही घर होता है।”

     

    कृष्ण चुपचाप दोनों को देखते रहे।

     

    कुछ देर बाद सुदामा उनके पास आए।

     

    “कृष्ण, एक बात पूछूँ?”

     

    “पूछो।”

     

    “तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि तुमने मेरा इंतजार इतने साल किया?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि सच्ची दोस्ती में इंतजार का हिसाब नहीं रखा जाता।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    “और अगर मैं कभी वापस नहीं आता?”

     

    कृष्ण ने बिना देर किए कहा,

     

    “तो भी मैं तुम्हें अपना दोस्त ही मानता।”

     

    सुदामा ने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    कई वर्षों की दूरी उस एक पल में जैसे मिट गई।

     

    उन्हें फिर वही गुरुकुल याद आया।

     

    दो छोटे बच्चे।

     

    एक साथ बैठकर खाना खाते हुए।

     

    एक-दूसरे की शरारतों पर हँसते हुए।

     

    मुश्किल समय में एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हुए।

     

    तब उन्हें लगा था कि समय के साथ सब बदल जाएगा।

     

    लेकिन आज समझ आया—

     

    सच्ची दोस्ती समय से नहीं बदलती।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण, उस दिन मैंने तुमसे पूछा था कि हमारी जिंदगी बदल जाएगी तो क्या हमारी दोस्ती भी बदल जाएगी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “और मैंने कहा था—कभी नहीं।”

     

    “आज मुझे उस जवाब का मतलब समझ आया।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    सुदामा बोले,

     

    “दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं है। दोस्ती उस भरोसे का नाम है, जो दूरी के बाद भी दिल में बना रहता है।”

     

    कृष्ण की आँखों में भी नमी आ गई।

     

    सुदामा ने अपनी पुरानी पोटली कृष्ण को वापस देने की कोशिश की।

     

    “इसे रख लो।”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “अब ये तुम्हारे पास ही रहेगी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “क्योंकि अब तुम्हें इसकी जरूरत पहले से ज्यादा है।”

     

    सुदामा समझ गए।

     

    उन्होंने पोटली को फिर अपने सीने से लगा लिया।

     

    उन्हें अब पता था कि उसमें सिर्फ एक पुरानी निशानी नहीं थी।

     

    उसमें उनकी दोस्ती की याद थी।

     

    एक वादा था।

     

    एक विश्वास था।

     

    और एक ऐसा रिश्ता था जिसे समय भी कमजोर नहीं कर पाया।

     

    शाम होने लगी।

     

    सुदामा वापस जाने के लिए तैयार हुए।

     

    बच्चा भी उनके साथ चलने लगा।

     

    कृष्ण ने उन्हें जाते हुए देखा।

     

    सुदामा कुछ कदम चले, फिर पलटकर बोले,

     

    “कृष्ण!”

     

    “हाँ?”

     

    “इस बार मैं वादा नहीं भूलूँगा।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मुझे पता है।”

     

    सुदामा ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “तुम मेरे दोस्त हो… ये बात अब कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और तुम मेरे दोस्त हो… ये बात मुझे कभी याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    सुदामा आगे बढ़ गए।

     

    उनके कदम पहले से ज्यादा मजबूत थे।

     

    अब उनके पास धन नहीं था।

     

    महल नहीं था।

     

    लेकिन उनके दिल में एक ऐसी दौलत थी, जो किसी राजा के पास भी नहीं होती—

     

    सच्चे दोस्त का विश्वास।

     

    रास्ते में बच्चा उनके साथ चल रहा था।

     

    सुदामा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चलो, अब तुम्हें पढ़ाई करनी है।”

     

    बच्चा मुस्कुराया।

     

    “और अगर मैं गलती करूँ तो?”

     

    सुदामा हँस पड़े।

     

    “तो मैं तुम्हें समझाऊँगा।”

     

    “और अगर फिर भी गलती करूँ?”

     

    “तो फिर…”

     

    सुदामा कुछ पल रुके।

     

    “फिर तुम्हें कृष्ण की एक बात याद दिलाऊँगा।”

     

    बच्चे ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “किसी का हाथ पकड़ो तो उसे बीच रास्ते में छोड़ना मत।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    दूर महल की ओर देखते हुए सुदामा के मन में कृष्ण का चेहरा था।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “कृष्ण, हमारा वो वादा कभी टूटा ही नहीं था… बस मैं उसे कुछ समय के लिए भूल गया था।”

     

    हवा धीरे-धीरे चल रही थी।

     

    सुदामा की पोटली उनके कंधे पर थी।

     

    और उसमें रखी पुरानी निशानी जैसे उन्हें बार-बार यही बता रही थी—

     

    सच्ची दोस्ती में दूरी हो सकती है, समय बदल सकता है, जिंदगी बदल सकती है… लेकिन सच्चे दोस्त के लिए दिल में जगह कभी नहीं बदलती।

     

    और इसी के साथ कृष्ण और सुदामा की वह कहानी पूरी हुई—

     

    एक ऐसी दोस्ती की कहानी, जिसमें न कोई स्वार्थ था, न कोई हिसाब… सिर्फ विश्वास था, अपनापन था और एक ऐसा वादा था, जो वर्षों बाद भी अपनी जगह कायम रहा।

     

    समाप्त 

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • गुरुकुल की ओर लौटते

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    अध्याय 13 — गुरुकुल की ओर लौटते कदम

    सुबह होते ही सुदामा ने गुरुकुल जाने की तैयारी शुरू कर दी।

     

    कई साल बीत चुके थे।

     

    जिस रास्ते पर कभी दो बच्चे नंगे पैर दौड़ा करते थे, उसी रास्ते पर अब सुदामा एक बूढ़े यात्री की तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

     

    उनके हाथ में वही छोटी-सी पोटली थी।

     

    वह बार-बार उसे देखते।

     

    उन्हें अब भी समझ नहीं आ रहा था कि कृष्ण ने आखिर इसमें ऐसा क्या रखा है, जो उन्हें उनके अतीत तक ले जा रहा है।

     

    उनकी पत्नी ने रास्ते के लिए थोड़ा भोजन बाँधा।

     

    “इसे रख लीजिए।”

     

    सुदामा ने पोटली के पास वह भोजन रखा।

     

    फिर पत्नी की तरफ देखकर बोले,

     

    “पता नहीं कितने दिन बाद वापस आऊँगा।”

     

    पत्नी मुस्कुराईं।

     

    “आप कृष्ण के दोस्त हैं। जहाँ कृष्ण की याद बुला रही है, वहाँ जाने में देर कैसी?”

     

    सुदामा भी मुस्कुरा दिए।

     

    “तुम्हें लगता है कृष्ण ने सच में कुछ सोचकर ये सब किया है?”

     

    “मुझे तो हमेशा से लगता है कि कृष्ण जो करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई वजह जरूर होती है।”

     

    सुदामा ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ… यही तो बात है।”

     

    कुछ देर बाद वह चल पड़े।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    चलते-चलते उन्हें गुरुकुल के दिन याद आने लगे।

     

    कृष्ण और वह साथ बैठकर पढ़ते थे।

     

    कभी गुरुजी की डाँट खाते।

     

    कभी जंगल से लकड़ियाँ लेने जाते।

     

    कभी भूख लगने पर एक-दूसरे से अपना थोड़ा-सा भोजन बाँट लेते।

     

    एक याद आते ही सुदामा हँस पड़े।

     

    “कृष्ण कितना शरारती था…”

     

    फिर अचानक उनकी हँसी रुक गई।

     

    उन्हें वही आखिरी शाम याद आई।

     

    कृष्ण का चेहरा।

     

    उसकी आँखों की उदासी।

     

    और वह अधूरा वादा।

     

    सुदामा ने खुद से कहा,

     

    “आज मुझे सब याद करना ही होगा।”

     

    शाम होते-होते वह उस जंगल के पास पहुँच गए जहाँ कभी गुरुकुल हुआ करता था।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उनके कदम रुक गए।

     

    सामने वही पुराना रास्ता था।

     

    पेड़ अब बहुत बड़े हो चुके थे।

     

    आश्रम की दीवारें कुछ टूट गई थीं।

     

    लेकिन जगह वही थी।

     

    सुदामा धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    आँगन में कदम रखते ही उनके शरीर में जैसे एक सिहरन दौड़ गई।

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    अचानक उन्हें कृष्ण की आवाज सुनाई दी।

     

    “सुदामा, जल्दी करो!”

     

    वह मुस्कुरा दिए।

     

    “तुम हमेशा मुझे ही जल्दी करने को कहते थे।”

     

    फिर उनकी आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    “कृष्ण…”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    सुदामा ने पोटली निकाली।

     

    “अब बताओ दोस्त… मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”

     

    उसी समय पीछे से किसी की आवाज आई,

     

    “क्योंकि कुछ बातें जगह बदलने से नहीं बदलतीं।”

     

    सुदामा तुरंत पलटे।

     

    सामने एक वृद्ध व्यक्ति खड़ा था।

     

    सुदामा ने उसे ध्यान से देखा।

     

    पहचानने की कोशिश की।

     

    वृद्ध मुस्कुराया।

     

    “पहचाना नहीं?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    वह व्यक्ति आगे आया।

     

    “मैं उसी गुरुकुल का एक पुराना सेवक हूँ।”

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम…?”

     

    “हाँ।”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें और कृष्ण को बचपन से देखा है।”

     

    सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।

     

    फिर उन्होंने पूछा,

     

    “क्या कृष्ण ने तुम्हें मेरे बारे में बताया था?”

     

    वृद्ध मुस्कुराया।

     

    “बहुत पहले।”

     

    “क्या?”

     

    “उन्होंने कहा था कि एक दिन सुदामा यहाँ जरूर लौटेगा।”

     

    सुदामा का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “और उन्होंने ये भी कहा था कि उसे क्या बताना है?”

     

    वृद्ध ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    सुदामा परेशान हो गए।

     

    “तो फिर?”

     

    वृद्ध ने आश्रम के पुराने कमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “उन्होंने तुम्हारे लिए वहाँ कुछ छोड़ा था।”

     

    सुदामा कुछ पल वहीं खड़े रहे।

     

    “क्या?”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “यह तुम्हें खुद देखना होगा।”

     

    सुदामा धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़े।

     

    दरवाजे पर हाथ रखते ही उन्हें कृष्ण की वही पुरानी मुस्कान याद आ गई।

     

    उन्होंने दरवाजा खोला।

     

    कमरे में धूल जमी थी।

     

    एक तरफ पुरानी लकड़ियाँ थीं।

     

    दूसरी तरफ कुछ टूटे हुए सामान।

     

    लेकिन कमरे के बीचोंबीच एक छोटी-सी लकड़ी की पेटी रखी थी।

     

    सुदामा उसे देखते ही रुक गए।

     

    पेटी पर एक छोटा-सा चिन्ह बना था।

     

    वही चिन्ह…

     

    जो कृष्ण अपनी किताबों पर बनाया करते थे।

     

    सुदामा ने काँपते हाथों से पेटी उठाई।

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “इसे खोलने से पहले अपनी पोटली देखना।”

     

    सुदामा चौंक गए।

     

    उन्होंने पोटली खोली।

     

    अंदर रखी पुरानी चीज को बाहर निकाला।

     

    वह एक छोटी-सी लकड़ी की माला थी।

     

    सुदामा उसे देखते ही स्तब्ध रह गए।

     

    “ये…”

     

    उनकी आँखों के सामने एक पुरानी तस्वीर जैसी याद उभरी।

     

    कृष्ण वही माला उनके हाथ में दे रहे थे।

     

    और कह रहे थे—

     

    “इसे संभालकर रखना।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मैं इसे भूल गया था…”

     

    वृद्ध चुपचाप खड़ा रहा।

     

    सुदामा ने पेटी की ओर देखा।

     

    “क्या इसमें वही बात है?”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “शायद।”

     

    सुदामा ने पेटी खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी…

     

    बाहर मंदिर की घंटी जैसी आवाज सुनाई दी।

     

    सुदामा ठिठक गए।

     

    वृद्ध भी अचानक गंभीर हो गया।

     

    “ये आवाज…”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    वृद्ध ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “ये घंटी कई सालों से नहीं बजी।”

     

    दोनों बाहर की तरफ देखने लगे।

     

    और तभी सुदामा को लगा…

     

    जैसे किसी ने बहुत दूर से उनका नाम पुकारा हो।

     

    “सुदामा…”

     

    वह आवाज बिल्कुल कृष्ण जैसी थी।

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “कृष्ण?”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    लेकिन अब सुदामा के सामने सिर्फ एक सवाल था—

     

    अगर कृष्ण यहाँ नहीं थे, तो फिर उनकी आवाज किसने पुकारी थी?

     

    क्रमशः…

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